बुधवार, 7 जनवरी 2009

मैं भी तनहा, रात तनहा


हिमांशु की उस फरमाइश और आप सब लोगों की वाहावाही ने ऐसा करंट मार दिया है कि अरसे बल्कि कई साल बाद नज़्म, ग़ज़ल और गीत जैसी बीमारियां फिर इस सर्द मौसम में दर्द दे रही हैं। अब मर्ज़ आप लोगों ने दिया है तो इलाज की ज़िम्मेदारी भी आप लोगों की ही है.....और इलाज यही है कि जनाब अब जो कुछ भी आहियात वाहियात कलम से निकल रहा है...ग़ज़ल और गीत के नाम पर उसे झेलें और बीमार के अच्छे होने तक अपनी टिप्पणियाँ देते रहे.....बहुत दिन बाद कोई नई ग़ज़ल लिखी है....उसे पेश कर रहा हूँ (अगली पोस्ट में फिर कुछ पुरानी डायरी से ) शीर्षक है तनहा

तनहा

बिन तेरे हर बात तन्हा
मैं भी तन्हा, रात तन्हा

ज़िंदगी के खेल में अब
कैसी शह और मात तन्हा

बाग़ कैसा बाग़बां बिन
गुल भी तन्हा, पात तन्हा

वक़्त वो भूला नहीं है
मैं था तेरे साथ तन्हा

क्या कहें हम हो गए हैं
छोड़ तेरा हाथ तन्हा

ज़िंदगी की मुश्किलों में
तुम थे एक सौगात तन्हा

बिन तेरे हम खोजते हैं
अपनी तो औकात तन्हा

यूं तो दुनिया में मिलेंगे
तुमको कई हज़रात तन्हा

पर किसी में दिख जो जाए
हम सी इक भी बात तन्हा

रास्ता कट जाए जल्दी
खत्म हों हालात तन्हा

यूं तो अब तक हो चले हैं
अपने सब जज़्बात तन्हा

सोचता हूं फिर भी एक दिन
तुमसे हो मुलाक़ात तन्हा

याद रखें कि जब तक आपकी टिप्पणिया मिलेंगी तब तक शायर के पाँव ....मेरा मतलब है कलम चलेगी .....(प्रेरणा साभार: गब्बर जी शोले में )

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहोत खूब लिखा है आपने ढेरो बधाई कुबूल करें.....


    अर्श

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  2. bahut khub likha hai .........aapko dher saari bhadhaaiyan

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  3. मैं भी तनहा रात तनहा
    वाह वाह बहुत ख़ूब साहब.

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  4. sochta hun fir bhi ek din...tumse ho mulakaat tanhaa....aashvadi vicharon ke liye badhai....
    Wish u a very happy new year

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  5. काश मेरे अब ना गुजरें
    बिन तेरे लम्हात तनहा

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