शुक्रवार, 2 मई 2008

हमारे एक जूनियर मित्र और ज़बरदस्त कवि हिमांशु की एक और कविता आपके सामने प्रस्तुत है... इससे पहले वसंत पर वो अपनी कविता से आप सबको लुभा चुके हैं ! पर यह कविता उससे चार हाथ आगे है तो मज़ा लीजिये ,

अपने आस-पास बहुत लोगों को देखता हूँ .....बेचारे जीते हैं मुगालतों में .......तब भी , जबकि वो सच्चाई जानते हैं .......उनसे सहानुभूति रखते हुए , एक कविता लिखी .......जो प्रस्तुत है ......

वो रोज़ मुझे भरमाती है ,
झूठे स्वप्न दिखाती है ,
मुझसे अपना काम निकालती है,
वो फिर भी मुझे भाती है ,
मुझे मालूम है , वो मुझे ठगती है
लेकिन फिर भी , वो मुझे अच्छी लगती है
वो मेरी कमजोरी है , मैं स्वीकार करता हूँ
पर मैं एक पुरूष हूँ ,और पुरूष जैसा ही व्यवहार करता हूँ .........

'कवि हिम'

- हिमांशु बाजपेयी

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