शनिवार, 8 नवंबर 2008

लेकिन मेरा लावारिस दिल

एक बार पहले भी आप सबको डॉक्टर राही मासूम रज़ा की कृतियाँ पढ़वा चुका हूँ.....हिंदू मुस्लिम के विकट विषय पर इन्होने बहुत लिखा और नश्तरी लिखा .....इतना नश्तरी कि धर्म के ठेकेदारों के दिलो पर घाव कर डाले; फिलहाल मुल्क के अभी के माहौल पर पेश ऐ खिदमत है ,

लेकिन मेरा लावारिस दिल

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

लेकिन मेरा लावारिस दिल

अब जिस की जंबील में

कोई ख़्वाब कोई ताबीर नहीं है

मुस्तकबिल की रोशन रोशन

एक भी तस्वीर नहीं है

बोल ए इंसान, ये दिल,

ये मेरा दिल ये लावारिस,

ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल

आख़िर किसके नाम का निकला

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

बन्दा किसके काम का निकला

ये मेरा दिल है या मेरे ख़्वाबों का मकतल

चारों तरफ बस ख़ून और आँसू,

चीख़ें, शोले घायल गुड़िया

खुली हुई मुर्दा आँखों से

कुछ दरवाज़े ख़ून में लिथड़े

कमसिन कुरते

एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल

जगह-जगह से मसकी साड़ी

शर्मिन्दा नंगी शलवारें

दीवारों से चिपकी बिंदी सहमी चूड़ी

दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें

ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत

ए श्रीराम, रघुपति राघव,

ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम ये आपकी दौलत

आप सम्हालें मैं बेबस हूँ

आग और ख़ून के इस दलदल में

मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।

राही मासूम रज़ा

4 टिप्‍पणियां:

  1. मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

    मंदिर राम का निकला

    लेकिन मेरा लावारिस दिल
    bahut sundar. ek ek shabad dard se bhara hai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मन्दिर बनाया आपने,
    मस्जिद बनाई आपने,
    दिल बनाया जिस ने,
    निकाल दिया उसे दिल से,
    फ़िर दिल लावारिस तो होना ही था.

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रिय मयंक जी
    अच्छी रचना पेश की है आज के माहौल में और भी सामयिक है

    उत्तर देंहटाएं

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी