काल चक्र

Friday, October 9, 2009

मां गूंथ रही है कविता....

(हाल ही में दफ्तर के बाहर की चाय की दुकान पर उस औरत को अपने बच्चों के लिए आटा गूंथते देखा...तो उसमें गिरती पानी की धार के साथ यादें भी भीगती गई....और आटे के साथ कविता भी गुंथती चली गई.....)
पुरानी परात में
अलसाए हाथ से
सफेद आटे में
सधे अंदाज़ में
पानी जा रहा है गिरता
मां गूंथ रही है कविता....
आंखों के आंसू
उसके तन का पसीना
बदल कर उसके
हाथों के स्वाद में
पानी में, आटे में, परात में
जा रहा है मिलता
मां गूंथ रही है कविता...
यादों के संदूक से
एक एक गहना
जो सजाया गया
माथे पर
या नहीं गया पहना
दोबारा गढ़ा जा रहा
दोबारा निखरता
मां गूंथ रही है कविता....
कविता गुंथती
मिलती बनती
वात्सल्य के आटे से
करुणा के पानी से
वक़्त की आंच पर
पक गई है
तो अब
उस पर
बिखर गए हैं
काले धब्बे
चारों ओर छितर गए हैं
उजली रोटी पर
मुझ पर
वक़्त के
फितरत के
स्याह निशान
और इनसे बेखबर
हर रोज़
मां
गूंथ रही है कविता.....

Wednesday, October 7, 2009

पूर्णमिदं

(एक कविता जो कुछ खास है.....एक कविता तो बेहद गहरे भावों से लिखी गई है....एक कविता जो अब तक पन्नों में कैद थी आज ब्लॉग पर भी आ गई है...शायद इसकी भी पूर्णता इसी में थी...किसके लिए है का प्रश्न अनुत्तरित ही रहने दिया जाए तो बेहतर होगा.....)

तुम पुष्प हो
इसमें भ्रम नहीं
तुम्हारा अतिशय सौंदर्य
अतिशयोक्ति नहीं
तुम खिले भी हो
वो भी अपने
पूर्ण, भरपूर, अप्रतिम
यौवन के साथ
पर तुम्हारे फूलने
की खुशी
थी अधूरी
अब तक
सुगंध के बिना
और अब
जब
मेरा स्वेद
तुमसे मिल गया है
हम दोनो
पूर्णता की ओर हैं
मैं फूल गया हूं
और तम
चिर प्रतीक्षित
सुवासित....

Wednesday, September 23, 2009

यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे....

लम्बे वक्त से ब्लॉगिंग से दूर था....कुछ वक्त नहीं मिलता था...कुछ मन नहीं करता था....और कुछ ठहराव था लेखनी में....अर्से बाद आज आया हूं तो कुछ विशेष है....कल संयुक्त राष्ट्र में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर एक बैठक हुई जहां कुछ विकसित राष्ट्रों ने कुछ बड़े वादे किए...तो मन में एक छोटी कविता उपजी और बह चली......पढ़ें और बचपन याद करें.....

यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे
शाम के धुंधलके में डराते से
सुबह हवा से लहराते से
धूप में छांव देने के मकसद से
पीपल से, कीकर से
बरगद से
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

सूरज की रोशनी से चमकते
चांदनी में चांदी से दमकते
तूफानों से झगड़ते
आंधियों में अकड़ते
इंसानों को बेहद प्यार करने वाले
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

उन डालियों पर
हम झूला करते थे
बैठते, कूदते थे उन पर
कई बार खाईं थी
निबोंलियां भी तोड़ कर
बड़े घनेरे, शाम सवेरे
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

बारिश की बूंदे पत्तों पर ठहर कर
काफी देर तक
देती थीं
बारिश का अहसास
तब शायद दुनियावी समझ
नहीं थी अपने पास
अब जब अपने पास दुनिया है
दुनिया की समझ है
दुनिया की दौलत है
दुनिया की ताकत है
तब अपने पास धूप नहीं है
छांव नहीं है
पगडंडी और गांव नहीं है
आंधी और बरसात नहीं है
छत पे सोती रात नहीं है
खेत किनारे मेड़ नहीं है
कुछ भी नहीं है
पेड़ नहीं है....
सड़क किनारे
धूप से तपता
छांव को तकता
सोच रहा हूं
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे......

Wednesday, August 12, 2009

कुछ जो कहा नहीं गया

अज्ञेय की एक और कविता जो मुझे बेहद पसंद है

है,अभी कुछ जो कहा नहीं गया ।
उठी एक किरण, धायी, क्षितिज को नाप गई,
सुख की स्मिति कसक भरी,निर्धन की नैन-कोरों में काँप गई,
बच्चे ने किलक भरी, माँ की वह नस-नस में व्याप गई।
अधूरी हो पर सहज थी अनुभूति :
मेरी लाज मुझे साज बन ढाँप गई-
फिर मुझ बेसबरे से रहा नहीं गया।
पर कुछ और रहा जो कहा नहीं गया।

निर्विकार मरु तक को सींचा है
तो क्या? नदी-नाले ताल-कुएँ से पानी उलीचा है
तो क्या ? उड़ा हूँ, दौड़ा हूँ, तेरा हूँ, पारंगत हूँ,
इसी अहंकार के मारे
अन्धकार में सागर के किनारे ठिठक गया : नत हूँ
उस विशाल में मुझसे बहा नहीं गया ।
इसलिए जो और रहा, वह कहा नहीं गया ।

शब्द, यह सही है, सब व्यर्थ हैं
पर इसीलिए कि शब्दातीत कुछ अर्थ हैं।
शायद केवल इतना ही : जो दर्द है
वह बड़ा है, मुझसे ही सहा नहीं गया।
तभी तो, जो अभी और रहा, वह कहा नहीं गया ।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

Tuesday, July 21, 2009

आखिरी स्मारक

एक युग का अंत हो गया...९७ साल का युग....गंगूबाई हंगल ने दो सदियां...उनके बीच की अंतर...वक्त का ठहराव और समय की रफ्तार सब कुछ देखा था....एक आखिरी स्मारक बन गया हिंदुस्तानी शास्त्रीय शैली के गायन के गर्वीले इतिहास का...किराना घराने की एक और पहचान गंगूबाई हंगल नहीं रहीं....
१९१३ में धारवाड़ में गंगूबाई का जन्म हुआ था....अपने गुरू सवाई गंधर्व से हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखने के लिए गंगूबाई, कुंडगोल जाया करती थी और वहां के लोग उस वक्त की प्रचलित परिपाटी के अनुसार उनका मज़ाक उड़ते हुए उनको गानेवाली कहते थे... और फिर धीरे धीरे यही उनका प्यार का उपनाम होता चला गया....
गंगूबाई कर्नाटक के एक दूरस्थ इलाके हंगल में रहती थी...और इससे उनको अपनी पहचान मिली और नाम के साथ जुड़ा गांव का नाम...हंगल...गंगूबाई हंगल की मां कर्नाटक शैली की शास्त्रीय गायिका थी पर जब बेटी ने हिंदुस्तानी शैली का गायन सीखने का फैसला किया तो मां ने बेटी के लिए खुद अपनी शैली को तिलांजलि दे दी...गंगूबाई की मां का नाम था अम्बाबाई.....गंगूबाई का जन्म एक मल्लाह परिवार में हुआ, जिसे उस वक्त सीधे सीधे सामाजिक संबोधनों में शूद्र कहा जाता था...पर उनके पिता और पति दोनो ब्राह्मण थे...लेकिन उससे भी बड़े आश्चर्य और साहस की बात कि उस दौर में भी न तो उनकी मां...और न उन्होंने ही अपने नाम के आगे अपने पति का उपनाम कभी प्रयोग किया...
अपने गुरु भाई भीमसेन जोशी को भीम अन्ना के नाम से सम्बोधित करने वाली गंगूबाई हंगल ने वो वक्त देखा है जब 9 दिन तक चलने वाले सालाना अखिल भारतीय संगीत समारोह में देश के सारे संगीत दिग्गज एक साथ जुटते थे...वो वक्त भी देखा जब फिल्म के बड़े सितारे शास्त्रीय गायकों का ऑटोग्राफ मांगा करते थे...और जनता की भीड़ शास्त्रीय संगीत सुनने के लिए जुटा करती थी...
गंगूबाई के पति जो आजीवन बेरोज़गार रहे.उनके लिए भी गंगूबाई का प्रेम मिसाल है...उनके पति ने उनकी कमाई हुई एक एक पाई गंवा दी पर उसके बाद भी गंगूबाई ने कभी शिकायत नहीं की..बल्कि उनको अपने आप से शिकायत रही कि पति के अंतिम वक्त में वो उनके साथ न थी....सिद्धेश्वरी देवी जब लकवे का शिकार होकर बिस्तर पर पड़ी थी..तब उनसे मिलने गई गंगूबाई से उन्होंने भैरवी सुनाने का आग्रह किया और आंखों से बहते आंसुओं के साथ उनको सुनती रहीं....
पद्म भूषण गंगूबाई हंगल आज नहीं रहीं...उनके निधन पर शोक व्यक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि वे एक महान जीवन जी कर गई थी...पर शास्त्रीय संगीत के विदा होते दिग्गजों की जयध्वनि के बीच शोक शास्त्रीय संगीत के निधन का है क्योंकि हमारी पीढ़ी में इसे लेकर ज़रा भी चेतना नहीं दिखती...गंगूबाई जन्म से भले ही किसी भी तथाकथित जाति से हों पर शास्त्रों की परिभाषा में वो पांडित्य के उच्चतम सोपानों पर थीं...जैसा कि मनुस्मृति कहती है
जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् द्विज उच्च्यते
गंगूबाई को श्रद्धांजलि.....


Saturday, June 27, 2009

जुल्फ - अंगडाई - तबस्सुम


अदम गोंडवी का नाम किसी के परिचय का मोहताज़ नहीं है....आज एक और उनकी नज़्म आपके लिए लाया हूँ....


जुल्फ - अंगडाई - तबस्सुम -
चाँद - आईना -गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर
इनका शबाब
पेट के भूगोल में
उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है
पढ़े दिल की किताब
इस सदी की तिश्नगी का
ज़ख्म होंठों पर लिए
बेयक़ीनी के सफ़र में
ज़िंदगी है इक अजाब
डाल पर मजहब की पैहम
खिल रहे दंगों के फूल
सभ्यता रजनीश के
हम्माम में है बेनक़ाब
चार दिन फुटपाथ के साये में
रहकर देखिए
डूबना आसान है
आंखों के सागर में जनाब
अदम गोंडवी

Saturday, June 13, 2009

कुछ यादें सिरहाने......

एक नया शहर ....जो पहली बार घर से निकलने की वजह से कुछ ज्यादा ही नया लग रहा था....अकेले सफर बहुत किया था पर कभी शायद ये नहीं सोचा था की लखनऊ से दूर कहीं रहना पड़ेगा....खैर भोपाल में आए ३-४ महीने बीत चुके थे और मैं या हम सब यह तो जान ही चुके थे कि कला और संस्कृति के मामले में भोपाल वाकई देश की कला राजधानी है....और सार्वजनिक प्रदर्शनों का गढ़ है....ऐसे में अपनी अपनी लखनवी जुबां के अलावा किसी चीज़ में बहुत ज्यादा गडबडी आती नहीं दिख रही थी....कई अच्छे दोस्त मिल गए थे पर मेरे विपरीत ज्यादातर कला के नाम पर भाग खड़े होते थे और यायावर फितरत का मैं अकेला ही भोपाल की सड़कें छानता रहता था....पहले से पता था कि मेरे दो पसंदीदा शख्स भोपाल के ही हैं....एक हबीब तनवीर और दूसरे बशीर बद्र...बशीर बद्र साहब से हालांकि आज तक मुलाक़ात नहीं हुई पर तनवीर जी से और किस्मत के मेल ने मिलवाया .....एक बार नहीं....तीन बार ....

एक सुबह अखबार में एक ख़बर से पता चला कि हबीब तनवीर शहर में हैं....उस वक़्त बहुत समपर्क ना थे और ना ही सम्बन्ध सो एक अंदाजा लगाया कि भारत भवन या रविन्द्र भवन में शायद दर्शन हो जायें....दर्शन से ज्यादा अपनी हैसियत नहीं लगती थी सो बस एक बार दूर से देखने का मन था कि आख़िर तस्वीरों में चिर युवा दिखने वाला ये शख्स क्या वाकई इतना युवा है....तो बस २ नंबर बस पकड़ कर पहुँच गए....रविन्द्र भवन....और वहाँ से घूमते हुए भारत भवन....और वाह री किस्मत दूर से ही किसी ने बताया कि वो रहे हबीब तनवीर....डरते हुए क़दमों से उनके पार पहुँचा....एक दुबला पतला सा वृद्ध बैठा कुछ लिख रहा था और आस पास बैठी थी तन्हाइयां ....

कुछ देर वहीं खड़ा रहा और फिर चुप्पी तोड़ कर बड़ी हिम्मत से बोला ....सर मेरा नाम मयंक सक्सेना है....लखनऊ का रहने वाला हूँ....आपसे मिलने आया हूँ....हड़बड़ी में बोले गए मेरे इस आखिरी वाक्य पर वे मुस्कुरा दिए और वैसे ही लिखते हुए हाथ से बैठ जाने का इशारा किया...मैं वहीं बैठ गया....५ मिनट बाद मुझसे मुखातिब हुए और बोले क्या नाम बताया ....?

मैंने दुबारा अपना पूरा परिचय दोहरा दिया ....फिर तुंरत एक दूसरा प्रश्न.....पत्रकार तो नहीं हो...?....जवाब दिया ...नहीं सर पढ़ाई कर रहा हूँ....आपसे मिलने की इच्छा थी....उधर से नहीं ठीक है....पत्रकार होते तो कहता कि अभी फुर्सत नहीं है.....और उसके बाद तमाम बातें....मेरी पढ़ाई से लेकर नाटक...अभिनय...संगीत और लोक कलाओं पर...सरकारों के रवैये पर....क्या क्या पढ़ते हो साहित्य में....ख़ुद क्या लिखते हो....अपने नाटकों पर बात...दूसरों के नाटकों पर बात.....तमाम बातें....और उनका पुराना पाइप....उनकी उँगलियों में....

काफ़ी देर बाद....अचानक उठ खड़े हुए और बोले....चलिए अब मेरे पास और वक़्त नहीं है तो ....और मैं सीधा इशारा समझ गया....और लौट चला घर के लिए....सोचते हुए कि इतना बड़ा व्यक्तित्व और इतना सरल व्यक्ति....उस दिन की मुलाक़ात हलाँकि जीवन की एक धरोहर थी पर ना जाने क्यूँ लग रहा था कि कुछ रह गया है जो अगली बार मिलने पर ही पूरा होगा....अगला मौका भी आया पर कुछ दिनों बाद....उस समय तक सूचना तंत्र थोड़ा मज़बूत हो गया था सो उनके आने की सूचना पहले ही मिल गई....इस बार जगह थी रविन्द्र भवन.....

इस बार उत्सुकता तो उतनी ही थी पर डर पिछली बार से कम...बल्कि नहीं के बराबर.....कई लोग थे ...जैसे तैसे उनसे मिला...देखते ही बोले...फिर आ गए...ऐसा लगा कि ज़रूर मुझसे चिद्ध गए हैं...पर फिर ठठा के हंस दिए और कहा आओ....इस बार तबियत थोडी ख़राब थी...मुझसे कहा कि तबियत ठीक नहीं है पर ज़िन्दगी ही थियेटर है तो किया भी क्या जाए....मैंने पता नहीं क्यों बिना सोचे पूछ लिया ...आपकी टोपी कहाँ है...इस बार मुझे लगा कि फिर गलती हुई पर वे मुस्कुराए...और बगल में रखी चिर परिचित टोपी उठा कर बोले ...इसकी बात कर रहे हो....और मैं भी हंस पडा...... इस बार ज्यादा बात नहीं हो पायी पर मैंने एक सवाल पूछा कि आपके बाद इस विरासत का क्या....ये लोक और आधुनिक कला का मेल कौन करेगा...तो एक आश्चर्यजनक उत्तर जिसमे चिंता का कोई नामोनिशान नहीं...कोई ना कोई कर लेगा....बोलकर फिर बोले ...मैंने भी तो किया ही.....कई लोग हैं जिनकी ज़िन्दगी में बस्ता है ये सब.....फिर थोडी सी फिल्मों पर बात हुई...और फिर कुछ प्रेस फोटोग्राफरों को देख कर मैंने कहा कि आपके साथ तस्वीर खिंचवाना चाहता हूँ....तो मना कर दिया और बोले कि ....तस्वीर आंखों से उतारो..और दिमाग में सहेज लिया करो....जाओ ज़िन्दगी में बढ़िया करो....
उसके बाद एक बार मुलाक़ात हुई पर बहुत कम बात हुई ...उनकी तबियत वाकई ख़राब रहने लगी थी....उसके बाद समय बीत गया....भोपाल छूट गया....और अब ख़बर आई कि हबीब नहीं रहे.....सब उनको याद कर रहे हैं....कोई उनके नाटकों के लिए ..कोई कला के लिए तो कोई उनके ख़बर होने की वजह से...नई नौकरी की नई व्यस्ततताओं की वजह से कुछ समय नही लिखा पाया ...तुंरत नहीं लिख पाया ...पर मैं उनको याद कर रहा हूँ....उनसे अपनी छोटी छोटी तीन मुलाकातों के लिए.....और उस एक वाक्य के लिए.....
तस्वीर आंखों से उतारो..और दिमाग में सहेज लिया करो
और आज उनके ना होने पर भी कुछ तस्वीरें ताज़ा हैं...जो आंखों से उतारी गई थी....और कुछ यादें आज भी सिरहाने हैं....






हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी