मंगलवार, 6 जनवरी 2009

मेरे शब्द ..... उनका हवाला ...और दो दुश्मन !

कुछ वक़्त पहले भी आप लोगों को अदम गोंडवी की एक नज़्म पढ़वा चुका हूँ ...... सो
उनका परिचय देने की ज़रूरत नहीं समझता पर साथ में एक और कविता लाया हूँ जो फिलिस्तीन के क्रांतिकारी कवि महमूद दरवेश की हैं.....महमूद दरवेश लगातार फिलिस्तीन में मानवाधिकारों की लड़ाई से जुड़े रहे और अभी हाल ही में १२ अगस्त २००८ को उनका देहांत हुआ। तीसरी लघु कविता है वियतनामी कवि तो हू की..... दरअसल तीनों कविताओं का मजमून और मिजाज़ अलग अलग है....पर संदेश एक है सो प्रस्तुत करने से रहा नहीं गया,

वेद में जिनका हवाला - अदम गोंडवी


वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विशवास लेकर क्या करें

लोकरंजन हो जहां शम्बूक -वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें

कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्या करें

बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्स का एहसास लेकर क्या करें

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें


मेरे शब्द - महमूद दरवेश

जब मिट्टी थे मेरे शब्द
मेरी दोस्ती थी गेहूँ की बालियों से

जब क्रोध थे मेरे शब्द
ज़ंजीरों से दोस्ती थी मेरी
जब पत्थर थे मेरे शब्द
मैं लहरों का दोस्त हुआ

जब विद्रोही हुए मेरे शब्द
भूचालों से दोस्ती हुई मेरी

जब कड़वे सेब बने मेरे शब्द
मैं आशावादियों का दोस्त हुआ

पर जब शहद बन गए मेरे शब्द
मक्खियों ने मेरे होंठ घेर लिए

( अनुवाद: गीत चतुर्वेदी )


दो दुश्मन - तो हू

जरूरी हैं प्रेम और दुलार
इनके बिना हम रह नहीं सकते
अत्याचार और उपेक्षा से
नफ़रत करते हैं हम
लेकिन हमारे दो दुश्मन भी हैं
ये दुश्मन हैं
अहंकार
और दूसरे पर हुक्म चलाने की आदत ।

दरअसल ये तीन कवितायें एक दूसरे की पूरक हैं और जहाँ एक कविता सवाल छोड़ती है दूसरी उसे वहीं से जवाब देना शुरू करती है......अपने अंदाज़ में क्यूंकि जब पहली नज़्म बात करती है अत्याचार की और असहायता की....दूसरी कविता दिखाती है उसके कारण और ढंग......फिर तीसरी कविता बात करती है संभावित समाधान की .....सो पढ़ें गुनें और सोचें कि मैं सही कह रहा हूँ या ग़लत ?
शुभ रात्री !

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