सोमवार, 12 मई 2008

समर शेष है ....

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

- रामधारी सिंह दिनकर

रविवार, 4 मई 2008

प्रेस की आजादी




कल विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस था ..... ३ मई !


नही जानता हम में से कितने पत्रकारों को पता था पर फिलहाल मुझे भी कल शाम पता चला .................


काफ़ी ग्लानी हुई पर देर आयद दुरुस्त आयद। सो इस दिन कामना से कि प्रेस आजाद होगी और खासकर चीन में ! हम श्रद्धांजलि देते हैं दुनिया भर में इस वर्ष शहीद हुए पत्रकार भाइयो को और दिया जलाते हैं उम्मीद का कि हम पथभ्रष्ट न हो ,


लड़ते रहे ................. दुनिया में हम पर कितने ज़ुल्म हो या कितनी ही ज्यादतिया .................


हम लड़ने को मरने को तैयार हैं


............ इन्केलाब जिन्दाबाद



हम होंगे कामयाब एक दिन


होगी क्रांति चारो ओर एक दिन



कलम चले तो जिगर खुश भी हो और छलनी भी


कलम रुके तो निजाम ऐ ज़िन्दगी भी रुक जाये


कलम उठे तो उठे सर तमाम दुनिया का


कलम झुके तो खुदा की नज़र भी झुक जाए


शुक्रवार, 2 मई 2008

हमारे एक जूनियर मित्र और ज़बरदस्त कवि हिमांशु की एक और कविता आपके सामने प्रस्तुत है... इससे पहले वसंत पर वो अपनी कविता से आप सबको लुभा चुके हैं ! पर यह कविता उससे चार हाथ आगे है तो मज़ा लीजिये ,

अपने आस-पास बहुत लोगों को देखता हूँ .....बेचारे जीते हैं मुगालतों में .......तब भी , जबकि वो सच्चाई जानते हैं .......उनसे सहानुभूति रखते हुए , एक कविता लिखी .......जो प्रस्तुत है ......

वो रोज़ मुझे भरमाती है ,
झूठे स्वप्न दिखाती है ,
मुझसे अपना काम निकालती है,
वो फिर भी मुझे भाती है ,
मुझे मालूम है , वो मुझे ठगती है
लेकिन फिर भी , वो मुझे अच्छी लगती है
वो मेरी कमजोरी है , मैं स्वीकार करता हूँ
पर मैं एक पुरूष हूँ ,और पुरूष जैसा ही व्यवहार करता हूँ .........

'कवि हिम'

- हिमांशु बाजपेयी

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी