शनिवार, 29 नवंबर 2008

जाने दो !



अभी अभी न्यूज़ रूम से उठा हूँ ......जिस तरह के विसुअल्स पिछले तीन दिनों से आने वाली फीड में देख रहा हूँ, वे लगातार दिमाग में घूम रहे हैं और फिर दिमाग घूम रहा है। कुछ समझ नहीं आ रहा है.....आज जब शहीद संदीप उन्नीकृष्णन की माँ को उसके शव से लिपट कर रोते देखा तो जैसे उठ कर टेलिविज़न पटक देने का मन हुआ। पर क्या क्या पटक सकते हैं.....अखबार, टेलिविज़न और रेडियो ? कब आख़िर अपने अन्दर के कायर को उठा कर पटक पाएंगे ....? कब पटखनी दे पाएंगे जाने दो वाली अपनी मानसिकता को ?


अब तो डर भी नही लगता कि सुरक्षित नहीं हैं हम लोग ..... बस लगता है कि .......................


शायद आज रात कोई अच्छी कविता लिख पाऊं ...... फिलहाल जो पाच नहीं पा रहा वह उलट देता हूँ

जाने दो


एक रात फिर

गूंजा आसमान

चली गोलियाँ

मरे इंसान


हमने फिर कहा

जाने दो


कई मरे, शायद सौ या फिर दो सौ

या पता नहीं

बहा खून या बहे आंसू

पता नहीं


शहर के लोग

चिपके थे टेलिविज़न से

देख रहे थे

सीधे मुंबई से


एक मैच का

लाइव टेलीकास्ट

एक मैच

जिसमे थी दो टीमें

एक के हाथ हथियार

एक के हाथ

अपनी जिंदगियां


दोनों भाग रहे थे

एक हाथ में मौत लेकर

उसे बांटते हुए

एक हाथ में लेकर ज़िन्दगी

उसे बचाते

हाँफते हुए


हम जो घर पर

देखते थे यह खेल

सीधा प्रसारण

निकले नहीं बाहर

भय के कारण


पर हमारे हाथ में भी

था कुछ

जिसे हम भी संभाले थे

एक हाथ में रिमोट

और दूसरे में पोपकोर्न


और फिर अगले दिन सुबह

जब निकले हम घर से

और कहा किसी ने

चलो कर आयें रक्तदान


तो अजीब सा मुंह बनाकर

कहा हमने

अभी कुछ काम है

निपटाने दो

और मन में सोचा

जाने दो !


मुझे पूछना है उन लोगों से जो हेमंत करकरे को झूठा, राष्ट्रद्रोही और बेईमान जाने क्या क्या कह रहे थे......वो चुप क्यूँ हो गए हैं ? अगर अपनी बात पर कायम हैं और तब राजनीति नहीं कर रहे थे तो सामने आकर बोलें और अगर अपनी गलती मानते हैं तो कम से कम सामने आकर दो आंसू ही बहा दें !

उनसे भी सवाल है कि जो तीन दिन पहले कह रहे थे कि आतंकवाद का कोई धर्म नही होता है ....फिर क्यों बार बार इस्लामी आतंकवाद चिल्ला रहे हैं ? क्या आप लोगों ने कोई शपथ ली है कि मुल्क में मज़हबी भाईचारा बिगाड़ कर ही दम लेंगे ? क्या प्यार से रहते पड़ोसी आपको बर्दाश्त नहीं ?

आप से एक विनती है कि आप लोग ख़ुद तो कुछ कर नहीं सकते है मुल्क के लिए तो कम से कम माहौल ना बिगाडिये ...... एक आम हिन्दुस्तानी अभी इतना सक्षम स्वयं है कि अपने आस पास का माहौल ठीक रख सके !

बाकी राज ठाकरे, तोगडिया और अमर सिंह जैसों पर कोई टिपण्णी नही क्यूंकि यह इतनी योग्यता ही नहीं रखते !

अंत में एक दोहा,

फटे बम और लोग मरे, मुंबई में अँधेरा घुप्प

अमर सिंह जी गायब हैं और राज ठाकरे चुप्प

मंगलवार, 25 नवंबर 2008

जनानो की मर्दानगी ..... क्यों नहीं !






कल २५ नवम्बर था....हम में से कईयों को नही मालूम होगा सो बताये देता हूँ की कल के दिन को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव की समाप्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। अगर औपचारिक भाषा में कहें तो संयुक्त राष्ट्र के १७ दिसम्बर के एक प्रस्ताव को पारित करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने २५ नवम्बर को महिलाओं के उत्पीडन के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने का निर्णय लिया। यह तिथि १९६० में इसी दिन डोमिनिक गणराज्य के शासकों के आदेश पर तीन राजनीतिक कार्यकर्ता बहनों की नृशंस हत्या की याद में निर्णीत हुई। *(By resolution 54/134 of 17 December 1999, the General Assembly designated 25 November as the International Day for the Elimination of Violence against Women, and invited governments, international organizations and NGOs to organize activities designated to raise public awareness of the problem on that day. Women's activists have marked 25 November as a day against violence since 1981. This date came from the brutal assassination in 1960, of the three Mirabal sisters, political activists in the Dominican Republic, on orders of Dominican ruler Rafael Trujillo (1930-1961)।)



खैर इतिहास भूगोल तो किताबों की बात है पर व्यवहारिक बात यह है कि ध्वनी की रफ़्तार से भी तेज़ चलने वाली इस दुनिया में आज भी वर्णभेद और लिंगभेद जैसी व्यवस्थाएं और अहम् बोध बचे हुए हैं। इसके ख़िलाफ़ पुरूष तो शायद ही कभी एक मत हो पाएं ( हलाँकि मैं स्वयं पुरूष हूँ......शायद इसी नाते पुरूष अहम् को समझ सकता हूँ ) इसलिए अब महिलाओं की ज़िम्मेदारी है....स्वयं और अपने आस पास की और महिलाओं के प्रति कि ख़ुद लड़ने और विरोध करने को तैयार हो जायें कि आपकी जानकारी में कभी भी किसी भी स्त्री पर हिंसा या उत्पीडन ना होने पाये ( स्त्री पर हिंसा केवल पुरूष ही नहीं करते )मुझे कवि का नाम तो नहीं याद पर अक्सर यह पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं,



कर पदाघात अब मिथ्या के मस्तक पर



सत्यान्वेषण के पथ पर निकालो नारी



तुम बहुत दिनों तक बनी दीप कुटिया की



अब बनो क्रान्ति की ज्वाला की चिंगारी


खैर क्रान्ति एक दिन में नही आती सो धैर्य बड़ी ताकत होगा.......सो लड़ेंऔर प्रतीक्षा करें जीतने तक, अंग्रेज़ी के प्रसिद्द कवि सर हेनरी वौटन ने कहा,

"Learn to labour and wait."

अभी फिलहाल एक छोटी कविता जो नारी अधिकारों की लड़ाई को समर्पित है......तुंरत रची गई है सो काव्य सौष्ठव की अपेक्षा ना करें, भाव सौष्ठव देखें,


माँ अब तुम तैयार रहो

बनने के लिए पिता

यकीन करो

तुम उतनी ही जिम्मेदार हो


बहन अब तुम जान लो

हो सकता है रक्षा करनी पड़े

तुम्हे भाई की अपने

क्या तुम तैयार हो ?


गृहस्वामिनी क्या तुम्हे नहीं लगता

कि घर तुम्हारी क्षमताओं के आगे

छोटा पड़ गया है

क्यूँ ना अब सीमाएं तोड़ भागें

दुलारी बेटियों क्यूँ अब तुम्हे

सड़क के मोड़ पर बैठा

कोई दानव करेगा परेशान

उठाओ हाथों को उसे अहसास कराओ

तुम में भी है जान


छोड़ कर दायरों को

तोड़ बंधनों को

अपेक्षाओं से परे

सीमाओं से आगे

तुम्हारा आकाश खिड़की से दीखता

बादल का टुकडा नहीं

वो क्षितिज का कोना है

कोई दुस्वप्न या दुखडा नहीं


उनकी भाषा में उनको जवाब देना

अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है

उन्होंने बहुत मर्दानगी

अब जनानो की बारी है



भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में अडिग कुंवर नारायण



अभी दो दिन के लिए लखनऊ-प्रतापगढ़ और सीतापुर ( तीनो उत्तर प्रदेश ) की २ दिन की तुरत फुरत यात्रा पर था सो दो तीन दिन कोई चिट्ठाकारी नही कर पाया पर कलाकारी और विचारकारी जारी थी( जो अगली पोस्ट में मिलेगा) पर फलहाल तो बात कुंवर नारायण की ( अब मतलब जब सब ही उनके बारे में बतिया रहे हैं तो आप हमको ही काहे घूर रहे हैं, अरे हॉट टापिक ही तो ब्लोगरों का टानिक है ) की जब भी उनको पढ़ा है तो पाया है कि भाषा और उसके अर्थ अनुप्रयोग को लेकर जिस तरह का विचार मंथन उनके भीतर चलता रहा शायद ही किसी के मन में रहा हो। अंततः हमेशा ही वह मंथन कागज़ पर उतरा और हम तक पहुँचा......


एक विशेष बात आज सोचते सोचते याद आई कि हरिवंश राय बच्चन ने भी अंग्रेज़ी से डाक्टरेट की और कुंवर नारायण ने भी अंग्रेज़ी से ही लखनऊ विश्वविद्यालय से परास्नातक.....और दोनों ही हिन्दी भाषा के मामले में बेहद मज़बूत तो इस पर भी सोचें। पर अब ज्ञानपीठ ने उनके काम को माना है तो हम भी उनकी कुछ कवितायें पढ़ें.....


अर्पित हैं


भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में


प्लास्टिक के पेड़
नाइलॉन के फूल
रबर की चिड़ियाँ


टेप पर भूले बिसरे
लोकगीतों की
उदास लड़ियाँ.....


एक पेड़ जब सूखता
सब से पहले सूखते
उसके सब से कोमल हिस्से-
उसके फूल
उसकी पत्तियाँ ।


एक भाषा जब सूखती
शब्द खोने लगते अपना कवित्व
भावों की ताज़गी
विचारों की सत्यता –


बढ़ने लगते लोगों के बीच
अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ ......
सोच में हूँ कि सोच के प्रकरण में
किस तरह कुछ कहा जाय
कि सब का ध्यान उनकी ओर हो
जिनका ध्यान सब की ओर है –


कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में
आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी
जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी
अपनी ज़मीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ ।




शब्दों की तरफ़ से


कभी कभी शब्दों की तरफ़ से भी
दुनिया को देखता हूँ ।


किसी भी शब्द को
एक आतशी शीशे की तरह
जब भी घुमाता हूँ आदमी, चीज़ों या सितारों की ओर
मुझे उसके पीछे
एक अर्थ दिखाई देता
जो उस शब्द से कहीं बड़ा होता है


ऐसे तमाम अर्थों को जब
आपस में इस तरह जोड़ना चाहता हूँ
कि उनके योग से जो भाषा बने
उसमें द्विविधाओं और द्वाभाओं के
सन्देहात्मक क्षितिज न हों, तब-
सरल और स्पष्ट
(कुटिल और क्लिष्ट की विभाषाओं में टूट कर)
अकसर इतनी द्रुतगति से अपने रास्तों को बदलते
कि वहाँ विभाजित स्वार्थों के जाल बिछे दिखते
जहाँ अर्थपूर्ण संधियों को होना चाहिए ।


आदमी का चेहरा




“कुली !” पुकारते ही
कोई मेरे अंदर चौंका ।


एक आदमी आकर खड़ा हो गया मेरे पास
सामान सिर पर लादे
मेरे स्वाभिमान से दस क़दम आगे
बढ़ने लगा वह


जो कितनी ही यात्राओं में
ढ़ो चुका था मेरा सामान
मैंने उसके चेहरे से उसे
कभी नहीं पहचाना


केवल उस नंबर से जाना
जो उसकी लाल कमीज़ पर टँका होता
आज जब अपना सामान ख़ुद उठाया
एक आदमी का चेहरा याद आया


गुरुवार, 20 नवंबर 2008

चुनावी ग़ज़ल

इधर दो तीन दिन से फिर लोग बातें सुनाने लगे थे कि बातें तो बहुत बड़ी बड़ी करते हो और हफ्ता भर होने को है, ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं डाल पाये। शर्म तो आई पर करता क्या, केव्स संचार इतना व्यस्त रखता है कि ताज़ा हवा चलाने को कई बार फुर्सत नहीं मिलती। इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि सामुदायिक हित में लग जाने के बाद अपनी चिंता करने का वक्त कम मिल पाता है। अब इसको इस तरह ना लें कि मैं ब्लोगिंग का कोई बड़ा संत या मठाधीश हूँ पर इतना ज़रूर है कि ताज़ा हवा और केव्स संचार शुरू करते समय दो अलग अलग कसमें खायी थी और फिर एक कसम खाई शम्भू चौधरी जी, शैलेश जी, हिमांशु और अनुपम अग्रवाल जी की महिमा से कि हिन्दी ब्लोगिंग का अपने स्तर पर जितना हो सके बेडागर्क करना है ( कुछ लोग इसे सेवा कह कर ख़ुद को महिमामंडित करते हैं पर ऐसा केवल ब्लोगिंग के महापंडित करते हैं ) ...... जैसा कि श्री श्री श्री समीर लाल जी उर्फ़ उड़नतश्तरी महाराज उवाच कि " कुछ भी लिखो, उद्धार हिन्दी ब्लोगिंग का ही होगा" सो हम सामुदायिक ब्लॉग को अधिक समय देते हैं और नए ब्लॉग को पढने को भी आजकल अधिक समय देते है ( प्रेरणा : श्री महाराज उड़नतश्तरी, सौजन्य: चिट्ठाजगत) इसीलिए ताज़ा हवा को समय कम दे पते हैं,
खैर मुद्दे पर आयें तो एक चुनावी ग़ज़ल लिख मारी है ( अमा चुनावी मौसम है तो वही सूझेगा ना ) बर्दाश्त इनायत होगी !

चुनावी ग़ज़ल

हुए थे लापता कुछ साल पहले, अब हैं लौट आए

वो नेता हैं, कि हाँ फितरत यही है।


हम उनकी राह तक-तक कर बुढाए

हम जनता हैं, कि बस किस्मत यही है।


वो बोले थे, ना हम सा कोई प्यारा

वो भूले, उनकी तो आदत यही है।


बंटी हैं बोतलें, कम्बल बंटे हैं

वो बोले आपकी कीमत यही है।


वो मुस्काते हैं, हम हैं लुटते जाते

कि बस हर बार की आफत यही है।


जो पूछा, अब तलक थे गुम कहाँ तो

वो बोले, बस हुज़ूर फुर्सत यही है।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

आज बाल दिवस है ..... पंडित नेहरू का जन्म दिवस भी तो पेशे खिदमत है अनिल जनविजय की एक कविता.....अनिल जी अनुदित पद्य का पहचाना नाम हैं, इन्होने कई रूसी कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है, शिल्प देख कर यह कविता भी रूसी ही प्रतीत होती है, मुझे अच्छी लगी सो आपके सामने प्रस्तुत है .......

देखा था उसने जवाहर को बचपन में
तब उम्र बहुत सरस थी
तीन-चार बरस की

सफ़ेद चूड़ीदार पाजामा
सिर पर सफ़ेद टोपी थी
छाती पर लाल गुलाब सजा
श्वेत था परिधान पूरा श्वेत अचकन में

तुम भी ऎसे ही बनना--माँ ने कहा
जगा दिया बालक के मन में सपना नया
फिर जिद्दी उस बच्चे ने चाही
वैसी ही पोशाक
अचकन, चूड़ीदार पाजामा,
लाल गुलाब हो साथ

कई बरस बना रहा वह वैसा ही जवाहर
स्वदेश बसा उसके दिल में अब भी
जनता को अपनी वह करता है प्यार
उम्र हुई अब उस बालक की आठ कम पचपन की

अनिल जनविजय

एक अच्छा विचार उठा है मन में कि काश दुनिया में सब बच्चे बन जाते ..... फिर झगडा तो होता पर दुश्मनी नही होती ! इस पर अगली पोस्ट में लिखूंगा और हाँ वो चुनाव वाली रचनाएँ भी.....

बुधवार, 12 नवंबर 2008

आ गए चुनाव !

देश के छः राज्यों में विधानसभा चुनावों की मार काट मची है ...... नेता टाइपलोग एक दूसरे को विशेषणों से नवाजने में लगे हुए हैं........ ऐसी की तैसी हो गई है पर हाँ एक आदमी की इज्ज़त और पूछ बढ़ गई है और वो है आम आदमी या जनता। क्या है कि आम आदमी को अब पता चला है कि वो ख़ास हो चला है.....अमा चुनाव आ गए हैं भाई !

अच्छा इधर पाँच सालों में तो इन देश के कर्णधारों ने जनता की हालत नगर निगम के डंपरों जैसी कर दी है.....जनता घिस घिस कर ऐसी गेंदहो गई है जिसे स्पिनर भी डालने से मना कर देगा और अब नेता जी हाथ जोड़ कर गली गली भटक रहे हैं कि....पर पब्लिक समझदार है कह रही है


तब जो किहिन थे अब वो ना कीजे

अबकी बरस तोहका वोट ना दीजे


अपना भी कुछ लिख रहा हूँ पर अभी पूरा नही हुआ है तो वो अगली पोस्ट में अभी महाकवि श्री श्री श्री अशोक चक्रधर की एक कविता पढ़वा देता हूँ, तो पढ़ें और गुनें



एक नन्हा मेमना और उसकी माँ बकरी,
जा रहे थे जंगल में राह थी संकरी।
अचानक सामने से आ गया एक शेर,
लेकिन अब तो हो चुकी थी बहुत देर।

भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,
बकरी और मेमने की हालत खस्ता।
उधर शेर के कदम धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कापें।
अब तो शेर आ गया एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-जैसे बच्चे को थामने।

छिटककर बोला बकरी का बच्चा
-शेर अंकल!क्या तुम हमें खा जाओगे एकदम कच्चा?
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया।
बोला-हे बकरी - कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
दीर्घायु भव! चिरायु भव!
कर कलरव! हो उत्सव!
साबुत रहें तेरे सब अवयव।
आशीष देता ये पशु-पुंगव-शेर,
कि अब नहीं होगा कोई अंधेर
उछलो, कूदो, नाचो और जियो हँसते-हँसते
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
बेटा ताज्जुब है,
भला ये शेर किसी पर रहम खानेवाला है,
लगता है जंगल में चुनाव आनेवाला है।

अशोक चक्रधर

मज़ा आया ना पढ़कर (वैसे देश भी धीरे धीरे जंगल होता जा रहा है, जंगली जो राज कर रहे हैं) ...... अगली पोस्ट का इंतज़ार करें पर हाँ वोट डालने जरूर जायें.....ये आपका अधिकार और कर्तव्य दोनों है !

शनिवार, 8 नवंबर 2008

लेकिन मेरा लावारिस दिल

एक बार पहले भी आप सबको डॉक्टर राही मासूम रज़ा की कृतियाँ पढ़वा चुका हूँ.....हिंदू मुस्लिम के विकट विषय पर इन्होने बहुत लिखा और नश्तरी लिखा .....इतना नश्तरी कि धर्म के ठेकेदारों के दिलो पर घाव कर डाले; फिलहाल मुल्क के अभी के माहौल पर पेश ऐ खिदमत है ,

लेकिन मेरा लावारिस दिल

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

लेकिन मेरा लावारिस दिल

अब जिस की जंबील में

कोई ख़्वाब कोई ताबीर नहीं है

मुस्तकबिल की रोशन रोशन

एक भी तस्वीर नहीं है

बोल ए इंसान, ये दिल,

ये मेरा दिल ये लावारिस,

ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल

आख़िर किसके नाम का निकला

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

बन्दा किसके काम का निकला

ये मेरा दिल है या मेरे ख़्वाबों का मकतल

चारों तरफ बस ख़ून और आँसू,

चीख़ें, शोले घायल गुड़िया

खुली हुई मुर्दा आँखों से

कुछ दरवाज़े ख़ून में लिथड़े

कमसिन कुरते

एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल

जगह-जगह से मसकी साड़ी

शर्मिन्दा नंगी शलवारें

दीवारों से चिपकी बिंदी सहमी चूड़ी

दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें

ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत

ए श्रीराम, रघुपति राघव,

ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम ये आपकी दौलत

आप सम्हालें मैं बेबस हूँ

आग और ख़ून के इस दलदल में

मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।

राही मासूम रज़ा

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी