मंगलवार, 27 मई 2014

विस्थापन से जंग



बहुत ज़िद्दी होते हैं 
कबूतर 
और गिलहरियां 
विस्थापित कर दिए जाने के बावजूद 
शक्तिशाली मनुष्य के सामने 
हार नहीं मानते 
लौट आते हैं फिर-फिर 
चहलकदमी करते हैं 
इंसानों के खड़े कर दिए गए 
विशाल ढांचों के 
आंगनों में 
कूदते हैं 
इस छत से उस छत 
करते हैं बीट 
खुजलाते हैं पांखें 
बैठ किसी रोशनदान या खिड़की में 
कब्ज़ाए रखते हैं 
मुंडेर, शेड और खिड़कियां 
पानी की टंकियां 
बंद पड़े कमरे और पंखे 
आसानी से 
बल्कि किसी भीा तरह से 
अपनी ज़मीन 
अपनी जगह नहीं छोड़ते हैं 
कबूतर और गिलहरियां 
आप जीत जाते हो 
लेकिन वो हारते नहीं हैं 
छोड़ कर नहीं जाते 
अपना घर...अपनी ज़मीन

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सालगिरह मुबारक पाकिस्तान...

बचपन से 15 अगस्त को स्कूल में होता था...बड़ा हुआ तो कॉलेज में जाने लगा...या फिर आस पास के किसी स्कूल या पिता जी के दफ्तर में...नौकरी में आया तो हर बार 15 अगस्त को दफ्तर में रहा...सुबह से देशभक्ति के नाम के झूठे नारे टीवी पर चलवाता रहा...लाल किले से किसी ने किसी धोखेबाज़ की ठगी को लाइव दिखवाता रहा...भाषणों का विश्लेषण करने के लिए बेईमान लोग पैनल में बैठते रहे...हम 15 अगस्त की भी टीआरपी काउंट करते रहे...इस बार उत्तराखंड के आपदा प्रभावित इलाकों में हूं और अचानक से उठता देशभक्ति का ज्वार देख रहा हूं...
कभी 15 अगस्त की सुबह आस पास के किसी सरकारी स्कूल में जाता था तो देखता था कि ज़्यादातर शहरी लोग घरों में उस रोज़ छुट्टी मनाते थे...स्कूलों में सिर्फ बच्चे होते थे...15 अगस्त का मतलब शाम की सैर था...लेकिन हां हम सब बहुत बड़े देशभक्त थे...पाकिस्तान के खिलाफ सिर्फ जंग चाहते रहे गोया वहां इंसान ही न रहते हों...
हम को समझना होगा कि दो मुल्कों का बंटवारा एक सियासी फैसला था...जिसके पीछे कुछ सियासी ख्वाहिशें थीं...हम को समझना होगा कि बंटवारा न तो गांधी ने कर दिया था...न ही सिर्फ अंग्रेज़ों ने...और न ही उसके लिए देश में कोई जनमत सर्वेक्षण हुआ था...
ठीक उसी तरह हमको समझना होगा कि बंटवारे के बाद जो दंगे हुए...जो हिंसा अब तक होती आ रही है...जो तनाव है...वो भी सियासी मुआमला है...सियासत ही करवाती आ रही है...जंग से लेकर समझौतों और वार्ताओं तक कभी आम आदमी से वोटिंग तो करवाई नहीं गई कि भई ये कर रहे हैं...तुम क्या कहते हो...
हमको समझना होगा कि रोटी, रोज़गार और रिवाजों के मसायल दोनों ओर हैं...दोनों ही मुल्कों के लोग एक ज़ुबां बोलते हैं...हमारे यहां तो सुनने में भी एक ही है...जिसे वो उर्दू समझते हैं, उसे हम हिंदुस्तानी कहते हैं....लेकिन बाकी दुनिया में भी वो ज़ुबान दरअसल सुनने में एक जैसी न लगते हुए भी एक ही सी है...वही भूख, दर्द, गरीबी, जंग की ज़ुबान...कुल मिला कर आंसुओं की ज़ुबान जिसे बमों और दमन से बंद किया जाता रहा है...फिर आखिर हम कैसे एक नागरिक के तौर पर पाकिस्तान या किसी भी मुल्क के नागरिक से नफ़रत कर सकते हैं...ये जानते हुए भी कि जंग आखिरकार फौजियों की जान और नागरिकों की ज़िंदगी मुश्किल में डालती है हम बार बार जंग का समर्थन करते हैं...आखिर क्यों ये समझना मुश्किल है कि रघुआ और रमज़ानी के हालात ज़्यादा अलग नहीं हैं....अल्पसंख्यक दोनों जगह वैसे ही हालात में हैं..बल्कि हमारे यहां फिर भी बेहतर हालात में...
ज़रा सोच कर देखिए कि हमारी देशभक्ति क्या वाकई हमेशा हमारे साथ रहती है या फिर त्योहारों पर उमड़ आने वाली धार्मिकता की तरह मौके-मौके पर उमड़ती है...क्या देशभक्ति का मतलब सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ वैमनस्य की भावना है...तो फिर उत्तराखंड या उड़ीसा या छत्तीसगढ़ या बंगाल या राजस्थान या आंध्र या मणिपुर की दिक्कतों को लेकर हमारा उदासीन रहना ये हमारे देशद्रोही होने का परिचायक नहीं है...अपने ही मुल्क के लोगों को भूख से तड़पता छोड़ हम पाकिस्तान से अदावत निभा कर आखिर किस तरह की खोखली देशभक्ति को प्रमाणित करते हैं...क्या देश से मुहब्बत किसी और से दुश्मनी है या फिर अपने देश के तकलीफ़शुदा लोगों से मोहब्बत करना है...हम आखिर किस तरह के लोग हैं...क्या 15 अगस्त और 14 अगस्त को पाकिस्तान को गाली बक कर और जॉर्ज पंचम के अभिनंदन में लिखे गए राष्ट्रगान को गाकर हम देशभक्त हो जाएंगे...
पाकिस्तान एक सियासी मजबूरी के साज़िश और फिर गलती में बदल जाने की सबसे बड़ी मिसाल है...आज वहां की अवाम लगातार मज़हबी आधार पर मुल्क बांट लेने की सज़ा भुगत रही है...हम उनसे कहीं बेहतर स्थिति में है फिर वहां के बेगुनाह अवाम के लिए सहानुभूति की जगह अदावत और नफ़रत क्यों...
हम बेहतर हालात में हैं...हम सड़कों पर उतरते हैं...वोट डालते हैं...हमको कोई मज़हबी धमका कर सरकार चुनने या शरिया मानने को बाध्य नहीं कर सकता है...हमसे कोई नहीं कह सकता है कि तुमको मंदिर जाना ही होगा...हमारे यहां कोई तय नहीं करता कि लड़कियां साड़ी या बुरका पहनेंगी ही...हम तमाम मामलों में बेहतर हैं...सोचिए उन लोगों की जो पिछले 65 सालों में आधे दशक के बराबर फ़ौजी हुक़ूमत और मज़हबी पागलों को झेलते रहे...
क्या हम दुश्मनी की आग में पागल हो जाने वाले लोग हैं...फिर हमने क्या ख़ाक दिमागी तरक्की की है...इतने साल बाद हम आज यहीं पहुंचे हैं...क्या हमारे मुल्क में और दिक्कतें मसले नहीं हैं...क्या हमें अपने मुल्क के तमाम हिस्सों में काम करने और उनको भी भूख, गरीबी और पूंजीवादी शोषण से बचाने की ज़रूरत नहीं हैं...क्या वाकई हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत सिर्फ दुश्मनी है...
ज़रा सोच के देखिएगा कि आपने मुल्क के लिए अब तक किया ही क्या है...क्या वो मुसलमान गद्दार हो सकते हैं जो अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और सगे-भाई बहनों के भी पाकिस्तान चले जाने के बावजूद भी अपनी मिट्टी और वतन छोड़ कर नहीं गए...और जो चले गए वो तो हिंदुस्तानी ही नहीं...उनसे क्या नाराज़गी...क्या 47 के दंगों में सिर्फ हिंदू या मुसलमान मरे थे...क्या मुल्क की एकता और इंसानियत नहीं मरे थे...हम आखिर किस तरह के लोग हैं, क्या हम वाकई अपनी अंधी आस्था और मज़हबी पागलपन के आगे कुछ सोचना ही नहीं चाहते...क्या मुल्क वाकई बहुत तरक्की कर चुका है और अब बस तरक्की की आखिरी मंज़िल जंग है...जंग अगर वाकई मसायल का हल होती तो अब तक कश्मीर से लेकर मणिपुर और अमेरिका से इज़रायल तक सब अनसुलझा क्यों है...
हम वो लोग हैं जो सड़क पर दुर्घटना में घायल पड़े आदमी को मरता छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं...लेकिन हम देशप्रेम के नाम पर पाकिस्तान को मटियामेट कर देना चाहते हैं...सच सुनिएगा और भले ही गाली बकते रहिएगा लेकिन वो ये ही है कि पिछले 65 सालों में जम्हूरियत के लिए जो संघर्ष पड़ोसी मुल्क के हमारे भाई-बहनों और साथियों ने किया है...वो हमने नहीं किया...न ही उतनी दिक्कतें झेली हैं...हमको सलाम करना चाहिए उस अवाम को जो गोलियां खाती है...फांसी पर चढ़ती है...तालिबान से लोहा लेती है...जहां नाहिदा किश्वर हैं...जहां फै़ज़ थे...हबीब जालिब थे...अहमद फ़राज़ थे...इक़बाल बानो थीं...जहां मलाला है...जहां लगातार एक जंग है कट्टरपंथियों के खिलाफ़...जान पर खेल कर कट्टरपंथ से जंग जैसी हमारे यहां कभी नहीं देखी गई...वो मुल्क जहां बोल और ख़ुदा के लिए जैसी फिल्में बनती हैं...हर 4 साल बाद इमरजेंसी लगती है और लाखों लोग जेल जाने को तैयार हो जाते हैं...
लेकिन हम क्यों समझेंगे...क्यों सोचेंगे...वो काम तो हमने अपने सियासी ठगों और नकली बुद्धिजीवियों पर छोड़ दिया है...छोड़ दिया है दलाल दक्षिणपंथी पत्रकारों और धर्मगुरुओं पर...हम क्यों सोचेंगे कि जब सरकारें सुप्रीम कोर्ट, एक्टिविस्टों और जनता के बीच अपने घोटालों कों लेकर फंसने लगती हैं...तभी क्यों सीमा पर अचानक जवान मर जाते हैं...क्यों दक्षिणपंथी ताक़तों के खिलाफ़ मामले उठते ही कहीं न कहीं ब्लास्ट हो जाता है...आखिर क्यों फ़र्ज़ी एनकाउंटर तक आसानी से कर देने वाली...पूर्वोत्तर में एफ्स्पा का नाजायज़ फ़ायदा उठाने वाली...दुनिया भर में जा कर शानदार काम करने वाली हमारी सेनाएं पाकिस्तानी जवानों से लोहा नहीं ले पातीं....सोचिएगा कि आखिर ये साज़िश क्या है...समझिएगा कि सरहदों की सरगर्मियां सियासत को लहू की खुराक देती हैं...सियासत की सबसे अहम खुराक...बड़ा आसान होता है जंग और अदावत का ज्वार भड़का कर अवाम का ध्यान भटकाना...समझिएगा कि आपके अंदर का कट्टरपंथी क्या पाकिस्तान के नाम पर मुसलमान से तो नफ़रत नहीं कर रहा...अगर करने लगा है तो समझिए कि आपकी ये मियादी देशभक्ति आपको किस ओर ले जा रही है...
दुनिया में सबसे बड़ा गुनाह है इंसान की इंसान से नफ़रत...उस रास्ते पर जा कर कोई इंसान ही नहीं हो सकता है...देशभक्त क्या होगा...पाकिस्तान के बनने के साथ ही दो नए मुल्कों में अदावत की शुरुआत हुई...लेकिन एक और सिलसिला भी शुरु हुआ, जिसे आज़ादी और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति का सिलसिला कहते हैं...14 अगस्त एक ऐतेहासिक तारीख थी, जिसके बाद 15 अगस्त भी आई...और तमाम और मुल्कों को भी आज़ादी मिली...आप चाहें या न चाहें 6 दशकों से फौजी हुक्मरानों, तानाशाहों और कट्टरपंथियों के खिलाफ़ लड़ रही जनता को मैं 14 अगस्त को उनकी आज़ादी और मुल्क की विलादत के दिन बधाई देना चाहता हूं...सलाम करना चाहता हूं फांसी पर चढ़ गए भुट्टो...और ज़ुल्मत को ज़िया कहने के खिलाफ़ तन कर खड़े हो गए हबीब जालिब को...जेल जाने वाले फ़ैज़ को...और जान खतरे में डाल कर भी तालिबान के सामने सिर न झुकाने वाली मलाला को...तमाम उन लोगों को जिनको हम पाकिस्तानी अवाम कहते हैं...जिनके भरोसे पर ये जियाले लड़ते रहे...तमाम सहाफियों को जो तानाशाही के खिलाफ़ कलम को तलवार बना कर लड़ते रहे...तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जिनके दम पर लोग कट्टरपंथियों का सामना कर रहे हैं...तमाम दोस्तों को जो जब बात करते हैं और मिलते हैं तो लगता है कि कोई घर का बिछड़ा सदस्य घर लौटा है...मेरा सलाम है लाहौर को...करांची को...रावलपिंडी को...क्वेटा को...हड़प्पा और तक्षशिला को...रावी और चिनाव को...सिंधु को...और हिंदू देवी के नाम से ही अब तक पुकारी जाती सरस्वती को...आपकी नफ़रत को धोती और धिक्कारती ये नदियां जिनके नाम पाकिस्तानी या इस्लामिक नहीं हैं...आज भी पाकिस्तान से बहती हुई हिंदोस्तान में आती हैं...कभी इनके तटों पर कोई ऋषि साधना करता रहा होगा...आज कोई नमाज़ी वुजू करता होगा...लेकिन आज भी खेती इंसान कर रहे हैं...पानी वही है...पाकिस्तान में भी और हिंदुस्तान में भी...सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हमारी आंखों में आज भी उतना ही पानी और ज़ेहन में उतनी ही इंसानियत बची है...सोचिएगा कि क्या इंसानियत नागरिकता की रूह है या फिर नागरिकता इंसानियत का मूल तत्व...सोचते सोचते बस देर मत कर दीजिएगा...पाकिस्तान को रात 12 बजने से पहले आज़ादी के दिन की मुबारकबाद दे दीजिएगा...

ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में
अमने आलम का ख़ून है आख़िर

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है

टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है

इसलिए ऐ शरीफ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है
(साहिर...)


इंसानियत ज़िंदाबाद...

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

समर शेष है ... (उत्तराखंड आपदा) - अंशु गुप्ता

कल ही हमारे दिल्ली दफ्तर के नज़दीक के हमारे नियमित दवा विक्रेता ने हैरानी जताई कि हमारा संगठन गूंज अभी भी उत्तराखंड में लगातार राहत कार्यों में लगा हुआ है। उसके एक साथी के भतीजे ने उसे हमसे ये पता करने के लिए फोन किया था कि हम अभी तक उत्तराखंड में क्या कर रहे हैं?’
उत्तराखंड में सब ठीक हो गया है, ऐसी कल्पना करने वाले वे अकेले नहीं हैं-जबकि अभी तक सड़कें नहीं बनी हैं, अभी तक लोग लापता हैं, एक परिवार में 25 किलो राशन सिर्फ एक हफ्ते चलता है और इस पूरे इलाके की आर्थिकी ढह चुकी है।
उत्तराखंड में मैं ये पहले भी देख चुका हूं, 20 साल पहले भारत के आपदा प्रभावित ग्रामीण इलाके से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी। ये ही वो जगह थी जिसने मेरी शहरी संवेदनाओं को अंदर तक हिला दिया था, ये साल था 1991 का जब उत्तरकाशी पर भूकम्प ने हमला किया था। मैं भारतीय जन संचार संस्थान की अपनी कक्षाएं छोड़ कर आपदा प्रभावित इलाके में जा पहुंचा था। मुझे पता भी नहीं था कि आपदा होती क्या है। मैंने भूकम्प के बारे में या तो सुना था या फिर पढ़ा था। बचाव और राहत अनजान तथ्य थे और भ्रष्टाचार और असंवेदनशीलता के बारे में सुना था लेकिन कम...उन दिनों ये हर रोज़ इस्तेमाल होने वाले शब्द नहीं थे।
उस यात्रा में मुझे पहाड़ों से डर नहीं लगा था, देहरादून और चकराता में बीते बचपन की यादें दिमाग में ताज़ा ही थीं। भू-स्खलन, सड़क बंद हो जाना, बिजली जाना, सब ठप हो जाना और पेड़ गिरना आम घटनाएं थी। मैं कभी भी ऐसे टूटते-खिसकते पहाड़ों में पहले नहीं घूमा था लेकिन मुझे उनसे डर बिल्कुल नहीं था।
मुझे भटवारी समेत तमाम गांवों में जाना याद है, खासकर जमक नाम का वो गांव जहां 70 लोग मारे गए थे। कारण...मानेरी बांध। ये सामान्य पर्यावरणीय दृष्टिकोण नहीं था क्योंकि स्थानीय लोगों ने कर्मचारियों और ठेकेदारों से सस्ते दाम पर सीमेंट खरीद कर बड़े-बड़े मकान बना लिए थे, बिना ये जाने कि मज़बूत नींव कैसे बनाई जाए। जब भूकंप आया, उनके मकान और ज़िंदगियां मिनटों में मिट्टी में मिल गए।
1991 में पहली बार मैं उन लोगों की अस्मिता को समझ पाया जिनको न केवल आपदा ने बल्कि शहरी इलाकों में हमारी असंवेदनशीलता ने भी मारा था। मैंने देखा कि कैसे आपदा में पुराने अंतःवस्त्र और टूटे जूते आपदा प्रभावित लोगों के लिए राहत के नाम पर भेज दिए गए और पहाड़ के लोगों ने इसे ठुकरा दिया, उन्होंने किस कदर छला हुआ और अपमानित महसूस किया। मैंने देखा कि न तो वहां शवों के अंतिम संस्कार के लिए सूखी लकड़ी थी और न ही शवयात्रा में कांधा देने के लिए लोग।  
20 साल बाद, मैं एक और आपदा के दौरान उत्तराखंड में हूं, इस बार एक ऐसा आधार तैयार करने के लिए जो दीर्घकालिक राहत और पुनर्वास कार्यों को अंजाम तक पहुंचाए।
क्या मैंने कहा कि इस बार भी मेरे लिए उत्तराखंड जाना पहचाना था? मैंने कहा, लेकिन इस बार भटवारी तक पहुंचना मुमकिन नहीं। बड़ी संख्या में गांव अभी भी सड़कों से कटे हुए हैं। राहत सामग्री वहां तक सिर्फ कुलियों या हेलीकॉप्टरों के ज़रिए जा सकती है, या फिर आप वहां सिर्फ तब जा सकते हैं जब आप अनजान रास्तों पर मीलों तक पैदल सफर करने के लिए तैयार हों।
जीवन में पहली बार मुझे पहाड़ों से भय महसूस हो रहा है। मेरे जैसा व्यक्ति जिसके लिए पहाड़ कभी बचपन का खेल का मैदान रहा हो, उसके लिए ये हैरानी की बात है। किसी भी और पहाड़ी बच्चे की तरह मैं कई बार कुछ किलोमीटर स्कूल तक पैदल जाता था, जब आर्मी की जीप नहीं मिलती थी।
मैं इस बार भयभीत हूं और मैंने महसूस किया है कि मैं अकेला नहीं हूं। ऐसे तमाम लोग जो वहीं पले-बढ़े, जिनके परिवार पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं...वो भी इसी मनो अवस्था में हैं। हालांकि गुप्तकाशी इलाके में मृतकों की संख्या ज़्यादा और उत्तरकाशी में तुलनात्मक रूप से कम हैं लेकिन दोनों ही इलाकों में नुकसान बराबर हुआ है। केदारनाथ में तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की मौत सबसे अधिक हुई हैं, लेकिन अगर आप बद्रीनाथ की ओर जाएं तो वहां भी भारी नुकसान हुआ है।
हमा भारतीय अपने लचीलेपन के लिए जाने जाते हैं। अपने शहरों में हम जाम हो गई नालियों, गंदी सड़कों, असुरक्षित बिजली के तारों, मानसून की बाढ़ और डेंगू के साथ रहते हैं। हम लचीले तो हैं लेकिन हम बदलाव के नाम पर कुछ करते नहीं हैं। पहाड़ों पर लोगों की जीवनशैली बेहद मुश्किल है लेकिन साथ ही वो अब उपेक्षा के साथ-साथ कारपोरेट और ठेकेदारों के लालच के भी शिकार हैं।
हालांकि पहाड़ के लोगों के लिए जीवन अभी भी चलता रहेगा।
लेकिन फिर भी यहां लोगों के कुछ सवाल हैं, जो अभी तक अनुत्तरित हैं।
जब गुप्तकाशी, उत्तरकाशी, जोशीमठ और पिथौरागढ़ विपरीत दिशाओं में और इतनी दूर है तो आखिर इन सारी जगहों पर एक सा ही कुदरती कहर क्यों बरपा?  जब स्थानीय लोगों के मुताबिक केदारनाथ मंदिर के इलाके में 15 हज़ार से अधिक लोगों के भी इकट्ठा हो जाने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है तो सरकार लगातार ये क्यों कहती रही कि सिर्फ 1000 लोग ही मारे गए? और उन हज़ारों लोगों का क्या जिनके बारे में सरकार के पास कोई सूचना नहीं है...सैकड़ों साधुओं से लेकर छोटे दुकानदारों तक?
इस बार मीडिया ने एक अहम भूमिका निभाई, बड़े तौर पर सकरात्मक भूमिका...ये तय करने में कि इस त्रासद आपदा को दुनिया भर का ध्यान मिले। हालांकि कई बार आगे रहने की रेस में साधारण बारिश को भी धुआंधार बारिश कह कर दिखाया गया, जिससे न केवल कई योग्य वालंटियर यहां आने के लिए हतोत्साहित हुए बल्कि कई लोगों के बच जाने की आशा भी उनके परिजन खो बैठे।

समस्या सिर्फ इतनी तो नहीं
हम न तो फौज हैं और न ही सरकार, हम सिर्फ लाखों और नागरिकों की तरह जुनूनी नागरिकों का एक समूह भर हैं। हमारी क्षमताएं और कौशल सीमित हैं, लेकिन जिस तरह की प्रतिक्रिया और भरोसा हमको दुनिया भर के लोगों से मिली है, उससे हम वाकई भाव विभोर हैं।
हम ये नहीं कह सकते हैं कि राहत कार्य में सहयोग न करने के लिए सिर्फ उत्तराखंड सरकार ही दोषी है क्योंकि 14 साल के अनुभवों में हमने हर जगह ये ही स्थिति देखी है। शांति के दौरान हम हर जगह आपदा और पलायन प्रबंधन पर कांफ्रेंस और सेमिनार देखते हैं लेकिन जब ये सब होता है तो हम शायद ही इसके लिए कभी तैयार होते हों।
2001 में जब पूरा गुजरात भूकम्प से हिल गया, तब राज्य सरकार ने अस्थायी घरों के लिए टिन शीट्स खरीदने में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए। गुजरात की तपती गर्मी में टिन की चादरें? और वो भी कच्छ में?
उत्तराखंड में भारतीय थल सेना और वायुसेना ने अहम भूमिका निभाई लेकिन हमने पाया कि ज़्यादातर सरकारी अधिकारी सिर्फ वीआईपी दौरों के इंतज़ाम में लगे रहे। दरअसल हमको जो चाहिए था, वो था एक आपदा नियंत्रण कक्ष, एक केंद्रीय कार्यालय जो हालातों पर नज़र रखे..यानी कि मौसम, सड़कों की हालत और परिवहन सुविधाएं उपलब्ध करवाए।  
हमको सड़कें साफ करने के लिए और अधिक उपकरणों की आवश्यक्ता थी, जिससे कि राहत सामग्री का वितरण और तेज़ी से हो पाता। अभी के हालातों में अगर राहत सामग्री तैयार भी है तो भी राहत कार्य सड़कों के बंद होने से ठप हो जाता है। केंद्रीय एजेंसियों में आपसी तालमेल का अभाव है। सही और ताज़ा सूचनाओं का अभाव रहता है। सबसे पहला काम आंकड़ों और सूचनाओं को दोबारा से संग्रहीत करना होना चाहिए।  

लेकिन फिर सड़क नहीं थी
मेरी अब तक की देखी गई किसी भी आपदा से उत्तराखंड की तबाही बिल्कुल अलग तरह की थी। इसलिए भी कि इस बार कुदरत के बारे में कुछ भी कह पाना मुश्किल था, जिस वजह से सभी के पास मजबूरी थी कि वो बस सांस रोक कर बैठें और धैर्य से काम लें।
सभी योजनाएं दीर्घकालिक होनी चाहिए थीं, हमको ये समझना होगा कि हम किसी परिवार को 25 किलोग्राम राशन देकर भले ही धन्य महसूस करें और दावा करें कि उस तक राहत पहुंच गई लेकिन सच ये है कि ये मदद सिर्फ कुछ दिनों तक ही उसके काम आएगी।
आमतौर पर ये देखा गया है कि आपदा के बाद पुनर्वास शुरु होता है लेकिन हमने लगातार देखा कि कई इलाके आपदा के बाद होने वाली ताज़ा लैंड स्लाइड्स में बाकी दुनिया से कट गए। हमको उस इलाके से भी वास्ता रखना ही होगा, जो कुछ वक्त पहले तक दुनिया से जुड़ा था और अब हमारी पहुंच से दूर है। ये मॉनसून का बस शुरुआती हिस्सा ही है और अभी भू-स्खलन की घटनाएं होती ही रहेंगी।
ऐसी कई सड़कें हैं तो ऊपर से देखने में काले तारकोल के साथ ठीकठाक लगती हैं लेकिन ज़रा ग़ौर से देखिए उनके नीचे का आधार बह चुका है। ऐसे में हर बार की बारिश और भू-स्खलन का मतलब होगा और ज़्यादा नुकसान। कई इलाकों में तो पुराने खच्चर ले जाने वाले रास्ते भी गायब हो चुके हैं। (हालांकि अब ज़्यादा खच्चर भी नहीं बचे हैं।)
आपदा के बाद कुछ घंटों के भीतर ही सारा देश जान चुका था कि इस इलाके में सड़क सम्पर्क खत्म हो चुका था, फिर आखिर इतनी बड़ी संख्या में संगठन, सहायता दल, व्यक्ति और राजनैतिक दल ये नहीं समझ सके कि आखिर उनके बड़े-बड़े ट्रक कैसे यहां पहुंचेंगे? आपदा के सिर्फ 2 हफ्ते बाद ख़बर मिली की 200 से ज़्यादा ट्रक राज्य के हर हाईवे पर खड़े सड़कें खुलने का इंतज़ार करते रहे और राहत सामग्री सड़ती रही।  
ये कहना बुरा लगता है लेकिन ये सब बिना योजना के राहत कार्य शुरु कर देने का ही नतीजा है, या तो अधीर भावनाओं की वजह से या फिर सस्ते प्रचार के लिए। मुझे रास्ते में फंसे हुए एक ट्रक चालक से वो बातचीत याद है, जिसमें उसको इस बात की चिंता थी कि वो बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के 6 दिन से रास्ते में फंसा हुआ था, जबकि वो जानता था कि इस आपदा ने ट्रांसपोर्ट के धंधे में तेज़ी ला दी थी।
वक्त की ज़रूरक है अच्छा परिवहन। कई इलाकों में अभी भी फौज ही राशन ले जा पा रही है। हर चीज़ जो इन इलाकों में उपलब्ध है, उसकी कीमत कई गुना बढ़ चुकी है। इसीलिए गूंज ने इंतज़ार नहीं किया, इलाके की पूरी समझ रखने वाली और जोखिम से जीतती रही राफ्टिंग टीम्स को अपने साथ जोड़ा। उन में से कई लोग उन्हीं गांवों से थे, जो आपदा प्रभावित थे और इसीलिए उनका इस काम से भावनात्मक जुड़ाव भी था। इसके अलावा हमने ट्रैकिंग करने वालों और पर्वतारोहियों के दलों से सम्पर्क किया, उनकी मदद से कई व्यवहारिक बातें तय हुई और राहत सामग्री कई दुर्गम इलाकों में पहुंची। अभी तक गूंज लगभग 30 ट्रकों जितनी राहत सामग्री दुर्गम इलाकों में पहुंचा चुका है। कुछ इलाकों में तो कुली 25 किलोग्राम बोझ ढोने के लिए 600 से 1000 रुपए तक लेते हैं, जो राहत सामग्री की कीमत से भी कहीं ज़्यादा होता है लेकिन फिलहाल ये ही लोग हैं जो उन इलाकों में राहत सामग्री ले जा सकते हैं। ये लोग 6-8 घंटे तक पैदल चलते है और सामान पहुंचा कर वापस लौटते हैं।  

लेकिन सर्दियां आ रही हैं...
इस आपदा की एक सतह नहीं, जहां पर हम खड़े हैं...आर्थिक आपदा जो इस सैलाब से आई है।
पहली बात ये कि इन इलाकों में ज़्यादातर लोग आलू और सेब की खेती करते थे, बाढ़ ने न केवल उनकी तैयार फसलों को तबाह कर दिया बल्कि उपजाऊ ज़मीनें भी बहा दीं। जहां कभी एक खेत था, अब वहां सिल्ट और बालू है। आमतौर पर यहां लोगों के पास छोटे-छोटे खेत होते हैं और उनसे वो कम से कम अपनी ज़रूरतें तो पूरी कर ही लेते हैं।
दूसरी बात एक अंदाज़े के मुताबिक 5000 के करीब खच्चर सिर्फ केदारनाथ में बह गए या मारे गए। ये इस तीर्थयात्रा का चरम था और इस मौसम में अमूमन दूर दूर से अपने खच्चर लेकर इस इलाके में रोज़गार के लिए आते थे। खच्चर इस इलाके में रोज़गार और परिवहन का सबसे अहम साधन थे। इन इलाकों के परिवारों के लिए खच्चर बड़ी सम्पत्ति हैं और उसकी कीमत 60 हज़ार से 1 लाख रुपए के बीच होती है। यही नहीं चूंकि खच्चर जोड़े में ही चलना पसंद करते हैं, इसलिए ज़्यादातर लोगों के पास खच्चर का जोड़ा था और वो उसे खो बैठे।  
अब खच्चरों की संख्या लगभग न के बराबर हो जाने की वजह से एक किसान अगर अपने आलू या कोई और सब्ज़ी बाज़ार तक नीचे लाना या ऊपर ले जाना चाहता है तो खच्चर का किराया ही सब्ज़ी की कीमत से ज़्यादा बैठता है। ऐसे में आप क्या करेंगे? कई लोगों ने खच्चर खरीदने के लिए स्थानीय देनदारों से ऋण लिया था, उनके ऊपर अब कर्ज़ का पहाड़ है।
तीसरी बात, इस इलाके की अर्थव्यवस्था का आधार आस्था और मंदिरों पर आधारित रहा है। हम अब तक न जाने कितने राजनैतिक प्रहसन देख चुके हैं और जल्दी ही मंदिर भी खुल जाएंगे। लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए अहम है कि रास्ते भी खुलें, और साथ ही उन रास्तों पर पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों के लिए सुरक्षित आवागमन भी हो।
इस रास्ते पर तमाम छोटे होटलों और दुकानें के ज़रिए आजीविका चलाने वाले सैकड़ों परिवारों के लिए ये सीज़न जा चुका है और उन्हें नहीं पता है कि यात्रा का अगला सीज़न कैसा होगा। आखिर इतना भविष्यदृष्टा कौन हो सकता है? कई इलाकों में तो अगले कुछ महीने ही मुश्किल होने वाले हैं। आमतौर पर यात्रा के दौरन ही लोग कमाते हैं और बाकी के 6 सर्द महीनों के लिए अनाज-राशन जमा कर लेते हैं। तो इसीलिए एक बाहरी के तौर पर आपको हैरानी होगी कि स्थानीय लोग आखिर क्यों राहत के राशन को जमा कर रहे हैं। आपका जवाब आपके पास है, वो जानते हैं कि हमारी अल्पकालिक याद्दाश्त उन्हें सर्दी से नहीं बचाएगी...हम भूल जाएंगे कि यहां भी लोग हैं...

हम अभी तक क्यों डटे हैं..

गूंज ने शुरुआत की ऋषिकेश में नगर पालिका के सहयोग से एक बड़े सामुदायिक केंद्र को उपयोग में लाकर की, इस जगह लगभग 30 ट्रक सामग्री का भंडारण हो सकता है। यहां पर हमने बड़े ट्रकों सामग्री को उतार कर छोटे वाहनों में भरा।  
हम एक व्यवस्थित तरीके से पूरे राहत कार्य को चालू किया, जिसके लिए अपने टीम के सदस्यों और स्वयंसेवकों को बुलाया। ये हमारा काम करने का तरीका है, जिसके ज़रिए हम बिहार की बाढ़ से लेकर पश्चिम बंगाल के आइला चक्रवात और ओडीशा की बाढ़ तक में काम करते हैं। हमारे पास इस तरह के काम का एक गहन और समृद्ध अनुभव है, जिसके ज़रिए हमने कोसी की बाढ़ में 300 गांवों तक पहुंचने का प्रयोग भी किया।
हमेशा की तरह राहत कार्यों का मतलब है मनुष्य के समझदार और ग़ैर समझदार दोनों रूपों से पाला पड़ना। हमारी दी गई सूची और सूचना के मुताबिक तैयार और व्यवस्थित हो कर आने वाले हर ट्रक के साथ ही हमारे पास फेंक दिए गए या तैयार भोजन का भी ढेर लगने लगा। एक ओर लोग नए कंबल और कपड़े भेज रहे थे तो दूसरी और ऐसे भी लोग थे जिन्होंने हमें कई दिन तक अपने भेजे गए गंदे, बिना धुले और बड़े आकार के कपड़ों-अंतः वस्त्रों के ढेर के नीचे दबाए रखा। 14 साल के अनुभवों ने मुझे इसकी आदत नहीं डाली है। मैं अभी भी इन तोहफ़ों को भेजने वालों पर हैरान होता हूं? मैं सोचता हूं कि कैसा लगेगा उनको अगर वो अपने लोगों और घर से हाथ धो बैठें और लोग उनको इस तरह के अंतः वस्त्र भेजें?  
कई लोग आपदा के समय को ऐसे अवसर के तौर पर देखते हैं, जब वो कीमतें बढ़ा कर गुणवत्ता गिरा दें। हमारे पास पहुंचे बिस्किट्स के डब्बों में कई ऐसे थे, जिनकी एक्सपायरी डेट कई महीने पहले ही निकल चुकी थी, सबसे खराब गुणवत्ता के तिरपाल और कम्बल और साथ ही इस्तेमाल की गई खाद्य सामग्री और दवाएं।   
उत्तराखंड में ही बाकी जगहों की तरह कई स्थानीय लोग मिले जिन्होंने अपने भंडार और रसोई दूसरों के लिए खोल दिए थे..यहां कि यात्रियों के लिए भी और फिर उन्होंने खुद भी किल्लत का सामना किया। लेकिन दूसरी ही ओर हमारा वास्ता ऐसे लोगों से भी पड़ा जो सिर्फ 1100 रुपए की रसीद तुरंत न मिलने पर हमको उपभोक्ता अदालत तक खींच ले जाने की धमकियां दे रहे थे। एक सज्जन ने 500 रुपए की रसीद तुरंत न दे पाने पर हमसे बेहद अश्लील भाषा में बात की। ऐसे तमाम फोन कॉल्स और ई मेल्स की वजह से हमारी टीम के कई सदस्यों को अपना ध्यान राहत वितरण की जगह रसीद वितरण में लगाना पड़ा। हम ने कभी नहीं सोचा था कि हम को आपदा के शुरुआती कुछ दिनों में ही 20 हज़ार के लगभग वित्तीय विवरण बांटने होंगे, हम में से कोई भी ऐसा नहीं सोचता है।   
मैंने लोगों की बड़ी भीड़ को अपने रिश्तेदारों की खोज करते देखा। तमाम मुश्किलों के बावजूद बड़ी संख्या में लोग अपने परिजनों की तलाश में बार-बार यहां आ रहे हैं।
कम से कम अगले 2 साल तक इस इलाके में हम राहत और पुनर्वास के काम को अंजाम देने का निर्णय कर चुके हैं। हमने ऋषिकेश में एक बड़ा आधार कैम्प तैयार किया है, इसके अलावा गुप्तकाशी और गंगोत्री में भी हमारा बेस कैम्प है। हम लगातार उपेक्षित जोशीमठ इलाके में भी काम कर रहे हैं। सामान्य राहत के अलावा हमारी नज़र स्वास्थ्य, शिक्षा और जनजीवन पर भी है।   
हां, ये देखा हुआ सा नहीं है...इस सैलाब के बाद उत्तराखंड में रहना कोई साधारण अनुभव नहीं है। ये पहली बार है जब मैं लोगों को मुश्किल से मुश्किल इलाकों में मदद पहुंचाने के लिए जान पर खेलते देख रहा हूं, जबकि बड़ी संख्या में लोग धनराशि और सामग्री भी भेज रहे हैं। उन मनीऑर्डर्स को तो मैं कभी नहीं भूल सकता हूं, जो उन ग्रामीणों ने भेजे हैं, जिनकी दैनिक आय 20 रुपए या उससे भी कम है।

उत्तराखंड ख़बरों की दुनिया में भले ही अब आपदाग्रस्त न रहा हो, लेकिन हमको बेहद धैर्य के साथ इस देवभूमि के मनुष्यों के साथ खड़ा रहना होगा।

अंशु गुप्ता, एनजीओ गूंज के संस्थापक-निदेशक हैं। आप उत्तराखंड में गूंज के काम में मदद करने के लिए http://goonj.org/?page_id=2245 पर जा सकते हैं।

अनुवाद – मयंक सक्सेना ( mailmayanksaxena@gmail.com )

शनिवार, 19 जनवरी 2013

कौन से आदर्श, कैसी ज़िद और एक सपने की मौत...


" बहेलिये ने उस निरीह पक्षी को मार गिराने के लिएजो उड़ कर किसी बड़े खेत में बैठ गया थापूरी फसल को ही आग लगाने की कोशिश की।"


उस शाम मैं एनएसडी समकालीन रंगमंच के उद्घाटन कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाया, अब सोचता हूं तो अजीब सी दुविधा होती है...एकबारगी लगता है कि काश वहां पहुंच जाता तो जो हुआ उसे रोक पाता, फिर सोचता हूं कि अगर न रोक पाता तो...अच्छा ही हुआ नहीं पहुंच पाता। लेकिन पत्रिका के पहले अंक के बंडल हाथ में थामे मेट्रो से उतर मंडी हाउस पैदल आते पत्रिका के सम्पादक और शायद हम में से सबसे साधारण जीवन जी रहे पत्रकार राजेश चंद्र के लिए ये दुविधा नहीं दुष्कर घड़ी है। राजेश चंद्र के हाथ में जो बंडल है, वैसे ही न जाने कितने बंडल घर पर बंधे रखे हैं, और वो इस सोच में हैं कि क्या एक महात्वाकांक्षी और अद्भुत पत्रिका का पहला अंक बिना बिके रह जाएगा। राजेश चंद्र के स्वप्न के साथ दुष्कर्म हुआ है और जैसा कि घरों में होता रहा है, ये दुष्कर्म भी अपनों ने ही किया है। मशहूर रंगकर्मी अरविंद गौड़ उन कुछ लोगों में से थे, जिन्होंने राजेश चंद्र को इस पत्रिका को निकालने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन पत्रिका के विमोचन के मौके पर एनएसडी के मंच पर जा कर बजाय पत्रिका के बारे में बात करने के, अरविंद जी ने व्यक्तिगत कुंठा, गुस्से और आरोपों के लिए जिस तरह से समकालीन रंगमंच के मंच को रंगमंच बना दिया, वो वाकई अफ़सोसनाक होने से ज़्यादा शर्मनाक था। अरविंद जी मेरे कुछ बेहद घनिष्ठ लोगों में से हैं...बिल्कुल बड़े भाई जैसे, लेकिन धीरे धीरे बढ़ती असहिष्णुता और विरोध न स्वीकारने की आदत के साथ साथ, हर मंच पर अपनी बात कहने की आदत उनको उन सब से दूर लिए जा रही है, जो उनके साथ खड़े हैं। संभव है कि उनको और लोग मिल जाएंगे, लेकिन पुराने साथियों की कमी की पूर्ति स्वार्थ के लिए आने वाले लोग नहीं कर सकते हैं...ख़ैर अरविंद जी के थिएटर का स्तर भी उनके बदलते स्वभाव के साथ खड़ा है...लेकिन रंगकर्म सिर्फ रंगकर्म ही तो नहीं है...समाज बदलने का जो सपना थिएटर दिखाता है, क्या उसके लिए पहले खुद को बदलना ज़रूरी नहीं...अरविंद जी, आपसे डांट भी सुनी है और ख़ुद की समीक्षा भी सुनी है...निंदक नियरै राखिए में भरोसा रखता हूं, सो आपसे अपने सम्बंधों को दांव पर लगा कर शायद ये आखिरी बार कह रहा हूं कि थोड़ा संभल कर, थोड़ा सहज होकर, थोड़ा संवेदनशील हो कर सोचिएगा कि क्या सुधार कि गुंजाइश सिर्फ समाज में है, खुद में नहीं...और हां जनवादी न होना बुरा नहीं है...न होकर उसका आवरण ओढ़ना ज़्यादा बुरा है...एक अनुज और हितैषी के तौर पर अपनी इस तल्ख लेकिन शुभेच्छु टिप्पणी के साथ मैं आप को सिर्फ अपने सपने के कुछले जाने से चर्म से मर्म तक बुरी तरह चोटिल पत्रकार राजेश कुमार की इस ई मेल के साथ छोड़े जा रहा हूं, जो उन्होंने एएएसडी की निदेशक अनुराधा कपूर, अरविंद गौड़ और भानु भारती के नाम, इस मुहावरा बन चुके कार्यक्रम के ठीक अगले दिन लिखी थी, ये हम सबका भरोसा है कि राजेश भाई फीनिक्स बनेंगे...राख से उठ खड़ा होना थिएटर की ताकत है...राजेश भाई आपके पास तो शोले भी हैं और चिंगारियां भी...

राजेश कुमार की इस ईमेल को ही उनका औपचारिक बयान और पक्ष माना जाए

आदरणीय अनुराधा जी,
नमस्कार।
कल 14 जनवरी 2013 को शाम 5 बजे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के परिसर में भारतीय रंगमंच पर केन्द्रित पत्रिका " समकालीन रंगमंच " के लोकार्पण समारोह में जिस तरह की अनपेक्षित, दुर्भाग्यपूर्ण और अशोभनीय घटना हुई तथा आमंत्रित रंगकर्मियों में से कुछ ने जिस प्रकार मंच, समारोह के प्रयोजन और अवसर को दरकिनार कर अपनी राजनीतिक कुत्सा की निर्लज्ज अभिव्यक्ति की - उसने इस समारोह के आयोजनकर्ता और एक रंगकर्मी होने के नाते मुझे काफी व्यथित, लज्जित और हतप्रभ किया है और इस प्रकरण के बाद भिन्न-भिन्न प्रकार की जैसी प्रतिक्रियाएं सुनने में आ रही हैं उसके बाद मेरे लिए यह अति आवश्यक हो गया है कि  इस असहज परिस्थिति में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए अपना पक्ष स्पष्ट करूँ। इस क्रम में मैं कहना चाहता हूँ कि,
(1) कल के आयोजन में जो कुछ हुआ, उसके पीछे न तो एक व्यवस्था का विरोध करने की कोई क्रांतिकारिता थी, और न ही यह विचारों अथवा पक्षधरता के बीच कोई टकराहट ही थी। साफ तौर पर यह एक रचना और रचनाकार पर दुर्भावनापूर्ण व्यक्तिगत हमला था और एक गरीब के कोमल सपने को कुचलने की नीयत थी। बहेलिये ने उस निरीह पक्षी को मार गिराने के लिए, जो उड़ कर किसी बड़े खेत में बैठ गया था, पूरी फसल को ही आग लगाने की कोशिश की।
(2) "समकालीन रंगमंच " पत्रिका के प्रकाशन का निर्णय हर प्रकार से मेरा नितांत वैयक्तिक निर्णय है और मैंने अपनी रचनात्मक ज़रूरतों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के ख्याल से ही यथासामर्थ्य इसे निकलने की पहल की है। मेरी इस आकांक्षा और प्रयोजन की सिद्धि में जिन रंगकर्मी मित्रों का जैसा भी सहयोग मिला है, मैं उनका इसलिए भी हृदय से सम्मान करता हूँ कि उन्होंने एक बेहतर पत्रिका निकालने  की मेरी काबिलियत और जज्बे पर भरोसा किया और किसी भी शर्त की कोई पेशकश नहीं की।
(3) मैं उन सभी रंगकर्मी मित्रों एवं विद्वज्जनों का आभारी हूँ जिन्होंने जोखिम से भरे मेरे इस निर्णय को प्रोत्साहित किया और सहर्ष अपनी रचनाएँ छापने को दीं। मैं उन सभी रंगकर्मियों, साहित्यकारों एवं पत्रकारों  का आभारी हूँ जो समय निकाल कर इस लोकार्पण समारोह में शामिल हुए और उन्होंने इस नयी पत्रिका का स्वागत किया।
(4) मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और उसकी निदेशक महोदया का आभारी  हूँ जिन्होंने मेरे आग्रह पर प्रतिष्ठित भारत रंग महोत्सव के तयशुदा और अतिव्यस्त कार्यक्रम के बीच पत्रिका के लोकार्पण हेतु मंच, संसाधन और अवसर उपलब्ध करने में ज़रा भी विलम्ब नहीं किया और निश्चित रूप से इसके पीछे उनके मन में यही भावना थी की एक वैयक्तिक पत्रिका होते हुए भी यह प्रयास समकालीन रंग परिदृश्य में सकारात्मक हस्तक्षेप की संभावनाओं से युक्त है अतः देश के एकमात्र नाट्य विद्यालय को ऐसे किसी भी प्रयास को संरक्षण और जगह देनी चाहिए।
(5) यह समारोह और मंच राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय या भारत रंग महोत्सव का नहीं बल्कि "समकालीन रंगमंच" पत्रिका का था और इसमें जो भी लोग आमंत्रित थे या शरीक हुए वे पत्रिका के संपादक के आमंत्रण पर एक लोकार्पण समारोह में शामिल होने आये थे। यह एक सामान्य तथा बेहद अनौपचारिक किस्म का लोकार्पण कार्यक्रम था। कार्यक्रम से पहले और मंच से भी यह बात रखी  गयी थी कि हम किसी संगोष्ठी या सेमिनार के लिए नहीं बल्कि एक उद्घाटन के साक्षी बनाने के लिए इकठ्ठा हुए हैं। 
(6) एक आयोजक, रंगकर्मी और संपादक होने के नाते आमंत्रित वरिष्ठ, अनुभवी और सम्माननीय रंगकर्मियों से यह आशा रखना कि वे मंच और अवसर की गरिमा का निर्वाह करेंगे- कोई अपराध नहीं था, और इस बात की तो कतई उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि बार-बार अनुनय-विनय करने पर भी वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को थोड़ी देर के लिए विराम नहीं देंगे।
(7) पत्रिका के मंच से अपेक्षित गरिमा का निर्वाह न करते हुए तथा विषयांतर करते हुए आदरणीय श्री अरविन्द गौड़ जी ने अपने अतिथि संबोधन में जिस प्रकार की तल्खी के साथ गैरज़रूरी और बेमौके की राजनीतिक टिप्पणियां कीं, उसके बाद विवाद को रोकना और समारोह को जारी रखना संभव नहीं रह गया। उनसे अपेक्षा थी कि वे समकालीन परिदृश्य में रंगमंच में संवाद और समीक्षा की जगह और ज़रुरत पर विचार रखते और कुछ ऐसे उपाय सुझाते जिनसे एक नवजात पत्रिका के दीर्घ जीवन की कोई राह निकलती। परन्तु एक शिशु के जन्मोत्सव में भी आत्म-प्रचार की लालसा को संयमित करने का उन्होंने कोई इरादा नहीं जताया। एक आयोजक के नाते इस घटना की  नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए मैं समारोह में उपस्थित सभी रंगकर्मियों, साहित्यकारों एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रशासन के समक्ष क्षमाप्रार्थी हूँ कि इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को रोक पाने में सफल नहीं हुआ और आप सबकी भावनाएं आहत हुईं।
(8) मैं वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक श्री भानु भारती जी से क्षमा मांगता हूँ कि वे मुझ अकिंचन के आमंत्रण को स्वीकार कर समारोह में उपस्थित हुए और पत्रिका का लोकार्पण भी किया परन्तु उन्हें अपने विचार, अनुभव तथा सुझाव रखने का उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराने  के दायित्व का मुझसे निर्वहन नहीं हो सका। यहाँ तक कि मैं मंच से उनके प्रति कृतज्ञता भी नहीं ज्ञापित कर सका।
                                                                                                                                  
आदरणीय अरविन्द गौड़ जी से मैं अब भी यह आशा रखता हूँ कि वे कल के अपने आचरण पर पुनर्विचार करेंगे और सार्वजनिक तौर पर अफ़सोस प्रकट करेंगे। वे इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय  नाट्य विद्यालय के नहीं बल्कि अपने एक रंगकर्मी मित्र के आमंत्रण पर उसका उत्साह बढ़ाने आये थे, पर उन्हें यह बात याद नहीं रही। अगर उनका विचार बदल गया था और वे मुझे या मेरे इस अकिंचन प्रयास को क्षति पहुँचाना चाहते थे तो ऐसा वे बहुत शांत और संयत तरीके से करने में भी सक्षम थे। एक छोटे से कस्बे से निकल कर न मालूम किस किस तरह की मुश्किलों की खाई को पार करते हुए यहाँ तक पहुंचे मेरे जैसे बेहद मामूली रंगकर्मी और समीक्षक पर इतनी ताक़त और तैयारी से हमला कर उन्होंने अपनी ऊर्जा और शक्ति क्यों जाया की, यह बात मेरी समझ से परे है।
- राजेश चन्द्र 
संपादक ,
समकालीन रंगमंच, दिल्ली।

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