मंगलवार, 31 मार्च 2009

बापू वाकई आज खुश होंगे......

बहरहाल अब जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने संजू बाबा के चुनाव लड़ने पर रोक लगा ही दी है तो इस पर ज्यादा टीका टिप्पणी नहीं पर इतना ज़रूर कहूँगा किएक लखनवी होने के नाते खुश हूँ......तो आज इसी परिप्रेक्ष्य में देखें हमारी चुनावी चित्र कथा ('अमर' चित्र कथा विवादित हो जायेगा) का अगला अंक.....




दरअसल यह पोस्ट की प्रतिष्ठा की हानि के लिए नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की प्रतिष्ठा की हानि के ख़िलाफ़ है। वाकई देश में न्यायपालिका अभी जिंदा है.....सत्यमेव जयते ! बापू वाकई आज खुश होंगे......

सोमवार, 30 मार्च 2009

दुनिया जिसे कहते हैं.....

कई महीने बाद एक बार फिर आपके लिए पुरानी डायरी के पीले पन्नों से कुछ हर्फ़ निकाल के लाया हूँ.....एक कविता जो छोटी है (मैं अक्सर बड़ी कवितायें लिखता हूँ) पर मुझे पसंद है, उस समय जब कॉलेज में थे...तब कैसा लगता था, क्या विचार थे उस को लिख डाला था....घर के बाहर की दुनिया बड़ी अजीब लगने लगी थी। अचानक से माहौल बदलने लगा था, अब समझ में आता है कि आज जो है...वो इसकी शुरुआत थी ! खैर आप कविता पढ़ें.....पीले पन्नों पर इसकी तारीख दर्ज है सोलह अक्टूबर, २००७......

दुनिया

आँखें
झपकती
खुलती-मुंदती,
बार बार
देखती हैं,
समझती हैं
कितना अबूझ, यह संसार !

फिर मुंदती हैं
और फिर देखती हैं
देखो जहाँ तक फैला है,
इसका विस्तार

फिर हंसती हैं आँखें
इसकी संपत्ति पर
हैरान हो
इसकी गति पर !
भयभीत हो
इसकी मति पर....

फिर फैल जाती हैं
सोचती हैं
दुनिया का
कितना नन्हा है आकार
दाई आँख के इस कोर
से शुरू
और
बायीं आँख के कोर पर.....

फिर विचलित हो
समझती हैं सारा व्यापार
जान जाती हैं
ये दुनिया है बाज़ार

फिर मुंद जाती है
और
गिरा देती हैं
कुछ बूँद
आंसू................

मयंक

रविवार, 29 मार्च 2009

तो आप क्या कहते हैं ?

आज इन्टरनेट पर टहलते हुए एक उक्ति हाथ लगी....पढ़ी तो मज़ा आया.....समझी तो ज्ञान पाया.....पर आप बताएं की क्या आप इससे सहमत हैं ? मतलब की इसके जवाब में आप क्या कहते हैं......लेखक का नाम नहीं पता चल पाया पर जिसने भी कही खूब कही .....आप कहें आप के क्या विचार हैं....उक्ति है,
Politicians are like diapers. They both need changing regularly and for the same reason.
अर्थात जजमान.....की नेता लोग डाइपर (समझते हैं ना) की तरह होते हैं, दोनों को ही नियमित रूप से बदलना पड़ता है....वो भी एक ही वजह से !
तो आप कहें आप क्या कहते हैं ?

शनिवार, 28 मार्च 2009

फिर फिर देखें....फिर फिर मज़ा लें !

वरुण गांधी भाजपा के गांधी हैं और राजनीति के भाजपाई स्कूल में कट्टरपंथ की तालीम तो उनको दे ही दी गई है, अब अगला घंटा (कक्षा) है राजनीतिक नौटंकी सीखने की ....सो आज वह भी लग गई है पॉलिटिकल ड्रामे के असाइंमेंट के तौर पर आज वरुण गांधी पीलीभीत में गिरफ्तारी देने जा रहे हैं, दो दिन पहले एक तस्वीर बनाई थी आज उसे पब्लिश कर देते हैं.......

वरुण ये कह रहे हैं कि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं कहा.....फिर कह रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ साजिश हुई है, फिर कहते हैं कि वि जेल जाने को तैयार हैं.....क्या ये बयान विरोधाभासी नहीं ?जवाब अपने अन्दर ढूँढिये.....हिंदुत्व का ये चिन्तक इतने दिन कहाँ था ?

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

सृजन का पर्व....नव त्राण की कल्पना

गुडी पडवा, उगादि या युगादि या कहें तो वर्ष प्रतिपदा....कुल जमा आज भारतीय पारंपरिक कैलेंडर या कहें तो पंचांग का पहला दिन है तो मतलब यह की आज नए वर्ष का पहला दिन है, पारंपरिक नव वर्ष का। वस्तुतः प्राचीन पंचांग (विक्रमी और शक दोनों) के अनुसार चैत्र मास की प्रतिपदा वर्ष का पहला दिन है, आज वही दिन है। पुरातन मान्यता यह है कि आज ही के दिन ब्रह्मा ने सृष्टि की सरंचना का आरम्भ किया था सो नई सरंचना का पहला दिन है नव संवत्सर .......इसीलिए इस दिन से ही पंचांग या वर्ष की शुरुआत मान ली गई। तो भाई सबसे पहले आप सबको बधाई.....जैसा कि बच्चन जी एक जगह जल्दबाज़ीमें लिख गए,
वर्ष नव,हर्ष नव,
जीवन का उत्कर्ष नव।

नव उमंग,नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह,नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

गीत नवल,प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,

जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

पढ़ के लगा तो होगा कि जल्दबाज़ी में ही लिख गए पर अर्थ गहरे हैं, यह तो खैर महान रचनाकारों की खासियत है कि जब जल्दबाज़ी में लिखते हैं तो और भी अच्छा लिखते हैं (और जो ख़ुद की भी समझ में ना आए वह कालजयी हो जाता है :) ) फिलहाल विषय को आगे बढाते हैं नव संवत्सर बहुत महत्वपूर्ण तिथि है हालांकि वर्तमान युग में हमारी आधुनिक जीवन शैली रोमन कैलेंडर को ही प्राथमिकता देती है सो इसकी पूछ अधिक नहीं बची पर आपको बता दूँ कि शक संवत हमारे देश का राष्ट्रीय पंचांग है सो उस हिसाब से भी यह साल का पहला दिन ही है। इसे महारष्ट्र में शालिवाहन की दंतकथा से जोड़ कर विजय के पर्व गुडी पड़वा के रूप में मनाया जाता है तो कर्नाटका और आन्ध्र प्रदेश में उगादि के नाम से। उगादि दरअसल एक अपभ्रंश शब्द है जो संस्कृत के युगादि से प्राप्त किया गया है, युगादि यानी कि युग की शुरुआत जो सृष्टि की सरंचना की ही ओर इंगित करता है।
पर इसके अलावा भी इस तिथि की कुछ विशेषताएं हैं जो शायद हमें मालूम हो तो हम इसे केवल नव वर्ष के दिन के तौर पर नहीं देखेंगे। बहुत से लोगों को नहीं मालूम होगा पर हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा के विरोध का साहस दिखलाने वाले स्वामी दयानंद ने संकीर्ण हिन्दू धर्म मत के ख़िलाफ़ जा कर आर्य समाज की स्थापना १८७५ में इसी दिन मुंबई में की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी दिन श्री राम का वनवास से लौटने के बाद राज्याभिषेक किया गया था। यही नहीं उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत भी इसी दिन से चालू किया था। इतिहास कहता है कि प्रख्यात गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से अपने प्रसिद्द पंचांग की गणना करनी शुरू की थी।
अक्सर इतिहास मुद्दों से भटकाने में अहम् भूमिका अदा करता है और ऐसा ही होगा अगर मैं वापिस मुद्दे पर नहीं आऊंगा तो, उदाहरण चाहिए तो हमारे नेताओं से मिलिए जो आज तक इतिहास से उबर नहीं पाये हैं; कभी ईश्वर की जन्मभूमि के नाम पर खून बहवा देते हैं तो कभी धर्मयुद्ध के नाम पर.....कुल जमा बवाल इतिहास का है जबकि हम यह भी नहीं जानते हैं कि वास्तविकता में हमारे इतिहास को लिखते वक़्त कितना खेल (Manipulation) हुआ है, जैसा कि मनु स्मृति की प्रतियाँ बनाते पर हुआ और कितनो को हमने वर्ण के आधार पर उनके अधिकारों से वंचित कर दिया। इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि इतिहास की बात करते करते मैं फिर भटक गया...देखा!
तो मुद्दा था पारंपरिक नव संवत्सर का.....देने आया था बधाई तो यह दिन मनाते हैं कि इस दिन सरंचना शुरू हुई थी....सृष्टि की सरंचना..........सृष्टि जो हमारे आस पास हमारे लिए है! प्रकृति जो वास्तविक देवता है, सृष्टि जो हमें वह सब देती है जो हमें चाहिए.....और फिर हम कह देते हैं कि अहं ब्रह्मास्मि ! अभी हाल ही में पापुआ न्यू गिनी द्वीप समूह पर वैज्ञानिकों ने ५० से भी अधिक नई जीव प्रजातियाँ ढूंढी हैं जो अब तक अज्ञात थी.....इस सुंदर सृष्टि के बारे में ना जाने कितने सच हमें पता तक नही पर हम परग्रहों को नापने निकल पड़े हैं। हम ख़ुद को ही नहीं जानते तो अन्तरिक्ष को छान डालने से क्या होगा? यह दर्शन नहीं है पर .....हम जिस तरह से तरक्की के नाम पर इस सुंदर सृष्टि का दोहन कर इसे बरबाद कर रहे हैं, हम कहीं ना कहीं इतनी महान सरंचना से निर्मम खिलवाड़ कर रहे हैं....हम सृष्टि का सर्जन नहीं कर सकते फिर किसने अधिकार दिया हमें विनाश का ...........
पर कौन समझाए मानव को जो ख़ुद मानव तक को नहीं बख्शता.....मज़हब और सोच की जिदों पर इंसानियत को बलि चढ़ा देता है उससे क्या उम्मीद की जाए पर आज नव संवत्सर के दिन आप सबसे अनुनय है कि कुछ सोचें कि सृजन ज़रूरी है कि अहं ........आज नया वर्ष शुरू हो रहा है, आइये प्रण लें कि नए साल में वाकई इंसान कहलाने लायक योग्यताएं हासिल करने की कोशिश करेंगे......
अंत में सोहन लाल द्विवेदी की कविता नव वर्ष

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;

मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;

श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;

जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!
एक बार फिर मंगलकामनायें ............

मंगलवार, 24 मार्च 2009

कुछ सूचनाएँ ....

दो दिन पहले आपको कवि धूमिल की एक रचना पढ़वाई थी, आज कवि धूमिल की एक और व्यवस्था को ललकारती कविता प्रस्तुत है;

कुछ सूचनाएँ

सबसे अधिक हत्याएँ
समन्वयवादियों ने की।
दार्शनिकों ने
सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।
भीड़ ने कल बहुत पीटा
उस आदमी को
जिस का मुख ईसा से मिलता था।

वह कोई और महीना था।
जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,
किंतु इस बार तो
मौसम बिना बरसे ही चला गया
न कहीं घटा घिरी
न बूँद गिरी
फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु
कई प्रतिशत बढ़ गए

कई बौखलाए हुए मेंढक
कुएँ की काई लगी दीवाल पर
चढ़ गए,
और सूरज को धिक्कारने लगे
--व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है
सूरज कितना मजबूर है
कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।

हवा बुदबुदाती है
बात कई पर्तों से आती है—
एक बहुत बारीक पीला कीड़ा
आकाश छू रहा था,
और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर
शौचालयों के सामने
पँक्तिबद्ध खड़े हैं।

आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं
लोग खोई हुई आवाज़ों में
एक दूसरे की सेहत पूछते हैं
और बेहद डर गए हैं।
सब के सब
रोशनी की आँच से
कुछ ऐसे बचते हैं
कि सूरज को पानी से
रचते हैं।

बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चौरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए,
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर

प्रेम में असफल छात्राएँ
अध्यापिकाएँ बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी-
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई,
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है

मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़को पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है
संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क,
आरामकुर्सी पर
चित्त पड़े हैं।

स्व. सुदामा प्रसाद पाण्डेय धूमिल

सोमवार, 23 मार्च 2009

शहीद सुखदेव का महात्मा गांधी को पत्र

आज २३ मार्च है और इसी दिन १९३१ में क्रान्ति के महानायकों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई थी, आज के दिन आपके सामने हम प्रस्तुत कर रहे हैं एक दुर्लभ पत्र जो मार्च १९३१ में अपनी फांसी से पहले वीर सुखदेव ने महात्मा गांधी को लिखा था। देखें कि किस तरह सुखदेव का जीवन क्रांति के विचारों को समर्पित था,

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परम कृपालु महात्मा जी,
आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की सफलता के बाद आपने क्रांतिकारी कार्यकर्त्ताओं को फिलहाल अपना आंदोलन बंद कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौक़ा देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं.
वस्तुतः किसी आंदोलन को बंद करना केवल आदर्श या भावना से होनेवाला काम नहीं है. भिन्न-भिन्न अवसरों की आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता है.
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अंतिम समझौता न होगा.
मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ गए होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले-मकसूद पर पहुँच गए हैं.
संपूर्ण स्वतंत्रता जब तक न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बँधी हुई है.
उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा विश्राम है.
इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की कल्पना की जा सकती और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है.
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आंदोलन के अगुआओं का है.
लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आपने फिलहाल सक्रिए आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा है, तो भी वह प्रस्ताव तो कायम ही है.
इसी तरह हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही साफ पता चलता है कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाज-सत्तावादी प्रजातंत्र की स्थापना करना है.
यह प्रजातंत्र मध्य का विश्राम नहीं है. उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने के लिए बँधे हुए हैं.
परंतु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध-नीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे. क्रांतिकारी युद्ध जुदा-जुदा मौकों पर जुदा-जुदा रूप धारण करता है.
कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी केवल आंदोलन-रूप होता है, और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन जाता है.
ऐसी दशा में क्रान्तिवादियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए. परंतु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया. निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतिवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता, हो नहीं सकता.
आपके समझौते के बाद आपने अपना आंदोलन बंद किया है, और फलस्वरूप आपके सब कैदी रिहा हुए हैं.
पर क्रांतिकारी कैदियों का क्या? 1915 से जेलों में पड़े हुए गदर-पक्ष के बीसों कैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं.
मार्शल लॉ के बीसों कैदी आज भी जिंदा कब्रों में दफनाये पड़े हैं. यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का है.
देवगढ़, काकोरी, मछुआ-बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र के कैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बंद पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं.
लाहौर, दिल्ली, चटगाँव, बम्बई, कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज़्यादा षड्यंत्र के मामले चल रहे हैं. बहुसंख्यक क्रांतिवादी भागते-फिरते हैं, और उनमें कई तो स्त्रियाँ हैं.
सचमुच आधे दर्जन से अधिक कैदी फाँसी पर लटकने की राह देख रहे हैं. इन सबका क्या?
लाहौर षड्यंत्र केस के सज़ायाफ्ता तीन कैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गए हैं और जिन्होंने जनता की बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की है, वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नहीं हैं.
उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नहीं है. सच पूछा जाए तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फाँसी पर चढ़ जाने से ही अधिक लाभ होने की आशा है.
यह सब होते हुए भी आप इन्हें अपना आंदोलन बंद करने की सलाह देते हैं. वे ऐसा क्यों करें? आपने कोई निश्चित वस्तु की ओर निर्देश नहीं किया है.
ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आंदोलन को कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं, और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को द्रोह, पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है.
यदि ऐसी बात नहीं है, तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते.
अपना आंदोलन बंद करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्धी की प्रतीति करा लेने का प्रयत्न करना चाहिए था.
मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं, विनाश और संहार में आनंद मानने वाले हैं.
मैं आपको कहता हूँ कि वस्तुस्थिति ठीक उसकी उलटी है, वे सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं, और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं, उसका उन्हें पूरा-पूरा ख्याल होता है.
और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग की अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यंत महत्त्व का मानते हैं, हालाँकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवा और कोई चारा उनके लिए नहीं है.
उनके प्रति सरकार की मौजूदा नीति यह है कि लोगों की ओर से उन्हें अपने आंदोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है, उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाए. अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है.
ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि-भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करनेवाली होगी.
इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि या तो आप कुछ क्राँतिकारी नेताओं से बातचीत कीजिए-उनमें से कई जेलों में हैं- और उनके साथ सुलह कीजिए या ये सब प्रार्थनाएँ बंद रखिए.
कृपा कर हित की दृष्टि से इन दो में से एक कोई रास्ता चुन लीजिए और सच्चे दिल से उस पर चलिए.
अगर आप उनकी मदद न कर सकें, तो मेहरबानी करके उन पर रहम करें. उन्हें अलग रहने दें. वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं.
वे जानते हैं कि भावी राजनैतिक युद्ध में सर्वोपरि स्थान क्रांतिकारी पक्ष को ही मिलनेवाला है.
लोकसमूह उनके आसपास इकट्ठा हो रहे हैं, और वह दिन दूर नहीं है, जब ये जमसमूह को अपने झंडे तले, समाजसत्ता, प्रजातंत्र के उम्दा और भव्य आदर्श की ओर ले जाते होंगे.
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हों, तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिए.
आशा है, आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्वसाधारण के सामने प्रकट करेंगे.
आपका
अनेकों में से एक

शनिवार, 21 मार्च 2009

जनतन्त्र के सूर्योदय में

चुनाव का मौसम आ चला है और नेता टाइप लोग लोकतंत्र और जनतंत्र के बड़े बड़े नारे बुलंद कर रहे है और बातें बना रहे हैं। ऐसे ही विडंबना पूर्ण समय को श्रद्धासुमन चढाती हुई एक कविता अभी कल ही पढ़ी, कवि धूमिल के संग्रह संसद से सड़क तक में और कविता ने ऐसी चोट की किरात यही सोचते गुजरी कि सुबह इसे पोस्ट करना ही है.....तो पढ़ें...

जनतन्त्र के सूर्योदय में

रक्तपात –कहीं नहीं होगा
सिर्फ़, एक पत्ती टूटेगी!
एक कन्धा झुक जायेगा!
फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई आँखों को
एक साथ लाल फीतों में लपेटकर
वे रख देंगेकाले दराज़ों के निश्चल एकान्त में
जहाँ रात में संविधान की धाराएँ
नाराज़ आदमी की परछाईं को
देश के नक्शे में
बदल देती है

पूरे आकाश को
दो हिस्सों में काटती हुई
एक गूँगी परछाईं गुज़रेगी
दीवारों पर खड़खड़ाते रहेंगे
हवाई हमलों से सुरक्षा के इश्तहार
यातायात को
रास्ता देती हुई जलती रहेंगी
चौरस्तों की बस्तियाँ

सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा
पीला अन्धकार
शहर की समूची
पशुता के खिलाफ़
गलियों में नंगी घूमती हुई
पागल औरत के 'गाभिन पेट' की तरह
सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा पीला अन्धकार
और तुम
महसूसते रहोगे कि ज़रूरतों के
हर मोर्चे पर
तुम्हारा शक
एक की नींद और
दूसरे की नफ़रत से
लड़ रहा है
अपराधियों के झुण्ड में शरीक होकर
अपनी आवाज़ का चेहरा टटोलने के लिए
कविता मेंअब कोई शब्द छोटा नहीं पड़ रहा है :
लेकिन तुम चुप रहोगे;
तुम चुप रहोगे और लज्जा के
उस गूंगेपन-से सहोगे –
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है, जो महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए एक साड़ी पर राज़ी है
सिर कटे मुर्गे की तरह फड़कते हुए
जनतन्त्र में
सुबह –सिर्फ़ चमकते हुए रंगों की चालबाज़ी है
और यह जानकर भी, तुम चुप रहोगे

या शायद, वापसी के लिए पहल करनेवाले –
आदमी की तलाश में

एक बार फिर
तुम लौट जाना चाहोगे मुर्दा इतिहास में
मगर तभी –य़ादों पर पर्दा डालती हुई सबेरे की
फिरंगी हवा बहने लगेगी
अख़बारों की धूल और
वनस्पतियों के हरे मुहावरे
तुम्हें तसल्ली देंगे
और जलते हुए जनतन्त्र के सूर्योदय में
शरीक़ होने के लिए
तुम, चुपचाप, अपनी दिनचर्या का
पिछला दरवाज़ा खोलकर
बाहर आ जाओगे
जहाँ घास की नोक परथरथराती हुई ओस की एक बूंद
झड़ पड़ने के लिए
तुम्हारी सहमति का इन्तज़ार कर रही है।

धूमिल
(१९३६ में बनारस में जन्म और अल्पायु में ही १९७५ में देहावसान जब ये ३९ साल ही के थे। धूमिल को वास्तविक ख्याति और सम्मान मृत्यु के बाद मिला, इनके संग्रह कल सुनना मुझे के लिए निधन के ५ वर्ष बाद १९७९ में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, पर हाँ इनकी अमर पहचान बना यह संग्रह संसद से सड़क तक जो १९७१ में छाप गया था)

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

फिर देखें और फिर मज़ा लें....पक्का मज़ा आएगा

आज एक ई मेल में एक ऐसी तस्वीर मिली जिसने हंसा हंसा कर लोट पोट कर दिया, इस तस्वीर में एक देसी दवाई के बम्पर वैद्य ने अंग्रेजी भाषा में अपनी काबिलियत का ऐसी काबिलियत से वर्णन किया है की पढ़कर ही मज़े लिए जा सकते हैं,

हैं न अंग्रेज़ी ज़बरदस्त !

बुधवार, 18 मार्च 2009

हो ना हो ........

एक नई दुल्हन मेरा मतलब है नई ग़ज़ल पेश ऐ खिदमत है.....

चल पड़ सफ़र पे, कोई तेरे साथ हो न हो
हंस दे तू खुल के, कोई हसीं बात हो न हो

ख़्वाबों में हर इक रोज़, मिलते रहना उससे तुम
क्या जाने हक़ीकत में, मुलाक़ात हो न हो

जिससे भी मिलो, खुल के मिलो, हंस के मिलो तुम
न जाने कल को फिर यही, जज़्बात हो न हो

चंद रोज़ तुम सुकूं से दिन गुज़ार लो
रोशन फिर ख़यालों की कायनात हो न हो

उलझो न सवालों में, जवाबों से बचो तुम
शायद हमेशा ऐसे ही हालात हों न हो

बस एक बार मुड़ के तुम न देखना मुझे
फिर ज़हन में तुम्हारे ख़यालात हो न हो

आ तो गए मयंक सियासत में एक दिन
बस देखना पहली ही शह में मात यो न हो

मयंक सक्सेना

सोमवार, 16 मार्च 2009

बस देखें और मज़ा लें....दिल पे ना लें.....



आगे पढ़ें http://cavssanchar.blogspot.com/2009/03/blog-post_16.html

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

शोर...

१४ जून १९५० को जन्मे विष्णु नागर हिन्दी के प्रतिष्ठित कवियों में से हैं। हिन्दी पत्रिका कादम्बिनी के पूर्व सम्पादक (सम्प्रति वर्तमान में सन्डे नई दुनिया के सम्पादक) की साहित्यिक कृतियाँ हैं मैं फिर कहता हूँ चिड़िया(1974) (कविता संग्रह), तालाब में डूबी छह लड़कियाँ (1981) (कविता संग्रह), संसार बदल जाएगा (1985) (कविता संग्रह) । आज का दिन (1981) (कहानी संग्रह)......इनकी एक लघु कविता पढ़ें,

शोर

मेरे भीतर इतना शोर है
कि मुझे अपना बाहर बोलना
तक अपराध लगता है
जबकि बाहर ऐसी स्थिति है
कि चुप रहे तो गए।

विष्णु नागर

गुरुवार, 12 मार्च 2009

आज बिरज में होली रे रसिया.....

वैसे तो मैं थोडा सुस्त हूँ पर मुआफी चाहूंगा इस बार होली पर घर चला गया था इसलिए पिछले तीन चार दिन से कुछ नहीं लिखा....मैं बड़े दावे से कहता हूँ की लिखना मेरे लिए जल भोजन और श्वास है पर घर मोक्ष है और इसलिए फिर घर गया तो होली के रंग में ऐसा डूबा की लेखन भूल गया। फिलहाल आज लौट आया हूँ और याद कर रहा हूँ कल लखनऊ में खेली गई होली। विस्तृत पोस्ट तो बाद में पर परसों रात पूजा के बाद ढोलक उठा कर जो पहला गीत मैंने गाया था....उसे सुनवा देता हूँ, अरे नहीं अपनी नहीं शोभा गुर्टू की मधुर आवाज़ में ......ये एक लोकगीत है जो सदियों से ब्रिज और जहाँ जहाँ भी होली के त्यौहार और संगीत के रसिक हैं, गाया जा रहा है और सुना जा रहा है.....
इसीलिए परसों रात मैंने भी ढोलक उठाई और शुरू हो गया....आज बिरज में होली रे रसिया ....

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गीत गाकर देखिये, फिर जहाँ मन में प्रेम और बोली में रस हो वहीं ब्रिज है !
आज बिरज में होली रे रसिया
होरी है रे रसिया, बरजोरी है रे रसिया

आज बिरज में ...

इत तन श्याम सखा संग निकसे
उत वृषभान दुलारी है रे रसिया

आज बिरज में ...

उड़त गुलाल लाल भये बादर
केसर की पिचकारी है रे रसिया

आज बिरज में ...

बाजत बीन, मृदंग, झांझ, डफली
गावत दे -दे - तारी रे रसिया

आज बिरज में ...

श्यामा श्याम मिल होली खेलें,
तन मन धन बलिहारी रे रसिया,
आज बिरज में होली रे रसिया !
होली की शुभकामनायें

रविवार, 8 मार्च 2009

माँ काश तुम नारी होती.....


महिला दिवस पर समझ नहीं आया की क्या विशेष लिखा जाए, बचपन से घर में माँ, मौसियों, बुआओं दादियों, नानियों और बहनों को देखते बड़ा हुआ। समय के साथ लगातार स्त्रियाँ वही रही पर उनके किरदार बदलते गए....माँ सास बनी, बहनें किसी की बहू, किसी की भाभी तो किसी की पत्नी, किसी की बहन मेरी भाभी बनी तो कभी कोई बेटी मेरी संगिनी बन जायेगी.........बदलते किरदारों में ही हम हमेशा नारी को पहचानते हैं पर क्या वो इन किरदारों में उलझ कहीं खो तो नहीं गई ?


माँ काश तुम नारी होती.....


माँ
जब तुम बेटी थी
तब तुम
लाडली थी पिता की
रोज़ उनकी दिन भर की थकान को
बदल देती थी मुस्कराहट में


माँ
जब तुम बहन हुई
तब बाँधी तो राखी भाई को तुमने
पर खड़ी हुई ख़ुद आगे
उस पर खतरे की
हर आहट में

माँ
जब थी तुम प्रेमिका
तब एक एक जोड़ा गया
सिक्का
दे डाला था कॉलेज के
उस धोखेबाज़ युवक को

माँ
जब तुम बनी पत्नी
पति की हर
ग़लत हरक़त पर भी
ना दिल में दी जगह
तुमने शक को

माँ
जब तुम बहू थी
तब हर बात
हर ताना, हर व्यंग्य
हर कटाक्ष हर तारीफ़
तुमने निरपेक्ष भाव से सहा

माँ
जब तुम माँ बनी
पहली बार
कितना दर्द सहा
पर किसी से
कभी नहीं कहा

माँ
तुम जब भी
बेटी थी, बहन थी
पत्नी थी या माँ थी
तब भी हर बार तुम माँ ही रही
और कुछ कहाँ थी

पर माँ
तुम सब कुछ थी
तो स्त्री क्यों नहीं हो पायी
क्यों अपने भीतर की
स्त्री को
छुपा दिया इन आवरणों में

क्यूँ ख़ुद के अस्तित्व को
ख़त्म कर डाला
लगा कर
अपने ऊपर चिप्पियाँ हज़ार
हर बार

क्या एक माँ, एक बहन
या कुछ भी और
होने के साथ साथ
तुम्हारे लिए लाज़मी नहीं था
एक स्त्री भी होना

क्यूँ जब तुम बेटी थी
तो बेटे से कम हिस्से पर खुश हो गई....
क्यूँ जब तुम बहन थी
तो खाई
भाई के हिस्से की डांट

क्यूँ हर बार
यह सुन कर भी चुप रहीं
कि लड़की तो धन है पराया
क्यों प्रेमी से ही विवाह का
साहस मन में नहीं आया

क्यों किताबें ताक पर रखी
और थाम ली हाथों में
कड़छियां
नहीं पूछा कभी पिता से कि
क्यों काम करें केवल लड़कियां

क्यों नहीं कभी कहा
कि नहीं
काम में कैसा बंटवारा
सब कमाएं, सब पढ़ें
क्या हमारा
तुम्हारा

मां
क्यों खुद अपनी बेटी को
बोझ मान लिया
क्यों नहीं बहू को लाड़
बेटी सा किया

मां
तुम तो मां थी न
फिर क्या मुश्किल था
तुम्हारे लिए
माँ तो सब कुछ कर सकती हैं ना

माँ
तो फिर
क्यूँ नहीं हो पायी तुम
एक स्त्री
माँ
क्यूँ तुम पर हावी रहा
हमेशा कोई नर

कितना अलग होता
तुम मां, बहन या कुछ भी
होने से पहले
एक नारी होती अगर.....

(मैं ऋणी हूं अपनी मां का जिनकी वजह से आज कुछ बन पाया......पर आज भी अखरता है कि कब तक बच्चों को पालने सिखाने और बड़ा करने की ज़िम्मेदारी, रसोई के बर्तनों का शोर और सलीके सीखने का ज़ोर केवल स्त्रियों पर ही रहेगा और बेटे को पाल कर बड़ा आदमी बना देने वाली माँ बेटी से अन्याय करने पर मजबूर हो जाती है ?)

शनिवार, 7 मार्च 2009

अब मैं वो नहीं.....

महिला दिवस की पूर्व संध्या पर .....
सिसकियाँ ....
बंद कमरों में घुटन
और दिमाग के भीतर की सीलन
अब और नही बची

अबकी सही उम्र
से पहले
किताबे लिए हाथों में मेंहदी
भी नहीं रची

अब गली के मोड़ पर
बैठे शोहदों को देख कर
लगता
कोई डर नहीं

अब घर से संवर कर
निकलने पर
पड़ोसियों के तानों का
कोई असर नहीं

अब लड़कों के साथ
खेलने पर
माँ
नाराज़ नहीं होती

अब लड़ती हूँ
बराबर से
अकेले में जाकर
नहीं रोती

अब चलती हूँ
तो सर उठा कर
देखती हूँ लोगों को
आत्मविश्वास से

लड़ी हूँ
सदियों से
तब जा कर आज यहाँ हूँ
अपने प्रयास से ........

मंगलवार, 3 मार्च 2009

अँधेरे चारों तरफ़ .......

सुबह सुबह दफ्तर पहुँचते ही हलचल दिखी....समझ में आ गया कि कुछ हुआ है पर जब पता चला कि लाहौर में श्रीलंकाई टीम पर हमला हुआ है और कई खिलाडी घायल हुए हैं तो होश उड़ गए......जब आंखों के सामने से उसके विसुअल्स गुज़रे तो जैसे काटो तो खून ही नहीं....इस घटना का दुःख शायद क्रिकेट को ही नहीं बल्कि इंसानियत को भी लंबे वक़्त तक सालता रहेगा.....राहत इन्दौरी की एक ग़ज़ल याद आ गई जो कहती है,

अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे

राहत इन्दौरी

सोमवार, 2 मार्च 2009

यह फागुनी हवा .........

मित्रों वसंत जा चुका है और फागुन का मौसम आ चुका है। फागुन के मौसम को बौराने का मौसम कहा जाता है,
मतलब बुढाऊ को चढी जवानी फागुन में
बूढा की कमर बनी कमानी फागुन में
मतलब मौसम ऐसा जो बदन ही नहीं दिल के भी पुराने दर्दों को जगह देता है। मौसम है इन दर्दों को सहलाने का और फिर जल्द ही होली भी हो ही लेगी.....तो पढ़ें फणीश्वर नाथ रेनू की एक कविता फागुन पर जो सारिका के 1 अप्रैल 1979 के अंक में प्रकाशित हुई थी ....मज़ा आएगा

यह फागुनी हवा

यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा
ले आई...ई...ई...ई
मेरे दर्द की दवा!

आंगन ऽ बोले कागा
पिछवाड़े कूकती कोयलिया
मुझे दिल से दुआ देती आई
कारी कोयलिया-या
मेरे दर्द की दवा
ले के आई-ई-दर्द की दवा!

वन-वन
गुन-गुन
बोले भौंरा
मेरे अंग-अंग झनन
बोले मृदंग मन--
मीठी मुरलिया!
यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा ले के आई
कारी कोयलिया!

अग-जग अंगड़ाई लेकर जागा
भागा भय-भरम का भूत
दूत नूतन युग का आया
गाता गीत नित्य नया
यह फागुनी हवा...!

फणीश्वर नाथ रेणु (रचना वर्ष १९५६)

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी