शनिवार, 22 मार्च 2008

सांझ फागुन की !!!!!!


फिर कहीं मधुमास की पदचाप सुन,
डाल मेंहदी की लजीली हो गई।

दूर तक अमराइयों, वनबीथियों में
लगी संदल हवा चुपके पांव रखने,
रात-दिन फिर कान आहट पर लगाए
लगा महुआ गंध की बोली परखने

दिवस मादक होश खोए लग रहे,
सांझ फागुन की नशीली हो गई।

हंसी शाखों पर कुंआरी मंजरी
फिर कहीं टेसू के सुलगे अंग-अंग,
लौट कर परदेश से चुपचाप फिर,
बस गया कुसुमी लताओं पर अनंग

चुप खड़ी सरसों की गोरी सी हथेली
डूब कर हल्दी में पीली हो गई।

फिर उड़ी रह-रह के आंगन में अबीर
फिर झड़े दहलीज पर मादक गुलाल,
छोड़ चन्दन-वन चली सपनों के गांव
गंध कुंकुम के गले में बांह डाल

और होने के लिए रंगों से लथपथ
रेशमी चूनर हठीली हो गई।

- रामानुज त्रिपाठी

रविवार, 9 मार्च 2008

ये ज़मीं हमारी नही ??

एक करीबी मित्र हैं स्वप्रेम तिवारी ...... साथ ही एक ही विश्विद्यालय में पढ़ते हैं और आजकल जी बिजनेस में रनडाउन पर प्रोडक्शन एक्सेकुटिवके तौर पर काम कर रहे हैं। उन्ही की एक काफ़ी मार्मिक कविता या कहें नज्म प्रस्तुत है इस बार। यह पंक्तिया महाराष्ट्र में हाल ही की राजनैतिक नौटंकी से उठी टीस बयां करती हैं। तो स्वागत करें स्वप्रेम का !


पराये हैं,
ये तो मालूम था हमको
जो अब कह ही दिया तूने
तो आया सुकूं दिल को

शराफत के उन सारे कहकहों में
शोर था इतना
मेरी आवाज़ ही
पहचान में न आ रही मुझको

बिखेरे क्यों कोई
अब प्यार की खुशबू फिज़ाओं में
शक की चादरों में दिखती
हर शय यहाँ सबको

बढ़ाओं आग नफ़रत की
जगह भी और है यारों
दिलों की भट्टियों में
सियासत को ज़रा सेको

सड़क पे आ के अक्सर
चुप्पियाँ दम तोड़ देती हैं
बस इतनी खता पे
पत्थर तो न फेंकों

स्वप्रेम तिवारी
www.khabarchilal.blogspot.com

शनिवार, 1 मार्च 2008

अच्छा अनुभव - भवानी भाई

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हुए भवानी प्रसाद मिश्रा .... भवानी भाई के नाम से मशहूर ! उन्ही की एक पसंदीदा कविता पेश ऐ खिदमत है ........ !!

मेरे बहुत पास

मृत्यु का सुवासदेह पर

उस का स्पर्श मधुर ही कहूँगा

उस का स्वर

कानों में भीतर

मगर प्राणों में जीवन की लय तरंगित

और उद्दाम किनारों में

काम के बँधा प्रवाह नाम का

एक दृश्य सुबह का

एक दृश्य शाम का

दोनों में क्षितिज पर

सूरज की लाली

दोनों में धरती पर छाया

घनी और लम्बी इमारतों की

वृक्षों की देहों की

काली दोनों में कतारें

पंछियों की चुप

और चहकती हुई

दोनों में राशीयाँ फूलों

की कम-ज्यादा महकती हुई

दोनों में एक तरह की शान्ति

एक तरह का आवेग

आँखें बन्द प्राण खुले हुए

अस्पष्ट मगर धुले हुऐ

कितने आमन्त्रण

बाहर के भीतर के

कितने अदम्य इरादे

कितने उलझे कितने सादे

अच्छा अनुभव है मृत्यु

मानो हाहाकार नहीं है कलरव है!

- भवानीप्रसाद मिश्र

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी