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शहर, खिड़की और लोग – 7 (वो मोबाइल बंद कर, सो गई है..)

इस कहानी को लिखते वक़्त कोई और मनोभाव नहीं आए...जितना सोचता गया, बस उतना ही लिखता गया...मैं जान भी कितना सकता हूं, पुरुष हो कर किसी लड़की को...उसके अंदर क्या चलता होगा, अंदाज़ ही तो लगा सकता हूं...इसमें न जाने क्या-क्या सोचा जाना छूट गया है...किसी का उसको चलती रेल में ग़लत तरीके से छू लेना...मासिक धर्म के दौरान बेचैनी और मूड स्विंग्स...और भी न जाने क्या-क्या...जो मैं महसूस नहीं कर पाता...उसे कैसे लिख दूं, ऐसे जैसे कि मैंने समझ लिया...फिर भी बहुत कुछ लिख पाया हूं, जो पहले महसूस नहीं कर पाता था...मेरे जीवन की दो स्त्रियों का मैं इसके लिए मैं सबसे ज़्यादा आभारी हूं...इला और देविका...तुम दोनों को शुक्रिया...मुझे बेहतर पुरुष और बेहतर मनुष्य बनाने के लिए...बाकी तमाम स्त्रियों को भी आभार, जिनके नाम नहीं लिए जा सके...
- लेखक 




उस खिड़की पर एक झीना सा पर्दा था...झीना सा मतलब...उससे आप वो सब देख सकते थे, जो आपको बस ये बताता कि अंदर एक लड़की है, अगर चोटी बंधी हो और ये नहीं बता सकते थे कि वो परेशान है...अगर उसके रोने या चिल्लाने की आवाज़ बाहर न आए। अक्सर पर्दा हटता था और वो हमेशा हंसती दिखती थी...बे…

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