सोमवार, 28 नवंबर 2011

दो कप चाय...अदरक वाली...

सोचना
आदत ही बुरी है
फिर सोचा कि शाम हुई
फिर
तुम ज़ेहन में आए
अब सोचता हूं
कि न सोचूं तुम्हे
और सोचता ही जाता हूं
तुम्हारे बाल
तुम्हारे होंठ
तुम्हारी हंसी
तुम्हारा स्पर्श
और सर्दी की उस शाम की
वो बारिश...
सोच रहा हूं बना लूं फिर
वो अदरक की चाय
दो कप..
एक मेरा, एक तुम्हारा
दोनो पी लूं फिर
तुम मुझसे अलग कहां हो...

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी