संदेश

इतनी सस्ती थी कि विद नमकीन 'चार आने' की पी...

कौन से मौसम में चले आए हो बादल...

काल तुझसे होड़ है मेरी...(आलोक तोमर की अंतिम कविता)

तुम मेरे आलोक थे....

जश्न जारी है...

बरखा और वीर... हमें आपसे सफाई नहीं चाहिए

लोकतंत्र के 'शाही' इमाम...

इंसानियत का बरगद...

अपनी हिंदी - काका हाथरसी

बीज कभी नहीं मरते हैं...

धूल-गुबार में जंतर मंतर...रंगरंगीला परजातंतर...