सोमवार, 24 दिसंबर 2007

मोदी का रहस्य


गुजरात विधानसभा चुनावो के परिणाम आ गए हैं और लोग या तो शर्ते जीत कर खुश हैं या हैरान परेशान कि आख़िर ये मोदी नाम की बला है क्या चीज़। गुजरात विधानसभा की १८२ में से ११७ सीटों पर विजय या कहे कि बहुमत से कही ज्यादा के आंकडे के साथ मोदी क्रिकेट की आस्ट्रेलिया टीम की तरह फिर अजेय साबित हुए। एक ओर जहाँ भाजपा कार्यालय में पटाखों के शोर के साथ मिठाईओ का स्वाद लिया जा रहा है कांग्रेस के नेता किन्कर्तव्य विमूढ़ खडे सोनिया गाँधी के सामने होने वाली पेशी के बारे में चिंतित हैं। वैसे सोनिया इस बारे में कुछ ज्यादा नही पूछने वाली क्योंकि उनका और बाबा का खुद का करिश्मा भी फ़ेल हो गया है।

दरअसल मोदी कोई रहस्य नही, उनका करिश्मा और उनका रहस्य उनके व्यक्तित्व और गुजरात कि जनता के मनोविज्ञान में छुपा है। मोदी वस्तुतः कोई व्यक्ति नही अपितु पैकेज हैं आत्मविश्वास, धाराप्रवाहता, ओज और अगर प्रचलित शब्दों में कहे तो यकीनन साम्प्रदायिकता के भी पर जनता उसका सम्मान करती है जो दूसरो से थोडा भी ज्यादा काम करे और वो शायद मोदी कर पाए हैं। कांग्रेस शायद इन १२ सालो में भूल चुकी है कि उसे करना क्या है और लगता है कि यह याद करने में १२ साल और लग सकते हैं। फिलहाल कहने को आत्ममंथन का दौर जारी है और कोई कुछ भी कहे मोदी सब पर भारी है !!
मयंक सक्सेना mailmayanksaxena@gmail.com

मंगलवार, 18 दिसंबर 2007

आवाज़ ऐ खल्क




इन दिनों राजनैतिक दलों की असल मुद्दों के प्रति उदासीनता दिनोदिन बढ़ती जा रही है। देश प्रदेश कि समस्याओ को ताक पर रख कर यह लोग पता नही किन समस्याओ को हल कर रहे हैं। विधानसभाओ मी होने वाले बेवजह भारी हंगामो के कारण आमतौर पर कार्यवाही स्थगित हो जाती है। जिन लोगो ने विकास और समस्याओ के हल के लिए इन लोगो को सदन में भेजा है वे ही अक्सर सत्र में व्यवधान डालने का काम कर रहे हैं।
पिछ्ले दिनों मध्य प्रदेश विधानसभा का शीत सत्र मात्र तीन दिनों में समाप्त हो गया। जिसमें अनुपूरक बजट डम्पर कि आवाज़ में बिना चर्चा पारित कर दिया गया। विपक्ष द्वारा डम्पर काण्ड के विषय में सदन में भरी शोरगुल किया गया पर क्या ये राजनेता बता पाएंगे कि डम्पर प्रकरण का परिणाम क्या होगा। वैसे आम जनता जानती है कि किसी नेता पर भ्रष्टाचार के कितने ही आरोप लगा दिए जाएँ, आज तक कितने सांसदों और विधायकों को सजा मिली है। अच्छी सड़क, बिजली, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा कि जनता को अधिक आवश्यकता है यह नेता कब इस पर ध्यान देंगे। उनको इस बात से कोई मतलब नही कि सदन कि एक दिन की कार्यवाही पर कितना धन खर्च होता है जो इसी आम जनता से आता है। ये लोग हमेशा एकमत होते हैं तो स्वयं कि वेतन वृद्धि के लिए तो क्या वे कभी नियम बनाएंगे कि सत्र तो पूरा होगा ही।
शीत सत्र कि तीन दिन मी समाप्ति से आम जनता का इनके प्रति विश्वास पलटता नज़र आता है क्योंकि इनमे से किसी ने कोई विशेष कार्य नही किया है। निश्चित ही जनता इसके बदले में अमूल्य उपहार इनको देगी जिसकी पहली किस्त खरगौन में विधायकों की पिटाई और दूसरी किस्त उप चुनावो में परिणाम पलट कर दे दी गयी है। चुनावी वादों पर कितना अमल होता है जनता सब जानती है।


सरकार स्वयं के मंत्रियो के भ्रष्टाचार पर ही लगाम नही लगा पाई साथ ही प्रशासन भी बेलगाम हो गया। ऐसे में प्रदेश कि जनता केवल चुनावो में ही इसका बदला ले सकती है। बड़ा पद अपने साथ माँग करता है बड़े उत्तरदायित्व और बड़े अनुशासन की लेकिन सब कुछ हो रह है इसके उलट। इसीलिए जनता भी उलटफेर करने को आतुर है और वो कहती फिर रही है कि नेता हमेशा लेता है, कुछ देता नही....................पर याद रहे जनता की आवाज़ ही ईश्वर कि आवाज़ है ...... आवाज़ - ऐ- खल्क नगाड़ा - ऐ - खुदा !




हरीश कुमार ( harishjournalist@gmail.com )

ज़रा याद करो कुर्बानी
















एक बार फिर हमारी तथाकथित पहरुआ मीडिया तारीखो के खेल में फिसड्डी साबित हुई। लोकतंत्र कि प्रहरी होने के बडे बडे दावे करने वाली हमारी मीडिया अभी दो दिन पहले १६ दिसम्बर को विजय दिवस को जहा भूल गयी आज १९ दिसम्बर को भी याद करने कि उसने ज़हमत नही उठाई.... सनद रहे कि १९ दिसम्बर १९२७ को काकोरी में ट्रेन डकैती के आरोप में १० क्रांतिकारियों को फांसी दी गयी थी लेकिन आज अफ़ज़ल गुरु की फांसी पर रोने गाने वाली मीडिया को यह दिन याद भी नही .....शायद उसे यह ज़रुर याद होगा कि मिका को रखी को चुम्बित किये कितने दिन महीने और साल बीत गए हैं और आश्चर्य ना हो जब हमारे देशभक्त चैनल और अखबार करीना और सैफ की डेटिंग के १०० दिन पूरे होने पर विशेष कार्यक्रम प्रसारित कर दे !


जन
गन मन भी याद न रखने वाले नेताओ और सरकार से भी हमे मीडिया के मुकाबले कुछ ज्यादा उम्मीदें नही है , ....... खैर हम ताज़ा हवा पर उन सभी शहीद क्रांतिकारियों को याद करते व श्रद्धांजलि देते हैं
शहीदों की चिताओ पर जुडेगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालो का यही बाकी निशान होगा .....





रविवार, 16 दिसंबर 2007

१६ दिसम्बर


दरअसल हम में से ज़्यादातर लोगो को शायद ही याद हो कि आज के दिन ही सन् १९७१ में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने अपने ९०,००० सैनिको के साथ आत्मसमर्पण किया था। इस तरह भारत पाकिस्तान के सबसे बडे युद्ध का अंत हुआ था और बांग्लादेश का जन्म हुआ था। गलती आपकी नही हमारी मीडिया कि है जो शायद अमिताभ और शाहरुख़ के जन्म दिवस को ही महत्वपूर्ण तारीखें मानता है। खैर हम याद कर सकते हैं उन सभी हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी सैनिको को जिन्होंने इस युद्ध में अपनी जान गवाई और शहीद हुए, क्योंक सैनिक का कोई मुल्क और धर्म नही होता उनका धर्म, कर्म और मुल्क उनकी बहादुरी और वतनपरस्ती का जज्बा होता है। हम ताज़ा हवा पर उनको श्रद्धांजलि देते और दुआ करतें है कि दुनिया में और युद्ध न हो .........फिल्म बॉर्डर में जावेद साहब की एक नज्म है उसको याद करें,

जंग तो चंद रोज़ होती है ........
ज़िंदगी बरसों तलक रोती है

शायद हमारी मीडिया भी एक दिन संवेदना को समझ पाए ... आमीन !

शनिवार, 15 दिसंबर 2007

उम्मीद है कि ....

प्रसिद्ध कवि दुष्यंत की यह पंक्तिया हमे हमेशा प्रेरणा देती हैं और देती रहेंगी कि हमने जो रास्ता चुना है उस पर हमेशा चलते रहे ....... मैंने कई साल पहले दो पंक्तिया लिख डाली थी उनसे ही दुष्यंत कि इस कविता को शुरू करूँगा ........

चक्रवात में खोकर डूब गए तट सारे
पर ढूंढ ही लेगी लहर हमारी नए किनारे

अब देखें दुष्यंत को ,

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

- दुष्यन्त कुमार

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2007

सम्पादकनामा


देश और दुनिया में इन दिनों कई तरह कि हवाएं चल रही हैं, पर बदकिस्मती से इनमे से कोई भी बहुत सुकून देने वाली नही है। दुनिया कि ही तर्ज़ पर मीडिया में भी कई तरह कि हवाएं चल रही हैं पर इनमे से न तो कोई रूहानी है और न ही सुहानी .............. दरअसल इन्ही हवाओ से तंग आ कर हमने यह सोचा कि क्यो न खुद ही ताज़ा झोंके चलाने कि कोशिशे कि जाएं और उपजा यह ब्लोग ! हमारी यह कोशिश है कि वाकई ज़रूरी मुद्दों ( राखी- मिका, ऐश-अभिषेक और रियलिटी शोस से ज्यादा ज़रूरी.... ) पर बहस और विचार किया जाये और कुछ वाकई अच्छे लेखों को रद्दी में बिकने से बचाया जा सके ...... पत्रकारिता शायद पत्रकारिता होनी चाहिऐ और उसके लिए इस मीडिया वर्ल्ड में ताज़ा हवा चलनी ही चाहिऐ आमीन ! हम कोशिश करेंगे कि हमारी सोच हमेशा ऐसी ही रहे और यह पहला सम्पादकनामा कभी आख़िरी का मुँह न देखे। एक खास बात और हम लेकर आएंगे हर बार एक अलग संपादक यानी हर हफ्ते नया फ्लेवर पर ध्यान रहे शर्तें लागू हैं ....................... *


*चेतावनी - ऐ सी कि हवाएं पसंद करने वाले कृपया सावधान यह ताज़ा हवा है ............. शायद रास न आये।

मयंक सक्सेना

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी