शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

गाँधी की टी आर पी

आज गांधी जी की पुण्यतिथि थी ....अब आप कहेंगे की हम जानते हैं ....तो कैसे मान लें की आप जानते थे ? आपने ना तो उस पर ब्लॉग लिखा...न ही टिप्पणी की और ना ही कुछ और ...फिर क्या सबूत है की आप जानते थे ? अच्छा अच्छा आप जानते थे पर आप भूल गए थे। बहुत बढ़िया फिर मुंबई हमले के बाद से अभी तक नेताओं को क्यों गरिया रहे हो ? कोई हक है क्या ?
खैर आपसे बहस नहीं करनी है और यह बहस का मुद्दा होना भी नहीं चाहिए क्यूंकि जिस भी मुद्दे पर हमारे देश में एक बार बहस शुरू हो जाती है वो फिर बहस में ही जिंदा रह जाता है बाकी ख़त्म हो जाता है। हाँ तो बात कर रहा था मैं बापू की पुण्य तिथि की, आज सुबह से प्रतीक्षा में था की वो मीडिया जिसका मैं हिस्सा हूँ और जो आज का सबसे बड़ा बहस का मुद्दा है; क्या करता है आज के दिन। सुबह अखबार उठाया तो हिन्दुस्तान जो देश का अलमबरदार बनने के दम भरता है उसके पहले पन्ने पर गांधी की एक तस्वीर तक के दर्शन नहीं हुए.....पहला झटका ......बापू का स्कोर ....शून्य पर एक .....दिल निराशा से भर गया, दूसरे पन्ने पर एक सरकारी विज्ञापन था सो मतलब की बापू अगर बिकते हैं तो हैं नहीं तो नहीं......
खैर जैसे तैसे हिम्मत कर के रिमोट उठाया, दूरदर्शन नहीं लगाया .....मालूम था की वो याद रखेगा। सारे चैनल पलट डाले पर कहीं भी कुछ नहीं। इस समय रात हो चली है और अभी तक किसी भी टीवी चैनल ने बापू को याद करने की ज़हमत नहीं उठाई है। हमारे चैनल ने भी नहीं जो कहता है ज़रा सोचिये हाँ रात दस बजे के कार्यक्रम की शुरुआत को प्रभावी करने के लिए उनको ज़रूर शामिल किया गया । कल ही इंडिया टीवी टी आर पी में सबसे ऊपर पहुँचा है और उनके एक शीर्ष पुरूष जो अब शिखर पुरूष होने के भ्रम में हैं, उन्होंने कहा की यह खबरों की जीत है।
अब मैं भ्रम में हूँ की क्या वाकई गांधी ख़बर नहीं रहे.....या ख़बर अब ख़बर नहीं रही.....क्या पंकज श्रीवास्तव जी मेरी आवाज़ सुन रहे हैं....उन्होंने अभी एक लेख लिखा है, और संजीव पालीवाल जी जिन्होंने अभी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ज़िम्मेदारी के ढोल पीटे थे ब्लोगिया बहस में .....शायद मैं यह ब्लॉग इसलिए लिख रहा हूँ की मैं चैनल में बहुत छोटे पद पर हूँ और नीति निर्माता नहीं हूँ पर गांधी तो राष्ट्र निर्माता थे उनको भुला दिया......भूल गए कह देने से क्या काम चलेगा ....क्या हम अपनी जिम्मेदारियों को याद रखने का ढोंग करके ख़ुद ही को तो नहीं धोखा देते हैं.....क्या पत्रकारिता केवल बिकाऊ ख़बर है ? फिर ये समाज सेवा का ढोंग क्यूँ ?
यही सवाल अखबार वालों से भी है की क्या अगर आज विज्ञापन नहीं मिलते तो अखबार में गांधी भी नहीं दीखते .........? मैं परेशान हूँ, दुखी भी और कुंठित भी.....मौका मिला तो इसे बदलना चाहूँगा पर क्या मेरे जैसे कथित आदर्शवादी को कोई मौका देगा ?
* आज विभिन्न चैनलों द्बारा प्रसारित कार्यक्रम.....
चांद और फिजा की प्रेम कहानी का सच आज तक
सुष्मिता बनेंगी झांसी की रानी जी न्यूज़
फिरौती का आयडिया
मामा-भांजे की करतूत एन डी टीवी इंडिया
राजू श्रीवास्तव को धमकी आई बी एन सेवेन
राजू श्रीवास्तव को धमकी इंडिया टीवी

अब आप समझ गए होंगे की क्या है गाँधी की टी आर पी
उत्तर की प्रतीक्षा में

(कुछ चैनलों ने गाँधी जी को औपचारिकता निभाने के लिए याद ज़रूर किया पर वह औपचारिकता ही रही १० सेकेण्ड के आस पास.......क्या चाँद मोहम्मद अगर दिन भर के स्लोट के अधिकारी थे तो राष्ट्रपिता आधे घंटे के भी नहीं ?)

बुधवार, 28 जनवरी 2009

सर्दियों का ना होना ...... दिमागी कुहरा !

सुबह उठा तो देखा धूप निकल आई है, घड़ी देखी तो आठ ही बजा था....रात ३ बजे सोया था सो थोडी सी देर से उठा पर आठ बजे धूप ? यकीं नहीं हुआ कि जनवरी अभी ख़त्म नहीं हुआ....पर सर्दी ख़त्म होने चली है। यकीं करने को जी नहीं चाहता कि इतनी जल्दी ये रूमानी मौसम जा रहा है पर परेशान करता स्वेटर कह रहा है कि यकीं कर लो क्यूंकि मैं पसीने से भीग रहा हूँ। दरअसल शुरुआत तो हुई सर्दी के जल्दी दिवंगत हो जाने के ख़याल से पर याद आ गए वो दिन......
वो दिन जब सितम्बर ख़त्म होने से पहले ही छत पर धूप में गर्म कपड़े और रजाइयां सूखने लगती, जब अक्टूबर की शुरुआत में ही मम्मी आधी बांह का स्वेटर ज़बरदस्ती पहना कर बाहर भेजती और चाय अदरक के स्वाद से लबरेज़ हो जाती। फिर आता दशहरा और तब से जो पटाखों की धूम शुरू होती वो मोहल्ले भर के डांटने के बाद भी करवाचौथ से लेकर दिवाली तक जारी रहती। अन्तर बस इतना रहता कि स्वेटर की बांह तब तक पूरी बांहों को घेर लेती।
कपड़े खरीदने और पहनने का भी अलग चाव जो शायद किसी और महीने में ना रहता.... रंग बिरंगे स्वेटर तरह तरह की टोपियाँ (मंकी कैप ना पहनने को लेकर घर में खूब झगडा) और हर बार नए दस्ताने। एक और कारण सर्दियों में पड़ने वाली ढेर सारी शादियाँ भी थी। एक अलग मज़ा आता था जब हलकी सर्दी में पहली बार कम्बल निकाले जाते थे और उनमें घुस कर नीचे से पैर थोड़े से निकाल कर उन पर लगती मद्धम ठण्ड का मज़ा लिया जाता था। फिर खुलती थी रजाइयां और आने लगता था मौसम मूंगफलियों का जो नमक और चटनी के साथ रजाई में ही पड़े पड़े टूंग ली जाती थी।
याद आ जाता है लखनऊ जहाँ बचपन जिया और जवानी के मज़े लिए। सर्दी आते ही रोज़ सुबह नाश्ते में छुंकी हुई हरी मटर या फिर मूली के परांठों की फरमाइशें, और इतवार को नाश्ते में साथ में गर्म जलेबियाँ। ज़बान पर पानी आ जाता है आज भी सोच कर जब सुबह सुबह चौक चौराहे पर मक्खन मलाई खाने जाते थे और रात को खाना खाने के बाद गर्मागर्म गाजर का हलवा।
नए साल पर दोस्तों और टीचरों को हाथ के बनाए ग्रीटिंग कार्ड देना और जनवरी आते ही पूरे शहर का घने कोहरे में डूब जाना। छुट्टियों का १५ दिन और बढ़ जाना और फिर घर पर बैठ कर अंगीठी पर हाथ सेंकना। अलाव या कोयले की आंच में भुने हुए आलू और शकरकंद ......दिन भर चाय के दौर पर दौर.......गजक, गुड की पट्टी, लैया के लड्डू, तिल के लड्डू और ना जाने क्या क्या .... सर्दी का वो एहसास जब हाथ सुन्न हो जाते थे और एक दूसरे के गालों पर लगा कर, एक दूसरे के स्नेह की ऊष्मा से भर जाते थे। छुट्टी के दिन दिन भर मैच खेलना और गेंद पकड़ने पर सर्दी में हाथ सुन्न हो जाने पर कहना "चिपक गई यार"
रजाई में मम्मी से लिपट कर सो जाना और सुबह उठने में दुनिया भर के नखरे......कई बार तो सर्दियों में बिना दांत साफ़ किए ही चाय पी लिया करते थे और फिर पापा की डांट भी खाते थे। स्कूटर पर पापा के पीछे चिपक कर बैठ जाना और आंखों में हवा लगने से निकलने वाले पानी को बार बार आस्तीन से पोछना......
आंखों से पानी आज भी बह रहा है पर गाड़ियों के धुंए से और अपनों की याद से। सर्दी शायद पिछले कुछ साल से देखी ही नहीं। तीन साल हुए लखनऊ छोडे हुए और शायद तभी से ना तो भुने आलूँ खाए ना ही शकरकंद। वो अदरक की चाय कभी कभी मिल जाती है उसमे वो स्वाद नहीं है, मूंगफली रजाई की जगह बस में बैठकर खाते हैं....लखनऊ में चौक की मक्खन मलाई इस साल केवल एक बार नसीब हुई वो भी घर में ही खाई चौक जाकर नहीं....गाजर का हलवा एक बार मम्मी ने किसी के हाथों भिजवा दिया और एक बार घर गया तो खाया। गर्म कपड़े खरीदने के लिए अब कोई उत्साह नहीं क्यूंकि ठण्ड ही नहीं.....रजाई में लिपटने के लिए अब मम्मी नहीं हैं...और स्कूटर पर चिपकाने के लिए पापा भी यहाँ नॉएडा में नहीं हैं.....घर से दूर.... गजक कोई लखनऊ से आता है तो ले आता है पर उसे भी सम्भाल संभाल कर खाते हैं कि जल्दी ना ख़त्म हो जाए, अब कोई गालों पर ठंडे हाथ नहीं छुआता है, यहाँ जो बड़े भाई बहन साथ हैं वे अब बड़े और समझदार हो गए हैं सो बचपने वाली हरक़तें नहीं करते हैं। (हाँ कुछ ख़ास लोग इस रवायत को जिंदा रखे हैं)
यहाँ नॉएडा में तो गलियाँ भी नहीं हैं, जिनमे लखनऊ में अपना बचपन और किशोरावस्था बीती। गलियाँ जहाँ दिनभर गली के सचिन और कुंबले में मुकाबला चलता था....जहाँ पतंग लूटने के लिए अपने मोहल्ले से ना जाने कितने मोहल्ले आगे दौड़ते चले जाते थे। गलियाँ जहाँ सर्दियां मौसम था मिल बैठने का और धूप सेंकने के बहाने सुख दुःख बांटने का। वो छतों और दरवाजो पर स्वेटर बुनती औरतें ना जाने कहाँ गायब हो गई......सर्दियों की तहरी चखे अरसा बीत गया.....! इस सर्दी ना तो नए स्वेटर खरीदे और ना ही दस्ताने....हाथ के ग्रीटिंग कब अमरीकी ब्रांड से होते हुए एस एम् एस और ई मेल में बदल गए पता ही नहीं चला.......कुहरा क्या होता है ये तो भूल ही गए।
अब तो गली में भी वो रौनक नहीं, क्यूंकि सर्दी नहीं, अलाव तो गरीबों के लिए है ना और अंगीठी धुंआ बहुत करती है। ना वो औरतें हैं, ना संगी साथी, ना मूंगफली, न पतंग ना मद्धम धूप और ना उस धूप को बिना भेद के बांटते लोग........और जब धूप नहीं है तो भेद है......भेद अपने पराये का क्यूंकि धूप अपनी पराई नहीं होती।

सर्दी की दोपहरों में
छतों पर धूप सेंकती रजाईयां
गुम हैं
सर्दी की शाम बिना अलाव
बिन चाय
गुमसुम है

छतों पर, चौखटों पर
बिनती स्वेटर, उडाती अफवाहें
वो औरतें कहाँ गई
सांझ के धुंधलके में
पार्क में बच्चों की तसवीरें
धुंधला गई

सुबह उठने के बाद
सड़कों पर कोहरा नहीं
इंसानों का सैलाब है
मन नहीं लगता
इस शहर में
मौसम ख़राब है

स्कूल जाते बच्चे
स्कार्फ, लंबे मोजे और दस्ताने
गए हैं भूल
नए घरों के
आधुनिक लाडले
कैब से जाते हैं स्कूल

अंगीठी अब खो गई है
या बदल गई है
एयर कंडीशनर में
सर्दी का मौसम
रह गया है केवल
टीवी की ख़बर में

याद आती है बहुत
अपने शहर की
उस मौसम सर्द की
सजा है हमारे लिए
ये सब
कुदरत बेदर्द की

( क्या आप सब भी मेरी तरह वो सर्दी का पुराना मौसम याद नहीं करते, क्या आपको नहीं लगता कि मौसम में भारी बदलाव आया है, क्या आप नहीं मानते कि हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं......तो वृक्ष लगाए और हरसंभव तरीका अपनाए प्रदूषण में कम से कम योगदान देने के लिए)

शनिवार, 24 जनवरी 2009

वली दक्कनी तीरे कारी आहिस्ता आहिस्ता

वली दक्कनी का मूल नाम वली मोहम्मद था और इन्हें वली गुजराती के नाम से भी जाना जाता है।
वली के लिखे का आप ख़ुद ही मुलाहिज़ा करें.....वली दक्कनी को हैदराबाद में बोली जाने वाली दक्कनी जुबां के प्रवर्तकों में माना जाता है...

तीरे कारी

जिसे इश्क़ का तीरे कारी लगे ।
उसे ज़िंदगी क्यों न भारी लगे ।।

वली जब कहे तू अगर यक वचन,
रक़ीबाँ के दिल पे कटारी लगे ।

न होगा उस जग में हरगिज़ क़रार,
जिसे इश्क़ की बेकरारी लगे ।


आहिस्ता आहिस्ता

सजन तुम सुख सेती खोलो नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता।
कि ज्यों गुल से निकसता है गुलाब आहिस्ता आहिस्ता।।

हजारों लाख खू़वाँ में सजन मेरा चले यूँ कर।
सितारों में चले ज्यों माहताब आहिस्ता आहिस्ता।।

सलोने साँवरे पीतम तेरे मोती की झलकाँ ने।
किया अवदे-पुरैय्या को खऱाब आहिस्ता आहिस्ता।।

रविवार, 18 जनवरी 2009

इश्क का हिसाब किताब

कल किसी ने एक शेर भेजा....शेर क्या एक अधूरी सी नज़्म और मुझसे उसका जवाब मांगा.......अब न तो हमको पता था कि ये किसकी नज़्म है न ही कभी पढ़ी थी सो खुद ही उसको पूरा कर के भेज दिया। अगर आप में से किसी का मतला हो तो मुआफ़ी चाहूंगा.....पर जवाब तो देना ही था सो लिख डाला, बताएं कि कैसा है......

जो भेजा गया था,

मैं मांग लूं गर हिसाब तुमसे
जवाब तुमसे
तो कैसे दोगे जवाब कोई
दे न सकोगे हिसाब कोई
तुम्हे ख़बर क्या कि रतजगों का हिसाब क्या है
उन आंसुओं का हिसाब क्या है
ये हिज्र है सवाल तो जवाब क्या है

जो हमने जवाब में भेजा

तुम अगर माँग लो हिसाब मुझसे
दे दूंगा प्यार बेहिसाब तुम्हे

जो रतजगे किए हैं तुमने तो
मेरी आँखें भी साथ जागी हैं
तुम्हारे आंसुओं की बारिश से
मेरी भी पलकें भीगी भागी हैं

पढ़ूंगा इस तरह से चेहरा कि
बना दूं प्यार की किताब तुम्हें
तुम अगर माँग लो हिसाब मुझसे......

अगर है हिज्र एक सवाल तो फिर
जवाब बस एक इंतज़ार तो है
अगर नहीं मिलेंगे हम तुम तो
हमारे पास अपना प्यार तो है

करेगा हुस्न की बुलंदी पर
ये मेरे इश्क का शबाब तुम्हे
तुम अगर माँग लो हिसाब मुझसे......

इश्क केवल कोई सवाल नहीं
ये है जवाब सारी वहशत का
इश्क कोई आम सा हिसाब नहीं
ये है हिसाब तेरी किस्मत का
न ये बस आंसुओं की बारिश है
न फ़कत रतजगों के किस्से हैं
ये हिज्र कोई छोटी बात नहीं
ये अपनी दास्तां के हिस्से हैं
ये दास्तां जो हर इक लम्हे ने
बुनी मिल के
ये दास्तां जो कही फूलों ने
सुबह खिल के
ये दास्तां जिसे सुना के
रात सोई है
ये दास्तां जो तेरे साथ
हंसी रोई है
इश्क सिर्फ़ आलमी बयार नहीं
ये बदलता नहीं वो मौसम है
हिज्र तो बात भर है कहने को
तू तो ज़ेहन में मेरे हरदम है
न ही रुसवाई, न ग़म, न आंसू
बेवफ़ाई, न हम, तुम भी नहीं
कैसा कोई हिज्र या कोई मातम
इश्क है इश्क और कुछ भी नहीं
हूं इश्क में मगर बीमार नहीं
दिल में मेरे कोई गुबार नहीं

इश्क मेरा है सीधा साधा सा
पर ये अहसास है नायाब तुम्हे

तुम अगर मांग लो हिसाब मुझसे
न दूंगा मैं कोई जवाब तुम्हें

तुम अगर मांग लो हिसाब मुझसे
मैं दूंगा प्यार बेहिसाब तुम्हे

तो कैसा लगा जवाब.....वैसे लख़नऊ वाले हाज़िरजवाब तो होते ही हैं .....

सोमवार, 12 जनवरी 2009

बूँद

जिस दिन निर्णय लिया कि पत्रकारिता करनी है, यह नहीं सोचा था कि घर छोड़ना पड़ेगा....और जब पत्रकारिता की पढ़ाई की तो समझ आया कि घर से तो दूर जाना ही होगा। फिर एक नामचीन चैनल में नौकरी लगी तो घर के ड़े बोले कि जाओ भविष्य बनाओ और बूढे बोले कि नहीं परदेस जाने से अच्छा है कम पैसे में यहीं कोई नौकरी कर लो। ख़ुद के दिल में भी हमेशा लखनऊ से बिछड़ जाने की टीस उठती और उसे कम करने के लिए हर महीने लखनऊ का एक चक्कर लगाते हैं.....एक दिन रात को ऐसे ही ये सब सोचते सोचते और अपने घर, अपने शहर को याद करते करते अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की एक कविता जो शायद कक्षा ५ या छः में पढ़ी थी वो याद आ गई। आज वही कविता आपके लिए लाया हूँ....देखिये कि कितनी सुंदर कविता है और चालू और लोकप्रिय काव्य के शोर में किस तरह हम उन कवियों और कविताओं को भूलते जा रहे हैं

बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से

थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी

सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,

आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?


देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,

मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?

या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,

चू पडूँगी या कमल के फूल में ?


बह गयी उस काल एक ऐसी हवा

वह समुन्दर ओर आई अनमनी

एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला

वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।


लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते

जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर

किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें

बूँद लौं कुछ और ही देता है कर ।


अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

बुधवार, 7 जनवरी 2009

मैं भी तनहा, रात तनहा


हिमांशु की उस फरमाइश और आप सब लोगों की वाहावाही ने ऐसा करंट मार दिया है कि अरसे बल्कि कई साल बाद नज़्म, ग़ज़ल और गीत जैसी बीमारियां फिर इस सर्द मौसम में दर्द दे रही हैं। अब मर्ज़ आप लोगों ने दिया है तो इलाज की ज़िम्मेदारी भी आप लोगों की ही है.....और इलाज यही है कि जनाब अब जो कुछ भी आहियात वाहियात कलम से निकल रहा है...ग़ज़ल और गीत के नाम पर उसे झेलें और बीमार के अच्छे होने तक अपनी टिप्पणियाँ देते रहे.....बहुत दिन बाद कोई नई ग़ज़ल लिखी है....उसे पेश कर रहा हूँ (अगली पोस्ट में फिर कुछ पुरानी डायरी से ) शीर्षक है तनहा

तनहा

बिन तेरे हर बात तन्हा
मैं भी तन्हा, रात तन्हा

ज़िंदगी के खेल में अब
कैसी शह और मात तन्हा

बाग़ कैसा बाग़बां बिन
गुल भी तन्हा, पात तन्हा

वक़्त वो भूला नहीं है
मैं था तेरे साथ तन्हा

क्या कहें हम हो गए हैं
छोड़ तेरा हाथ तन्हा

ज़िंदगी की मुश्किलों में
तुम थे एक सौगात तन्हा

बिन तेरे हम खोजते हैं
अपनी तो औकात तन्हा

यूं तो दुनिया में मिलेंगे
तुमको कई हज़रात तन्हा

पर किसी में दिख जो जाए
हम सी इक भी बात तन्हा

रास्ता कट जाए जल्दी
खत्म हों हालात तन्हा

यूं तो अब तक हो चले हैं
अपने सब जज़्बात तन्हा

सोचता हूं फिर भी एक दिन
तुमसे हो मुलाक़ात तन्हा

याद रखें कि जब तक आपकी टिप्पणिया मिलेंगी तब तक शायर के पाँव ....मेरा मतलब है कलम चलेगी .....(प्रेरणा साभार: गब्बर जी शोले में )

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

मेरे शब्द ..... उनका हवाला ...और दो दुश्मन !

कुछ वक़्त पहले भी आप लोगों को अदम गोंडवी की एक नज़्म पढ़वा चुका हूँ ...... सो
उनका परिचय देने की ज़रूरत नहीं समझता पर साथ में एक और कविता लाया हूँ जो फिलिस्तीन के क्रांतिकारी कवि महमूद दरवेश की हैं.....महमूद दरवेश लगातार फिलिस्तीन में मानवाधिकारों की लड़ाई से जुड़े रहे और अभी हाल ही में १२ अगस्त २००८ को उनका देहांत हुआ। तीसरी लघु कविता है वियतनामी कवि तो हू की..... दरअसल तीनों कविताओं का मजमून और मिजाज़ अलग अलग है....पर संदेश एक है सो प्रस्तुत करने से रहा नहीं गया,

वेद में जिनका हवाला - अदम गोंडवी


वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विशवास लेकर क्या करें

लोकरंजन हो जहां शम्बूक -वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें

कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्या करें

बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्स का एहसास लेकर क्या करें

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें


मेरे शब्द - महमूद दरवेश

जब मिट्टी थे मेरे शब्द
मेरी दोस्ती थी गेहूँ की बालियों से

जब क्रोध थे मेरे शब्द
ज़ंजीरों से दोस्ती थी मेरी
जब पत्थर थे मेरे शब्द
मैं लहरों का दोस्त हुआ

जब विद्रोही हुए मेरे शब्द
भूचालों से दोस्ती हुई मेरी

जब कड़वे सेब बने मेरे शब्द
मैं आशावादियों का दोस्त हुआ

पर जब शहद बन गए मेरे शब्द
मक्खियों ने मेरे होंठ घेर लिए

( अनुवाद: गीत चतुर्वेदी )


दो दुश्मन - तो हू

जरूरी हैं प्रेम और दुलार
इनके बिना हम रह नहीं सकते
अत्याचार और उपेक्षा से
नफ़रत करते हैं हम
लेकिन हमारे दो दुश्मन भी हैं
ये दुश्मन हैं
अहंकार
और दूसरे पर हुक्म चलाने की आदत ।

दरअसल ये तीन कवितायें एक दूसरे की पूरक हैं और जहाँ एक कविता सवाल छोड़ती है दूसरी उसे वहीं से जवाब देना शुरू करती है......अपने अंदाज़ में क्यूंकि जब पहली नज़्म बात करती है अत्याचार की और असहायता की....दूसरी कविता दिखाती है उसके कारण और ढंग......फिर तीसरी कविता बात करती है संभावित समाधान की .....सो पढ़ें गुनें और सोचें कि मैं सही कह रहा हूँ या ग़लत ?
शुभ रात्री !

शनिवार, 3 जनवरी 2009

नए साल की शुभकामनाएं


नए वर्ष के पहले दिन दफ्तर में काफ़ी व्यस्त रहा सो कुछ नया लिखने का वक्त नहीं निकाल पाया तो क्षतिपूर्ति के लिए प्रस्तुत है बेजोड़ साहित्यकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता नए साल की शुभकामनाएं

नए साल की शुभकामनाएं

नए साल की शुभकामनाएं !

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को

कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को

नए साल की शुभकामनाएं !

जोते के गीतों को बैलों की चाल को

करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को

नए साल की शुभकामनाएं !


इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को

चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को

नए साल की शुभकामनाएं !


वीराने जंगल को तारों को रात को

ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को

नए साल की शुभकामनाएं !


इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को

सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को

नए साल की शुभकामनाएं !


कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को

हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को

नए साल की शुभकामनाएं !


उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे

उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे

नए साल की शुभकामनाएं !


सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ( कवि को संग्रह खूंटियों में टंगे लोग के लिए १९८३ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया)

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी