संदेश
इतनी सस्ती थी कि विद नमकीन 'चार आने' की पी...
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काल तुझसे होड़ है मेरी...(आलोक तोमर की अंतिम कविता)
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बरखा और वीर... हमें आपसे सफाई नहीं चाहिए
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धूल-गुबार में जंतर मंतर...रंगरंगीला परजातंतर...
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