गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

याद रहा क्रिसमस, बधाई मिली वाजपयी को...भूले महामना को ?

२५ दिसम्बर, साल की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तारीखों में से एक ! एक ओर ईसा के अवतरण की कहानी की परम्परा ....... बड़ा दिन और सैंटा क्लॉस की किवदंतियों को जीवित कर देने का दिन....दिन याद करने का उस इंसान को जिसने दुनिया को शायद पहली बार अहिंसा का पाठ पढाया ( यह अलग बात है कि उसके अनुयायी ही उसे भूल गए)। पहले ताज़ा हवा की ओर से सबको बड़े दिन की शुभकामनायें।
इस दिन की एक ख़ास बात और......शायद एक यह बात भी है जो इसे और उल्लासपूर्ण बनाती है कि ठीक एक हफ्ते बाद ही रोमन संवत का नया साल शुरू हो जाता है.....तो इस दिन में एक रोमांच भी शामिल है। आज ही के दिन देश के सम्मानित नेता और पूर्व प्रधानमन्त्री अटल जी का भी जन्मदिन है। अटल जी एक उम्दा कवि भी हैं और ओजस्वी वक्ता भी.....
आज के दिन कई टीवी, अखबार और ब्लॉग लेखों में क्रिसमस और अटल जी के बारे में पढ़ा पर एक कमी खली सो उसको शरीके ज़िक्र करूंगा और याद भी दिलाना चाहूँगा...( हो सकता है कुछ ब्लोगरों ने चर्चा की हो ....पर अखबार और टीवी तो खैर अब नाउम्मीद ही करते हैं) आज प्रसिद्द स्वतंत्रता आंदोलनकारी, विद्वान्, पत्रकार और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक आचार्य महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की भी जयंती है और बनारस के अखबारों को छोड़कर किसी ने इसकी चर्चा भी की हो।
महामना मालवीय के बारे में क्या बात की जाए ..... जन्म हुआ २५ दिसम्बर १८६१ को इलाहाबाद में ....एक विद्वान के तौर पर ख्याति अर्जित की, पत्रकार के तौर पर दो अखबार हिंदुस्तान (हिन्दी) और द इंडियन यूनियन (अंग्रेज़ी) में स्थापित किए। १९०९ और १९१८ में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। पर सबसे बड़ा उपकार जो पंडित जी ने भारतीय लोगों पर किया वह यह था कि उन्होंने एक ऐसे संस्थान की नींव डाली जो न केवल भारत अपितु विश्व में अतुलनीय है....और श्रेष्ठता के झंडे गाड रहा है।
१९१६ में स्थापित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा शिक्षण संस्थान है। इसमे कोई १२८ शिक्षण विभाग हैं, १५००० से ऊपर शिक्षार्थी, जिसमे तकनीकी संस्थान और चिकित्सा संस्थान दुनिया में सबसे अच्छों में से हैं। यहाँ के विज्ञान संकाय को एशिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
यही नहीं १९३१ में हुई गोलमेज वार्ता में भी महामना, गांधी जी के साथ शामिल हुए। सबसे बड़ी बात यह थी कि देश के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों से लेकर आम आदमी तक उनकी एक ही छवि रही। सब उनके साथ थे।
बुरा यह नहीं लगा कि लोग महामना को भूल गए, बुरा यह लगा कि जिनको याद रखना चाहिए वे भूल गए। हम में से कई पत्रकार और लेखक उसी काशी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं और दुनिया भर पर अपने बी एच यु अलुमनी होने का रॉब झाड़ते रहते हैं और हम ही उस दिन को भूल गए ?
देश के वे नेता भूल गए जो संसद में अपने अपने वोट बैंक के हिसाब से महापुरुषों की तसवीरें लगवाने के लिए चीखा करते हैं......और हम सब भूल गए जो नेताओं पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाते हैं !
क्या ऐसे में पाठ्य पुस्तकों में इन महापुरुषों के बारे में पढाये जाने का कोई औचित्य है जब हम इन्हे केवल परीक्षा पास करने की मजबूरी मानते हों ?
खैर चलिए अभी ऐसा वक्त नहीं आया कि हम क्रिसमस भूल जाते....पर क्या क्रिसमस पर वाकई हम ईसा या उनके उपदेशों को याद करते हैं .....या केवल पार्टी करते हैं....कहीं ऐसा तो नहीं कि अगर बाज़ार ना याद दिलाये तो हम इसे भी भूल जायेंगे ?
सोचिये क्या ऐसा तो नहीं कि बाज़ार हमें वही चीज़ें याद रखने पर मजबूर कर रहा है जिनमे उसका फायदा है ?
फिलहाल इजाज़त .....बड़े दिन की बधाई.....अटल जी को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएं.....महामना को खैर जाने ही दीजिये अंत में अटल जी की ही एक कविता पढ़ डालते हैं,

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़ हो
सिर्फ ऊँचाई का अंधड़ हो ,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

अलविदा .... !

आज एक ऐसी नज़्म लाया हूँ जो मेरे दिल के बहुत करीब है.....यह नज़्म लखनऊ छोड़ने से पहले लिखी गई थी...उस समय हर नवयुवक की तरह अपने शहर में बहुत कमियाँ और बदहाली दिखती थी....ऐसा नहीं था की लखनऊ पर नाज़ नहीं था पर लगता की यहाँ कुछ होना नहीं है...यहाँ कोई अपनी कीमत नहीं जानता...कब यह शहर छूटे और ये लोग कीमत हमारी जान पाएं....दुःख, गुस्से और निराशा की स्थिति में यह नज़्म लिखी थी और कुछ ही दिन बाद लखनऊ छूट गया और आज ३ साल होने को हैं और लखनऊ से दूर हैं....बहुत याद आता है शहर ऐ लखनऊ ! अभी पुरानी डायरी के ही पन्ने पलट रहा हूँ तो यह नज़्म सामने पड़ी है......लखनऊ को छोड़ने के पहले लिखी गई यह नज़्म, अब हमारे लखनऊ से छूट जाने का दस्तावेज बन गई है !

अलविदा लखनऊ !

इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
सुबह न चमकेगी ऐसे
सांझ न दमकेगी ऐसे
और सहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

ना तराने होंगे मेरे
ना फ़साने होंगे मेरे
देर से आने पे अब ना
वो बहाने होंगे मेरे

और नज़र को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

घर लगेगा एक पिंजर
लोग अनजाने लगेंगे
रास्ते सुनसान होंगे
महल वीराने लगेंगे

इस नगर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

खिलखिला भी ना सकोगे
मुस्कराहट जाएगी गुम
जान जाओगे उसी दिन
मेरे होने की तलब तुम

हर पहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

सोच लो कि कल से आख़िर
किस से तुम रूठा करोगे
जानता हूँ आज इतराते हो
कल आहें भरोगे

जब बसर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

आंख में बस होंगे आंसू
होंठ पर फरियाद होगी
जिस तरफ़ देखोगे मुड़कर
सिर्फ़ मेरी याद होगी

और सफर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

यह नज़्म लिखते पर यह नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी लखनऊ से इतनी दूर हो जायेंगे, ज़ाहिर सी बात जिनको अपने वजूद और कीमत का एहसास दिलाना चाहता था उनको तो इस दूरी से यह एहसास हुआ ही है....पर ख़ुद को भी वही एहसास हुआ है जो उनके लिए सोचा था .....आज अच्छी जगह से तालीम ले कर अच्छी जगह नौकरी कर रहे है.....बड़े चैनल में....काम है, नाम है.....पैसा भी आ ही रहा है....पर अगर कुछ नहीं हैं तो वो है लखनऊ !
और लखनऊ केवल लखनऊ नहीं है....क्या है...ये केवल लखनऊ वाले जानते हैं !
अभी के लिए खुदा हाफिज़ !

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

काश !

हिमांशु की फरमाइशें और ब्लॉग जगत की उम्मीदें पिछली पोस्ट के बाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं, अब एक बार फिर पुरानी डायरी के पीले पन्नों को पलटना पढ़ रहा है....ज़िन्दगी के कुछ ऐसे किस्से जिनमे से कुछ भुलाए नहीं जा सकते, कुछ याद नहीं रह गए और कुछ जानबूझ कर भुला दिए गए हैं....उन से फिर से दो चार होना पड़ रहा है। फिलहाल कल जनाब हिमांशु उर्फ़ हिम लखनवी का फ़ोन आया और गुजारिश की गई कि क्यों नहीं पुरानी डायरी से कुछ और पेश करते तो जनाब पेश ऐ खिदमत है एक और नज़्म ऐ इश्क ....यह भी थोड़ा प्रयोगधर्मी है सो कमियाँ बर्दाश्त करें,

काश !

ऐ काश कभी ऐसा होता !
तुम राह में मुझको मिल जाते
मैं देख के तुम को मुस्काता
तुम पूछते मुझसे "कैसे हो?"

ऐ काश कभी ऐसा होता !
मैं अपनी ही धुन में रहता
और तुम अपने दिल में कहते
मुझको पसंद हो ' जैसे हो'

ऐ काश कभी ऐसा होता !
तुम देख के मुझको छिप जाते
मन में कुछ सोच के मुस्काते
फिर ख़ुद ब ख़ुद शरमा जाते

ऐ काश कभी ऐसा होता !
जब इंतज़ार मेरा करने पर
तेरी आँखें भर आती
और फिर मेरे आने पर तुम
मुंह फेर के गुस्सा दिखलाती

ऐ काश कभी ऐसा होता !
मैं वही बहाने बतलाता
तुम कहती मुझसे झूठे हो
और मैं कहता छोडो जाने भी दो
ऐसे क्यो रूठे हो

ऐ काश कभी ऐसा होता !
मेरी आँखें तुम पढ़ लेते
बिन कहे मेरे तुम सुन लेते
हाथों में मेरा हाथ लिए
जीवन तुम अपना बुन लेते

ऐ काश कभी ऐसा होता !
हाँ काश कभी ऐसा होता !!

यह कविता भी उसी दौर में लिखी गई थी जब जीवन में हर नई सुबह, प्रेम का नया झोंका ले आती थी....सूरज की लाली में, गालों की लालिमा और गुलाब का हर फूल, अधरों की सुर्खियों की बात करता था.....हर बार ऊपर आकाश की ओर देख कर निकलता था काश !
पर पिछली कविता पढ़ कर यह तो ज़ाहिर ही हुआ होगा की यह काश ....काश ही रह गया ! खैर यह भी कोई गैरमामूली बात नहीं की यह काश तब से अब तक जिंदा है .......हर रोज़ एक नए चेहरे को देख कर नया काश ..... कि काश !
खैर वह काश तो पूरा नहीं हो पाया पर हिमांशु का काश अब पूरा हो रहा है कि सक्सेना जी गीत पर गीत ...नज़्म पर नज़्म डाल रहे हैं !!!

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

मैं जानता था !

हिमांशु बार बार कहता रहता है....( अमां यार वाला हिमांशु ) की भइया आप अब गीत नहीं लिखते....आपसे गीत की अपेक्षा है, ये छंदमुक्त कविता यो हर ऐरा गैर लिखने लगा है ! तब मेरा उत्तर प्रायः यह होता है की लिखने की परिस्थितियाँ होती हैं और देश और दुनिया की वर्तमान हालत ऐसी नहीं कि प्रेमगीत लिखे जाएँ.....पर इस बात पर इधर वह कुछ ज्यादा ही खिन्न है सो आज एक पुरानी डायरी खोली और एक पुराना गीत दिखा जो संभवतः ग्रजुअशन के विश्वविद्यालय वाले वक्त में लिखा गया था.....हिमांशु यह तुम्हारे लिए .... नया गीत लिखने की इजाज़त मुल्क के हालत और दिल नहीं देता ....जल्द ही लिखूंगा पर अभी ये ही पढ़ कर संतोष करो ! यह गीत आम गीतों से कुछ भिन्न मातृ वाला है ...पढो प्रयोग था
मैं जानता था !

हाथ झटक कर छुडा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था
मेरी आंखों की अंजुली में जल आंसू का भर जाओगे एक दिन
मैं जानता था

मैं अक्सर सोचा करता था
क्या तुम बिन भी रहना होगा ?
जीवन के प्रवाह को क्या
एकाकी बहना होगा ?
क्या कोई पल ऐसा होगा ?
क्या कोई तुम जैसा होगा ?
पलकों पर बूंदों की झिलमिल झिलमिल झालर सजवाओगे एक दिन
हाथ झटक कर छुडा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था

मैंने जब भी तुमको देखा
सदा नया सा तुमको पाया
आख़िर यह बतलाओ कहाँ से
रूप सलोना तुमने पाया ?
कहाँ से सीखा फूलों जैसा
खिल खिल जाना
और काँटों से भी मुस्का कर
घुल मिल जाना
मेरे मन के भी काँटों से क्या तुम बोलो मिल पाओगे एक दिन
हाथ झटक कर छुडा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था

जब जब तुम नाराज़ हुए थे
तुम्हे मनाया
तुमको देखा, ख़ुद को खोया
तुमको पाया
हर रोज़ सुबह उठ कर
क्यों तेरा नाम लिया था
हर रात सपन में
बस तेरे ही साथ जिया था
क्या फिर लौट के इन सपनों में तुम आओगे एक दिन
हाथ झटक कर छुड़ा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था

मैं जानता था और फिर भी
मैं जान न सका
सत्य विराट था
पर पहचान न सका
अब दिल में गुबार
आँखों में पानी है
शायद यही
हां यही ज़िन्दगानी है
और आखिरी एक प्रश्न है ईश्वर से अब
क्या तुम मुझको मेरे मन से मिलवाओगे एक दिन
हाथ झटक कर...........................

आखिरी में बशीर बद्र के चाँद आशार इसे नजर करता हूँ ...
वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे
चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे

इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे

मैं समझता था मुहब्बत की ज़बाँ ख़ुश्बू है
फूल से लोग इसे ख़ूब समझते होंगे

भूल कर अपना ज़माना ये ज़माने वाले
आज के प्यार को मायूब समझते होंगे

( यह कविता २५ फरवरी २००६ को लिखी गई थी.....लिखने के कारणों पर चर्चा ना ही हो अच्छा है.....जब वक़्त के साथ जवानी के शुरूआती दिनों के ज़ख्म भर जाएँ तो उन्हें ना ही कुरेदना अच्छा है.....)

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

भूल गए हैप्पी बड्डे !

कल १६ दिसम्बर था और था विजय दिवस। विजय आज यानी कि कल के दिन ही १९७१ में भारतीय सेना के रणबांकुरों ने पाकिस्तानी सेना के ९०,००० सिपाहियों को आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया था और आज हम उसी पाकिस्तान के छद्म युद्ध का सामना कर रहे हैं। इस विजय दिवस पर मैंने पिछले वर्ष १६ दिसम्बर को भी एक पोस्ट लिखी थी और अचानक विजय दिवस के बहाने याद आया कि अरे ताज़ा हवा को एक साल हो गया और यह सालगिरह बिना किसी हो हल्ले के निकल गई...........क्या यार.....इतनी लापरवाही !
खैर अब भूल गए सो भूल गए पर अब याद आ गया है तो बताये देते हैं कि भइया अपने ब्लॉग को एक साल पूरा हो गया है और दिसम्बर की १४ तारीख को आपका ब्लॉगशिशु ताज़ा हवा एक साल का हो गया है। आज याद आ रहा है वो एक एक लम्हा जब यह शिशु पल बढ़ रहा था.....जब यह जन्मा ...... जब इसे आप सब बडो ने पुचकारा, गोद में खिलाया ..... माता गूगल और पिता मयंक सक्सेना की इस संतान ने मुझे बिना विवाह के पिता बनने का जो गौरव प्रदान किया है उसकी समता तो केवल स्वर्गीय अभिनेता महमूद ही कर सकते थे....( महमूद ने एक फ़िल्म में यही किरदार निभाया था )....
फिलहाल बैठा हूँ और गुजरा वक्त जैसे आंखों के सामने बाइस्कोप जैसा चल रहा है....जब यह शिशु पहली बार हिन्दी ब्लोगिंग परिवार की गोद में सौंपा गया, तब किस तरह आप सब ने इसे परिवार के अलग अलग सदस्यों की तरह प्यार दुलार दिया। इन सब में से कोई इस शिशु का भाई बना, कोई चाचा, कोई ताऊ, कोई दादा- दादी और उम्मीद है कि जल्द ही कोई पहली प्रेयसी भी मिल ही जायेगी ........
जब ताज़ा हवा शुरू हुआ तो शायद यह मालूम भी नही था कि ब्लोगवाणी, चिट्ठाचर्चा या हिन्दी ब्लोग्स जैसा कोई एग्रीगेटर होता है जहाँ दुनिया को आपके ब्लॉग का पता चले....सो कुछ अपने यार-दोस्त ही इसे पढा करते थे....पहली पोस्ट जिसे सम्पादकनामा के नाम से प्रस्तुत किया था उसमे कई बड़ी बड़ी बातें थी जिसमे इसे एक बड़ा सामूहिक ब्लॉग बनाने के विचार थे पर खैर उनकी जाने दें ( वैसे भी एक उस विचार को छोड़ कर बाकी कोई भी विचार अभी तक तो फ्लॉप हुआ नहीं दिखता) ..... पहली पोस्ट पर केवल कुछ मित्रों की प्रतिक्रियाएं थी, उनका मज़ा लें;

गुंजन सक्सेना ने इरादों पर ही प्रश्नचिन्ह लगा डाला, वे बोले....
"हवाएं कब से चलना स्टार्ट होंगी?... गुंजन"
मनीष ने थोडी दिलासा दी पर व्यंग्य कर ही डाला,
"havaa acchi chal rahi hai lekin thodi dhimi है"
जैसे यह थोड़ा था कुमार अजीत ने चुनौती ही दे डाली, वे कहते हैं...
"मयंक भाई, ताज़ा हवा ब्लाग सम्बन्धित आपके इरादों पर भी चलती रहे....आपका अजीत"
ऐसी हालत में जब ब्लॉग का बुखार चढ़ते ही उतरने लगा था (हालांकि इनमे से सबकी मंशा अच्छी ही थी ) दो टिप्पणियां ऐसी आई जिन्होंने हौसला बाँध दिया.......
देविका ने बड़ी प्रेरक बात लिखी,
"hawaon ka irada, hausla e bandi ka hai। par sirf hawa ban k mat ho rawan, balki us toofan ka manzar bana, ki galat soch tujh se dare aur kamzor tera daman thaame।umeed hai ki yeh apne naam aur kaam ko zimmedari se nibhaye."
रोहिणी ने भी हौसला बढाया, कहा...
"posts n updates dekh kar lag raha hai k blog 'taaza hawa' apne naam ko saarthak kar raha hai.. sampaadak ko badhaai,शुभकामनाएं"


समस्या उस समय यह थी कि न तो हिन्दी टंकण के अधिक टूल उपलब्ध थे और न ही उपलब्ध टूल्स के बारे में आम इंटरनेट यूज़र को ज़्यादा जानकारी...इसलिए हमारे टिप्पणीकारों की अधिकतर टिप्पणियां रोमन में ही होती थी.... खैर इसके बाद ब्लॉग पर उम्मीद है कि, १६ दिसम्बर, ज़रा याद करो कुर्बानी, आवाज़ ऐ खल्क ( यह हरीश बरौनिया ने लिखा था), मोदी का रहस्य, सचिन का भाग्य जागा और मीडिया के अकाल पर एक भी टिप्पणी नहीं आई और हौसला हिचकोले खाने लगा........तब अहसास हुआ कि TRP या BRP की क्या अहमियत है और फटाफट एक साभार लेख चिपका दिया....मौसम के अनुकूल......रवीश कुमार का मफ़लर ..... खैर तरक़ीब ज़्यादा काम तो नहीं आई पर एक टिप्पणी आ गई....
नितिन ने रवीश जी के लिए संदेश लिखा...,
"रवीश जी अब तक मफलर बांधता था आज पढ़ भी लिया, शुक्रिया !"
(रवीश जी का मैं भी आभारी हूँ की उन्होंने सदैव अपने लेखों को मुझे साभार प्रकाशित करने की अनुमति दी है....)
इसके बाद पढ़ाई पूरी होने वाली थी और एक एक कर के सारे साथी या तो इन्टर्न शिप या फिर नौकरी के लिए साथ छोड़ रहे थे.....माहौल इमोशनल था और फिर लिख डाली पंछी .....
यह वह समय था जब के जद्दोजहद शुरू हो गई थी .... मेरी प्रोफाइल लिखा था कि "अक्सर बेकार रहता हूँ इसलिए ब्लॉग लिखता हूँ...." इसके बाद २६ जनवरी को काका हाथरसी की एक कविता ठेली और रवीश जी ने एक कमेन्ट दिया जो ताज़ा हवा पर किसी बाहरी ब्लागर का पहला आवागमन था,
"मयंक जी पढ़ लिया आपका ब्लाग। २६ जनवरी के दिन ही। और कविता भी २६ जनवरी पर। अच्छा है।
बेकारी में ही तो रास्ता निकलता है। जब भी हम बेकार होते हैं तभी नया सोचते हैं। इसलिए ब्लाग बनाने की बधाई। लिखते रहिए।"
रवीश जी की टिपण्णी मेरे ब्लॉग जीवन के लिए शायद उस समय बहुत बड़ी उपलब्धि थी, शायद तब भान भी ना था कि अभी तो ब्लोगिंग के और भी महारथी हैं.....इसके बाद गांधी जी की पुन्य तिथि पर एक कविता डाली जिस पर पणजी से यती ने टिप्पणी की,
"is kavita k baremai likh ne k liye shabda nai hai bas itna hi kahungi aachi hai"
खैर कारवाँ चल तो चुका ही था .....इसके बाद विज़न 202०, सपने बीनने वाला, यह ज़मीं हमारी नहीं (परम मित्र स्वप्रेम की) आदि रचनाएं आईं और सराही गईं। इसके बाद जलियांवाला बाग की बरसी पर हमने बात की कि क्या वाकई हम अपने शहीदों को भूलने लगे है.....अप्रैल वह समय था जब मैं एक अदद नौकरी के लिए मीडिया जगत में संघर्ष कर रहा था और इस महीने केवल एक पोस्ट आई। मई में ४ पोस्ट लिखी पर टिप्पणी शून्य रही.....एक तो सामने रोजगार की तलाश .... एक भी टिप्पणी न देख कर रहा सहा आत्मविश्वास भी जाता रहा, सोचा अब कोई ब्लाग व्लाग नहीं लिखना और नतीजतन जून में शर्मनाक तरीके से एक भी पोस्ट नहीं रही और मामला सन्नाटा !
पर वाकई यह बदलाव का समय निकला और २१ जुलाई को देश के एक प्रतिष्ठित और सबसे पुराने न्यूज़ चैनल में नौकरी लग गई। फिर क्या था.....निकल पड़ी और ब्लोगिंग फिर शुरू.....अगले ही दिन अपने मुल्क के महान नेताओं की बदौलत अगली पोस्ट आ गई, शीर्षक था सत्ता के सौदागर या पोलिटिकल मैनेजर्स .......... अगली पोस्ट थी राही मासूम रज़ा की कविता गंगा और महादेव ...इसके बाद बंगुलुरु और अहमदाबाद में लगातार धमाके हुए और टीवी समाचार चैनलों के न्यूज़रुम के माहौल पर कुछ आहें निकल पड़ी खून के आंसू और आंसुओ का खून ! इस पर संजय तिवारी जी ने कहा,
"गहरी संवेदनाएं हैं. इसको ही अपने काम में उतारिए. बहुत कुछ बदलेगा."
इसके बाद 31 जुलाई को हिमांशु ने प्रेमचंद की जयंती और रफ़ी की पुण्यतिथि पर एक रचना भेजी प्रेमचंद और रफी ......इसके बाद अगस्त की पहली पोस्ट थी हरकिशन सिंह सुरजीत के अवसान से जुड़ी जिसमें मेरा व्यक्तिगत संस्मरण भी जुड़ा था युगांत ...... । इसके बाद आई ११ अगस्त और लाई ओलम्पिक में अभिनव बिंद्रा के स्वर्ण पदक जीतने की ख़बर....ताज़ा हवा ने कहा बिंद्रा.....सलाम ! इस पर शोभा महेन्द्रू ने कहा,
"आप आशावादी रहें। भारत और भी पदक जीतेगा। जीत की बहुत- बहुत बधाई"
भविष्यवाणी सच निकली !!
१५ अगस्त आई और हमने कहा हुआ जनतंत्र का जन्म ! उड़नतश्तरी सरसराई, "स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं।" इसके बाद जन्माष्टमी पर याद दिलाई कृष्ण भक्त रसखान। ... की, इसके बाद आखिरी कलाम.....सलाम में ताज़ा हवा ने दी अहमद फ़राज़ साहब को श्रद्धांजलि। १ सितम्बर को दुष्यंत के जन्मदिन पर उन्हें याद किया हिमांशु ने और समझाए दुष्यंत के मायने .... और क्रांतिकारी कवि वेणुगोपाल के अवसान पर किया उनको याद...क्रन्तिकारी का अवसान .... शिक्षक दिवस पर गुरुजनों को याद किया राधाकृष्णन, कबीर, तुम्हारे या फिर अपने बहाने ...? इसके बाद उठाई हमने आवाज़ .....
समीरलाल जी ने कही "सच में सबकी बात है। बहुत उम्दा रचना!!!"
Shastri बोले, "हम तो जोर से चिल्लायेंगे !!"
और हिंदी दिवस पर प्रसून जोशी से साभार कहलवाया हिंदी को आजादी चाहिए !
इसके बाद दिल्ली में धमाके हो गए और फिर आए मकडियां , बीच की दीवार और आतंक का फिर हमला ......२८ और 29 सितम्बर को हमने याद किया भगत सिंह को उनकी माँ की अपील .... और उनकी चिट्ठियों के ज़रिए ! अदम गोंडवी की ग़ज़ल पर डॉ .अनुराग ने कहा,
"ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
बस एक शेर में सारी बात कह दी..."
हालांकि कई बातें कहनी बाकी थी सो आगाज़ हुआ एक नए ब्लागर का और उन्होने कहा इक शमा और जला लूँ ......इसके बाद नन्ही पुजारन से परिचय हुआ और समझा बाढ़ और अकाल को तभी आया करवाचौथ और हमने कहा आज फिर ..... इस पर दिनेशराय द्विवेदी जी ने पूछा,
"कविता सुंदर है। लेकिन क्या आप इस परंम्परा को अपनी बेटी तक चलाने का इरादा रखते हैं।"
इसके बाद हमने बात कही जो राही मासूम ने कही थी लेकिन मेरा लावारिस दिल ,इस पर Suresh Chandra Gupta जी ने फ़रमाया,
मन्दिर बनाया आपने,
मस्जिद बनाई आपने,
दिल बनाया जिस ने,
निकाल दिया उसे दिल से,
फ़िर दिल लावारिस तो होना ही था।
उसके बाद चुनाव आए और बाल दिवस भी....चुनावी ग़ज़ल भी आई और वरुण कुमार सखाजी की टिप्पणी भी कि,
अच्छा लिखते हो ग़ज़ल-ए-बयां पसंद आया पहली बार इस ब्लॉग पर आया हूँ। वधाई हो इस हक़ीक़त को जानते तो सभी हैं,मग़र कौन बनेगा दर्द की दवा,ज़ख़्म का मलहम। तेजस्वी ओजस्वी लोग मीडिया की शरण में हैं जो उद्योगपतियों की कठपुतली हैं आखिर क्यों ये तथाकथित क्रांतीवीर राजनीति नहीं ज्वाइन करते। मयंक जी से उम्मीदें बहुत हैं।
ज्ञानपीठ मिलने के बाद भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में अडिग कुंवर नारायण को भी याद किया और महिला दिवस पर जनानो की मर्दानगी को भी......यह सब चलता रहता पर तभी मुम्बई ने पूरी दुनिया को हिला दिया.....हम क्या अलग थे ? बहुत कोशिश की कहने की जाने दो ! पर दिल उबल पड़ा कि क्या वाकई हम इसी मीडिया के हिस्से हैं ..... निकल पड़ी कुछ नज्में...दिल की बातें हैं..... और मानवाधिकार दिवस पर याद किया कि क्या ज़रूरी हैं .........................
और देखते ही देखते यह शिशु एक वर्ष का हो गया......यकीन तो वाकई नहीं होता पर सच है......अब तक वही कहा और लिखा जो ठीक लगा
न भाषा भाव शैली है, न कविता सारगर्भित है
ह्रदय का भाव सुमन है, ह्रदय से ही समर्पित है
पर अब शिशु और उसका पिता आप सभी परिवारजनों को धन्यवाद देना चाहता है, हम दिल से आभारी हैं,
समीरलाल जी, कविता जी, शोभा जी, रवीश जी, यती, सुरेश जी, अनुपम जी, शास्त्री जी, महेन्द्र जी, संजय जी, अशोक जी, राकेश जी, रश्मि जी, नीरज जी, सुशील जी, हरि जी, संगीता जी, दिनेश राय द्विवेदी जी, निशू जी, योगेन्द्र जी, रंजना जी, तनु जी जिन सबने ताज़ा हवा के अभिभावकों की बख़ूबी भूमिका वहन की......इसके बाद शुक्रगुज़ार हूं अपने साथियों देविका, अजीत, नितिन, स्वप्रेम, वरुण, अनुभव जी, गुंजन, रोहिणी, मनीष और उन सभी का जो हम को पढ़ते हैं ....... या आगे पढ़ेंगे ....
अब कहो कि सालगिरह भूल गए तो यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं, अब हम लोग जब अपने शहीदों की जन्म तिथियाँ और पुण्य तिथियाँ भूल जाते हैं, हम सड़क पर पड़े घायल को भूल जाते हैं, हम कचरे में खाना ढूंढते बच्चों को भूल जाते हैं, हम रोज़ होने वाले आतंकी हमलों को भूल जाते हैं, हम अपने समाज और मुल्क के हित भूल जाते हैं, और तो और अक्सर हम अब इंसानियत भूल जाते हैं......फिर मैं तो अपने अदने से ब्लॉग की सालगिरह ही भूला था.....सो इस भूल को आप भूल जाओ और अब आगे ताज़ा हवा पर आने वाले और नियमित और बेहतर लेखों का मज़ा लें .....!
इस प्रण के साथ कि आगे से हम और नियमित और धुँआधार पोस्ट्स आपके लिए लायेंगे ......अभी के लिए विदा

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

ज़रूरी हैं .........................


माथे पर चिंता की लकीरें

धीरे धीरे बदलती झुर्रियों में

दिन भर बीनता कचरा

रात आ पसरता झुग्गियों में



जूठन में कलेवा ढूंढता

तलाशता जिंदगी जनाजों में

उतरन से ढकता आबरू

बचता ठण्ड से अलावों में



वो जो बुहारता है सड़कें

वह जो उठाता है मैला

वह जो घर घर फेरी करता है

लेकर एक फटा सा थैला



वो जो खींचता है अपने ही जैसे

एक आदमी को, रिक्शे में बिठा कर

वो जो ऊंची इमारतें चमकाता है

ख़ुद को रस्से पर लटका कर



तपती धूप में आदमी वो जो

ढोता है तसलों में भर भर मिटटी

औरत जिसकी गोद में है शिशु

और कंधे पर गिट्टी



वो जो उतरा है गली के

खुले हुए गटर में

ताकि माहौल ना ख़राब हो

खुशबुओं के शहर में



वो जिसके रईस हमउम्र

जाते हैं अपनी अपनी कारों में स्कूल

जो लड़ते हुए ज़िन्दगी से

अपना बचपन गया है भूल



जिनको हम अक्सर बिना बात

छूटते ही दे देते हैं अश्लील सी गाली

मार देते हैं तमाचा अक्सर

इनके बगल से निकलते हैं बचकर




हम डरते हैं की इनके छूने से

हमारा अस्तित्व ना मैला हो जाए कहीं

पर सबसे ज्यादा काम हमारा

करते हैं लोग वही



इन सबके और हम सबके बीच

शारीरिक समता के अलावा

क्या कोई और समानता है ?


क्या हम मानव हैं

और अगर नहीं हैं तो कौन हैं ये ?

अगर मानव के अधिकार होते हैं

और हमारे अधिकार हैं

तो ज़ाहिर हैं हम ही मानव हैं



फिर ये कौन हैं ?

क्या ये कड़ी हैं कोई

जो पशु और मानव को जोड़ती है

या कोई हथौडी है सत्य की जो

मानव होने के भ्रमों को तोड़ती है



क्योंकि जीवन के लिए

साँस और विचार ज़रूरी है

मानव होने के लिए

अधिकार ज़रूरी हैं .........................


मानवाधिकार दिवस पर विशेष प्रस्तुति......यह कविता मैंने अभी लिखी पर कहीं ना कहीं यह बचपन में पढ़ी गई एक कविता से प्रभावित है जो संभवतः अज्ञेय ने लिखी थी......

मयंक सक्सेना (9310797184)

रविवार, 7 दिसंबर 2008

नज्में...दिल की बातें हैं.....


अभी ब्लोग्वानी देख रहा था और पाया कि हमारे ब्लॉगर बन्धु और भगिनियां अभी तक मुंबई शोक से उबर नहीं पाये हैं.......और इस मायने में वे वाकई हिन्दुस्तान का प्रतीक रूप माने जा सकते हैं। हिन्दुस्तान भी इस दुःख से अभी उबर नहीं पा रहा है.....और शायद अभी इसमे वक़्त भी लगेगा। पर जैसा मैंने कहा कि इस मायने में तो मैं अपने अल्फाज़ वापिस लूँगा कि इस मायने में ही नहीं बल्कि हर मायनों में ब्लॉग जगत एक छोटा हिन्दुस्तान है.....अलग अलग जातियाँ, भेष ..... तरीका, सलीका, मान्यताएं और अलग अलग विचार। हम सब रोज़ अलग अलग मुद्दों पर बात करते है....उस पर विचार देते हैं.....टिपियाते हैं।

हम में हर तरह के लोग हैं। कुछ जाति और धर्म के पूर्वाग्रहों से दूर तो कई धर्म परायण ...... कुछ अति उत्तेजित रहते हैं तो कुछ हर स्थिति में शांत। कुछ धर्म को राजनीति से जोड़ते हैं तो कुछ राजनीति से ही दूर रहते हैं....कुछ सुनहरे भविष्य को लेकर आशान्वित हैं और कुछ कहते हैं कि कुछ बदलने वाला नही ! इनमे से कई धैर्य वाले हैं....खुले विचारों के हैं...धर्मनिरपेक्ष हैं तो कुछ जल्दबाज़ और कट्टर ..... पर कुल मिलकर बड़ी बात यह है कि यह लिख रहे हैं....अपने विचार खुले तरीके से रख रहे हैं....हिदोस्तान की ही तरह तमाम मतभेद होने के बावजूद ये मुंबई के बारे में लिख रहे हैं और इनके विचार और तरीके भले ही अलग अलग हो पर महत्वपूर्ण यह है कि इन सबको कहीं न कहीं देश ही फ़िक्र है.....( तरीकों और विचारों से भले मैं और आप सहमत न हो पाएं...)

खैर अभी मुंबई और मुल्क से जुड़ी कुछ पोस्ट पढ़ रहा था और कुछ नज्में याद आई जो पेश कर रहा हूँ ये कवितायें मुल्क की और अवाम की बातें करती हैं तो गौर फ़रमाएँ,


ग़र चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे

अदम गोंडवी की नज्में मुझे ख़ास पसंद हैं क्यूंकि ये आम आदमी के पसीने की महक और गाँव की मिटटी की सोंधी खुशबू समेटे होती हैं, पहली है गर चाँद तवारीखी तहरीर बदल दोगे, ये नज़्म उनके लिए है जो सारे मुसलमानों को गद्दार मानते हैं;


ग़र चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे

क्या इनसे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे


जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आई

मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे ?


जो अक्स उभरता है रसख़ान की नज्मों में

क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे ?


तारीख़ बताती है तुम भी तो लुटेरे हो

क्या द्रविड़ों से छीनी जागीर बदल दोगे ?


मैं अपना सलीब आप उठा लूँ

अगली नज़्म है अहमद नदीम कासमी की .... नदीम साहब अपनी नज्मों के लिए मशहूर हैं, ये नज़्म नज़र करता हूँ मुंबई के लोगों को ..... मुल्क के हालात को ..... दुनिया के हालात को !


फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ
आँखों को बुझा लूँ कि हक़ीक़त को बदल दूँ

हक़ बात कहूंगा मगर है जुर्रत-ए-इज़हार
जो बात न कहनी हो वही बात न कह दूँ

हर सोच पे ख़ंजर-सा गुज़र जाता है दिल से
हैराँ हूँ कि सोचूँ तो किस अन्दाज़ में सोचूँ

आँखें तो दिखाती हैं फ़क़त बर्फ़-से पैकर
जल जाती हैं पोरें जो किसी जिस्म को छू लूँ

चेहरे हैं कि मरमर से तराशी हुई लौहें
बाज़ार में या शहरे-ख़मोशाँ में खड़ा हूँ

सन्नाटे उड़ा देते हैं आवाज़ के पुर्ज़े
यारों को अगर दश्त-ए-मुसीबत में पुकारूँ

मिलती नहीं जब मौत भी मांगे से, तो या रब
हो इज़्न तो मैं अपना सलीब आप उठा लूँ

( पैकर=चेहरे, लौहें=कब्र पर लगा पत्थर, दश्ते-मुसीबत=मुसीबतों का जंगल, इज़्न=इजाज़त )


कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये

और तीसरी और आख़िर ग़ज़ल है हमारे हुक्मारानों के, धर्म के ठेकेदारों के और हम सबके नाम क्यूंकि सब जिम्मेदार हैं इन हालातों के लिए....जो धोखा देते हैं वो भी और जो धोखा खाते हैं वो भी ! चाँद पर पहुँचने से पहले हमें अपनी धरती के हालात ठीक करने होंगे.....तो शायद आज की पोस्ट के अंत के लिए दुष्यंत की इस ग़ज़ल से ज्यादा कुछ सटीक नहीं हो सकता है............


कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये

कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है

चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही

कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता

मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये


अंत में बशीर बद्र के अल्फाजों में कहें तो,


हमसे हो नहीं सकती दुनिया की दुनियादारियाँ

इश्क़ की दीवार के साये में राहत है बहुत


उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मी

रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत


आख़िर में यही कि ज़िन्दगी अपना रास्ता ढूंढ ही लेती तो उम्मीद बनाए रखें !

...................

..............................

..........................................

....................................................... !

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

क्या वाकई हम इसी मीडिया के हिस्से हैं .....


अजीब सा लगा जब कल रात को एन डी टीवी और आज दोपहर स्टार न्यूज़ पर संजय दत्त के आतंकवाद पर विचार सुने। पहले तो कल रात यही तय करना मुश्किल था की क्या वाकई मैं एन डी टीवी देख रहा हूँ ...... स्टार से तो खैर इतना अनापेक्षित नहीं था। मैं यहाँ कोई निर्णय देने नहीं बैठा पर क्या यह वाकई उचित था ?
मेरा यह मतलब कतई नहीं है कि एक नागरिक के तौर पर संजय दत्त आतंवादी हमलों पर कोई विचार नहीं रखते या उन्हें देश की फ़िक्र नहीं ...... बिल्कुल होगी ( आख़िर देश की सबसे ज्यादा फ़िक्र फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों को ही तो है ! ) पर आतंवाद पर विचार जानने और दुःख व्यक्त करने के लिए संजय दत्त ही क्यूँ ?
ज्ञात हो कि ये वही महानुभाव हैं जिन्हें दाउद से प्राप्त ऐ के ५६ और विस्फोटक रखने के अपराध में सज़ा भी मिल चुकी है.....(अगर कोई यह कहे कि यह केवल आरोप है तो बन्धु आरोप सिद्ध हो चुके हैं अतः यह अपराध है। ) और अब जब यह माना जा रहा है कि इन हमलों में दाउद की मिलीभगत है तब हमारे पत्रकार संजय दत्त जैसे व्यक्ति का साक्षात्कार करके इस तरह के विषय पर राय जान रहे हैं......यह आख़िर है क्या मज़ाक या व्यंग्य ?
क्या संजय दत्त के अलावा किसी फ़िल्म अभिनेता का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता था ? यही नही मुख्तार अब्बास नकवी के बयान पर भी संजय की पत्नी मान्यता का बयान लिया गया जो शायद ही किसी सामाजिक मुद्दे से कभी जुड़ी रही हो (कहीं यह कुछ सेटिंग तो नहीं) ! यह विडम्बना ही है कि इनमे से कोई भी किसी एक भी घायल या मृतक के घर या शवयात्रा में नहीं पहुँचा होगा .....
फिर संजय दत्त ? तब तो फिर हम अबू सालेम की बाईट भी आतंक वाद पर ले सकते हैं.....अभी तो उस पर केस चल ही रहा है.....!
सबसे बड़ा हैरतनाक वाक्य यह रहा कि एन डी टीवी ने सबसे पहले संजू बाबा का इंटरव्यू प्रसारित किया .... कम से कम उनसे यह अपेक्षा नहीं की जाती है ! मुआफ करें एन डी टीवी के पत्रकारों पर आपके सबसे बड़े मुरीदों में से एक आपसे आज बहुत खिन्न है ! मुआफ करें पर अगर आप इस तरह की पत्रकारिता करते हैं तो कृपा करके आम आदमी की बात करना छोड़ दें.....ख़बर वही जो सच दिखाए .....तो क्या परदे की गांधीगिरी देश का सच है ? जुबां पर सच....दिल में इंडिया तो क्या संजय और मान्यता जुबान का वह सच हैं जिसके दिल में इंडिया है ?
वाकई यह शर्मनाक है.....आप माने या ना माने !
बाकी स्टार से भी यह अपील तो करूँगा ही कि कम से कम ऐसे लोगों की बाईट ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर ना लें ... यह आपकी भी छवि का मामला है.....वैसे भी और फ़िल्म अभिनेता मर गए थे क्या जो माफिया और दुबई से सम्बद्ध एक व्यक्ति इस तरह देश और मुंबई की नुमाइंदगी के लिए आप लोगों ने खड़ा कर दिया ? क्या दो ही दिन पहले ख़त्म हुए हादसों में मारे गए और शहीदों के लिए आपके मन में कोई सम्मान नहीं है ?
हलाँकि आप यह कह सकते हैं कि संजय दत्त के दुबई से संबंधों की कोई पुख्ता पुष्टि नहीं है पर शक तो है न....ऐसे किसी संदिग्ध को भी आप इस तरह महिमामंडित कैसे कर सकते हैं ? तो फिर क्यूँ नहीं चारा घोटाले के विरोध में लालू जी की और सिख दंगो पर दुःख जताने के लिए जगदीश टाइटलर के वक्तव्य ले लेते हैं ?
मैं यह अपेक्षा नहीं रखता कि आप माफ़ी मांगेंगे या शर्मिंदा होंगे (आजतक ऐसा कभी हुआ है ?) बस गुजारिश है कि एक बार सोचियेगा ज़रूर कि इससे कितने लोगो की भावनाएं आहत हुई होंगी और उनके परिवारजन जो ९३ के मुंबई हमलों में मरे होंगे ......
खैर आप शर्मिंदा हो या ना हों ..... मैं शर्मिंदा हूँ कि क्या वाकई मैं इसी मीडिया का हिस्सा हूँ !

शनिवार, 29 नवंबर 2008

जाने दो !



अभी अभी न्यूज़ रूम से उठा हूँ ......जिस तरह के विसुअल्स पिछले तीन दिनों से आने वाली फीड में देख रहा हूँ, वे लगातार दिमाग में घूम रहे हैं और फिर दिमाग घूम रहा है। कुछ समझ नहीं आ रहा है.....आज जब शहीद संदीप उन्नीकृष्णन की माँ को उसके शव से लिपट कर रोते देखा तो जैसे उठ कर टेलिविज़न पटक देने का मन हुआ। पर क्या क्या पटक सकते हैं.....अखबार, टेलिविज़न और रेडियो ? कब आख़िर अपने अन्दर के कायर को उठा कर पटक पाएंगे ....? कब पटखनी दे पाएंगे जाने दो वाली अपनी मानसिकता को ?


अब तो डर भी नही लगता कि सुरक्षित नहीं हैं हम लोग ..... बस लगता है कि .......................


शायद आज रात कोई अच्छी कविता लिख पाऊं ...... फिलहाल जो पाच नहीं पा रहा वह उलट देता हूँ

जाने दो


एक रात फिर

गूंजा आसमान

चली गोलियाँ

मरे इंसान


हमने फिर कहा

जाने दो


कई मरे, शायद सौ या फिर दो सौ

या पता नहीं

बहा खून या बहे आंसू

पता नहीं


शहर के लोग

चिपके थे टेलिविज़न से

देख रहे थे

सीधे मुंबई से


एक मैच का

लाइव टेलीकास्ट

एक मैच

जिसमे थी दो टीमें

एक के हाथ हथियार

एक के हाथ

अपनी जिंदगियां


दोनों भाग रहे थे

एक हाथ में मौत लेकर

उसे बांटते हुए

एक हाथ में लेकर ज़िन्दगी

उसे बचाते

हाँफते हुए


हम जो घर पर

देखते थे यह खेल

सीधा प्रसारण

निकले नहीं बाहर

भय के कारण


पर हमारे हाथ में भी

था कुछ

जिसे हम भी संभाले थे

एक हाथ में रिमोट

और दूसरे में पोपकोर्न


और फिर अगले दिन सुबह

जब निकले हम घर से

और कहा किसी ने

चलो कर आयें रक्तदान


तो अजीब सा मुंह बनाकर

कहा हमने

अभी कुछ काम है

निपटाने दो

और मन में सोचा

जाने दो !


मुझे पूछना है उन लोगों से जो हेमंत करकरे को झूठा, राष्ट्रद्रोही और बेईमान जाने क्या क्या कह रहे थे......वो चुप क्यूँ हो गए हैं ? अगर अपनी बात पर कायम हैं और तब राजनीति नहीं कर रहे थे तो सामने आकर बोलें और अगर अपनी गलती मानते हैं तो कम से कम सामने आकर दो आंसू ही बहा दें !

उनसे भी सवाल है कि जो तीन दिन पहले कह रहे थे कि आतंकवाद का कोई धर्म नही होता है ....फिर क्यों बार बार इस्लामी आतंकवाद चिल्ला रहे हैं ? क्या आप लोगों ने कोई शपथ ली है कि मुल्क में मज़हबी भाईचारा बिगाड़ कर ही दम लेंगे ? क्या प्यार से रहते पड़ोसी आपको बर्दाश्त नहीं ?

आप से एक विनती है कि आप लोग ख़ुद तो कुछ कर नहीं सकते है मुल्क के लिए तो कम से कम माहौल ना बिगाडिये ...... एक आम हिन्दुस्तानी अभी इतना सक्षम स्वयं है कि अपने आस पास का माहौल ठीक रख सके !

बाकी राज ठाकरे, तोगडिया और अमर सिंह जैसों पर कोई टिपण्णी नही क्यूंकि यह इतनी योग्यता ही नहीं रखते !

अंत में एक दोहा,

फटे बम और लोग मरे, मुंबई में अँधेरा घुप्प

अमर सिंह जी गायब हैं और राज ठाकरे चुप्प

मंगलवार, 25 नवंबर 2008

जनानो की मर्दानगी ..... क्यों नहीं !






कल २५ नवम्बर था....हम में से कईयों को नही मालूम होगा सो बताये देता हूँ की कल के दिन को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव की समाप्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। अगर औपचारिक भाषा में कहें तो संयुक्त राष्ट्र के १७ दिसम्बर के एक प्रस्ताव को पारित करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने २५ नवम्बर को महिलाओं के उत्पीडन के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने का निर्णय लिया। यह तिथि १९६० में इसी दिन डोमिनिक गणराज्य के शासकों के आदेश पर तीन राजनीतिक कार्यकर्ता बहनों की नृशंस हत्या की याद में निर्णीत हुई। *(By resolution 54/134 of 17 December 1999, the General Assembly designated 25 November as the International Day for the Elimination of Violence against Women, and invited governments, international organizations and NGOs to organize activities designated to raise public awareness of the problem on that day. Women's activists have marked 25 November as a day against violence since 1981. This date came from the brutal assassination in 1960, of the three Mirabal sisters, political activists in the Dominican Republic, on orders of Dominican ruler Rafael Trujillo (1930-1961)।)



खैर इतिहास भूगोल तो किताबों की बात है पर व्यवहारिक बात यह है कि ध्वनी की रफ़्तार से भी तेज़ चलने वाली इस दुनिया में आज भी वर्णभेद और लिंगभेद जैसी व्यवस्थाएं और अहम् बोध बचे हुए हैं। इसके ख़िलाफ़ पुरूष तो शायद ही कभी एक मत हो पाएं ( हलाँकि मैं स्वयं पुरूष हूँ......शायद इसी नाते पुरूष अहम् को समझ सकता हूँ ) इसलिए अब महिलाओं की ज़िम्मेदारी है....स्वयं और अपने आस पास की और महिलाओं के प्रति कि ख़ुद लड़ने और विरोध करने को तैयार हो जायें कि आपकी जानकारी में कभी भी किसी भी स्त्री पर हिंसा या उत्पीडन ना होने पाये ( स्त्री पर हिंसा केवल पुरूष ही नहीं करते )मुझे कवि का नाम तो नहीं याद पर अक्सर यह पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं,



कर पदाघात अब मिथ्या के मस्तक पर



सत्यान्वेषण के पथ पर निकालो नारी



तुम बहुत दिनों तक बनी दीप कुटिया की



अब बनो क्रान्ति की ज्वाला की चिंगारी


खैर क्रान्ति एक दिन में नही आती सो धैर्य बड़ी ताकत होगा.......सो लड़ेंऔर प्रतीक्षा करें जीतने तक, अंग्रेज़ी के प्रसिद्द कवि सर हेनरी वौटन ने कहा,

"Learn to labour and wait."

अभी फिलहाल एक छोटी कविता जो नारी अधिकारों की लड़ाई को समर्पित है......तुंरत रची गई है सो काव्य सौष्ठव की अपेक्षा ना करें, भाव सौष्ठव देखें,


माँ अब तुम तैयार रहो

बनने के लिए पिता

यकीन करो

तुम उतनी ही जिम्मेदार हो


बहन अब तुम जान लो

हो सकता है रक्षा करनी पड़े

तुम्हे भाई की अपने

क्या तुम तैयार हो ?


गृहस्वामिनी क्या तुम्हे नहीं लगता

कि घर तुम्हारी क्षमताओं के आगे

छोटा पड़ गया है

क्यूँ ना अब सीमाएं तोड़ भागें

दुलारी बेटियों क्यूँ अब तुम्हे

सड़क के मोड़ पर बैठा

कोई दानव करेगा परेशान

उठाओ हाथों को उसे अहसास कराओ

तुम में भी है जान


छोड़ कर दायरों को

तोड़ बंधनों को

अपेक्षाओं से परे

सीमाओं से आगे

तुम्हारा आकाश खिड़की से दीखता

बादल का टुकडा नहीं

वो क्षितिज का कोना है

कोई दुस्वप्न या दुखडा नहीं


उनकी भाषा में उनको जवाब देना

अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है

उन्होंने बहुत मर्दानगी

अब जनानो की बारी है



भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में अडिग कुंवर नारायण



अभी दो दिन के लिए लखनऊ-प्रतापगढ़ और सीतापुर ( तीनो उत्तर प्रदेश ) की २ दिन की तुरत फुरत यात्रा पर था सो दो तीन दिन कोई चिट्ठाकारी नही कर पाया पर कलाकारी और विचारकारी जारी थी( जो अगली पोस्ट में मिलेगा) पर फलहाल तो बात कुंवर नारायण की ( अब मतलब जब सब ही उनके बारे में बतिया रहे हैं तो आप हमको ही काहे घूर रहे हैं, अरे हॉट टापिक ही तो ब्लोगरों का टानिक है ) की जब भी उनको पढ़ा है तो पाया है कि भाषा और उसके अर्थ अनुप्रयोग को लेकर जिस तरह का विचार मंथन उनके भीतर चलता रहा शायद ही किसी के मन में रहा हो। अंततः हमेशा ही वह मंथन कागज़ पर उतरा और हम तक पहुँचा......


एक विशेष बात आज सोचते सोचते याद आई कि हरिवंश राय बच्चन ने भी अंग्रेज़ी से डाक्टरेट की और कुंवर नारायण ने भी अंग्रेज़ी से ही लखनऊ विश्वविद्यालय से परास्नातक.....और दोनों ही हिन्दी भाषा के मामले में बेहद मज़बूत तो इस पर भी सोचें। पर अब ज्ञानपीठ ने उनके काम को माना है तो हम भी उनकी कुछ कवितायें पढ़ें.....


अर्पित हैं


भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में


प्लास्टिक के पेड़
नाइलॉन के फूल
रबर की चिड़ियाँ


टेप पर भूले बिसरे
लोकगीतों की
उदास लड़ियाँ.....


एक पेड़ जब सूखता
सब से पहले सूखते
उसके सब से कोमल हिस्से-
उसके फूल
उसकी पत्तियाँ ।


एक भाषा जब सूखती
शब्द खोने लगते अपना कवित्व
भावों की ताज़गी
विचारों की सत्यता –


बढ़ने लगते लोगों के बीच
अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ ......
सोच में हूँ कि सोच के प्रकरण में
किस तरह कुछ कहा जाय
कि सब का ध्यान उनकी ओर हो
जिनका ध्यान सब की ओर है –


कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में
आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी
जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी
अपनी ज़मीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ ।




शब्दों की तरफ़ से


कभी कभी शब्दों की तरफ़ से भी
दुनिया को देखता हूँ ।


किसी भी शब्द को
एक आतशी शीशे की तरह
जब भी घुमाता हूँ आदमी, चीज़ों या सितारों की ओर
मुझे उसके पीछे
एक अर्थ दिखाई देता
जो उस शब्द से कहीं बड़ा होता है


ऐसे तमाम अर्थों को जब
आपस में इस तरह जोड़ना चाहता हूँ
कि उनके योग से जो भाषा बने
उसमें द्विविधाओं और द्वाभाओं के
सन्देहात्मक क्षितिज न हों, तब-
सरल और स्पष्ट
(कुटिल और क्लिष्ट की विभाषाओं में टूट कर)
अकसर इतनी द्रुतगति से अपने रास्तों को बदलते
कि वहाँ विभाजित स्वार्थों के जाल बिछे दिखते
जहाँ अर्थपूर्ण संधियों को होना चाहिए ।


आदमी का चेहरा




“कुली !” पुकारते ही
कोई मेरे अंदर चौंका ।


एक आदमी आकर खड़ा हो गया मेरे पास
सामान सिर पर लादे
मेरे स्वाभिमान से दस क़दम आगे
बढ़ने लगा वह


जो कितनी ही यात्राओं में
ढ़ो चुका था मेरा सामान
मैंने उसके चेहरे से उसे
कभी नहीं पहचाना


केवल उस नंबर से जाना
जो उसकी लाल कमीज़ पर टँका होता
आज जब अपना सामान ख़ुद उठाया
एक आदमी का चेहरा याद आया


गुरुवार, 20 नवंबर 2008

चुनावी ग़ज़ल

इधर दो तीन दिन से फिर लोग बातें सुनाने लगे थे कि बातें तो बहुत बड़ी बड़ी करते हो और हफ्ता भर होने को है, ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं डाल पाये। शर्म तो आई पर करता क्या, केव्स संचार इतना व्यस्त रखता है कि ताज़ा हवा चलाने को कई बार फुर्सत नहीं मिलती। इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि सामुदायिक हित में लग जाने के बाद अपनी चिंता करने का वक्त कम मिल पाता है। अब इसको इस तरह ना लें कि मैं ब्लोगिंग का कोई बड़ा संत या मठाधीश हूँ पर इतना ज़रूर है कि ताज़ा हवा और केव्स संचार शुरू करते समय दो अलग अलग कसमें खायी थी और फिर एक कसम खाई शम्भू चौधरी जी, शैलेश जी, हिमांशु और अनुपम अग्रवाल जी की महिमा से कि हिन्दी ब्लोगिंग का अपने स्तर पर जितना हो सके बेडागर्क करना है ( कुछ लोग इसे सेवा कह कर ख़ुद को महिमामंडित करते हैं पर ऐसा केवल ब्लोगिंग के महापंडित करते हैं ) ...... जैसा कि श्री श्री श्री समीर लाल जी उर्फ़ उड़नतश्तरी महाराज उवाच कि " कुछ भी लिखो, उद्धार हिन्दी ब्लोगिंग का ही होगा" सो हम सामुदायिक ब्लॉग को अधिक समय देते हैं और नए ब्लॉग को पढने को भी आजकल अधिक समय देते है ( प्रेरणा : श्री महाराज उड़नतश्तरी, सौजन्य: चिट्ठाजगत) इसीलिए ताज़ा हवा को समय कम दे पते हैं,
खैर मुद्दे पर आयें तो एक चुनावी ग़ज़ल लिख मारी है ( अमा चुनावी मौसम है तो वही सूझेगा ना ) बर्दाश्त इनायत होगी !

चुनावी ग़ज़ल

हुए थे लापता कुछ साल पहले, अब हैं लौट आए

वो नेता हैं, कि हाँ फितरत यही है।


हम उनकी राह तक-तक कर बुढाए

हम जनता हैं, कि बस किस्मत यही है।


वो बोले थे, ना हम सा कोई प्यारा

वो भूले, उनकी तो आदत यही है।


बंटी हैं बोतलें, कम्बल बंटे हैं

वो बोले आपकी कीमत यही है।


वो मुस्काते हैं, हम हैं लुटते जाते

कि बस हर बार की आफत यही है।


जो पूछा, अब तलक थे गुम कहाँ तो

वो बोले, बस हुज़ूर फुर्सत यही है।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

आज बाल दिवस है ..... पंडित नेहरू का जन्म दिवस भी तो पेशे खिदमत है अनिल जनविजय की एक कविता.....अनिल जी अनुदित पद्य का पहचाना नाम हैं, इन्होने कई रूसी कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है, शिल्प देख कर यह कविता भी रूसी ही प्रतीत होती है, मुझे अच्छी लगी सो आपके सामने प्रस्तुत है .......

देखा था उसने जवाहर को बचपन में
तब उम्र बहुत सरस थी
तीन-चार बरस की

सफ़ेद चूड़ीदार पाजामा
सिर पर सफ़ेद टोपी थी
छाती पर लाल गुलाब सजा
श्वेत था परिधान पूरा श्वेत अचकन में

तुम भी ऎसे ही बनना--माँ ने कहा
जगा दिया बालक के मन में सपना नया
फिर जिद्दी उस बच्चे ने चाही
वैसी ही पोशाक
अचकन, चूड़ीदार पाजामा,
लाल गुलाब हो साथ

कई बरस बना रहा वह वैसा ही जवाहर
स्वदेश बसा उसके दिल में अब भी
जनता को अपनी वह करता है प्यार
उम्र हुई अब उस बालक की आठ कम पचपन की

अनिल जनविजय

एक अच्छा विचार उठा है मन में कि काश दुनिया में सब बच्चे बन जाते ..... फिर झगडा तो होता पर दुश्मनी नही होती ! इस पर अगली पोस्ट में लिखूंगा और हाँ वो चुनाव वाली रचनाएँ भी.....

बुधवार, 12 नवंबर 2008

आ गए चुनाव !

देश के छः राज्यों में विधानसभा चुनावों की मार काट मची है ...... नेता टाइपलोग एक दूसरे को विशेषणों से नवाजने में लगे हुए हैं........ ऐसी की तैसी हो गई है पर हाँ एक आदमी की इज्ज़त और पूछ बढ़ गई है और वो है आम आदमी या जनता। क्या है कि आम आदमी को अब पता चला है कि वो ख़ास हो चला है.....अमा चुनाव आ गए हैं भाई !

अच्छा इधर पाँच सालों में तो इन देश के कर्णधारों ने जनता की हालत नगर निगम के डंपरों जैसी कर दी है.....जनता घिस घिस कर ऐसी गेंदहो गई है जिसे स्पिनर भी डालने से मना कर देगा और अब नेता जी हाथ जोड़ कर गली गली भटक रहे हैं कि....पर पब्लिक समझदार है कह रही है


तब जो किहिन थे अब वो ना कीजे

अबकी बरस तोहका वोट ना दीजे


अपना भी कुछ लिख रहा हूँ पर अभी पूरा नही हुआ है तो वो अगली पोस्ट में अभी महाकवि श्री श्री श्री अशोक चक्रधर की एक कविता पढ़वा देता हूँ, तो पढ़ें और गुनें



एक नन्हा मेमना और उसकी माँ बकरी,
जा रहे थे जंगल में राह थी संकरी।
अचानक सामने से आ गया एक शेर,
लेकिन अब तो हो चुकी थी बहुत देर।

भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,
बकरी और मेमने की हालत खस्ता।
उधर शेर के कदम धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कापें।
अब तो शेर आ गया एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-जैसे बच्चे को थामने।

छिटककर बोला बकरी का बच्चा
-शेर अंकल!क्या तुम हमें खा जाओगे एकदम कच्चा?
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया।
बोला-हे बकरी - कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
दीर्घायु भव! चिरायु भव!
कर कलरव! हो उत्सव!
साबुत रहें तेरे सब अवयव।
आशीष देता ये पशु-पुंगव-शेर,
कि अब नहीं होगा कोई अंधेर
उछलो, कूदो, नाचो और जियो हँसते-हँसते
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
बेटा ताज्जुब है,
भला ये शेर किसी पर रहम खानेवाला है,
लगता है जंगल में चुनाव आनेवाला है।

अशोक चक्रधर

मज़ा आया ना पढ़कर (वैसे देश भी धीरे धीरे जंगल होता जा रहा है, जंगली जो राज कर रहे हैं) ...... अगली पोस्ट का इंतज़ार करें पर हाँ वोट डालने जरूर जायें.....ये आपका अधिकार और कर्तव्य दोनों है !

शनिवार, 8 नवंबर 2008

लेकिन मेरा लावारिस दिल

एक बार पहले भी आप सबको डॉक्टर राही मासूम रज़ा की कृतियाँ पढ़वा चुका हूँ.....हिंदू मुस्लिम के विकट विषय पर इन्होने बहुत लिखा और नश्तरी लिखा .....इतना नश्तरी कि धर्म के ठेकेदारों के दिलो पर घाव कर डाले; फिलहाल मुल्क के अभी के माहौल पर पेश ऐ खिदमत है ,

लेकिन मेरा लावारिस दिल

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

लेकिन मेरा लावारिस दिल

अब जिस की जंबील में

कोई ख़्वाब कोई ताबीर नहीं है

मुस्तकबिल की रोशन रोशन

एक भी तस्वीर नहीं है

बोल ए इंसान, ये दिल,

ये मेरा दिल ये लावारिस,

ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल

आख़िर किसके नाम का निकला

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

बन्दा किसके काम का निकला

ये मेरा दिल है या मेरे ख़्वाबों का मकतल

चारों तरफ बस ख़ून और आँसू,

चीख़ें, शोले घायल गुड़िया

खुली हुई मुर्दा आँखों से

कुछ दरवाज़े ख़ून में लिथड़े

कमसिन कुरते

एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल

जगह-जगह से मसकी साड़ी

शर्मिन्दा नंगी शलवारें

दीवारों से चिपकी बिंदी सहमी चूड़ी

दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें

ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत

ए श्रीराम, रघुपति राघव,

ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम ये आपकी दौलत

आप सम्हालें मैं बेबस हूँ

आग और ख़ून के इस दलदल में

मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।

राही मासूम रज़ा

शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

पानी में चंदा और चंदा पर आदमी .....

कई साल पहले अपनी हिन्दी की उत्तर प्रदेश बोर्ड की पाठ्य पुस्तक में एक निबंध पढा था, पानी में चंदा - चंदा पर आदमी। आज जब हम ख़ुद चाँद पर पहुँच गए हैं तो सहसा वो निबंध याद आ गया.....खुशी हुई पर २ मिनट बाद ही अपने वो भाई याद आ गए जो उस रात भी भूखे सोये और शायद आज रात भी..... सारी खुशी काफूर हो गई जब देखा कि किस तरह राज ठाकरे के किराये के बदमाश मुंबई की सडकों पर आतंक फैला रहे थे और संसद में हमारे कर्णधार कि तरह बेशर्मी से बर्ताव कर रहे थे ..... क्या वाकई हम चाँद पर पहुँचने लायक हैं ? क्या वाकई भूखे लोगों के देश में चांद्रयान उपलब्धि है ?

तब लगा कि वाकई आज भी मुल्क के आधे से ज्यादा लोगों के लिए चाँद केवल एक सपना है जिसे पानी में ही पास से परछाई देख कर महसूस किया जा सकता है.....पाया नहीं जा सकता है ! तब अचानक चल उठी कलम और निकल पड़ी एक कविता जो ऑफिस में एक बेकार पड़े पन्ने पर लिखी गई......

पानी में चंदा और चंदा पर आदमी .....

भूख जब सर चकराती है

बेबसी आंखों में उतर आती है

बड़ी इमारतों के पीछे खड़े होते हैं जब

रोजी रोटी के सवाल

तब एक गोल चाक चौबंद इमारत में

कुछ बहुरूपिये मचाते बवाल

गिरते सेंसेक्स की

ख़बरों में दबे

आम आदमी की आह

देख कर मल्टीप्लेक्स के परदे पर

मुंह से निकालते वाह

सड़क पर भूखे बच्चों की

निगाह बचाकर

कुत्तों को रोटी पहुंचाती समाजसेवी

पेज थ्री की शान

आधुनिक देवी

रोटी के लिए कलपते

कई करोड़ लोगों का शोर

धुंधला पड़ता धुँआधार डी जे की धमक में

ज्यों बढो शहर के उस छोर

तरक्की वाकई ज़बरदस्त है

नाईट लाइफ मस्त है

विकास की उड़ान में

जा पहुंचे चाँद पर

पर करोड़ो आंखों में नमी

पानी में चन्दा और

चन्दा पर आदमी

मयंक ...............

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

आज फिर .....

आज करवाचौथ है......पुरूष प्रधान व्यवस्था का एक और पर्व ! सुशोभित करते रहे इसे पति पत्नी के पर्व के रूप में पर यही सामंत वाद है किक्यो नही पति के व्रत करने की भी प्रथा चलाई गई ?
क्या लम्बी उम्र की ज़रूरत केवल पुरूष को है ?

एक कविता जो मन में बचपन से मचलती रही, कागज़ पर आज आ पायी है ! स्वीकारें

आज फिर माँ

सुबह से भूखी है

और हमारी दिनचर्या

वैसी ही है

आज फिर भाभी

रात तक

पानी भी नहीं पीने वाली हैं

भइया चिल्ला कर

पूछते हैं

क्यों मेरी चाय बना ली है ?

आज फिर दीदी

व्रत रखेंगी

जीजाजी की

लम्बी उम्र के लिए

उनको खांसते खांसते

तीन महीने हुए

सुहागन मरने की

दुआएं करती

आज फिर नानी

अस्पताल में

भूखी हैं

बीमारी के हाल में

आज फिर दादी

सुना रही हैं बहुओं को

करवाचौथ की व्रत कथा

बहुएं भूखी प्यासी हैं

सुबह से

सुनती हैं मन से यथा

आज फिर पत्नी

खाने के लिए

पति का

मुंह देखेगी पहले

आज फिर पति

का दिन

वैसे ही बीता

दफ्तर में

चाय पर चाय पीता

आज फिर बिटिया

को बाज़ार से

दिला लाया टाफी

सोचा जी लो ज़िन्दगी

तुम्हारे करवाचौथ में

वक़्त है काफ़ी

मयंक सक्सेना

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

बाढ़ और अकाल

क्षमा चाहूँगा की पिछले तीन चार दिन से ताज़ा हवा पर कुछ ताज़ा नहीं ला पाया ...... अब क्या किया जाए कमबख्त न्यूज़ चैनल की नौकरी होती ही ऐसी है की वक्त हो ता कटता नहीं और जब न हो तो खाना सोना मुहाल !

खैर अभी बिहार में बाढ़ और कुछ दूसरे राज्यों में अकाल के हालत की चर्चा हुई और फिर आज सुबह मेरे लिहाज से देश के सबसे बौद्धिक और स्तरीय चैनल लोकसभा टीवी पर बिहार की बाढ़ पर एक संजीदा कार्यक्रम देखा। कार्यक्रम के अंत में बाबा नागार्जुन की एक कविता थी जो काफ़ी पहले सुनी थी याद आ गई। सोचा आज आपके सामने वही पेश कर दूँ, नागार्जुन के स्वभाव के अनुसार कविता सच्चाई का सच्चाई से बयान है......बाढ़ और अकाल दोनों पर सटीक बैठने लायक है पर मूलतः अकाल पर लिखी गई है .......


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।



दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।


-नागार्जुन


बुधवार, 8 अक्तूबर 2008

नन्ही पुजारन

संकट का वक्त सा दीखता है यह जब मुल्क के तमाम धर्म के ठेकेदारों को आम आदमी को बरगलाते देखता हूँ......कमोबेश पूरे मुल्क का यही हाल है। इन दिनों ब्लॉग जगत में भी कट्टरपंथ की आंधी आई हुई है.....अब लोग लेखक या पत्रकार होने के बजाय हिंदू और मुसलमान हो रहे हैं और ब्लॉग के नाम भी धर्म का कच्चा रंग छोड़ रहे हैं। हालत ऐसे हैं कि ना तो बैठ कर रोने का वक्त बचा है, ना ही सोचने की हमें तमीज रह गई है। मुल्क में भुखमरी, बाढ़ और आतंकवाद के सवालों पर मज़हबी जवाब भारी पड़ रहे हैं। कट्टरपंथ पूरा फन फैलाए खडा है और डसने को तैयार है...... ऐसे में क्या किया जाए ये दुविधा है....क्या वाकई धर्म जनता की अफीम है ?

हाल ही में मशहूर शायर मजाज़ लखनवी की एक नज़्म हाथ लगी सोचा उसे आपके नज़्र कर दूँ ....... शायद पत्थर दिल कुछ पिघलें ( पर उसके लिए भाव समझना होगा, जो शायद हमारी अब आदत नहीं रही !)

नन्ही पुजारन



इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन, पतली बाहें, पतली गर्दन।

भोर भये मन्दिर आयी है, आई नहीं है माँ लायी है।

वक्त से पहले जाग उठी है, नींद भी आँखों में भरी है।

ठोडी तक लट आयी हुई है, यूँही सी लहराई हुई है।

आँखों में तारों की चमक है, मुखडे पे चाँदी की झलक है।

कैसी सुन्दर है क्या कहिए, नन्ही सी एक सीता कहिए।


धूप चढे तारा चमका है, पत्थर पर एक फूल खिला है।

चाँद का टुकडा, फूल की डाली, कमसिन सीधी भोली-भाली।


कान में चाँदी की बाली है, हाथ में पीतल की थाली है।

दिल में लेकिन ध्यान नहीं है, पूजा का कुछ ज्ञान नहीं है।


कैसी भोली और सीधी है, मन्दिर की छत देख रही है।

माँ बढकर चुटकी लेती है, चुप चुप सी वो हँस देती है।


हँसना रोना उसका मजहब, उसको पूजा से क्या मतलब।

खुद तो आई है मन्दिर में, मन में उसका है गुडया घर में।


- मजाज़ लखनवी

शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

इक शमा और जला लूँ

हिन्दी भाषा के ब्लॉग क्रान्ति के आन्दोलन में एक और क्रांतिकारी शामिल हो गया है......क्रान्ति इस सन्दर्भ में की ब्लॉग ने हिन्दी जगत में ग़दर मचा दिया है और क्रांतिकारी वह हर व्यक्ति जो ग़दर मचाना चाहता है ! फिलहाल ग़दर में न फंस कर मुद्दे पर आते हैं तो एक नया ब्लॉगर आप सबके बीच आ गया है और उनका परिचय कराता हूँ आपसे ......ये हैं अनुपम अग्रवाल जी। लखनऊ के रहने वाले अनुपम जी पेशे से इंजिनियर है और फिलहाल विद्युत् अभियंता के रूप में उत्तर प्रदेश के अनपरा प्लांट में कार्यरत हैं।

खाली समय में शानदार कवितायें और ग़ज़ल लिखने वाले अनुपम जी के ब्लॉग पर पहली ग़ज़ल एक बानगी भर है......

प्यास महफ़िल की बुझा लूँ तो कहीं और चलूँ

इक शमा और जला लूँ तो कहीं और चलूँ

सबसे बड़ी बात है की जब लोग आराम करने की सोचते हैं उस वयमें अनुपम जी कंप्यूटर से खेल रहे हैं और ब्लॉग्गिंग शुरू की है....... तो देखा जवानी तब तक है जब तक आप उसे महसूस करें.....

तो अनुपम जी का ब्लॉग देखें ....... नाम है ..............ज़िन्दगी

www.aapkesamne.blogspot.com

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

अदम गोंडवी की ये ग़ज़ल

ये दौर मुल्क के लिए मुश्किलों का दौर है.....भरोसा दोनों ओर का टूटा है और हालत रोज़ बा रोज़ बदसे बदतर होते जा रहे हैं ! ऐसे में अचानक आज शायर / कवि अदम गोंडवी की ये ग़ज़ल हाथ लगी तो सोचा ये सवा शेर आपकी नज़र कर दूँ ......तो पढ़ें और गुनें !

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

कुछ और चिट्ठियां

सप्ताह भर भगत सिंह की सालगिरह मना रहे ताज़ा हवा पर आज थोड़ा देर से सही पर एक पोस्ट ले ही आया हूँ ...... आज पेश हैं भगत सिंह के कुछ व्यक्तिगत पात्र जो उन्होंने अपने परिवार को लिखे थे। इन पत्रों में झलक मिलती है की जूनून क्या होता है और उनमे वो किस हद तक भरा था !

पढ़ें

शादी से इनकार के लिए पिताको पत्र

पूज्य पिता जी,

नमस्ते।

मेरी जिन्दगी मकसदे आला यानी आजादी-ए-हिन्द के असूल के लिए वक्फ हो चुकी है। इसलिए मेरी जिन्दगी में आराम और दुनियावी खाहशात बायसे किशश नहीं है।

आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हू।

आपका ताबेदारभगतसिंह

छोटे भाई कुलतार को अन्तिम पत्र

सेण्ट्रल जेल,

3 मार्च,1931

प्यारे कुलतार,

आज तुम्हारी आ¡खों में आसू देखकर बहुत दुख पहु¡चा। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था। तुम्हारे आ¡सू मुझसे सहन नहीं होते। बरखुरदार, हिम्मत से विद्या प्राप्त करना और स्वास्थ्य का ध्यान रखना। हौसला रखना, और क्या कहू-

उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे-जफ़ा क्या है,

हमें यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।

दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,

सारा जहा अदू सही, आओ मुक़ाबला करें।

कोई दम का मेहमा हू ऐ अहले-महिफ़ल,

चराग़े- सहर हू¡ बुझा चाहता हू।

हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,

ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे।

अच्छा रूख़सत।

खुश रहो अहले-वतन, हम तो स़फर करते हैं।

हिम्मत से रहना।

नमस्ते।

तुम्हारा भाई,

भगतसिंह

पढ़ें और एक बार फिर की अब सोचना शुरू करें .......

रविवार, 28 सितंबर 2008

भगत सिंह की माँ की अपील ....

यह पर्चा भगत सिंह की माँ का संदेश है आम अवाम के नाम ...... यह दुर्लभ पर्चा भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद उनके मुकदमे के दौरान छपे थे। इस पर्चे में उनकी माँ विद्यावती ने उनके स्वभाव और देश के प्रति उनके जूनून को नवयुवकों के सामने रखा है। पाल प्रेस, लुधिआना से छपे इन पर्चों में भगत सिंह की माता के हस्ताक्षर हैं और युवक केन्द्र, खटकर कलां गाँव, जालंधर का पता है....इसे पढ़कर यह समझ में आएगा की किसी व्यक्ति का भविष्य का जीवन उसके परिवार और संस्कारों से भी काफ़ी प्रभावित होता है। इसे पढ़ें....

अंत में एक बार फिर ...... सोचना शुरू करें !

भगत सिंह......




२८ सितम्बर ..... शहीद ऐ आज़म भगत सिंह की आज जन्मतिथि है......नहीं मालूम कितने लोगों को पता है पर कल यश चोपडा का जन्मदिन था और अखबार-टीवी और पोर्टल अटे पड़े थे। आज लता मंगेशकर का जन्मदिन है आज भी यही हाल है ......या तो हम सो रहे हैं या हम सब बेहोशी में हैं पर यह जो भी है इसे दूर करना होगा।
भगत सिंह की पैदाइश २८ सितम्बर, १९०७ को आज के पाकिस्तान के लायलपुर जिले के बंगा में चक नंबर १०५ में हुआ जबकि उनका पुश्तैनी घर आज भी भारतीय पंजाब के नवाशहर के खट्टरकलां गाँवमें है। भगत सिंह ने क्या कुछ किया वह शायद हम सब जानते हैं पर शायद उनको याद करने की ज़हमत उठाना हम गवारा नहीं कर सकते हैं। उनकी जयंती के अवसर पर ताज़ा हवा उनको याद करते हुए उनकी कुछ स्मृतियाँ आपसे बांटेगा और यही नही ताज़ा हवा (http://www.taazahavaa.blogspot.com/) इस पूरे हफ्ते भगत सिंह के दुर्लभ पात्र और किस्से आपसे बांटेगा ............


आख़िरी पैगाम

यह वो आखिरी ख़त है जो भगत सिंह ने २२ मार्च १९३१ को यानि की फांसी के एक दिन पहले अपने साथियों को लिखा था ..........

22 मार्च,1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह

फिर यही कहूँगा ........ अब सोचना शुरू कर दें !

शनिवार, 27 सितंबर 2008

आतंक का फिर हमला


देश के दिल दिल्ली अब दिल की मरीज़ हो चली है। आज दोपहर २:१५ से २:३० के बीच दिल्ली के पुराने और मशहूर इलाके महरौली में दो संदिग्ध विस्फोट हुए जिसमे अब तक प्राप्त सूचनाओं के अनुसार ४-५ लोगों की मौत हो चुकी है जबकि असली आंकडा अभी आना बाकी है। ज्ञात हो कि कुतुबमीनार के लिए मशहूर इलाके महरौली के फूल बाज़ार के इलाके में यह धमाका हुआ। यह धमाके इस मायने में खतरनाक संकेत देते हैं कि पुलिस और सरकार ने पिछली १३ सितम्बर को हुए धमाको के बाद बड़े बड़े दावे कर डाले थे। हाल ही में आतंकियों ने अनेक ई मेल भी की जिनमे तमाम तरह की धमकियां दी गई और पुलिस ने सतर्कता भी बढ़ा दी पर नतीजे सिफर ही रहे और आज फिर ये घटना हुई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार स्कूटर सवार दो युवकों ने एक झोले में यह विस्फोटक फूल बाज़ार की सड़क पर फेंका और वहाँ से चले गए, उनको लोगों ने यह कह कर आवाज़ भी दी कि शायद उनका कोई सामान गिर गया हो पर जब तक लोग कुछ समझ पाते ...... चारों तरफ़ लाशें, घायल और खून बिखरा पड़ा था। बताया जाता है कि उस बैग को एक बच्चे ने उठाया और उसके साथ ही उस बैग में धमाका हो गया और उस बच्चे के चीथड़े उड़ गए। अभी तक ४ लोगों की मौत की ख़बर है जिसमे दो बच्चे हैं।
सवाल आतंकियों से है जो अपने आपको दहशतगर्द की जगह मुजाहिद्दीन कहते हैं ..... कि धर्म की लड़ाई में बेगुनाहों की जान लेने पर क्या कोई धर्म माफ़ करता है ?
सवाल सरकार से है जो शायद सुरक्षा से ज्यादा मुआवजा देने में तत्परता दिखाती है......कि आख़िर उसकी कोई जवाबदेही है या नहीं ?
सवाल हम सबसे है कि हम अपने समाज और अपने मुल्क को लेकर कितने संवेदनशील हैं ....... क्या अब हमें सड़कों पर नहीं उतर आना चाहिए ?
दुष्यंत कुमार ने जैसा कहा....
पक चुकी हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं


अब वक़्त आ गया है कि हम सोचना शुरू करें ...... नेताओं से उम्मीद ना करें, अपने अपने स्तर पर आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखें....सडकों पर तमाशबीन बनने की जगह सडको पर जुटना शुरू करें ...... ???

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

बीच की दीवार



हाल ही के धमाकों के बाद मुल्क में जिस तरह का माहौल बना है उस पर सोचना होगा। एक बार फिर हम धार्मिक पहचान के आधार पर होने वाले मामलों में उलझ रहे हैं और हिन्दू-मुस्लिम होने के कारण संदेहों में फंसे हैं। यही नहीं एक क्षेत्र विशेष के कुछ लोगों के इन दिल्ली धमाकों में शामिल पाये जाने से उस इलाके को भी बदनाम किया जा रहा है.......मुल्क में दोबारा मज़हबी शक और वैमनस्य का माहौल बनने लगा है। ऐसे में एक कहानी हाथ लगी जो शायद कुछ मदद कर पाए.....मेरी तो की, आप भी पढ़ें !


ये एक उर्दू कहानी है, जिसे गयासुर्रह्मान ने लिखा है और इसका हिन्दी अनुवाद किया है नसीम अजीजी ने .......


बीच की दीवार


पूरे दस दिन हो गए थे। फ़साद की आग जो भड़की तो बुझने का नाम नहीं लेती थी। सारे शहर में सख्त कर्प्यू के बावजूद वारदातें हो रही थीं। पूरी दस रातें आंखों में गुजर गईं। इस क़दर शोर-शराबे में नींद किसको आती है? फिर हर वक्त ये डर कि कहीं फ़सादी हमला न कर दें। यों तो पहले ही सब कुछ लुट चुका है लेकिन जान सबको प्यारी होती है और उससे भी प्यारी औलाद।मशकूर अली और उनकी बेगम, अपनी दो बेटियों को गले लगाए बारगाहे-इलाही में दुआएं करते रहते थे कि ''खुदाया इन मासूम बच्चियों पर कोई आंच न आये, चाहे हमारी चिक्का बोटी कर दी जाये।''बड़ी लड़की राशिदा हाई स्कूल पास करके इंटर में दाख़िल हुई तो अचानक ही उस पर ऐसा निखार आया कि पूरे मुहल्ले की नज़रों में समा गई। कॉलेज के मनचले हसरत भरी निगाहों से देखने लगे। आस-पास क्या, दूरदराज़ से भी कई पैग़ाम आने लगे लेकिन मशकूर अली ये कहकर इंकार कर देते कि ''अभी बच्ची पढ़ रही है और मैं इसको आला तालीम दिलवाना चाहता हूं। खुदा ने बेटा नहीं दिया तो क्या, ये मेरी बेटियां ही बेटों से बेहतर हैं।''लेकिन राशिदा की जवानी ने मां-बाप की आंखों से नींद छीन ली थी और दिन-ब-दिन एक अजीब सा इज़्तेराब बढ़ता जा रहा था और पिछले दस रोज़ से तो वो सिर्फ राशिदा की फिक्र में इतने परेशान थे कि कोई मौत से भी इतना परेशान न होगा। वैसे कई बार मशकूर अली ने अपनी दो नाली बंदूक निकाल कर उसकी सफाई की थी और पुराने करातूस को धूप दिखाई थी। वो रोजाना कारतूस गिन-गिन कर रखते थे। कुल नौ कारतूस थे।
उन्होंने अच्छी तरह सोच रखा था कि अगर फ़सादी आते हैं, पहले तो सद्र दरवाज़ा ही आसानी से नहीं टूट सकेगा। अगर दरवाज़ा टूट भी जाता है और वो अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो मशकूर अली राशिदा को अपने साथ ही रखेंगे। जहां तक हो सका आठ कारतूसों से फसादियों का मुकाबला करेंगे और नवां कारतूस राशिदा की इज्जत बचाने के लिए काफी होगा लेकिन आज उन्हें राशिदा की कम और अपनी छोटी बेटी सुगरा की ज्यादा फिक्र थी। सुग़रा सात-आठ साल की थी और अपनी तोतली जबान में इतनी प्यारी बातें करती थी कि सभी उसके गरवीदा थे। पिछले तीन दिन से वो बुखार में मुब्तला थी। दवाई तो दरकिनार, खाने के लिए एक दाना भी बाकी न था।मशकूर अली हमेशा ज़ख़ीरा अंदोजी के ख़िलाफ़ थे और कभी उन्होंने मुस्तक्बिल की फिक्र न की थी लेकिन अब पछता रहे थे।'' काश पहले ही एक आध बोरी आटा या चावल वैगरह जमा कर लेता तो आज ये नौबत न आती।'' उस कर्फ्यू में बिजली और पानी का निजाम दरहम-बरहम हो गया था। अब तो पीने का पानी भी बमुश्किल तमाम फराहम हो पा रहा था और फिर रह-रह कर सुग़रा का दिलदोज़ अंदाज़ के साथ खाना मांगना उन्हें बेचैन कर रहा था। आज तक उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए थे। जमींदारी खत्म हुई, जायेदाद के बंटवारे हुए। मशकूर अली के हिस्से में ये पुराना मकान और चार छोटी-छोटी दुकानें आईं, जिनका बरायेनाम किराया ही उनका जरिय-ए-गुज़र औक़ात था। उन्होंने इसी पर इक्तेफ़ा किया, लेकिन अपने भाइयों में सबसे बड़े होने के नाते उन्होंने जिद करके अपने बुजुर्गों की निशानी ये दो-नाली बंदूक अपने कब्जे में कर ली थी। कितने ही उतार-चढ़ाव आये, एक-एक करके घर की सभी क़ीमती चीजें सस्ते दामों में बिक गई। फाकों तक की नौबत आई लेकिन उन्हें अपने आबाई शानो शाकत की निशानी उस दो नाली बंदूक को बेचने का ख्याल भी नहीं, मगर आज वो अपनी सुग़रा की भूख की खातिर अपनी जान भी बेचने को तैयार थे। वो फ़कीरों की तरह भीख मांग कर भी अपनी बच्ची का पेट भरना चाहते थे लेकिन बाहर निकलना मुमकिन न था। कर्फ्यू ने सख्त शक्ल अख्तियार कर ली थी, देखते ही गोली मार देने के अहकामात जारी हो गए थे। बाहर पुलिस की जीप गुजरती और लाउडस्पीकर पर यही ऐलान करती कि कोई भी घर से बाहर न निकले।


आस-पड़ोस में सभी हिंदुओं के मकान थे। यों तो उनके ताल्लुकात सभी से अच्छे थे लेकिन इस फ़साद ने तो दिलों में दरारें पैदा कर दी थीं, किस पर एतबार किया जाय? उनके घर की दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल रहते थे। उनकी बच्ची भी सुग़रा के साथ एक ही स्कूल में पढ़ती थी। दोनों में इस क़दर दोस्ती थी कि एक दूसरे के बगैर एक पल भी रहना गंवारा न था। ऊषा की गुड़िया और सुग़रा का गुड्डा, जिनकी कई बार शादी रचाई गई थी, आज अलग-अलग थे। ऊषा उधर रो-रो कर सुग़रा के घर जाने की जिद कर रही थी लेकिन पंडित रतनलाल खतरा महसूस कर रहे थे। ''मशकूर अली मुसलमान है, वैसे तो वो भला आदमी है लेकिन दंगे में तो सारे मुसल्ले एक जैसे हो जाते हैं। नारा-ए-तकबीर की आवाज़ कान में पड़ते ही आपे से बाहर हो जाते हैं। मैं अपनी बेटी को उसके घर भेजूं और वो उसका गला दबा दे तो क्या होगा?''वो अपनी बेटी को बहुत समझाते लेकिन उसकी जिद बढ़ती ही जा रही थी। उधर सुग़रा की हालत ग़ैर हो रही थी। मशकूर अली की बेगम और राशिदा रोने लगीं। मशकूर अली उन्हें दिलासा तो दे रहे थे लेकिन खुद उनकी आवाज़ भी भर आई थी और आंखें डबडबाने लगीं। वो कुछ कहना ही चाहते थे कि अचानक उनकी दीवार पर आहट हुई। रात काफी हो चुकी थी। कोई उनके घर की दीवार तोड़ रहा था। दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल का मकान था। मशकूर अली ने अपनी बंदूक कस के पक़ड़ ली। उसमें कारतूस भर दिए और खतरे से निपटने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने बेगम से कहा कि वो सुग़रा को लेकर दूसरे कमरे में चली जायं और राशिदा को अपने साथ रहने का हुक्म दिया। वो दिल ही दिल में बड़बड़ाए, '' मुझे रतनलाल से ऐसी उम्मीद न थी कि वो फसादियों को अपने घर से मेरे घर में दाखिल करेगा। वैसे तो बड़ा प्यार जताता था लेकिन आज उसने अपना कमीनापन दिखा ही दिया।''मशकूर अली ने मुस्तहकम इरादा कर दिया कि फ़सादियों के अंदर घुसते ही वो गोली चला देंगे चाहे उनमें रतनलाल ही क्यों नो हो, जब उसको दोस्ती का एहसास नहीं है तो मैं क्यों हिचकिचाऊं।दीवार के पीछे से कुदाल की ज़र्बें लग रही थीं और हर ज़र्ब के साथ मशकूर अली के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, राशिदा उनके पीछे सहमी हुई, ज़ख्मी फ़ाख़्ता की तरह कांप रही थी--''पुराने ज़माने की दीवार इतनी आसानी से नहीं गिरेगी''---एक जगह से चूना उखड़ना शुरू हुआ। मशकूर अली दीवार के बिल्कुल करीब आ गए। बहुत देर के बाद दीवार की एक ईंट घऱ में गिरी और आर-पार एक सुराख हो गया। मशकूर अली ने ललकार कर कहा--''खबरदार! अगर किसी ने अंदर घुसने की कोशिश की तो गोली चला दूंगा।'' और उन्होंने बंदूक की नाल ईंट से निकले हुए सूराख पर लगा दी लेकिन दूसरे ही लम्हे ऊषा की आवाज़ ने चौंका दिया।''मशकूर चाचा, मैं सुग़रा के लिए खाना लाई हूं।'' और उसने सूराख से एक छोटा सा टिफिन अंदर की तरफ बढ़ा दिया।



नोट: हमें सोचना पड़ेगा अब .......सबको मज़हब से ऊपर उठ कर

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

मकडियां

सन्नाटे के शोर से
कानो को पकड़
दांतों को भींचता
सामने के
भयानक दृश्य
देख न पाने की हालत में
आंखों को मींचता
इधर उधर
हर तरफ़ ....
जहाँ देखो
या न देखो
सब कहीं झूठ ....
धोखा
लोग होते जाते
और और और
मक्कार
सब हैं अय्यार
अंधेरे में
पूरे बदन पर
रेंगती हैं फंसाने को
शिकार बनाने को
जाल बुनती हैं
हजारों मकडियां
दरो दीवारों पर ......
दिलो की दीवारों पर !

रविवार, 14 सितंबर 2008

हिंदी को आजादी चाहिए

हिन्दी फिल्मो के मशहूर लेखक और गीतकार हैं प्रसून जोशी। प्रसून जी कभी पेशे से एड गुरु हुआ करते थे पर मन से हमेशा थे साहित्यकार तो आखिरकार सब्र नहीं कर पाये और कूद ही गए सक्रिय लेखन में। प्रसून शानदार कवि हैं और इसका दर्शन हमें उनके फिल्मी गीतों में भी हो जाता है। आँधियों से झगड़ रही है लौ मेरी ...अब मशालों सी बढ़ रही है लौ मेरी ! जैसी पंक्तियाँ लिखने वाले प्रसून जोशी ने हाल ही में दैनिक भास्कर के लिए हिन्दी पर एक आलेख लिखा जो आज हिन्दी दिवस के अवसर पर आपके लिए भास्कर से साभार प्रस्तुत है,

हिंदी को आजादी चाहिए


प्रसून जोशी


भाषा कोई भी हो, वह अपनी जमीन से उपजती और पनपती है, इसलिए कोई लाख चाहे भी तो उसका रिश्ता उस जमीन से तोड़ नहीं सकता। भाषा को लेकर आज तक जितने भी विवाद हुए हैं, उसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं रहा है। कुछ स्वार्थी तत्वों का हित-साधन उससे जरूर हो जाता है। भाषा का उससे न कुछ बनता है, न बिगड़ता है। जहां तक हिंदी की बात है, वह खुद इतनी सक्षम और सशक्त है कि अपना पालन-पोषण जीवंत तरीके से कर रही है। हर भाषा समय के साथ अपना रूप-रंग बदलती रहती है। इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने मूल रूप से च्युत हो रही है। दरअसल उसकी आत्मा नहीं बदलती है। हिंदी को खुद खिलने और खेलने की आजादी मिलनी चाहिए।


हिंदी तो सतत प्रवाहित धारा है। धारा जरूरी नहीं कि सीधी ही चले, आड़ी-तिरछी भी चलेगी। उसे उसी रूप में बहने नहीं दिया गया, तो उसके साथ अन्याय होगा। हिंदी का विकास कभी नहीं रुका, सिर्फ जगह-जगह रूप बदल रहा है। जब मैं उत्तर भारत में था तो मुझे लगता था कि जो हिंदी वहां बोली जा रही है, वही सही हिंदी है। जब मैं मुंबई आया तो पाया कि हिंदी तो यहां भी है, मगर उसमें कुछ टपोरीपन और मस्ती मिली हुई है। उसे ही हर कोई सुनता और बोलता है। किसी को कोई परेशानी भी नहीं होती। इसका मतलब यह नहीं कि हिंदी विकृत हो गई। हां, यह जरूर लगा कि व्याकरण यहां मजबूर हो गया है। भाषा-शुध्दि की आवश्यकता है। मगर यह शुध्दिकरण अभियान कहां-कहां चलाएंगे? इसलिए भाषा को अपनी राह पर चलते रहने की आजादी चाहिए, जो अंतत: समृध्दि ही देगी।


हमें अंग्रेजी से कुछ सीखने की जरूरत है। उसकी समृध्दि का राज सभी जानते हैं कि वह जहां गई है, वहीं की हो गई। भारत, स्पेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया में अंग्रेजी को अलग-अलग ढंग से बोला जाता है, क्योंकि वहां की स्थानीय बोलियां उसमें शामिल हो जाती हैं। आंचलिक भाषाओं ने अंग्रेजी को इतना कुछ दे दिया है कि अंग्रेजी ऋणी हो गई है। भारत में भी लगभग सारी भाषाओं के शब्द अंग्रेजी में घुल-मिल रहे हैं। इस मामले में हिंदी पिछड़ रही है। हिंदी के तथाकथित अलमबरदारों ने इसे अपनी ही सीमा में देखने और रखने का मानो संकल्प ले लिया है, लेकिन क्या किसी के रोके हिंदी का विकास रुक रहा है? अगर रुकना होता तो हिंदी के इतने सारे टीवी चैनल नहीं आए होते! और भी दर्जनों चैनल आने वाले हैं। हिंदी के अखबारों के संस्करणों में लगातार वृध्दि हो रही है। पाठकों की संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।


टीवी सीरियल्स और हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता और मांग में इजाफा ही हो रहा है। आज के जितने सफल विज्ञापन हिट हैं, वे सारे के सारे लगभग हिंदी में ही हैं। विज्ञापनों में 'कैच लाइन' का बहुत महत्व है, हिंदी में ज्यादा चर्चित हैं। वह चाहे 'ठंडा मतलब...', 'सबका ठंडा एक...', 'दोबारा मत पूछना...', 'पीयो सर उठा के...' हो या फिर 'ज्यादा सफेदी...' हो- हिंदी के सारे कैच लाइन मुहावरे की तरह प्रचलित हो रहे हैं। हिंदीभाषियों को और भी उदार होने की जरूरत है। हृदय विशाल हो जाए तो सीमा-रेखा अपने आप मिट जाएगी। सभी भाषाओं और बोलियों का सहयोग लेना चाहिए। अंग्रेजी के साथ भी जीने की आदत डालनी चाहिए, इसलिए मेरा मानना है कि भाषा के कपाट को कभी बंद नहीं रखना चाहिए। उसका खुला रहना सुखकर और समृध्दिकर है।


कोई कैसे बोलेगा और कोई कैसे- इसे समस्या नहीं समझना चाहिए। हिंदी बोलने की आदत अगर कोई डाल रहा है तो यह अच्छी बात है। गैर-हिंदीभाषी ही क्यों, हिंदीभाषी भी अशुध्द बोलते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि वे हिंदी को बिगाड़ रहे हैं। इसे इस तरह कहना चाहिए कि वे बोलकर भाषा को सीखने और शुध्द करने का प्रयास कर रहे हैं। यह उनकी मुख्यधारा(हिंदी) में शामिल होने की इच्छा है। गाना सबका स्वभाव होता है। कोई अच्छा गाता है और कोई बुरा। बुरा गाने वालों का लगाव गीतों से उतना ही है, जितना अच्छा गाने वालों का। फर्क इतना ही है कि किसी का सुर अच्छा लगता है और किसी का बुरा। गानों की तरह भाषा पर सबकी पकड़ एक जैसी हो, संभव नहीं है।


हिंदी के हितैषी पता नहीं क्यों, इसे लेकर इतना बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं! हम यह क्यों नहीं मानते कि सबका बौध्दिक स्तर एक जैसा नहीं होता? कोई भाषा और व्याकरण के मामले में कमजोर होता है और कोई परिष्कृत शब्दों का इस्तेमाल करता है। इसके बावजूद दोनों में संवाद होना चाहिए। इससे दोनों में समृध्दि आएगी। जिम्मेदारी भी महसूस होगी। हां, यह बात सही है कि आजकल फिल्मों की स्क्रिप्ट रोमन लिपि में लिखी जाती है, मगर इससे क्या फर्क पड़ता है। अंतत: पर्दे पर तो वह हिंदी ही बनकर आती है। इसे अंग्रेजीदां की जिद नहीं कह सकते। संभव है उन्हें अच्छी हिंदी बोलनी आती हो, मगर पढ़नी नहीं। सीधे हिंदी पढ़ने के बाद जो भाव आता है, संभव है वह रोमन से नहीं आता हो, मगर यह काम निर्देशक का है कि संवाद के अनुसार एक्सप्रेशन या इमोशन कैसे लाया जाए! जहां तक फिल्म, टीवी, एड मीडिया में अंग्रेजी स्कूलों से पढ़े लोगों के आने की बात है, इसमें हिंदी को खुश होना चाहिए कि उन्हें हिंदी ही आश्रय दे रही है। वे अंग्रेजी में भले योजना बनाते हों, स्क्रिप्ट भी अंग्रेजी में मांगते हों, सेट पर पूरा माहौल अंग्रेजीनुमा हो, मगर कलाकारों को जब डायलॉग बोलने की बारी आएगी तो क्या बोलेंगे?


वैश्वीकरण के बाद हिंदी का भी विस्तार हो रहा है। हिंदी फिल्में विदेशों में भी धूम मचा रही हैं। इसे सिर्फ भारतीय या भारत के गैर-हिंदीभाषी ही नहीं देखते हैं, बल्कि विदेशी भी देखते हैं और समझने की कोशिश करते हैं। अगर आज की भाषा में कहूं तो हिंदी एक बड़ा बाजार बन गया है। विदेशी भी हिंदी में काम करना चाह रहे हैं। भले उनके डायलॉग डब किए जाएं, मगर हिंदी की सत्ता को वे स्वीकार तो कर ही रहे हैं। हिंदी की अपनी भाव-भूमि है। उसके अपने शब्दों में क्षेत्र, जमीन, मौसम, संवेदना और भावना का असर होता है। 'तारे जमीं पर' में 'मां...' वाला गाना भारतीय जमीन और मानसिकता का प्रतिबिंब है। उसका अनुवाद अगर विदेशी भाषा में होगा तो वह असर नहीं पैदा होगा, क्योंकि वहां की संस्कृति में 'मां' का क्या स्थान है, ठीक-ठीक पता नहीं है। यह निश्चित है कि मां का जो दर्जा यहां है, वैसा कहीं नहीं है। इसलिए मैं मानता हूं कि हिंदी की भाषा जितनी समृध्द है, उतने ही विचार भी परिपक्व हैं। हिंदी को रोकना संभव नहीं है, मगर हमारी जिम्मेदारी है कि हम हिंदी को खिलने की आजादी दें।


(भास्कर से साभार)

रविवार, 7 सितंबर 2008

आवाज़ .....

काफ़ी दिनों से इस कविता को पूरा करने के लिए परेशान था सो आज हो ही गई ...... ये हम सबकी हकीक़त है ..... सब जो सोचा करते हैं, तो पढ़ें ....

चुप रहो
तुम्हारी आवाज़
दूसरों के कानों तक न जाए
यही बेहतर है

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
सच बोले
जो दूसरों को हो नापसंद
तो कर लो इसे बंद

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
तुम्हारे पक्ष में हो
और उनको लगे अपने ख़िलाफ़
वो करेंगे नहीं माफ़

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
इतनी बुलंद हो
की उनके कानों के परदे फट जायें
फिर तुम्हारे साथी भी
तुमसे कट जाएँ

तुम्हारी आवाज़
दूसरी आवाजों से
अलग हुई तो
उन आवाजों को अच्छा नहीं लगेगा
वो
तब ?

तुम्हारी आवाज़ में सवाल हो सकते हैं
सवालों से बडों का
अपमान होता है
तुम्हारी आवाज़ में
अगर जवाब हुए
तो उनका हत मान होता है

तुम्हारी आवाज़
भले
तुमको मधुर लगे
पर उनको ये पसंद नहीं
इसलिए
या तो चुप रहो
या फिर
ज़ोर से चिल्लाओ
दुनिया को भूल जाओ
बंधन क्यूंकि
टूटने को उत्सुक है

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

राधाकृष्णन, कबीर, तुम्हारे या फिर अपने बहाने ...?

(कुछ व्यक्तिगत कारणों से इधर व्यस्त या कहूं की अस्त - व्यस्त रहा इस कारण शिक्षक दिवस पर ज़्यादा तैयारी से ब्लॉग पर नही आ पाया उसके लिए क्षमायाचना के साथ)

A teacher affects eternity; he can never tell where his influence stops ( एक शिक्षक आने वाले युगों तक प्रभाव डालता है.....कितना और कितने समय तक यह उसे ख़ुद को भी नहीं मालूम होता !)

हेनरी ब्रुक एडम्स की यह उक्ति वाकई कितनी सटीक है। कल जब मैं पहली बार इतनी परेशानी में था की मुझे याद ही न रहा कि आज शिक्षक दिवस है, तभी मुझे एक ई मेल मिली जिसमे यह उक्ति थी ..... कुछ समय के लिए अपनी सारी परेशानी भूल कर स्कूल के दिनों में चला गया।

राम-नाम कै पटंतरै, देबे कौं कछु नाहिं ।

क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥

सुबह सुबह अपनी साइकिल उठा कर सबसे पहले फूलों की दूकान पर जाकर मास्टर जी/सर/गुरूजी के लिए फूल खरीदना......"५ रुपये का है बेटा .... "

"चचा यार घर से ३ ही रुपये मिले हैं आज मास्टर साब को फूल देना ज़रूरी है....टीचर्स डे है ना आज !"

"ऊ तो मालोमै है हमको, अमा बरखुरदार ये बताओ ..... साल भर तो उनको तिगनी का नाच नचाये रहते हो, ससुर ऊ दिन उनकी गाड़ी की हवा भी तुम्ही निकाले थे ना ? आज कौन सा गज़ब हो गया कि अमां फूल पाती चढ़ा रहे हो ??"

" अमां चचा ऐसा है कहानी ना समझाओ हमको, आज देश के दूसरे राष्ट्रपति डाक्टर राधाकृष्णन की सालगिरह है .... वो भी टीचर थे ..... बस उन्ही की याद में शिक्षक दिवस मनाते हैं "

" अच्छा जैसे १५ अगस्त - २६ जनवरी मानते हैं ?"

" हाँ ऐसे ही समझ लीजिये .... ख़ुद तो चले गए ...हम को फंसा गए ये सब मनाने को !!"

We expect teachers to handle teenage pregnancy, substance abuse, and the failings of the family। Then we expect them to educate our children - John Sculley

मैं सोचता हूँ हम में से ज़्यादातर को ये याद होगा ...... उसके बाद स्कूल में मास्टर साहब से दरवाज़े का फीता कटवाना और फिर उनको पूरी कक्षा की ओर से एक तोहफा ...... और फिर होड़ लग जाती उनको अपना अपना गुलाब देने की, कभी कभी कुछ बड़े घरों के बच्चे जब अध्यापकों के लिए महंगे तोहफे ले आते तब थोड़ा बुरा भी लगता पर खैर ...... अगले दिन से फिर वही ....

" होम वर्क किया ?"

" नहीं सर !"

" जाओ पीछे जा कर दोनों हाथ ऊपर कर के खड़े हो जाओ !"

" सर, आइन्दा से ऐसा नहीं होगा !"

" जितना कहा उतना सुनो ... पीछे !!" (और फिर तमाम तरह के बुरे चेहरे बनाते हुए पीछे जाकर खड़े हो जाते थे, दिमाग चलता रहता था कि अब इनको कैसे परेशान करना है ....)

गुरु कुम्हार सिख कुम्भ है, गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट
अन्तर हाथ सहार दे, बाहर बाहे चोट

ये सब याद आया और फिर याद आया स्कूल का आखिरी दिन और उस दिन की बाद से हर रोज़ स्कूल को, स्कूल के टीचरों को और स्कूल के दोस्तों को याद करना ..... वो सारे टीचर जिनको सताया उनकी भी याद आती है .....जिन सहपाठियों से एक एक साल बात नहीं की उनको रोज़ ऑरकुट पर ढूंढता हूँ ......
आज सोचता हूँ तो पाता हूँ कि आज जो कुछ हूँ उसमे उनका कितना बड़ा योगदान है ...... अंग्रेज़ी की क्लास में मार न खाता तो आज फर्राटे से बोल नहीं पाता, गणित की कक्षा में पीछे ना खडा होता तो आज जीवन के सवाल क्या हल कर पाता ? भूगोल की जिन कक्षाओं से गोल रहा वो आज तक गोल गोल घुमा रही हैं ......

गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागू पाय
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय

आज जो कुछ हूँ उसमें उनका योगदान अपरिमेय है......
उसका धन्यवाद नहीं कर सकता

तेरा तुझको सौंप दूँ, क्या लागत है मोर
मेरा मुझ में कुछ नाही, जो होवत सो तोर

पर आज ये बताना चाहता हूँ कि जो कुछ हूँ ...... आपकी वजह से, जहाँ तक पहुँच पाया आपकी वजह से ......जहाँ तक जाऊँगा, वह रास्ता आपका दिखाया हुआ है और चलने का हौसला भी आपने ही दिया है !
अगर कभी वो पा पाया जो सोच रखा है तो ...... वो मेरा नहीं आपका प्राप्य होगा, मेरी उपलब्धियां हमेशा आपकी मोहताज होंगी .....

गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नमः

आप सब जो बचपन से अब तक चलना ही नहीं .... बदलना भी सिखाते रहे ......... कल अगर दुनिया बदली तो सबसे पहला श्रेय आपको मिलेगा ......
हम सब ये स्वीकार करते हैं कि आप हमारे बचपन की यादों से वर्तमान के वक्त में शामिल हैं ..... आप की वजह से हम हैं इसलिए हम आप से अलग नहीं हो सकते
आपकी शिक्षा से हमारा ज्ञान है
आपकी दीक्षा से हमारा व्यवहार है
आपके प्रेक्षण से हमारा चरित्र
आपकी प्रेरणा से हमारी प्रगति
आपके ध्यान से हमारी शुचिता है
अगर
आज भी हम इतना नहीं पथ भ्रष्ट हुए जितना दुनिया ने प्रयास किया तो उसकी वजह भी आप हैं ......
आपकी मति आज हमारी गति बन गई है

और अधिक लिखना अब मूर्खता है ..... कबीर का अब यह आख़िरी दोहा बचा है,

सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुन लिखा ना जाए
( सारी धरती को कागज़ कर लूँ, सारे जंगलों के पेडो की कलम बना दूँ, सातों सागरों की स्याही कर लूँ पर गुरु के गुन लिखना सम्भव नहीं )

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी