शनिवार, 19 जनवरी 2013

कौन से आदर्श, कैसी ज़िद और एक सपने की मौत...


" बहेलिये ने उस निरीह पक्षी को मार गिराने के लिएजो उड़ कर किसी बड़े खेत में बैठ गया थापूरी फसल को ही आग लगाने की कोशिश की।"


उस शाम मैं एनएसडी समकालीन रंगमंच के उद्घाटन कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाया, अब सोचता हूं तो अजीब सी दुविधा होती है...एकबारगी लगता है कि काश वहां पहुंच जाता तो जो हुआ उसे रोक पाता, फिर सोचता हूं कि अगर न रोक पाता तो...अच्छा ही हुआ नहीं पहुंच पाता। लेकिन पत्रिका के पहले अंक के बंडल हाथ में थामे मेट्रो से उतर मंडी हाउस पैदल आते पत्रिका के सम्पादक और शायद हम में से सबसे साधारण जीवन जी रहे पत्रकार राजेश चंद्र के लिए ये दुविधा नहीं दुष्कर घड़ी है। राजेश चंद्र के हाथ में जो बंडल है, वैसे ही न जाने कितने बंडल घर पर बंधे रखे हैं, और वो इस सोच में हैं कि क्या एक महात्वाकांक्षी और अद्भुत पत्रिका का पहला अंक बिना बिके रह जाएगा। राजेश चंद्र के स्वप्न के साथ दुष्कर्म हुआ है और जैसा कि घरों में होता रहा है, ये दुष्कर्म भी अपनों ने ही किया है। मशहूर रंगकर्मी अरविंद गौड़ उन कुछ लोगों में से थे, जिन्होंने राजेश चंद्र को इस पत्रिका को निकालने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन पत्रिका के विमोचन के मौके पर एनएसडी के मंच पर जा कर बजाय पत्रिका के बारे में बात करने के, अरविंद जी ने व्यक्तिगत कुंठा, गुस्से और आरोपों के लिए जिस तरह से समकालीन रंगमंच के मंच को रंगमंच बना दिया, वो वाकई अफ़सोसनाक होने से ज़्यादा शर्मनाक था। अरविंद जी मेरे कुछ बेहद घनिष्ठ लोगों में से हैं...बिल्कुल बड़े भाई जैसे, लेकिन धीरे धीरे बढ़ती असहिष्णुता और विरोध न स्वीकारने की आदत के साथ साथ, हर मंच पर अपनी बात कहने की आदत उनको उन सब से दूर लिए जा रही है, जो उनके साथ खड़े हैं। संभव है कि उनको और लोग मिल जाएंगे, लेकिन पुराने साथियों की कमी की पूर्ति स्वार्थ के लिए आने वाले लोग नहीं कर सकते हैं...ख़ैर अरविंद जी के थिएटर का स्तर भी उनके बदलते स्वभाव के साथ खड़ा है...लेकिन रंगकर्म सिर्फ रंगकर्म ही तो नहीं है...समाज बदलने का जो सपना थिएटर दिखाता है, क्या उसके लिए पहले खुद को बदलना ज़रूरी नहीं...अरविंद जी, आपसे डांट भी सुनी है और ख़ुद की समीक्षा भी सुनी है...निंदक नियरै राखिए में भरोसा रखता हूं, सो आपसे अपने सम्बंधों को दांव पर लगा कर शायद ये आखिरी बार कह रहा हूं कि थोड़ा संभल कर, थोड़ा सहज होकर, थोड़ा संवेदनशील हो कर सोचिएगा कि क्या सुधार कि गुंजाइश सिर्फ समाज में है, खुद में नहीं...और हां जनवादी न होना बुरा नहीं है...न होकर उसका आवरण ओढ़ना ज़्यादा बुरा है...एक अनुज और हितैषी के तौर पर अपनी इस तल्ख लेकिन शुभेच्छु टिप्पणी के साथ मैं आप को सिर्फ अपने सपने के कुछले जाने से चर्म से मर्म तक बुरी तरह चोटिल पत्रकार राजेश कुमार की इस ई मेल के साथ छोड़े जा रहा हूं, जो उन्होंने एएएसडी की निदेशक अनुराधा कपूर, अरविंद गौड़ और भानु भारती के नाम, इस मुहावरा बन चुके कार्यक्रम के ठीक अगले दिन लिखी थी, ये हम सबका भरोसा है कि राजेश भाई फीनिक्स बनेंगे...राख से उठ खड़ा होना थिएटर की ताकत है...राजेश भाई आपके पास तो शोले भी हैं और चिंगारियां भी...

राजेश कुमार की इस ईमेल को ही उनका औपचारिक बयान और पक्ष माना जाए

आदरणीय अनुराधा जी,
नमस्कार।
कल 14 जनवरी 2013 को शाम 5 बजे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के परिसर में भारतीय रंगमंच पर केन्द्रित पत्रिका " समकालीन रंगमंच " के लोकार्पण समारोह में जिस तरह की अनपेक्षित, दुर्भाग्यपूर्ण और अशोभनीय घटना हुई तथा आमंत्रित रंगकर्मियों में से कुछ ने जिस प्रकार मंच, समारोह के प्रयोजन और अवसर को दरकिनार कर अपनी राजनीतिक कुत्सा की निर्लज्ज अभिव्यक्ति की - उसने इस समारोह के आयोजनकर्ता और एक रंगकर्मी होने के नाते मुझे काफी व्यथित, लज्जित और हतप्रभ किया है और इस प्रकरण के बाद भिन्न-भिन्न प्रकार की जैसी प्रतिक्रियाएं सुनने में आ रही हैं उसके बाद मेरे लिए यह अति आवश्यक हो गया है कि  इस असहज परिस्थिति में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए अपना पक्ष स्पष्ट करूँ। इस क्रम में मैं कहना चाहता हूँ कि,
(1) कल के आयोजन में जो कुछ हुआ, उसके पीछे न तो एक व्यवस्था का विरोध करने की कोई क्रांतिकारिता थी, और न ही यह विचारों अथवा पक्षधरता के बीच कोई टकराहट ही थी। साफ तौर पर यह एक रचना और रचनाकार पर दुर्भावनापूर्ण व्यक्तिगत हमला था और एक गरीब के कोमल सपने को कुचलने की नीयत थी। बहेलिये ने उस निरीह पक्षी को मार गिराने के लिए, जो उड़ कर किसी बड़े खेत में बैठ गया था, पूरी फसल को ही आग लगाने की कोशिश की।
(2) "समकालीन रंगमंच " पत्रिका के प्रकाशन का निर्णय हर प्रकार से मेरा नितांत वैयक्तिक निर्णय है और मैंने अपनी रचनात्मक ज़रूरतों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के ख्याल से ही यथासामर्थ्य इसे निकलने की पहल की है। मेरी इस आकांक्षा और प्रयोजन की सिद्धि में जिन रंगकर्मी मित्रों का जैसा भी सहयोग मिला है, मैं उनका इसलिए भी हृदय से सम्मान करता हूँ कि उन्होंने एक बेहतर पत्रिका निकालने  की मेरी काबिलियत और जज्बे पर भरोसा किया और किसी भी शर्त की कोई पेशकश नहीं की।
(3) मैं उन सभी रंगकर्मी मित्रों एवं विद्वज्जनों का आभारी हूँ जिन्होंने जोखिम से भरे मेरे इस निर्णय को प्रोत्साहित किया और सहर्ष अपनी रचनाएँ छापने को दीं। मैं उन सभी रंगकर्मियों, साहित्यकारों एवं पत्रकारों  का आभारी हूँ जो समय निकाल कर इस लोकार्पण समारोह में शामिल हुए और उन्होंने इस नयी पत्रिका का स्वागत किया।
(4) मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और उसकी निदेशक महोदया का आभारी  हूँ जिन्होंने मेरे आग्रह पर प्रतिष्ठित भारत रंग महोत्सव के तयशुदा और अतिव्यस्त कार्यक्रम के बीच पत्रिका के लोकार्पण हेतु मंच, संसाधन और अवसर उपलब्ध करने में ज़रा भी विलम्ब नहीं किया और निश्चित रूप से इसके पीछे उनके मन में यही भावना थी की एक वैयक्तिक पत्रिका होते हुए भी यह प्रयास समकालीन रंग परिदृश्य में सकारात्मक हस्तक्षेप की संभावनाओं से युक्त है अतः देश के एकमात्र नाट्य विद्यालय को ऐसे किसी भी प्रयास को संरक्षण और जगह देनी चाहिए।
(5) यह समारोह और मंच राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय या भारत रंग महोत्सव का नहीं बल्कि "समकालीन रंगमंच" पत्रिका का था और इसमें जो भी लोग आमंत्रित थे या शरीक हुए वे पत्रिका के संपादक के आमंत्रण पर एक लोकार्पण समारोह में शामिल होने आये थे। यह एक सामान्य तथा बेहद अनौपचारिक किस्म का लोकार्पण कार्यक्रम था। कार्यक्रम से पहले और मंच से भी यह बात रखी  गयी थी कि हम किसी संगोष्ठी या सेमिनार के लिए नहीं बल्कि एक उद्घाटन के साक्षी बनाने के लिए इकठ्ठा हुए हैं। 
(6) एक आयोजक, रंगकर्मी और संपादक होने के नाते आमंत्रित वरिष्ठ, अनुभवी और सम्माननीय रंगकर्मियों से यह आशा रखना कि वे मंच और अवसर की गरिमा का निर्वाह करेंगे- कोई अपराध नहीं था, और इस बात की तो कतई उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि बार-बार अनुनय-विनय करने पर भी वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को थोड़ी देर के लिए विराम नहीं देंगे।
(7) पत्रिका के मंच से अपेक्षित गरिमा का निर्वाह न करते हुए तथा विषयांतर करते हुए आदरणीय श्री अरविन्द गौड़ जी ने अपने अतिथि संबोधन में जिस प्रकार की तल्खी के साथ गैरज़रूरी और बेमौके की राजनीतिक टिप्पणियां कीं, उसके बाद विवाद को रोकना और समारोह को जारी रखना संभव नहीं रह गया। उनसे अपेक्षा थी कि वे समकालीन परिदृश्य में रंगमंच में संवाद और समीक्षा की जगह और ज़रुरत पर विचार रखते और कुछ ऐसे उपाय सुझाते जिनसे एक नवजात पत्रिका के दीर्घ जीवन की कोई राह निकलती। परन्तु एक शिशु के जन्मोत्सव में भी आत्म-प्रचार की लालसा को संयमित करने का उन्होंने कोई इरादा नहीं जताया। एक आयोजक के नाते इस घटना की  नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए मैं समारोह में उपस्थित सभी रंगकर्मियों, साहित्यकारों एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रशासन के समक्ष क्षमाप्रार्थी हूँ कि इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को रोक पाने में सफल नहीं हुआ और आप सबकी भावनाएं आहत हुईं।
(8) मैं वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक श्री भानु भारती जी से क्षमा मांगता हूँ कि वे मुझ अकिंचन के आमंत्रण को स्वीकार कर समारोह में उपस्थित हुए और पत्रिका का लोकार्पण भी किया परन्तु उन्हें अपने विचार, अनुभव तथा सुझाव रखने का उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराने  के दायित्व का मुझसे निर्वहन नहीं हो सका। यहाँ तक कि मैं मंच से उनके प्रति कृतज्ञता भी नहीं ज्ञापित कर सका।
                                                                                                                                  
आदरणीय अरविन्द गौड़ जी से मैं अब भी यह आशा रखता हूँ कि वे कल के अपने आचरण पर पुनर्विचार करेंगे और सार्वजनिक तौर पर अफ़सोस प्रकट करेंगे। वे इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय  नाट्य विद्यालय के नहीं बल्कि अपने एक रंगकर्मी मित्र के आमंत्रण पर उसका उत्साह बढ़ाने आये थे, पर उन्हें यह बात याद नहीं रही। अगर उनका विचार बदल गया था और वे मुझे या मेरे इस अकिंचन प्रयास को क्षति पहुँचाना चाहते थे तो ऐसा वे बहुत शांत और संयत तरीके से करने में भी सक्षम थे। एक छोटे से कस्बे से निकल कर न मालूम किस किस तरह की मुश्किलों की खाई को पार करते हुए यहाँ तक पहुंचे मेरे जैसे बेहद मामूली रंगकर्मी और समीक्षक पर इतनी ताक़त और तैयारी से हमला कर उन्होंने अपनी ऊर्जा और शक्ति क्यों जाया की, यह बात मेरी समझ से परे है।
- राजेश चन्द्र 
संपादक ,
समकालीन रंगमंच, दिल्ली।

"राजेश भाई के जज़्बे को सलाम कीजिए और पत्रिका की सालाना या आजीवन सदस्यता के लिए उनको 9871223317 पर कॉल कीजिए, या फिर  rajchandr@gmail.com पर ई मेल कीजिए... "
   

सोमवार, 31 दिसम्बर 2012

बलात्कार का प्रशिक्षण












वो अक्सर बाज़ार से लौटते हुए


कहते थे मुझसे 
क्या लड़की जैसे चलते हो 
दो झोले उठाने में 
थक जाते हो तुम

जब कभी किसी गाने पर
मैं नादान
हिला कर कमर
लगता था नाचने
तब अक्सर कहते थे
चारपाई पर खांसते बुज़ुर्ग वो
ये क्या लड़कियों सा
लगते हो नाचने

खाना बनाने के मेरे शौक पर
मां को
अक्सर आ जाती थी
तेज़ हंसी
कहती थी वो
लड़की पैदा हो गई है घर में
खुश रहेगी बीवी तुमसे

क्रिकेट खेलते हुए
जब भी वो देखता था मुझे
खेलते हुए लंगड़ी टांग
लड़की-लड़की कह कर
चिढ़ाता था
मेरा बड़ा भाई

स्कूल में भी
जब नहीं कर पाता था
मैं नाटे कद का
कमज़ोर सा लड़का
उस मोटे तगड़े साथी से
लड़ाई
लड़की सा होने का ही
मिलता था ताना

रक्षाबंधन के दिन
स्कूल के टीचर
ज़बरन बंधवाते थे राखी
उसी सलोनी से
जिसे देख कर लगता था
बेहद अच्छा
अलग अलग रखी जाती थी
लड़कियों और लड़कों की कक्षा
अलग अलग थे गाने
अलग अलग खेल भी

कच्चे आम तोड़ कर
काले नमक के साथ खाना
छुप कर ही होता था
देख लेती थीं तो
छेड़ती थी भाभियां
कि क्या भैया
आपको तो लड़कियों वाले ही
शौक हैं सब

दाढ़ी बनाने के ब्लेड
खरीदते रहे हम
देख कर लड़कियां
चड्ढियों के भी होर्डिंग पर
दिखती थी
लड़की ही बस
टूथपेस्ट दांतों में लगाने का
मक़सद भी एक ही था
वही जो था
खास खुशबू पसीने से तर
बगलों में छिड़कने का
हाल ही में कहा किसी ने
क्यों रगड़ते हो
लड़कियों वाली क्रीम

और फिर जब
दोस्तों ने मेले, बस और
सड़क पर भी
लड़कियों को न घूरने के लिए
कहा कि
तू तो लड़की है बिल्कुल यार

बस वो सब
घर से लेकर
सड़क तक
उस अनजान
सुनसान
आसान पल के लिए
कर चुके थे पूरा
मेरा प्रशिक्षण
मैं तैयार
बलात्कारी बन चुका
बस साब
एक मौके की तलाश थी....

वो कहते थे कि
मेरी बहन को
पढ़ना चाहिए उस स्कूल में
जहां जाती हैं
सिर्फ लड़कियां
उसके लिए
घर पर नहीं आने चाहिए
लड़कों के फ़ोन
उसकी दोस्ती भी क्यों थी
लड़कों से
जब वो जाती है
लड़कियों के स्कूल

बूढ़े बाबा
जो खुद उठते थे
मेरी मां के सहारे से
डांटते थे अक्सर
मेरी बहन को
कि क्या लड़कों के साथ
खेलती है तू
और फैलाए रहती है
हर वक़्त ही किताबें
हंसती है क्यों
ज़ोर ज़ोर से
जा रसोई में
मदद करो मां की
सीखो कुछ घर के काम
लड़कियां ऐसे अच्छी नहीं लगती

दादी मां को
अक्सर रात टोंका करती थी
कैसी कतरनी सी
चलती है तेरी ज़ुबान
हर बात का जवाब
देती है तुरंत
डांट खाती है
किसी रोज़ मार भी खाएगी
सही हुआ पड़ा तेरे
ज़ोर का तमाचा
ससुर के सामने
आदमी से लड़ा रही थी
ज़ुबान
औरत को इतना गुस्सा
ठीक नहीं है...

मां अक्सर
रात को रोती हुई
आती थी बिस्तर पर
पिता जी को
नहीं देखा था
कभी भी ऐसे रोते छिप कर
मां को आंसू भी
छिप कर बहाने पड़ते थे
अमूमन बहन भी
धीरे धीरे
ऐसे ही रोने की
हो गई थी आदी
चाची, भाभी और कभी कभी
दादी भी

स्कूल में
अक्सर लड़कियों की
पीठ सहलाते थे
गणित वाले वो टीचर
गर्दन के पास
रख कर हाथ
हिंदी वाले मास्साब
समझाया करते थे
विद्यापति का
साहित्य में योगदान
भौतिकी के सर
कई बार अश्लील मज़ाक करते थे
रसायन शास्त्र वाली
मैडम के साथ
वो हंसती थीं खिसियानी हंसी
पीटी की टीचर को देख
हंसते रहते थे
कमीनगी से वो दो
इंस्पेक्शन वाले मास्टर

टीवी पर अक्सर
महिलाओं की मदद के लिए
आगे आ जाते थे
फिल्म निर्देशक
जिनकी हर फिल्म में
ज़रूरी था
एक आईटम नम्बर
नौकरानी पर घर में अक्सर
मुग्ध हो कर मुस्कुराते थे
कभी कभी उसकी
खिसकी साड़ी के पल्लू को
निहारते रहते थे वो मामा हमारे
मुंहबोले चाचा न जाने क्यों
मेरी बहन को करते थे
कुछ ज़्यादा ही लाड़
और हां बड़े भाई का वो दोस्त
अक्सर दे जाता था
अखबार का कवर चढ़ी
न जाने कौन सी ज़रूरी किताबें

हां मेले में
बचता था मैं भीड़ से
लेकिन मेरे बड़े भाई
और कहते थे चाचा भी
कि मेले का मज़ा तो
भीड़ में ही है
अस्पताल में डॉक्टर के
होने पर भी
मरीज़ का हाल
उस कुंवारी नर्स से ही लेते थे
मेरे घर के कई मर्द

और हां याद होगा ही
कहते रहते थे वो अक्सर
औरतों के हाथ में गया जो घर
उसको होना ही है बर्बाद
है न याद...
और फिर मर्द होना ही है
शक्ति का पर्याय
शक्ति अपराजित, असीमित
अराजक

दफ्तर में
झाड़ू लगाने वाली
उस चार बच्चों की मां से लेकर
अपनी महिला सहकर्मियों तक
सबसे करता रहा मैं
छेड़खानी
अपनी मातहतों से
करता रहा मैं
फ्रैंडली जेस्चर
न होने की शिकायत
और वो सीधी सी लड़की
याद तो होगी ही न
जिसके प्रमोशन पर फैलाई थी मैंने
उसके बास के साथ
सोने की अफ़वाह...

और फिर सड़कों पर
अक्सर मैं घूरता था
लड़कियों को
देखता था
उनके शारीरिक सौष्ठव को
देह को देख
करता रहा हर रोज़
आंखों से ही
उनका न जाने कितनी बार
बलात्कार
और चूंकि दुस्साहसी होना
प्रमाण था
उसके पौरुष का
मैं करता रहा कभी
शब्द बेधी वार
कभी नयन सुख के उपचार
कभी छेड़खानी
और बसों, मेट्रो, रेल में
अक्सर शामिल हो जाता था
उनको घेर कर
उनके तन से लिपट कर
जगह जगह डसने वाले
सर्पों के झुंड में

देखिए न
घर से बाहर तक
बलात्कार करने का
मेरा प्रशिक्षण कितना पक्का था
हां अब घूमता था
रात को झुंड में कभी सड़कों पर
तो कभी अकेले
शिकार की खोज में
जानता ही था मैं
समाज और परिवार मेरे साथ है
तो इनसे ही उपजे
पुलिस, कानून और सरकार
क्या बिगाड़ लेंगे मेरा...

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

यशवंत की गलती है लेकिन संपादक जी आपकी मंशा क्या है?



यशवंत सिंह मामले में तीन पक्ष हैं, तीन में से सबसे पहला पक्ष है उनका जो ये मानते हैं कि यशवंत ने जो कुछ किया गलत किया लेकिन उसके बदले में जो कुछ किया वो गलत ही नहीं बल्कि आपराधिक होने की अतिरेकता है। दूसरा पक्ष है जो ये मानता है कि यशवंत ने कुछ गलत किया ही नहीं और तीसरा पक्ष है जो ये मानता है कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि क्या अनैतिक और गलत हुआ, यशवंत के साथ ऐसा ही होना चाहिए। चलिए बात करते हैं इन तीन पक्षों की और यशवंत की, जिन्हें इन तीनों ही बातों से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता।
सबसे पहले बात कि यशवंत का कृत्य किस श्रेणी में आता है, तो ये डॉ नूतन ठाकुर के लेख में साफ है कि यशवंत नशे में एक अलग शख्स है, जो बिल्कुल सोचना नहीं चाहता...बिल्कुल उत्श्रृंखल और दरअसल इसी पर लगाम लगाने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। लेकिन क्या यशवंत ने जो एसएमएस और फोन कॉल्स देर रात एक आदरणीय महामाननीय और देश के सबसे सरोकारी सम्पादक को किए वो ठीक थे। साफ कहना चाहूंगा कि किसी को भी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ फोन करना और एसएमएस करना सौ फीसदी गलत है, और किसी को इरादतन नशे में या होश में परेशान करना और भी ज़्यादा गलत है। यशवंत सिंह ने निस्संदेह कोई अश्लील एसएमएस नहीं किया पर अगर किया और जो साफ है तो ये सौ फीसदी गलत था। न केवल देर रात किसी की पत्नी को फोन करना गलत है बल्कि उस पर अकड़ते हुए एसएमएस करना और भी अनैतिक। लेकिन सवाल ये है कि यशवंत सिंह ने जो पैसे मांगे वो क्यों मांगे...एसएमएस का मजमून साफ कर रहा है कि ये एक शरारत थी। लेकिन हां किसी के भी जीवन में खलल डालने का हक किसी को नहीं, इसलिए यशवंत की ये गलती ज़रूर है  पर दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया के तरीके से उसकी मंशा पर सवाल उठने लाजिमी हैं।
लेकिन दरअसल इसकी प्रतिक्रिया में जो हुआ, वो ठीक है? दरअसल इस वक्त ज़्यादा मौजू सवाल यही है, क्योंकि इस घटना की परिघटना के तौर पर प्रबुद्ध और प्रतापी एलियन छाप सम्पादक जी की जो प्रतिक्रिया सामने आई वो अतिरेक का दूसरा नाम थी। आप में से कितने लोग ये मान सकते हैं कि लाख बुराईयां होने के बाद क्या यशवंत इतने मूर्ख हैं कि वो एक चैनल के सम्पादक(जिसके तमाम राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक-असामाजिक संबंध हों) को बीच सड़क मोटरसाइकिल से उसकी कार रोक कर, उस से रंगदारी वसूलने की मांग दिन दहाड़े करेंगे। ज़ाहिर है कि एफआईआर फ़र्ज़ी है, जिसे सम्पादक जी ने एक इंटरव्यू में स्वीकारा भी था। क्या यशवंत सिंह पर जो धाराएं लगा दी गईं, वो फ़र्ज़ी नहीं है? क्या जिस तरह ये गिरफ्तारी हुई वो ठीक है? दरअसल पुलिस के जिस आपराधिक तरीके से फर्ज़ी एफआईआर दर्ज करने से लेकर फर्ज़ी एनकाउंटर तक जाने के तरीकों का तमाम पत्रकार चैनलों और अखबारों में विरोध करते रहे हैं, ये सम्पादक जी उसी तरीके से अपनी दुश्मनी निकाल रहे हैं।
अब खैर आगे की बात मैं अपने आप को उस श्रेणी में रखता हूं जो ये मानती है कि यशवंत ने निस्संदेह वो एसएमएस कर के गलत किया लेकिन जो प्रतिक्रिया में किया गया, वो अतिरंजित था और आपराधिक भी। खैर आगे की ओर आते हैं, बात करते हैं मामले के तार्किक पहलू की, दरअसल यशवंत के खिलाफ जिस तरह के केस दर्ज करवाए गए, उसको लेकर किसी को भी शक नहीं है कि वो मामले प्रथम दृष्टया फ़र्ज़ी हैं और साथ ही जिस तरह यशवंत की गिरफ्तारी हुई वो और चौंकाने वाला मामला है। ज़ाहिर है कि इसका जवाब ज़िले के कप्तान साहब के पास होगा और निकट भविष्य में उनको वो जवाब देना भी पड़ेगा। क्या अगर कोई शख्स आपको लम्बे समय से परेशान कर रहा है तो एक टीवी चैनल के सम्पादक के नाते आपके लिए उसको समझाना या पुलिस के पास जाना भी कोई मुश्किल काम था और सबसे बड़ी बात क्या जब आप पुलिस की मदद लेंगे तो असल शिकायत की जगह गलत और बेहद संगीन धाराएं लगवाएंगे? तो फिर आप कैसे अपनी मंशा को दुनिया के सामने रखेंगे, वो तो इन फर्ज़ी धाराओं से ही जगज़ाहिर हो जाएगी।
मामला एक और तरह से समझिए कि दरअसल ये पूरा तौर तरीका यशवंत सिंह की गलती को तो सामने लेकर आता ही है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा इन माननीय सम्पादक जी की प्रवृत्ति को सामने लेकर आता है। पता नहीं आप क्या मानते हैं लेकिन किसी के भी खिलाफ गलत एफआईआर दर्ज कराने और झूठे आरोप लगा कर उसका नुकसान करने की कोशिश को भारतीय संविधान और कानून संज्ञेय अपराध मानता है, एसएमएस भेजने और फोन कर के परेशान करने से ज़्यादा संज्ञेय। भारतीय दंड विधान यानी कि IPC के तहत धारा 211 और 182 के तहत इस तरह की झूठी एफआईआर कराने वाले के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। यही नहीं इसमें दोष सिद्ध होने पर 6 महीने से 7 साल और कुछ मामलों में आजीवन कारावास भी हो सकता है। ज़ाहिर है एफआईआर करवाने वाले की प्रवृत्ति और नीयत आपराधिक है और अगर नहीं है तो अभी भी वक्त है, गलती का अहसास कर के बेवजह की गई शिकायतें वापस ली जा सकती हैं। हालांकि कप्तान साहब के लिए ये कितना बुरा होगा, वो खुद महसूस कर पाएंगे कुछ दिनों में, उन्होंने वर्दी पहन के कानून तोड़ने में मदद जो की है।
साफ है कि यशवंत की गलती ज़रूर है लेकिन फर्ज़ी केस करने के बाद ज़्यादा बड़ी गलती सम्पादक महोदय और उनको सहयोग करने वाले पुलिस वालों की है। मज़े की बात ये है कि ये ही सम्पादक अपने चैनलों पर किसी भी तरह के फ़र्ज़ी केस और एनकाउंटर पर दोषियों को सज़ा की मांग करते हैं। अब जब सम्पादक ही ऐसे करे, तो क्या उसे आपराधिक प्रवृत्ति का न माना जाए? यहां पर ये ध्यान में रखना होगा कि यशवंत सिंह ने शराब के नशे में जो कुछ किया वो निंदनीय है और आप चाहें तो उसे क्षमा न करें पर क्या किसी की गाड़ी में खरोंच मार देने पर कत्ल की धारा लगा कर फांसी दी जा सकती है? बड़ा अहम सवाल ये है कि अगर रसूखदार लोग अपने सामर्थ्य और पहुंच के हिसाब से कानून का दुरुपयोग करते रहेंगे तो कैसी दुनिया बनेगी ये?
यहां पर एक सवाल आता है उन सारे लोगों के लिए जो ये मानते हैं कि यशवंत के साथ जो किया गया अच्छा किया गया, आप सब ज़रा खुले दिमाग से सोच कर बताएं कि क्या अगर आपके साथ ऐसा ही कोई करे तो वो अच्छा होगा। क्योंकि सब कुछ व्यक्तिगत झगड़े में किया गया, तो आप सबका भी किसी न किसी के साथ निजी झगड़ा होगा ही, ऐसे में अगर कोई आप पर हत्या के प्रयास, अपहरण-रंगदारी की कोशिश के आरोप लगा के फर्ज़ी एफआईआर करवा दे तो क्या आप इसे सही कहेंगे। यहां ये ज़िक्र करना ज़रूरी है कि ऐसा समर्थन करने वाले ज़्यादातर लोग किसी न किसी तरीके से यशवंत से चिढ़ते हैं या भड़ास से डरते हैं। क्यों डरते हैं ये बताना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है...लेकिन यशवंत से कितना भी असहमत होने के बावजूद कैसे आप किसी के ऊपर लगे गलत आरोपों के आधार पर फर्ज़ी केस बनाने का समर्थन कर सकते हैं?
लेकिन एक तीसरा पक्ष भी है और ये वो लोग हैं जो बजाय यशवंत के रवैये को लेकर संजीदा होने और सोचने के, बार बार उनका अंधा पक्ष ले रहे हैं। हमें ये मानना पड़ेगा कि नशा करना गलत नहीं लेकिन उसके नशे में लोगों की ज़िंदगी में खलल डालना गलत है। वादी सम्पादक जी कैसे भी व्यक्ति हैं, उनकी मर्ज़ी के बिना उनको एसएमएस या फोन कॉल नीति के विरुद्ध है। इसलिए हम सब मिल कर ये कोशिश करें कि यशवंत जब लौटें, तो अपनी इस समस्या से निजात पाएं।
यशवंत सिंह को लेकर शायद अब तक का सबसे संजीदा लेख रहा नूतन ठाकुर का, जिसमें न केवल एक भाई के तौर पर यशवंत को शराब के नशे में बेसुध होने की हद तक डूब जाने की डांट भी मिली तो यशवंत नाम के सिक्के के दो पहलुओं पर बात भी हुई। जो मैंने लिखा हो सकता है कुछ लोगों को ये कुछ जगह यशवंत के खिलाफ भी लगे। लेकिन जो लगता है उसे ही कहना सबसे महत्वपूर्ण है। हालांकि हां लेख खत्म करते वक्त माननीय सम्पादक जी के लिए एक सवाल छोड़ जाता हूं, कि क्यों न आपके खिलाफ फर्ज़ी एफआईआर और केस के लिए 182 और 211 के तहत मामला दर्ज हो, और साथ ही आपके टीवी चैनल के कार्यक्रमों के द्वारा ब्रॉडकास्ट नियमों के उल्लंघन का मामला जिसमें अंधविश्वास फैलाना, किसी की छवि खराब करना और लोगों को डरा के माहौल बिगाड़ने की कोशिश (तमाम भूत प्रेत, नाग नागिन मार्का कार्यक्रम जो कभी उस चैनल ने चलाए, 2012 में दुनिया का खत्म होना और एक सम्प्रदाय के धर्मगुरु को आतंकी दिखा देना...जिसके पीछे इन्हीं सम्पादक जी की ज़िम्मेदारी क्यों न मानी जाए) के लिए 295 ए जैसी धाराओं में मामला दर्ज करवा दिया जाए। क्या कहते हैं सम्पादक जी, यशवंत ने जो किया वो छोटा अपराध था तो आपने इतना कुछ कर दिया, आप पर तो सारी सच्ची धाराएं लगेंगी, क्या कहते हैं...क्या विचार है? सोचिएगा और समझिएगा कि रसूख आज है, कल नहीं रहेगा, समझ और संवेदनशीलता ही आगे काम आएगी...लोक व्यवहार काम आएगा...और हां लोगों का प्यार काम आएगा, जो आप कमा नहीं पाए...बेचारे...
मयंक

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

तुम बहुत दिनों तक बनी दीप कुटिया की...



नैतिकता के नामर्द सिपाहियों को गौर से देख लीजिए
चलती सड़क, देश के "व्यस्त शहरों" में से एक, आस पास मौजूद पढ़े लिखे ज़िम्मेदार "नौजवानों की फौज" और फ़िर भी नोच फेंके गए उसके शर्म, लज्जा और लिहाज के गहने. वही गहने जो उसकी माँ ने पैदा होते ही तन पर पहले कपडे के साथ उसे पहना दिए. और आज उसके कपड़ों और गहनों के साथ-साथ उतर गया उसकी आँखों पर पड़ा वो चश्मा जिससे वो देखती थी हर पुरुष को अपने रक्षक के रूप में. वो चीख रही थी कि "मेरी इज्ज़त ख़राब मत करो, तुम्हारे घर में भी बहन है" लेकिन उसके वो "ज़िम्मेदार रक्षक" बन गए थे “नैतिकता के कर्णधार”, जो उसे सज़ा दे रहे थे उसके "अनैतिक कर्मों" की.

चिंता मत कीजिये मैं आपको नहीं याद दिलाउंगी वो सारी ऐसी घटनाएं जो इस वाकये से पहले भी न जाने कितनी बार दोहराई जा चुकी हैं, क्यूंकि जब आप वो सब भूल ही चुके हैं तो ये घटना भी आपके मस्तिष्क में ज्यादा दिन के लिए नहीं टिकने वाली. बदलते समाचार चैनलों की रफ़्तार टिकी हुई थी के कौन सा चैनल दिखा रहा था वो विडियो. अजी ग़लत मत समझिएगा दरअसल हम तो जानने की कोशिश कर रहे हैं के असल में हुआ क्या था, क्यूंकि बिना सब कुछ जाने हम कैसे कह दें के उन "नैतिकता के कर्णधारों" ने कुछ ग़लत किया. हो सकता है गलती उस लड़की की रही हो.
अरे माना के भारतीय समाज पुरुष-प्रधान समाज है लेकिन उसका भी तो ठोस कारण है, अब आप भी जानते ही हैं के पुरुष ज्यादा मज़बूत होते हैं, वही तो हैं जो इन अबलाओं की, कभी भाई, कभी पिता, कभी पुत्र और परिवार के मुखिया के तौर पर, रक्षा करता है. ये तो इन औरतों की आदत है, कुछ ज़रा सी बात हुई नहीं के रोना, चीखना, चिल्लाना शुरू. ये तो, ये भी नहीं समझती कि इनके हाथ में परिवार की इज्ज़त है, इनका बस चले तो सारे खानदान की नाक कटवा कर रखे दें. अब आप ही बताइए ऐसी औरतों के हाथों में सारे निर्णय छोड़ हम क्या घर संभालना शुरू कर दें?? अजी पूरी सृष्टि उथल-पुथल हो जाएगी!!

वैसे आपमें से कई लोगों ने उस पूरे हादसे की विडियो फुटेज न जाने कितनी मर्तबा देखी होगी, क्या एक पल को भी आपको ये ख्याल आया, के क्या होता अगर उस लड़की की जगह आपकी अपनी बहन, बेटी, पत्नी या घर की कोई भी स्त्री होती? क्या तब भी आप सिर्फ उस विडियो फुटेज को बार बार रिफ्रेश करके देखते? अरे कोई बात नहीं, मैं जानती हूँ के आपके पास मेरे इस सवाल का जवाब है ही नहीं, क्यूंकि दुर्भाग्यवश अगर वो आपके घर की कोई महिला होती तो इस समय आप इस लेख को पढने की हालत में ही न होते, और अब जब आप पढ़ ही रहे हैं तो दिमाग के किसी कोने में यही रट रहे होंगे कि क्या ज़रूरत थी उस लड़की को किसी पब में जाने की और वो भी देर रात, उसको तो उसके कर्मों की सज़ा मिल ही गई, हमारे घर कि औरतें तो कभी ऐसा न करें और अगर करें तो बागपत के उस गाँव की तरह हमारे घर पर भी बैठेगी एक खाप, और बन जायेंगे उनके आचरण के लिए नियम और कानून.

अगर आप ये सोच रहे हैं के मैं किस पक्ष की ओर से लिख रही हूँ तो कृपया इस लेख को यहीं पढ़ना बंद कर दें क्यूंकि अगर आप अभी तक समझ नहीं पाए तो कहीं न कहीं मुझे आपसे भी घृणा होगी. बचपन से आज तक पुरुषों के इस आचरण से मुझे घोर आपत्ति रही है, मौका मिला नहीं के किसी भी महिला की शारीरिक संरचना को भंग करने से नहीं चूकते, चाहे बात उन हाथों की हो जो बस मौका तलाशते हैं उस घृणा की भावना को प्रगाड़ करने की, या वो नज़रें जो मानो एक निगाह में ही आपका मानसिक बालात्कार कर दे. जो महिलाएं इस लेख को पढ़ रही हैं वो समझ सकती हैं के मेरा इशारा किस ओर है, और पुरुषों से बेहतर तो मेरी इस बात को कोई समझ ही नहीं सकता, आख़िरकार "मज़ा पाने" वाली तरफ तो आप या आप ही के साथी मौजूद होते है. कहने को घर के मुखिया एक महिला के बगैर अपने जीवन और परिवार की कल्पना तक न कर सकने वाले वो सब पुरुष भूल जाते हैं की चाहे वो पुरुष हो या महिला सबके जीवन का पहला पायदान एक ही था, बस एक गुणसूत्र की फेरबदल ने आपका लिंग निर्धारित कर दिया और हो गए आप "महाराजा"!!

मेरी हिम्मत नहीं हुई उस विडियो को दोबारा देखने की, क्यूंकि एक बार में उसने मुझे इस हद्द तक कचोट दिया के अगर दोबारा देख लेती तो रात के इस पहर सड़कों पर तमाम पुरुषों को गालियाँ देते हुए अकेले ही एक मोर्चे पर निकल पड़ती और यकीन मानिए अगर आप इस सोच में हैं के मेरा हश्र भी वैसा हो सकता है तो अब समय आ गया है के खुल कर दो-दो हाथ हो ही जाएँ. अभद्र भाषा और अश्लील आचरण पर अपना एक छत्र राज समझने वाले ये न भूलें के उन्हें उनके पैरों से घुटनों पर लाने के लिए मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, एक बात की जगह एक लात ही काफी होगी. लद गए शब्दों, उपदेशों, वाद-विवाद, और जिरह के दिन, बस एक बात दिमाग में बिठा लीजिये के "लातों के भूत बातों से नहीं मानते".

मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से त्रस्त ज़्यादातर महिलाएं समझौतों पर टिकी ज़िन्दगी जीती हैं, फ़िर तमाम उम्र पहले ख़ुद और बाद में अपनी बेटियों को उस आग में झोंक देती है. इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को लगभग सभी प्रमुख समाचार चैनलों ने दिखाया, मैं बस इतना जानना चाहूंगी के कब तक आपके सरोकार सिर्फ खबर को दिखाने तक सिमट कर रहेंगे? मानवाधिकार आयोग कब तक केवल चीखता चिल्लाता रहेगा? वो पुलिस जो अभी भी आँखें, कान और मूंह बंद करके बैठी है, कब भूलेगी की गाँधी जी का समय बीत चूका है? और तो और आप लोग जो शायद इस लेख को इसकी आखिरी पंक्ति तक पढ़ें, आपकी आत्मा कब जागेगी???

















इला जोशी 
(लेखिका एक मल्टीनेशनल में बिज़नेस मैनेजमेंट प्रोफेश्नल हैं और स्वतंत्र लेखन और कविता करती हैं)

बृहस्पतिवार, 31 मई 2012

मुस्काती है एक औरत....

चित्र - साभार - 'द हिंदू'(24 दिसम्बर, 2011)
एक औरत मुस्कुराती है, 
दूसरी अनजान औरत को देख कर 
बना देती है जगह, 
उसके बैठने को 
थाम लेती है उसका असबाब,
सम्भाल लेती है
उसका बच्चा

एक पुरुष
दूसरे पुरुष को घूरता है
एक पुरुष कुहनी मारता है
दूसरे पुरुष को
देख कर एक औरत को
एक पुरुष झगड़ता है
दूसरे पुरुष से
देता है भद्दी भद्दी गालियां
उसके घर की औरतों को
एक पुरुष दूसरे पुरुष को
कहता है
जानता है तू मैं कौन हूं

एक औरत प्रेम करती है
एक पुरुष से
एक औरत लुटा देती है
सब कुछ दो पुरुषों पर
पति पर, बेटे पर
एक औरत को सताते हैं
हमेशा उसके पुरुष
एक औरत को लूटते हैं
अपने ही पुरुष
एक औरत फिर भी
भरोसा करती है
पुरुषों पर
एक औरत सहम जाती है
अनजान पुरुषों के बीच

एक पुरुष हंसता है
एक औरत से धोखा कर के
एक पुरुष घूरता है
एक औरत को
एक पुरुष दबाता है
कुचलना ही चाहता है
एक औरत को
एक पुरुष मानता है मूर्ख
एक औरत को
एक पुरुष समझता है
इंसान और औरत को अलग अलग चीज़
एक पुरुष का पौरूष
बढ़ जाता है
रौंद कर एक औरत को

एक पुरुष कहता है
दूसरे पुरुष से
दबा के रखो अपनी औरत को
एक पुरुष मानता है
अपने दबंग दोस्त को सच्चा पुरुष
एक पुरुष शिकायत करता है
दूसरे पुरुष से
अपनी औरत की
एक पुरुष बना देता है
एक औरत को मशीन
एक पुरुष चाहता है
एक औरत से अच्छा खाना
अच्छा सेक्स और आज्ञाकारी बच्चे
एक पुरुष कम ही चाहता है
एक औरत को

एक औरत समझती है
दूसरी औरत को
एक औरत जानती है एक से हैं
हर औरत के हालात
एक औरत को है हमदर्दी
हर दूसरी औरत से
एक औरत आज फिर
पिट कर आई होगी अपने पुरुष से
एक औरत घर जाकर
बनाएगी उसी पुरुष के लिए खाना
पालेगी उसके ही बच्चे
संभालेगी उस का घर
इसीलिए वो बांट लेती है
दर्द दूसरी औरत का
इसीलिए एक औरत मुस्कुराती है
दूसरी अनजान औरत को देख कर
बना देती है जगह,
उसके बैठने को
थाम लेती है उसका असबाब,
सम्भाल लेती है
उसका बच्चा.....

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मयंक सक्सेना
30 मई 2012, 10.50 रात

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

सुबह अब मेरे दर पे आती नहीं है...

तेरी ये उदासी जो जाती नहीं है 
मेरे दर पर अब सुबह आती नहीं है 

किताबें मेरी धूल में सन गई हैं 
वो आंखों को चेहरा दिखाती नहीं हैं 

चांद आया था घर, ताक पर रख दिया है 
कि अब धूप आंगन में आती नहीं है

तेरी आंख में एक कहानी छिपी है 
मगर तेरी बोली बताती नहीं है

तेरी ज़ुल्फ़ में मेरी किस्मत फंसी है
लटों को क्यूं रुख से हटाती नहीं है

उसे क्या हुआ है, क्या मुझसे ख़फ़ा है
मुझे देख वो मुस्कुराती नहीं है

ये नारे उछालो हवा में संभल के
हुकूमत को हरकत ये भाती नहीं है

ग़ज़लगोई अब नामुनासिब हुई है
कि अब सुबह बुलबुल भी गाती नहीं है

नज़ारों को भूला, बियाबां में भटका
मगर याद ज़ेहन से जाती नहीं है

मयंक अब समझ जाओ, बदलेगा न कुछ
जो खल्क ए खुदा, कसमसाती नहीं है

सोमवार, 20 फरवरी 2012

नीली साड़ी...सपना...और तुम


जब ढलने लगे रात

पौ फटने से पहले

आ जाया करो

तुम

मेरे सपनों में

पहन वही नीली साड़ी

जिसके किनारे लटकता था

एक रेशमी धागा

और उससे जड़ा

एक नीला नग

और हां

उस दिन की ही मानिंद

खोल कर आना

अपने काले बाल

उनकी खुशबू बिखरती है

खुले होने पर

आ जाना

मेरे सपनों में

मेरे सोने पर

वो नीला रंग

जैसे हो

सुरमई नदी कोई

नीले पानी से भरी

जैसे कोई फूल

उस अंग्रेज़ी नाम वाले

देसी जंगली पौधे का

हां वही

कॉर्नफ्लावर

जैसे हो आसमान

उस खुली

बिन बादल

दोपहर का

नीला...सपाट...अनंत

और उसी वक्त

तुम मेरी आंखों में

आंचल अपना

लहरा जाना

मेरे सपनों में

आ जाना

छूकर अपनी आंखों से

मेरी आंखों को

दे दो

मुझे

रोशनी

बिखेर दो काजल

थोड़ा सा

मेरी भी पलकों के

कोरों पर

थोड़ा सा संगीत

बहा दो

अपनी सांसों का

मेरी धड़कन के

शोरों पर

आज ही

आ जाओ

आओ कि

मेरे सपने

बेकाबू हैं

बेसब्र हैं

बेताब हैं

कि आओ तुम इनमें

और

फिर कभी

नींद ही न आए...

मयंक सक्सेना

21-02-2012 (1.10 रात)

काल चक्र

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देवनागरी