बुधवार, 23 दिसंबर 2009

खाकी...लाल बत्ती और शराब....

ये दृश्य उत्तर भारत में कहीं का भी हो सकता है....पर फिलहाल उत्तर प्रदेश का है....शहर का नाम है ग़ाज़ियाबाद....और जगह ग़ाज़ियाबाद का रेलवे स्टेशन....और उस स्टेशन का विजय नगर का प्रवेश द्वार....23 दिसम्बर यानी कि कल रात करीब सवा दस बजे...एक मित्र को ट्रेन पकड़ा कर उतरा ही था....कि देखा कि बाहर एक लाल बत्ती की एम्बेसडर खड़ी है....सरकारी....सफेद रंग की....नम्बर भी बताऊंगा अभी....खैर आगे बढ़ते हैं....मैं अभी अपनी बाइक का लॉक खोल ही रहा था कि एक फोन आ गया...इतने में गाड़ी के अंदर से एक भद्दी सी गाली के साथ पीछे रखे पान के खोखे की तरफ एक फरमाइश उछाली गई....अबे....*&*)_(%*&_ एक सिगरेट ला जल्दी....
आवाज़ से लग गया कि जनाब लोग शराब के नशे में हैं....मुड़कर गाड़ी के अंदर देखा तो खून खौल उठा....लाल बत्ती की गाड़ी के अंदर बैठी थी खाकी.....खाकी बोले तो अपने रक्षक पुलिस वाले...और कोई कांस्टेबल या सिपाही नहीं...साक्षात यम का रूप लिए एक दरोगा साहब भी विराजमान थे....और सुना रहे थे अपनी वीरता का एक किस्सा....उनके अलावा गाड़ी में तीन लोग और थे....दो तो साफ साफ पुलिस की वर्दी में दिख रहे थे....एक शायद हेड कांस्टेबल और दूसरा कांस्टेबल.....एक की मूंछें नत्थूलाल जैसी थी....और एक कुछ युवा था....चौथा शख्स ड्राईइविंग सीट पर था....हो सकता है पुलिसवाला हो...या न भी हो....खैर ये तीनो वर्दी में थे....और इन पर कानून की रक्षा की ज़िम्मेदारी थी...पर तीनो कानून तोड़ रहे थे...चौथा भी शामिल था....पर शायद वर्दी में नहीं था....कौन कौन से कानून ये तोड़ रहे थे इस पर भी बात कर लेते हैं....
  • पहला ये सार्वजनिक स्थल पर मदिरापान कर रहे थे.....जी हां लाल बत्ती की इस गाड़ी के अंदर शराब के दौर पर दौर चल रहे थे...वो भी खुलेआम रेलवे स्टेशन पर....बल्कि युवा पुलिस वाला तो हाथ में पैग लेकर सड़क पर घूम रहा था....
  • दूसरा ये कि ये तीनो रेलवे स्टेशन के परिसर में ये हरकत कर रहे थे...जहां तक मेरी जानकारी है वो ज़मीन गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन के अंतर्गत आती है.....
  • तीसरा ये कि तीनो ही वर्दी में थे....यानी कि ऑन ड्यूटी मदिरा सेवन हो रहा था....
  • चौथा ये कि उसके बाद इन लोगों ने उस कार के सीडी प्लेयर पर एक बेहद ही अश्लील गाना चला कर उसकी आवाज़ को पूरे वॉल्यूम पर कर दिया....और उसी वक्त एक ट्रेन आई होने के कारण वहां आस पास तमाम महिलाएं भी खड़ी थी...मतलब सार्वजिनक स्थल पर अश्लील व्यवहार का भी मामला....
  • पांचवां ये कि उसके बाद मैं जो इनको देख रहा था...मुझ पर निगाह पड़ते ही मुझे इशारे से बुलाया गया...और धमकाने वाले अंदाज़ में कहा गया कि देख क्या रहा है बे....मेरे थोड़ा तेवर दिखाने पर चुपचाप कार में बैठ गए साहब....
  • छठा....अब ये बताइए कि जब चारों ही पी रहे थे....तो गाड़ी भी ड्राइवर साहब ने पी कर ही चलाई होगी...एक और मामला....शराब पी कर गाड़ी चलाने का...इसमें तो साहब दो साल की कैद भी हो सकती है.....
अब इसके आगे की बात कि आप में से जो लोग कानून के जानकार हों....ये ज़रूर बताएं कि आखिर कौन कौन से अभियोग लगते हैं इन पुलिस वालों पर....दिनेशराय जी आप से ज़रूर जानना चाहूंगा....अब ये बताएं साहब कि ऐसों के हवाले तो हमारी आपकी सुरक्षा है....आज गंदे गाने चलाए कल पता चला कि कार से बाहर उतर कर स्त्रियों से अभद्रता ही करने लगें...भई नशे में जो ठहरे....अच्छा और ये भी बता दूं कि गाड़ी जिस भी व्यक्ति की रही होगी...वह कोई जनसेवक ही था और वहां नहीं था....गाड़ी पर लाल बत्ती थी...और ये पुलिस वाले शायद सुरक्षा या एस्कोर्ट ड्यूटूीपर थे....और जिन साहब की गाड़ी थी अगर वो इस बात से अनभिज्ञ हैं तो उनसे भी निवेदन है कि ऐसा न होने दें....वरना फिर रुचिका जैसी किसी मासूम की कोई वहशी पुलिसवाला जान ले लेगा....
अब बताता हूं गाड़ी का नम्बर....क्योंकि सबसे ज़रूरी ये है कि इन नीच पुलिसवालों की पहचान हो....उस लाल बत्ती की एम्बेसडर का नम्बर था......
UP32 BN5931

अब साहब गाड़ी का नम्बर भी सबके सामने है....सरकारी गाड़ी थी...नम्बर लखनऊ का है पर पुलिस गाज़ियाबाद की ही थी.....लेकिन सवाल जस का तस है कि जब कानून के रक्षक ही अपराधियों सरीखा व्यवहार कर रहे हों....तब क्या किया जाए और कैसे माओवादियों...या नक्सलियों को गलत ठहराया जाए...और कैसे माना जाए कि आदिवासी इलाकों में पुलिस ज़ुल्म नहीं करती होगी....जब शहरों का ये हाल है....और फिर जब पुलिस ऐसी है तो क्या नागरिक कानून हाथ में ले लें...करें क्या...जवाब चाहिए.....
गाड़ी का नम्बर एक बार फिर नोट कर लें.....
UP32 BN5931

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

तेरे जाने के बाद-3




हाल ही में हिमांशु ने कविताओं की श्रृंखला सी शुरु की....दो हिस्से लिखे...तेरे जाने के बाद....शीर्षक से......दोनो ही बेहतरीन....आज अचानक उसके आगे कुछ लिखने का विचार आया....सो उसी श्रृंखला में एक कड़ी और जोड़ रहा हूं...और हिमांशु का आभारी हूं....कई दिन बाद लिखवाने के लिए.....हिमांशु की रचनाओं का लिंक है....


तेरे जाने के बाद
कुछ दिन तक
हवाओं ने तड़पाया
दिशाओं ने उलझाया
नींद आई
तो तेरे ख्वाब ने जगाया
सोच ने
बस तुझको ही पाया

लेकिन अब
हवाएं
एक सी ही लगती हैं
दिशाएं
भ्रम नहीं देती हैं
नींद
अब तेरे ख्वाबों के बिन है
सोच
अब बोझ नहीं लेती है

तेरे जाने के बाद
कलम
जो उदास थी
अब फिर चल पड़ी है
कागज़
जो कोरे थे
फिर कारे हो रहे हैं

और इन पर
अब प्रेम के गीत नहीं हैं
न ही
विरह के आंसुओं से
ये भीग रहे हैं

अब
फिर से
ये
भूख की आवाज़ बनेंगे
फिर
ये विप्लव का साज़ बनेंगे
अब इन पर
श्रृंगार तो होगा
सुहाग का रंग
सुर्ख तो होगा
पर वो खून की सुर्खी होगी
अधरों की नहीं....
अब कविता फिर बहेगी
पर
अल्हड़ धार सी नहीं
चक्रवात की मार सी होगी

प्रेम के इस संसार में
मैं भूला था
कि बाहर एक दुनिया
और भी है
और
मैं नहीं था
होकर भी
इस संसार में

लेकिन
तेरे जाने के बाद
जो तंद्रा टूटी है
जो खुली हैं आंखें....

तो अब दिख रहे हैं
नंगे जिस्म...
भूखे लोग.....
बिलखते बच्चे......
चिढ़ा रहे हैं
वहशी आंखें...
चालाक लोग....
बेरहम दिल....
और
तेरे जाने के बाद
लगता है
कि
तेरा जाना अच्छा ही है
क्योंकि अब
मैं देख सकता हूं ये सब....

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

वो कहते हैं कि..... हैप्पी बड्डे........




एक सुकून और खुशी का अहसास है...तो साथ ही साथ ये एक चिंता भी है कि आज ताज़ा हवा दो साल का हो गया....आज से करीब दो साल पहले एक शिशु रूप में ये ब्लॉग मैने और मेरे सखा हरीश बरौनिया ने मिल के शुरु किया था....और आज ये दो साल का हो गया और वक्त कैसे गुज़रता गया पता ही नहीं चला....सच में वाकई बच्चे बहुत जल्दी बड़े हो जाते हैं....सुकून और खुशी इस बात की है कि नौकरी और ज़िंदगी की जद्दोजहद के बीच भी ताज़ा हवा बहती रही.... और चिंता इस बात की कि हाल के दिनों में इसे ज़्यादा वक्त नहीं दे पा रहा हूं...पर जब जन्मा है तो बच्चा पल ही जाएगा ये सोच कर ऐतबार कर लेता हूं इसके आगे भी चलते रहने का....आज तक इस पर जो कुछ भी लिखा गया आप सब ने हमेशा हौसला बढ़ाया....एक एक का नाम लेना न तो आसान है....और न ही उचित क्योंकि एक भी नाम छूटा तो बवाल समझो....सो आप सभी का आभार....और आभार भी क्यों....आप नहीं हौसला बढ़ाएंगे तो कौन बढ़ाएगा....
लगातार ब्लॉगिंग कर के एक बात जो और समझ में आई वो ये है कि आप जब भी कुछ लिखें तो परवाह न करें कि क्या होगा...क्यों परवाह कर के भी कोई फायदा नहीं....ब्लॉगिंग का जन्म ही अपनी कम कहने दूसरे की उधेड़ने के लिए ज़्यादा हुआ है...हालांकि इसने अभिव्यक्ति के मायने बदले भी हैं....और बिगाड़े भी....पर फिर भी सकरात्मक असर ज़्यादा रहे...एक पत्रकार होने के नाते काम की जो भूख दफ्तर शांत नहीं कर पाया वो ब्लॉगिंग ने शांत की....सबसे अच्छी बात ये है कि ब्लॉगिंग के पुरोधा और शिखर पुरुष अन्य क्षेत्रों की तरह नहीं है...वो भी हमारी आप की तरह आम आदमी हैं...ज़मीन के आदमी हैं...और आपको सहज उपलब्ध हैं....और नए ब्लॉगर को हमेशा हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में परिवार जैसा ही लगता है...जहां तमाम मतभेद हैं...पर फिर भी सब एक साथ हैं....
हाल के दिनों में थोड़ी तल्खी और राजनीतिक गतिविधियां आई....कुछ एक लोग धार्मिक-जातिगत-वैचारिक ज़हर उगलने लगे.....(किसी एक पक्ष की बात नहीं कर रहा हूं) पर हां अभी तक ताज़ा हवा इससे बचा रहा है....लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं....और मेरा अब तक का दो साल का अनुभव बेहतरीन रहा है....हां टिप्पणियों की संख्या कम हुई है क्योंकि ज़्यादातर पाठक खुद भी ब्लॉगर हो गए हैं....पर ये भी अच्छा ही है, अच्छा होता कि पाठक संख्या भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती....
एक दो लोगों का नाम ज़रूर लेना चाहूंगा, पहले तो श्री श्री श्री 1008 समीर लाल उड़नतश्तरी जी महाराज का जो मेरे लिए दुनिया का आठवां अजूबा हैं...पता नहीं कैसे इतना पढ़ लेते हैं....हर अच्छी पोस्ट पढ़ते हैं...और इसके बाद इतना समय भी बचा लेते हैं कि लिख भी डालते हैं...खैर टिप्पणियों के रेकॉर्ड होल्डर तो वो हैं ही....आज तक हर अच्छी पोस्ट पर उनकी टिप्पणी मिली....भले ही वो अकेली टिप्पणी रही हो....इसके बाद है नाम अनुपम अग्रवाल जी का जनाब पेशे से सरकारी इंजीनियर हैं...पर लेखन और कविता का ऐसा शौक कि मुझसे फोन पर ब्लॉगिंग की दीक्षा ली और ब्लॉग जगत को बेहतरीन पोस्टों से नवाज़ दिया...ऐसा जुनून नहीं देखा भैया....गजबै आदमी हैं....हालांकि आजकल लिखते नहीं न जाने क्यूं तो इस मौके पर अनुरोध करूंगा कि लिखना फिर शुरु कर दें....फिर है नम्बर अपने हिमांशु भैया....उर्फ़ कवि हिम...उर्फ़ हिम लखनवी का....अब नामै तीन ठो हैं तो आदमी तो खतरनाक होंगे ही...हिमांशु भैया गुरु जी गुरू जी करते करते हमका गुड़ बनाए दिहिन और खुद शक्कर हुई गए....जनाब की उम्र है 22 साल और काव्य संग्रह छप गया है अमां यार....यहै नाम ब्लॉग का भी है और ब्लॉग पर लिखी गई रचनाओं का ही संग्रह है....वो भी बहुत जोर लगाते हैं कि हम लिखते रहें...कई दिन तक कुछ न लिखो तो फोन करके कह देते हैं कि बहुत दिन हो गए लिख काहे नहीं रहे हैं....इसके अलावा संगीता पुरी जी से भी एक बार बड़ी लम्बी बहस चली थी सो उनका भी धन्यवाद क्योंकि इसी बहाने बहुत दिन बाद फिर से लिखना शुरु कर दिया था....देविका भी डांटती रहती है कि लिखना क्यों छोड़ दिया है....और हां गुंजन भाई जब ब्लॉग पढ़ते दिखते हैं तो भी शर्म आ जाती है....
और भी बहुत नाम हैं....पर सबको धन्यवाद तो दे ही चुका हूं....पर आज दूसरी सालगिरह पर एक वादा कि अब नियमित लिखूंगा....नौकरी के पहलू के सिवा जन्नतें और भी हैं....और ताज़ा हवा बेसाख्ता चलेगी...गजबै चलेगी....और हां पोस्ट पढ़ कर निकल मत लीजिएगा...विश करिएगा...वो क्या कहते हैं अंग्रेज़ी में हैप्पी बड्डे....और कवि एकांत श्रीवास्तव की एक कविता जो जन्मदिन की खुशी और चिंता दोनो को ज़ाहिर करती है उसके साथ छोड़ता हूं कलम....



आकाश के थाल में
तारों के झिलमिलाते दीप रखकर
उतारो मेरी आरती

दूध मोंगरा का सफ़ेद फूल
धरो मेरे सिर पर
गुलाल से रंगे सोनामासुरी से
लगाओ मेरे माथ पर टीका
सरई के दोने में भरे
कामधेनु के दूध से जुटःआरो मेरा मुँह

कि नहीं आई
कोई सनसनाती गोली मेरे सीने में
कि नहीं भोंका गया मुझे छुरा
कि नहीं जलाया गया मेरा घर
कि वर्ष भर जीवित रहा मैं ।

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

मां गूंथ रही है कविता....

(हाल ही में दफ्तर के बाहर की चाय की दुकान पर उस औरत को अपने बच्चों के लिए आटा गूंथते देखा...तो उसमें गिरती पानी की धार के साथ यादें भी भीगती गई....और आटे के साथ कविता भी गुंथती चली गई.....)
पुरानी परात में
अलसाए हाथ से
सफेद आटे में
सधे अंदाज़ में
पानी जा रहा है गिरता
मां गूंथ रही है कविता....
आंखों के आंसू
उसके तन का पसीना
बदल कर उसके
हाथों के स्वाद में
पानी में, आटे में, परात में
जा रहा है मिलता
मां गूंथ रही है कविता...
यादों के संदूक से
एक एक गहना
जो सजाया गया
माथे पर
या नहीं गया पहना
दोबारा गढ़ा जा रहा
दोबारा निखरता
मां गूंथ रही है कविता....
कविता गुंथती
मिलती बनती
वात्सल्य के आटे से
करुणा के पानी से
वक़्त की आंच पर
पक गई है
तो अब
उस पर
बिखर गए हैं
काले धब्बे
चारों ओर छितर गए हैं
उजली रोटी पर
मुझ पर
वक़्त के
फितरत के
स्याह निशान
और इनसे बेखबर
हर रोज़
मां
गूंथ रही है कविता.....

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

पूर्णमिदं

(एक कविता जो कुछ खास है.....एक कविता तो बेहद गहरे भावों से लिखी गई है....एक कविता जो अब तक पन्नों में कैद थी आज ब्लॉग पर भी आ गई है...शायद इसकी भी पूर्णता इसी में थी...किसके लिए है का प्रश्न अनुत्तरित ही रहने दिया जाए तो बेहतर होगा.....)

तुम पुष्प हो
इसमें भ्रम नहीं
तुम्हारा अतिशय सौंदर्य
अतिशयोक्ति नहीं
तुम खिले भी हो
वो भी अपने
पूर्ण, भरपूर, अप्रतिम
यौवन के साथ
पर तुम्हारे फूलने
की खुशी
थी अधूरी
अब तक
सुगंध के बिना
और अब
जब
मेरा स्वेद
तुमसे मिल गया है
हम दोनो
पूर्णता की ओर हैं
मैं फूल गया हूं
और तम
चिर प्रतीक्षित
सुवासित....

बुधवार, 23 सितंबर 2009

यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे....

लम्बे वक्त से ब्लॉगिंग से दूर था....कुछ वक्त नहीं मिलता था...कुछ मन नहीं करता था....और कुछ ठहराव था लेखनी में....अर्से बाद आज आया हूं तो कुछ विशेष है....कल संयुक्त राष्ट्र में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर एक बैठक हुई जहां कुछ विकसित राष्ट्रों ने कुछ बड़े वादे किए...तो मन में एक छोटी कविता उपजी और बह चली......पढ़ें और बचपन याद करें.....

यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे
शाम के धुंधलके में डराते से
सुबह हवा से लहराते से
धूप में छांव देने के मकसद से
पीपल से, कीकर से
बरगद से
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

सूरज की रोशनी से चमकते
चांदनी में चांदी से दमकते
तूफानों से झगड़ते
आंधियों में अकड़ते
इंसानों को बेहद प्यार करने वाले
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

उन डालियों पर
हम झूला करते थे
बैठते, कूदते थे उन पर
कई बार खाईं थी
निबोंलियां भी तोड़ कर
बड़े घनेरे, शाम सवेरे
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे

बारिश की बूंदे पत्तों पर ठहर कर
काफी देर तक
देती थीं
बारिश का अहसास
तब शायद दुनियावी समझ
नहीं थी अपने पास
अब जब अपने पास दुनिया है
दुनिया की समझ है
दुनिया की दौलत है
दुनिया की ताकत है
तब अपने पास धूप नहीं है
छांव नहीं है
पगडंडी और गांव नहीं है
आंधी और बरसात नहीं है
छत पे सोती रात नहीं है
खेत किनारे मेड़ नहीं है
कुछ भी नहीं है
पेड़ नहीं है....
सड़क किनारे
धूप से तपता
छांव को तकता
सोच रहा हूं
यहां कभी कुछ पेड़ हुआ करते थे......

बुधवार, 12 अगस्त 2009

कुछ जो कहा नहीं गया

अज्ञेय की एक और कविता जो मुझे बेहद पसंद है

है,अभी कुछ जो कहा नहीं गया ।
उठी एक किरण, धायी, क्षितिज को नाप गई,
सुख की स्मिति कसक भरी,निर्धन की नैन-कोरों में काँप गई,
बच्चे ने किलक भरी, माँ की वह नस-नस में व्याप गई।
अधूरी हो पर सहज थी अनुभूति :
मेरी लाज मुझे साज बन ढाँप गई-
फिर मुझ बेसबरे से रहा नहीं गया।
पर कुछ और रहा जो कहा नहीं गया।

निर्विकार मरु तक को सींचा है
तो क्या? नदी-नाले ताल-कुएँ से पानी उलीचा है
तो क्या ? उड़ा हूँ, दौड़ा हूँ, तेरा हूँ, पारंगत हूँ,
इसी अहंकार के मारे
अन्धकार में सागर के किनारे ठिठक गया : नत हूँ
उस विशाल में मुझसे बहा नहीं गया ।
इसलिए जो और रहा, वह कहा नहीं गया ।

शब्द, यह सही है, सब व्यर्थ हैं
पर इसीलिए कि शब्दातीत कुछ अर्थ हैं।
शायद केवल इतना ही : जो दर्द है
वह बड़ा है, मुझसे ही सहा नहीं गया।
तभी तो, जो अभी और रहा, वह कहा नहीं गया ।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

आखिरी स्मारक

एक युग का अंत हो गया...९७ साल का युग....गंगूबाई हंगल ने दो सदियां...उनके बीच की अंतर...वक्त का ठहराव और समय की रफ्तार सब कुछ देखा था....एक आखिरी स्मारक बन गया हिंदुस्तानी शास्त्रीय शैली के गायन के गर्वीले इतिहास का...किराना घराने की एक और पहचान गंगूबाई हंगल नहीं रहीं....
१९१३ में धारवाड़ में गंगूबाई का जन्म हुआ था....अपने गुरू सवाई गंधर्व से हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखने के लिए गंगूबाई, कुंडगोल जाया करती थी और वहां के लोग उस वक्त की प्रचलित परिपाटी के अनुसार उनका मज़ाक उड़ते हुए उनको गानेवाली कहते थे... और फिर धीरे धीरे यही उनका प्यार का उपनाम होता चला गया....
गंगूबाई कर्नाटक के एक दूरस्थ इलाके हंगल में रहती थी...और इससे उनको अपनी पहचान मिली और नाम के साथ जुड़ा गांव का नाम...हंगल...गंगूबाई हंगल की मां कर्नाटक शैली की शास्त्रीय गायिका थी पर जब बेटी ने हिंदुस्तानी शैली का गायन सीखने का फैसला किया तो मां ने बेटी के लिए खुद अपनी शैली को तिलांजलि दे दी...गंगूबाई की मां का नाम था अम्बाबाई.....गंगूबाई का जन्म एक मल्लाह परिवार में हुआ, जिसे उस वक्त सीधे सीधे सामाजिक संबोधनों में शूद्र कहा जाता था...पर उनके पिता और पति दोनो ब्राह्मण थे...लेकिन उससे भी बड़े आश्चर्य और साहस की बात कि उस दौर में भी न तो उनकी मां...और न उन्होंने ही अपने नाम के आगे अपने पति का उपनाम कभी प्रयोग किया...
अपने गुरु भाई भीमसेन जोशी को भीम अन्ना के नाम से सम्बोधित करने वाली गंगूबाई हंगल ने वो वक्त देखा है जब 9 दिन तक चलने वाले सालाना अखिल भारतीय संगीत समारोह में देश के सारे संगीत दिग्गज एक साथ जुटते थे...वो वक्त भी देखा जब फिल्म के बड़े सितारे शास्त्रीय गायकों का ऑटोग्राफ मांगा करते थे...और जनता की भीड़ शास्त्रीय संगीत सुनने के लिए जुटा करती थी...
गंगूबाई के पति जो आजीवन बेरोज़गार रहे.उनके लिए भी गंगूबाई का प्रेम मिसाल है...उनके पति ने उनकी कमाई हुई एक एक पाई गंवा दी पर उसके बाद भी गंगूबाई ने कभी शिकायत नहीं की..बल्कि उनको अपने आप से शिकायत रही कि पति के अंतिम वक्त में वो उनके साथ न थी....सिद्धेश्वरी देवी जब लकवे का शिकार होकर बिस्तर पर पड़ी थी..तब उनसे मिलने गई गंगूबाई से उन्होंने भैरवी सुनाने का आग्रह किया और आंखों से बहते आंसुओं के साथ उनको सुनती रहीं....
पद्म भूषण गंगूबाई हंगल आज नहीं रहीं...उनके निधन पर शोक व्यक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि वे एक महान जीवन जी कर गई थी...पर शास्त्रीय संगीत के विदा होते दिग्गजों की जयध्वनि के बीच शोक शास्त्रीय संगीत के निधन का है क्योंकि हमारी पीढ़ी में इसे लेकर ज़रा भी चेतना नहीं दिखती...गंगूबाई जन्म से भले ही किसी भी तथाकथित जाति से हों पर शास्त्रों की परिभाषा में वो पांडित्य के उच्चतम सोपानों पर थीं...जैसा कि मनुस्मृति कहती है
जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् द्विज उच्च्यते
गंगूबाई को श्रद्धांजलि.....


शनिवार, 27 जून 2009

जुल्फ - अंगडाई - तबस्सुम


अदम गोंडवी का नाम किसी के परिचय का मोहताज़ नहीं है....आज एक और उनकी नज़्म आपके लिए लाया हूँ....


जुल्फ - अंगडाई - तबस्सुम -
चाँद - आईना -गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर
इनका शबाब
पेट के भूगोल में
उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है
पढ़े दिल की किताब
इस सदी की तिश्नगी का
ज़ख्म होंठों पर लिए
बेयक़ीनी के सफ़र में
ज़िंदगी है इक अजाब
डाल पर मजहब की पैहम
खिल रहे दंगों के फूल
सभ्यता रजनीश के
हम्माम में है बेनक़ाब
चार दिन फुटपाथ के साये में
रहकर देखिए
डूबना आसान है
आंखों के सागर में जनाब
अदम गोंडवी

शनिवार, 13 जून 2009

कुछ यादें सिरहाने......

एक नया शहर ....जो पहली बार घर से निकलने की वजह से कुछ ज्यादा ही नया लग रहा था....अकेले सफर बहुत किया था पर कभी शायद ये नहीं सोचा था की लखनऊ से दूर कहीं रहना पड़ेगा....खैर भोपाल में आए ३-४ महीने बीत चुके थे और मैं या हम सब यह तो जान ही चुके थे कि कला और संस्कृति के मामले में भोपाल वाकई देश की कला राजधानी है....और सार्वजनिक प्रदर्शनों का गढ़ है....ऐसे में अपनी अपनी लखनवी जुबां के अलावा किसी चीज़ में बहुत ज्यादा गडबडी आती नहीं दिख रही थी....कई अच्छे दोस्त मिल गए थे पर मेरे विपरीत ज्यादातर कला के नाम पर भाग खड़े होते थे और यायावर फितरत का मैं अकेला ही भोपाल की सड़कें छानता रहता था....पहले से पता था कि मेरे दो पसंदीदा शख्स भोपाल के ही हैं....एक हबीब तनवीर और दूसरे बशीर बद्र...बशीर बद्र साहब से हालांकि आज तक मुलाक़ात नहीं हुई पर तनवीर जी से और किस्मत के मेल ने मिलवाया .....एक बार नहीं....तीन बार ....

एक सुबह अखबार में एक ख़बर से पता चला कि हबीब तनवीर शहर में हैं....उस वक़्त बहुत समपर्क ना थे और ना ही सम्बन्ध सो एक अंदाजा लगाया कि भारत भवन या रविन्द्र भवन में शायद दर्शन हो जायें....दर्शन से ज्यादा अपनी हैसियत नहीं लगती थी सो बस एक बार दूर से देखने का मन था कि आख़िर तस्वीरों में चिर युवा दिखने वाला ये शख्स क्या वाकई इतना युवा है....तो बस २ नंबर बस पकड़ कर पहुँच गए....रविन्द्र भवन....और वहाँ से घूमते हुए भारत भवन....और वाह री किस्मत दूर से ही किसी ने बताया कि वो रहे हबीब तनवीर....डरते हुए क़दमों से उनके पार पहुँचा....एक दुबला पतला सा वृद्ध बैठा कुछ लिख रहा था और आस पास बैठी थी तन्हाइयां ....

कुछ देर वहीं खड़ा रहा और फिर चुप्पी तोड़ कर बड़ी हिम्मत से बोला ....सर मेरा नाम मयंक सक्सेना है....लखनऊ का रहने वाला हूँ....आपसे मिलने आया हूँ....हड़बड़ी में बोले गए मेरे इस आखिरी वाक्य पर वे मुस्कुरा दिए और वैसे ही लिखते हुए हाथ से बैठ जाने का इशारा किया...मैं वहीं बैठ गया....५ मिनट बाद मुझसे मुखातिब हुए और बोले क्या नाम बताया ....?

मैंने दुबारा अपना पूरा परिचय दोहरा दिया ....फिर तुंरत एक दूसरा प्रश्न.....पत्रकार तो नहीं हो...?....जवाब दिया ...नहीं सर पढ़ाई कर रहा हूँ....आपसे मिलने की इच्छा थी....उधर से नहीं ठीक है....पत्रकार होते तो कहता कि अभी फुर्सत नहीं है.....और उसके बाद तमाम बातें....मेरी पढ़ाई से लेकर नाटक...अभिनय...संगीत और लोक कलाओं पर...सरकारों के रवैये पर....क्या क्या पढ़ते हो साहित्य में....ख़ुद क्या लिखते हो....अपने नाटकों पर बात...दूसरों के नाटकों पर बात.....तमाम बातें....और उनका पुराना पाइप....उनकी उँगलियों में....

काफ़ी देर बाद....अचानक उठ खड़े हुए और बोले....चलिए अब मेरे पास और वक़्त नहीं है तो ....और मैं सीधा इशारा समझ गया....और लौट चला घर के लिए....सोचते हुए कि इतना बड़ा व्यक्तित्व और इतना सरल व्यक्ति....उस दिन की मुलाक़ात हलाँकि जीवन की एक धरोहर थी पर ना जाने क्यूँ लग रहा था कि कुछ रह गया है जो अगली बार मिलने पर ही पूरा होगा....अगला मौका भी आया पर कुछ दिनों बाद....उस समय तक सूचना तंत्र थोड़ा मज़बूत हो गया था सो उनके आने की सूचना पहले ही मिल गई....इस बार जगह थी रविन्द्र भवन.....

इस बार उत्सुकता तो उतनी ही थी पर डर पिछली बार से कम...बल्कि नहीं के बराबर.....कई लोग थे ...जैसे तैसे उनसे मिला...देखते ही बोले...फिर आ गए...ऐसा लगा कि ज़रूर मुझसे चिद्ध गए हैं...पर फिर ठठा के हंस दिए और कहा आओ....इस बार तबियत थोडी ख़राब थी...मुझसे कहा कि तबियत ठीक नहीं है पर ज़िन्दगी ही थियेटर है तो किया भी क्या जाए....मैंने पता नहीं क्यों बिना सोचे पूछ लिया ...आपकी टोपी कहाँ है...इस बार मुझे लगा कि फिर गलती हुई पर वे मुस्कुराए...और बगल में रखी चिर परिचित टोपी उठा कर बोले ...इसकी बात कर रहे हो....और मैं भी हंस पडा...... इस बार ज्यादा बात नहीं हो पायी पर मैंने एक सवाल पूछा कि आपके बाद इस विरासत का क्या....ये लोक और आधुनिक कला का मेल कौन करेगा...तो एक आश्चर्यजनक उत्तर जिसमे चिंता का कोई नामोनिशान नहीं...कोई ना कोई कर लेगा....बोलकर फिर बोले ...मैंने भी तो किया ही.....कई लोग हैं जिनकी ज़िन्दगी में बस्ता है ये सब.....फिर थोडी सी फिल्मों पर बात हुई...और फिर कुछ प्रेस फोटोग्राफरों को देख कर मैंने कहा कि आपके साथ तस्वीर खिंचवाना चाहता हूँ....तो मना कर दिया और बोले कि ....तस्वीर आंखों से उतारो..और दिमाग में सहेज लिया करो....जाओ ज़िन्दगी में बढ़िया करो....
उसके बाद एक बार मुलाक़ात हुई पर बहुत कम बात हुई ...उनकी तबियत वाकई ख़राब रहने लगी थी....उसके बाद समय बीत गया....भोपाल छूट गया....और अब ख़बर आई कि हबीब नहीं रहे.....सब उनको याद कर रहे हैं....कोई उनके नाटकों के लिए ..कोई कला के लिए तो कोई उनके ख़बर होने की वजह से...नई नौकरी की नई व्यस्ततताओं की वजह से कुछ समय नही लिखा पाया ...तुंरत नहीं लिख पाया ...पर मैं उनको याद कर रहा हूँ....उनसे अपनी छोटी छोटी तीन मुलाकातों के लिए.....और उस एक वाक्य के लिए.....
तस्वीर आंखों से उतारो..और दिमाग में सहेज लिया करो
और आज उनके ना होने पर भी कुछ तस्वीरें ताज़ा हैं...जो आंखों से उतारी गई थी....और कुछ यादें आज भी सिरहाने हैं....






रविवार, 31 मई 2009

प्रतीक्षा

अरसे बाद आज ब्लॉग पर लिख रहा ....हूँ इतने समय की प्रतीक्षा के बाद आज लिख पा रहा हूँ....तो दुष्यंत की एक कविता....

परदे हटाकर करीने से
रोशनदान खोलकर
कमरे का फर्नीचर सजाकर
और स्वागत के शब्दों को तोलकर

टक टकी बाँधकर बाहर देखता हूँ
और देखता रहता हूँ मैं।
सड़कों पर धूप चिलचिलाती है
चिड़िया तक दिखायी नही देती
पिघले तारकोल में
हवा तक चिपक जाती है
बहती बहती,

किन्तु इस गर्मी के विषय में
किसी से
एक शब्द नही कहता हूँ मैं।
सिर्फ़ कल्पनाओं से
सूखी और बंजर ज़मीन को खरोंचता हूँ
जन्म लिया करता है जो ऐसे हालात में
उनके बारे में सोचता हूँ
कितनी अजीब बात है कि आज भी
प्रतीक्षा सहता हूँ।

दुष्यंत कुमार

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

धूमिल की एक और कविता ...प्रजातंत्र

वे घर की दीवारों पर
नारे लिख रहे थे
मैंने अपनी दीवारें जेब में रख लीं

उन्होंने मेरी पीठ पर
नारा लिख दिया
मैंने अपनी पीठ कुर्सी को दे दी

और अब पेट की बारी थी
मै खूश था कि मुझे
मंदाग्नि की बीमारी थी और
यह पेट है
मैने उसे सहलाया

मेरा पेट
समाजवाद की भेंट है
और अपने विरोधियों से कहला भेजा
वे आएं-
और साहस है तो लिखें,
मै तैयार हूं

धूमिल
न मैं पेट हूं न दीवार हूं न पीठ हूं अब मै विचार हूं।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

अच्छा अनुभव

भवानी भाई की एक कविता जो मुझे बेहद पसंद है....

मेरे बहुत पास
मृत्यु का सुवासदेह पर
उस का स्पर्श मधुर ही कहूँगा
उस का स्वर कानों में
भीतर

मगर प्राणों में
जीवन की लय तरंगित
और उद्दाम किनारों में
काम के बँधा प्रवाह नाम का
एक दृश्य सुबह का
एक दृश्य शाम का

दोनों में क्षितिज पर
सूरज की लाली दोनों में
धरती पर छाया घनी
और लम्बी इमारतों की
वृक्षों की देहों की काली
दोनों में कतारें पंछियों की
चुप और चहकती हुई दोनों में
राशीयाँ फूलों की
कम-ज्यादा महकती हुई
दोनों में

एक तरह की शान्ति
एक तरह का आवेग
आँखें बन्द प्राण खुले हुए
अस्पष्ट मगर धुले हुऐ
कितने आमन्त्रण
बाहर के भीतर के

कितने अदम्य इरादे
कितने उलझे कितने सादे
अच्छा अनुभव है मृत्यु
मानो हाहाकार नहीं है
कलरव है!

- भवानीप्रसाद मिश्र

रविवार, 5 अप्रैल 2009

एक रात का मेहमान....पुचकू..!

वो एक रात अचानक मिला था और सुबह अचानक ही हमें छोड़कर चला गया था.....मेहमान था एक रात का....रात भर खूब मज़ा उठाया उसने मेहमाननवाजी का और फिर सुबह जब हम उसे जगाने गए तो....
कहानी बहुत लम्बी नहीं है और ना ही बहुत रोचक पर हाँ बताती ज़रूर है कि इंसान कैसा भी हो, कोई भी हो ....उसकी फितरत हमेशा इंसानी ही रहती है और इंसानी फितरत ही है दरअसल प्यार करने की ....टूट कर प्यार करने की !
एक दिन अचानक बहन जी का फ़ोन आया (बहन जी मतलब देविका...उम्र में छोटी है पर उसके हर आदेश का पालन करता हूँ सो बहन जी कहता हूँ) की आज मन्दिर चलना है, अब हम तो वैसे ही भगवान् के दर ज्यादा नहीं जाते (क्यूंकि अगर वो है तो सब जगह है, नहीं है तो कहीं नहीं) सो अरसा हुआ था मन्दिर गए तो हमने हां कर दी और साथ ही हिमांशु भी तैयार हो गया। शाम को खाली होते ही चल दिए हम सेक्टर १९ के भव्य मन्दिर की ओर (नॉएडा में ऐसा मन्दिर भव्य ही कहलाता है), नियमों को ठेंगा दिखाते हुए हम एक बाइक पर तीन लोग सवार हुए और किसी चौथे की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी पर शायद चौथे को आना ही था और इसका अंदाजा हमें नहीं था।
मन्दिर में जाकर सभी मूरतों के माथा टेक कर हम जब बाहर निकले तो काफ़ी वक़्त एक छोटी बच्ची के साथ मैं और देविका फुटबाल खेलते रहे और फिर हिमांशु का परेशान चेहरा देखकर ही चलने को तैयार हुए (हिमांशु आदतन अधीर हैं) बाहर जूते लेने जब स्वयंसेवियों के पास पहुंचे तो देखा कि एक छोटा सा खरगोश का बच्चा उनके पास एक पिंजरे में खेल रहा है.....तभी मेरा हाथ अपनी पतलून की जेब में गया और पाया कि गाड़ी की चाबी गायब है, तुंरत भाग कर अन्दर गया और पूरा मन्दिर खोज डाला पर चाबी नहीं मिली ....लौट कर आया तो पता चला कि चाबी हेलमेट में ही पड़ी रह गई थी पर चाबियों के साथ ही एक और चीज़ मिली उन लोगों के हाथ में....जिसको देख कर चाबियाँ और घर सब भूल गया......स्वयंसेवकों के पास खेलता वो नन्हा खरगोश अब देविका के हाथ में था और उसके चेहरे पर वात्सल्य का वह आनंद देखते ही बन रहा था।
मैंने अचरज से जब पूछा कि यह कैसे तो जवाब पहले ही मिल गया कि "उन लोगों से मांग लिया", मैं इस प्रयास से आश्चर्यचकित था कि ममत्व जब उमड़ता है तो क्या नहीं कराता। खैर घर लौटते पर बाइक पर चार लोग हो चुके थे पर असुविधा का भाव गायब था। घर पहुँचते ही देविका सब कुछ भूल कर उस नन्हे प्राणी के साथ जुट गई और उसे प्यार से नाम दिया पुचकू .....पुचका बांगला में गोलगप्पे को कहते हैं, और प्यार से बात करने को पुचकारना भी कहा जाता है, तो कुल मिलाकर लड़कियों को जो चीज़ खाने में सबसे ज्यादा पसंद है उसको और प्यार को मिलाकर बन गया नाम पुचकू।
पुचकू रात ८ बजे से लेकर १२ बजे तक हमारे घर में इधर से उधर दौड़ता और खेलता रहा....फिर उसके बाद देविका के घर पर भी यही क्रम चला रात दो बजे तक। पहली बार ममता का अनुभव पहली बार माँ बननेसे कमतर नहीं होता यह पता चल रहा था। उसके खाने के लिए पालक खरीदी गई थी....उसे पार बार पकड़ कर अपनी नाक पर कटवाया जा रहा था, उसकी चूमा जा रहा था और सहलाया जा रहा था। पशु भी प्रेम के भाव और उसकी कीमत समझते हैं (शायद मनुष्य से ज्यादा) सो वह भी लगातार सकारात्मक उत्तर दे रहा था....उसकी आंखों में गज़ब की चमक थी.......और चैतन्यता भी
उसके फ़र जैसे कोमल बाल, उसकी चंचल आँखें, प्यारी सी नाक और उसका जवाबी प्रेम रात दो बजे तक दोनों (देविका और पुचकू) को जगाता रहा! सुबह उठकर सबसे पहले पुचकू का पिंजरा फिर से खोला गया उसे खिलाया गया.....दौडाया गया और नहलाया धुलाया गया.....(अच्छे बच्चे रोज़ नहाते हैं) उसके लिए विशेष तौर पर पानी गुनगुना किया गया और उसके बाद उसे दुबारा अपने पिंजरे में रखा गया। १ घंटे बाद जब तैया होकर बहनजी पुचकू से खेलने पहुँची तो वो उत्साह नहीं था....चमकती आँखें बिल्कुल उदास थी.....चंचलता और फुर्ती गायब थी.....कोई उत्सुकता नहीं जैसी रात को थी ! लगा कि अभी मूड नहीं है और निकला गया दफ्तर की ओर, सखी से कहकर कि इसका ध्यान रखने ...
शाम को घर पहुँचते ही ख़बर मिली कि पुचकू नहीं रहा......समझ ही में नहीं आया कि क्या कहा जाए, रात तक तो वह बिल्कुल स्वस्थ था....फिर किसी ने बताया कि वह था ही बीमार.... हालाँकि इस तरह के समाचार कई बार मिलते रहते हैं कि फलाना नहीं रहा पर इस बार अजीब सा लगा....चाय पीने जा रहा था मन नहीं हुआ लौट आया.....काम में भी मन नहीं लगा उस दिन समय से ही निकल लिया...देविका का भी मन अन्दर से तो ख़राब था ही पर हमेशा की तरह ऊपर से नहीं दिखा रही थी। घर पहुंचे तो पुचकू का पिंजरा दिखा वैसे ही कपड़े से ढंका हुआ, हिम्मत कर के पिंजरे पर से कपड़ा हटाया तो जो सूना था वही मिला, पुचकू नहीं रहा।
बच्चा जो इतनी देर से ख़ुद को संभाले हुई थी उसको पिंजरे से बाहर निकाल कर गोद में लेकर सहलाने लगी और फूट फूट कर रो पड़ी......मैंने भी रोका बहुत पर आंसू रुके नहीं। पर देविका को समझाना जो था पर वो तो गोद में मृत खरगोश को लिए रोये जा रही थी और क्या किया भी जा सकता था....रात भर कितनी योजनायें बनी होंगी...कि इसको ये खिलाएंगे, घर पर सबको बता दिया था.....लगा था कि अकेलेपन को कोई बांटेगा, पर एक ही रात में......खैर बड़ी मुश्किल से उससे पुचकू का शरीर लेकर उसे एक कपड़े में लपेटा और तय हुआ कि इसे हिंडन में बहा दिया जायेगा......रास्ते भर देविका रोती रही, हिंडन नदी में जैसे ही उसे प्रवाहित किया फिर उसकी रुलाई छूट पड़ी और अन्दर ही अन्दर मैं भी.......एक रात का मेहमान !
ये वृत्तान्त महज़ इसलिए नहीं कि कुछ लिखना था बल्कि इसलिए कि इंसान होने का क्या मतलब है और ममत्व केवल अपने बच्चों को ही प्यार करना नहीं है यह बात करने के लिए है। हम इंसान है और उसके बाद एक पशु से भी इतना प्यार कर लेते हैं कि उसका विछोह बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, भले ही उससे मिले कुछ ही वक़्त हुआ हो....वात्सल्य किसी भी स्त्री का मूलभूत गुण है और वह उसको बरसाती है बिना यह देखे कि वह उसका अपना बच्चा है या कोई और........हम एक पशु से भी प्यार कर लेते हैं और उस पर प्रेम की, नेह की, वात्सल्य की वर्षा कर देते हैं फिर हम इंसानों को प्यार क्यूँ नहीं कर पाते हैं......? क्यूँ हम एक दूसरे का ही खून बहा देते हैं.......
क्यों हम भेद करते हैं......क्या हम इंसान रहना चाहते हैं और क्या चाह कर भी हम अपनी मूलभूत प्रवृत्ति बदल सकते हैं ?
जवाब चाहिए.....क्यूंकि एक रात का मेहमान मुझे बहुत कुछ सिखा गया है !

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

रामनवमी विशेष: भये प्रगट कृपाला

रामनवमी की शुभकामनाओं के साथ सुनें जगजीत सिंह की आवाज़ में राम जन्म का भजन.....

आज के दिन ये कामना है कि राम कोई लड़ने का बहाना ना बने बल्कि उनको जीवन में उतारा जाए.....



मंगलवार, 31 मार्च 2009

बापू वाकई आज खुश होंगे......

बहरहाल अब जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने संजू बाबा के चुनाव लड़ने पर रोक लगा ही दी है तो इस पर ज्यादा टीका टिप्पणी नहीं पर इतना ज़रूर कहूँगा किएक लखनवी होने के नाते खुश हूँ......तो आज इसी परिप्रेक्ष्य में देखें हमारी चुनावी चित्र कथा ('अमर' चित्र कथा विवादित हो जायेगा) का अगला अंक.....




दरअसल यह पोस्ट की प्रतिष्ठा की हानि के लिए नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की प्रतिष्ठा की हानि के ख़िलाफ़ है। वाकई देश में न्यायपालिका अभी जिंदा है.....सत्यमेव जयते ! बापू वाकई आज खुश होंगे......

सोमवार, 30 मार्च 2009

दुनिया जिसे कहते हैं.....

कई महीने बाद एक बार फिर आपके लिए पुरानी डायरी के पीले पन्नों से कुछ हर्फ़ निकाल के लाया हूँ.....एक कविता जो छोटी है (मैं अक्सर बड़ी कवितायें लिखता हूँ) पर मुझे पसंद है, उस समय जब कॉलेज में थे...तब कैसा लगता था, क्या विचार थे उस को लिख डाला था....घर के बाहर की दुनिया बड़ी अजीब लगने लगी थी। अचानक से माहौल बदलने लगा था, अब समझ में आता है कि आज जो है...वो इसकी शुरुआत थी ! खैर आप कविता पढ़ें.....पीले पन्नों पर इसकी तारीख दर्ज है सोलह अक्टूबर, २००७......

दुनिया

आँखें
झपकती
खुलती-मुंदती,
बार बार
देखती हैं,
समझती हैं
कितना अबूझ, यह संसार !

फिर मुंदती हैं
और फिर देखती हैं
देखो जहाँ तक फैला है,
इसका विस्तार

फिर हंसती हैं आँखें
इसकी संपत्ति पर
हैरान हो
इसकी गति पर !
भयभीत हो
इसकी मति पर....

फिर फैल जाती हैं
सोचती हैं
दुनिया का
कितना नन्हा है आकार
दाई आँख के इस कोर
से शुरू
और
बायीं आँख के कोर पर.....

फिर विचलित हो
समझती हैं सारा व्यापार
जान जाती हैं
ये दुनिया है बाज़ार

फिर मुंद जाती है
और
गिरा देती हैं
कुछ बूँद
आंसू................

मयंक

रविवार, 29 मार्च 2009

तो आप क्या कहते हैं ?

आज इन्टरनेट पर टहलते हुए एक उक्ति हाथ लगी....पढ़ी तो मज़ा आया.....समझी तो ज्ञान पाया.....पर आप बताएं की क्या आप इससे सहमत हैं ? मतलब की इसके जवाब में आप क्या कहते हैं......लेखक का नाम नहीं पता चल पाया पर जिसने भी कही खूब कही .....आप कहें आप के क्या विचार हैं....उक्ति है,
Politicians are like diapers. They both need changing regularly and for the same reason.
अर्थात जजमान.....की नेता लोग डाइपर (समझते हैं ना) की तरह होते हैं, दोनों को ही नियमित रूप से बदलना पड़ता है....वो भी एक ही वजह से !
तो आप कहें आप क्या कहते हैं ?

शनिवार, 28 मार्च 2009

फिर फिर देखें....फिर फिर मज़ा लें !

वरुण गांधी भाजपा के गांधी हैं और राजनीति के भाजपाई स्कूल में कट्टरपंथ की तालीम तो उनको दे ही दी गई है, अब अगला घंटा (कक्षा) है राजनीतिक नौटंकी सीखने की ....सो आज वह भी लग गई है पॉलिटिकल ड्रामे के असाइंमेंट के तौर पर आज वरुण गांधी पीलीभीत में गिरफ्तारी देने जा रहे हैं, दो दिन पहले एक तस्वीर बनाई थी आज उसे पब्लिश कर देते हैं.......

वरुण ये कह रहे हैं कि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं कहा.....फिर कह रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ साजिश हुई है, फिर कहते हैं कि वि जेल जाने को तैयार हैं.....क्या ये बयान विरोधाभासी नहीं ?जवाब अपने अन्दर ढूँढिये.....हिंदुत्व का ये चिन्तक इतने दिन कहाँ था ?

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

सृजन का पर्व....नव त्राण की कल्पना

गुडी पडवा, उगादि या युगादि या कहें तो वर्ष प्रतिपदा....कुल जमा आज भारतीय पारंपरिक कैलेंडर या कहें तो पंचांग का पहला दिन है तो मतलब यह की आज नए वर्ष का पहला दिन है, पारंपरिक नव वर्ष का। वस्तुतः प्राचीन पंचांग (विक्रमी और शक दोनों) के अनुसार चैत्र मास की प्रतिपदा वर्ष का पहला दिन है, आज वही दिन है। पुरातन मान्यता यह है कि आज ही के दिन ब्रह्मा ने सृष्टि की सरंचना का आरम्भ किया था सो नई सरंचना का पहला दिन है नव संवत्सर .......इसीलिए इस दिन से ही पंचांग या वर्ष की शुरुआत मान ली गई। तो भाई सबसे पहले आप सबको बधाई.....जैसा कि बच्चन जी एक जगह जल्दबाज़ीमें लिख गए,
वर्ष नव,हर्ष नव,
जीवन का उत्कर्ष नव।

नव उमंग,नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह,नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

गीत नवल,प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,

जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

पढ़ के लगा तो होगा कि जल्दबाज़ी में ही लिख गए पर अर्थ गहरे हैं, यह तो खैर महान रचनाकारों की खासियत है कि जब जल्दबाज़ी में लिखते हैं तो और भी अच्छा लिखते हैं (और जो ख़ुद की भी समझ में ना आए वह कालजयी हो जाता है :) ) फिलहाल विषय को आगे बढाते हैं नव संवत्सर बहुत महत्वपूर्ण तिथि है हालांकि वर्तमान युग में हमारी आधुनिक जीवन शैली रोमन कैलेंडर को ही प्राथमिकता देती है सो इसकी पूछ अधिक नहीं बची पर आपको बता दूँ कि शक संवत हमारे देश का राष्ट्रीय पंचांग है सो उस हिसाब से भी यह साल का पहला दिन ही है। इसे महारष्ट्र में शालिवाहन की दंतकथा से जोड़ कर विजय के पर्व गुडी पड़वा के रूप में मनाया जाता है तो कर्नाटका और आन्ध्र प्रदेश में उगादि के नाम से। उगादि दरअसल एक अपभ्रंश शब्द है जो संस्कृत के युगादि से प्राप्त किया गया है, युगादि यानी कि युग की शुरुआत जो सृष्टि की सरंचना की ही ओर इंगित करता है।
पर इसके अलावा भी इस तिथि की कुछ विशेषताएं हैं जो शायद हमें मालूम हो तो हम इसे केवल नव वर्ष के दिन के तौर पर नहीं देखेंगे। बहुत से लोगों को नहीं मालूम होगा पर हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा के विरोध का साहस दिखलाने वाले स्वामी दयानंद ने संकीर्ण हिन्दू धर्म मत के ख़िलाफ़ जा कर आर्य समाज की स्थापना १८७५ में इसी दिन मुंबई में की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी दिन श्री राम का वनवास से लौटने के बाद राज्याभिषेक किया गया था। यही नहीं उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत भी इसी दिन से चालू किया था। इतिहास कहता है कि प्रख्यात गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से अपने प्रसिद्द पंचांग की गणना करनी शुरू की थी।
अक्सर इतिहास मुद्दों से भटकाने में अहम् भूमिका अदा करता है और ऐसा ही होगा अगर मैं वापिस मुद्दे पर नहीं आऊंगा तो, उदाहरण चाहिए तो हमारे नेताओं से मिलिए जो आज तक इतिहास से उबर नहीं पाये हैं; कभी ईश्वर की जन्मभूमि के नाम पर खून बहवा देते हैं तो कभी धर्मयुद्ध के नाम पर.....कुल जमा बवाल इतिहास का है जबकि हम यह भी नहीं जानते हैं कि वास्तविकता में हमारे इतिहास को लिखते वक़्त कितना खेल (Manipulation) हुआ है, जैसा कि मनु स्मृति की प्रतियाँ बनाते पर हुआ और कितनो को हमने वर्ण के आधार पर उनके अधिकारों से वंचित कर दिया। इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि इतिहास की बात करते करते मैं फिर भटक गया...देखा!
तो मुद्दा था पारंपरिक नव संवत्सर का.....देने आया था बधाई तो यह दिन मनाते हैं कि इस दिन सरंचना शुरू हुई थी....सृष्टि की सरंचना..........सृष्टि जो हमारे आस पास हमारे लिए है! प्रकृति जो वास्तविक देवता है, सृष्टि जो हमें वह सब देती है जो हमें चाहिए.....और फिर हम कह देते हैं कि अहं ब्रह्मास्मि ! अभी हाल ही में पापुआ न्यू गिनी द्वीप समूह पर वैज्ञानिकों ने ५० से भी अधिक नई जीव प्रजातियाँ ढूंढी हैं जो अब तक अज्ञात थी.....इस सुंदर सृष्टि के बारे में ना जाने कितने सच हमें पता तक नही पर हम परग्रहों को नापने निकल पड़े हैं। हम ख़ुद को ही नहीं जानते तो अन्तरिक्ष को छान डालने से क्या होगा? यह दर्शन नहीं है पर .....हम जिस तरह से तरक्की के नाम पर इस सुंदर सृष्टि का दोहन कर इसे बरबाद कर रहे हैं, हम कहीं ना कहीं इतनी महान सरंचना से निर्मम खिलवाड़ कर रहे हैं....हम सृष्टि का सर्जन नहीं कर सकते फिर किसने अधिकार दिया हमें विनाश का ...........
पर कौन समझाए मानव को जो ख़ुद मानव तक को नहीं बख्शता.....मज़हब और सोच की जिदों पर इंसानियत को बलि चढ़ा देता है उससे क्या उम्मीद की जाए पर आज नव संवत्सर के दिन आप सबसे अनुनय है कि कुछ सोचें कि सृजन ज़रूरी है कि अहं ........आज नया वर्ष शुरू हो रहा है, आइये प्रण लें कि नए साल में वाकई इंसान कहलाने लायक योग्यताएं हासिल करने की कोशिश करेंगे......
अंत में सोहन लाल द्विवेदी की कविता नव वर्ष

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;

मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;

श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;

जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!
एक बार फिर मंगलकामनायें ............

मंगलवार, 24 मार्च 2009

कुछ सूचनाएँ ....

दो दिन पहले आपको कवि धूमिल की एक रचना पढ़वाई थी, आज कवि धूमिल की एक और व्यवस्था को ललकारती कविता प्रस्तुत है;

कुछ सूचनाएँ

सबसे अधिक हत्याएँ
समन्वयवादियों ने की।
दार्शनिकों ने
सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।
भीड़ ने कल बहुत पीटा
उस आदमी को
जिस का मुख ईसा से मिलता था।

वह कोई और महीना था।
जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,
किंतु इस बार तो
मौसम बिना बरसे ही चला गया
न कहीं घटा घिरी
न बूँद गिरी
फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु
कई प्रतिशत बढ़ गए

कई बौखलाए हुए मेंढक
कुएँ की काई लगी दीवाल पर
चढ़ गए,
और सूरज को धिक्कारने लगे
--व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है
सूरज कितना मजबूर है
कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।

हवा बुदबुदाती है
बात कई पर्तों से आती है—
एक बहुत बारीक पीला कीड़ा
आकाश छू रहा था,
और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर
शौचालयों के सामने
पँक्तिबद्ध खड़े हैं।

आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं
लोग खोई हुई आवाज़ों में
एक दूसरे की सेहत पूछते हैं
और बेहद डर गए हैं।
सब के सब
रोशनी की आँच से
कुछ ऐसे बचते हैं
कि सूरज को पानी से
रचते हैं।

बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चौरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए,
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर

प्रेम में असफल छात्राएँ
अध्यापिकाएँ बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी-
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई,
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है

मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़को पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है
संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क,
आरामकुर्सी पर
चित्त पड़े हैं।

स्व. सुदामा प्रसाद पाण्डेय धूमिल

सोमवार, 23 मार्च 2009

शहीद सुखदेव का महात्मा गांधी को पत्र

आज २३ मार्च है और इसी दिन १९३१ में क्रान्ति के महानायकों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई थी, आज के दिन आपके सामने हम प्रस्तुत कर रहे हैं एक दुर्लभ पत्र जो मार्च १९३१ में अपनी फांसी से पहले वीर सुखदेव ने महात्मा गांधी को लिखा था। देखें कि किस तरह सुखदेव का जीवन क्रांति के विचारों को समर्पित था,

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परम कृपालु महात्मा जी,
आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की सफलता के बाद आपने क्रांतिकारी कार्यकर्त्ताओं को फिलहाल अपना आंदोलन बंद कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौक़ा देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं.
वस्तुतः किसी आंदोलन को बंद करना केवल आदर्श या भावना से होनेवाला काम नहीं है. भिन्न-भिन्न अवसरों की आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता है.
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अंतिम समझौता न होगा.
मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ गए होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले-मकसूद पर पहुँच गए हैं.
संपूर्ण स्वतंत्रता जब तक न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बँधी हुई है.
उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा विश्राम है.
इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की कल्पना की जा सकती और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है.
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आंदोलन के अगुआओं का है.
लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आपने फिलहाल सक्रिए आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा है, तो भी वह प्रस्ताव तो कायम ही है.
इसी तरह हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही साफ पता चलता है कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाज-सत्तावादी प्रजातंत्र की स्थापना करना है.
यह प्रजातंत्र मध्य का विश्राम नहीं है. उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने के लिए बँधे हुए हैं.
परंतु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध-नीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे. क्रांतिकारी युद्ध जुदा-जुदा मौकों पर जुदा-जुदा रूप धारण करता है.
कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी केवल आंदोलन-रूप होता है, और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन जाता है.
ऐसी दशा में क्रान्तिवादियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए. परंतु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया. निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतिवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता, हो नहीं सकता.
आपके समझौते के बाद आपने अपना आंदोलन बंद किया है, और फलस्वरूप आपके सब कैदी रिहा हुए हैं.
पर क्रांतिकारी कैदियों का क्या? 1915 से जेलों में पड़े हुए गदर-पक्ष के बीसों कैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं.
मार्शल लॉ के बीसों कैदी आज भी जिंदा कब्रों में दफनाये पड़े हैं. यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का है.
देवगढ़, काकोरी, मछुआ-बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र के कैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बंद पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं.
लाहौर, दिल्ली, चटगाँव, बम्बई, कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज़्यादा षड्यंत्र के मामले चल रहे हैं. बहुसंख्यक क्रांतिवादी भागते-फिरते हैं, और उनमें कई तो स्त्रियाँ हैं.
सचमुच आधे दर्जन से अधिक कैदी फाँसी पर लटकने की राह देख रहे हैं. इन सबका क्या?
लाहौर षड्यंत्र केस के सज़ायाफ्ता तीन कैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गए हैं और जिन्होंने जनता की बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की है, वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नहीं हैं.
उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नहीं है. सच पूछा जाए तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फाँसी पर चढ़ जाने से ही अधिक लाभ होने की आशा है.
यह सब होते हुए भी आप इन्हें अपना आंदोलन बंद करने की सलाह देते हैं. वे ऐसा क्यों करें? आपने कोई निश्चित वस्तु की ओर निर्देश नहीं किया है.
ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आंदोलन को कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं, और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को द्रोह, पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है.
यदि ऐसी बात नहीं है, तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते.
अपना आंदोलन बंद करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्धी की प्रतीति करा लेने का प्रयत्न करना चाहिए था.
मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं, विनाश और संहार में आनंद मानने वाले हैं.
मैं आपको कहता हूँ कि वस्तुस्थिति ठीक उसकी उलटी है, वे सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं, और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं, उसका उन्हें पूरा-पूरा ख्याल होता है.
और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग की अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यंत महत्त्व का मानते हैं, हालाँकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवा और कोई चारा उनके लिए नहीं है.
उनके प्रति सरकार की मौजूदा नीति यह है कि लोगों की ओर से उन्हें अपने आंदोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है, उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाए. अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है.
ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि-भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करनेवाली होगी.
इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि या तो आप कुछ क्राँतिकारी नेताओं से बातचीत कीजिए-उनमें से कई जेलों में हैं- और उनके साथ सुलह कीजिए या ये सब प्रार्थनाएँ बंद रखिए.
कृपा कर हित की दृष्टि से इन दो में से एक कोई रास्ता चुन लीजिए और सच्चे दिल से उस पर चलिए.
अगर आप उनकी मदद न कर सकें, तो मेहरबानी करके उन पर रहम करें. उन्हें अलग रहने दें. वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं.
वे जानते हैं कि भावी राजनैतिक युद्ध में सर्वोपरि स्थान क्रांतिकारी पक्ष को ही मिलनेवाला है.
लोकसमूह उनके आसपास इकट्ठा हो रहे हैं, और वह दिन दूर नहीं है, जब ये जमसमूह को अपने झंडे तले, समाजसत्ता, प्रजातंत्र के उम्दा और भव्य आदर्श की ओर ले जाते होंगे.
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हों, तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिए.
आशा है, आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्वसाधारण के सामने प्रकट करेंगे.
आपका
अनेकों में से एक

शनिवार, 21 मार्च 2009

जनतन्त्र के सूर्योदय में

चुनाव का मौसम आ चला है और नेता टाइप लोग लोकतंत्र और जनतंत्र के बड़े बड़े नारे बुलंद कर रहे है और बातें बना रहे हैं। ऐसे ही विडंबना पूर्ण समय को श्रद्धासुमन चढाती हुई एक कविता अभी कल ही पढ़ी, कवि धूमिल के संग्रह संसद से सड़क तक में और कविता ने ऐसी चोट की किरात यही सोचते गुजरी कि सुबह इसे पोस्ट करना ही है.....तो पढ़ें...

जनतन्त्र के सूर्योदय में

रक्तपात –कहीं नहीं होगा
सिर्फ़, एक पत्ती टूटेगी!
एक कन्धा झुक जायेगा!
फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई आँखों को
एक साथ लाल फीतों में लपेटकर
वे रख देंगेकाले दराज़ों के निश्चल एकान्त में
जहाँ रात में संविधान की धाराएँ
नाराज़ आदमी की परछाईं को
देश के नक्शे में
बदल देती है

पूरे आकाश को
दो हिस्सों में काटती हुई
एक गूँगी परछाईं गुज़रेगी
दीवारों पर खड़खड़ाते रहेंगे
हवाई हमलों से सुरक्षा के इश्तहार
यातायात को
रास्ता देती हुई जलती रहेंगी
चौरस्तों की बस्तियाँ

सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा
पीला अन्धकार
शहर की समूची
पशुता के खिलाफ़
गलियों में नंगी घूमती हुई
पागल औरत के 'गाभिन पेट' की तरह
सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा पीला अन्धकार
और तुम
महसूसते रहोगे कि ज़रूरतों के
हर मोर्चे पर
तुम्हारा शक
एक की नींद और
दूसरे की नफ़रत से
लड़ रहा है
अपराधियों के झुण्ड में शरीक होकर
अपनी आवाज़ का चेहरा टटोलने के लिए
कविता मेंअब कोई शब्द छोटा नहीं पड़ रहा है :
लेकिन तुम चुप रहोगे;
तुम चुप रहोगे और लज्जा के
उस गूंगेपन-से सहोगे –
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है, जो महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए एक साड़ी पर राज़ी है
सिर कटे मुर्गे की तरह फड़कते हुए
जनतन्त्र में
सुबह –सिर्फ़ चमकते हुए रंगों की चालबाज़ी है
और यह जानकर भी, तुम चुप रहोगे

या शायद, वापसी के लिए पहल करनेवाले –
आदमी की तलाश में

एक बार फिर
तुम लौट जाना चाहोगे मुर्दा इतिहास में
मगर तभी –य़ादों पर पर्दा डालती हुई सबेरे की
फिरंगी हवा बहने लगेगी
अख़बारों की धूल और
वनस्पतियों के हरे मुहावरे
तुम्हें तसल्ली देंगे
और जलते हुए जनतन्त्र के सूर्योदय में
शरीक़ होने के लिए
तुम, चुपचाप, अपनी दिनचर्या का
पिछला दरवाज़ा खोलकर
बाहर आ जाओगे
जहाँ घास की नोक परथरथराती हुई ओस की एक बूंद
झड़ पड़ने के लिए
तुम्हारी सहमति का इन्तज़ार कर रही है।

धूमिल
(१९३६ में बनारस में जन्म और अल्पायु में ही १९७५ में देहावसान जब ये ३९ साल ही के थे। धूमिल को वास्तविक ख्याति और सम्मान मृत्यु के बाद मिला, इनके संग्रह कल सुनना मुझे के लिए निधन के ५ वर्ष बाद १९७९ में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, पर हाँ इनकी अमर पहचान बना यह संग्रह संसद से सड़क तक जो १९७१ में छाप गया था)

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

फिर देखें और फिर मज़ा लें....पक्का मज़ा आएगा

आज एक ई मेल में एक ऐसी तस्वीर मिली जिसने हंसा हंसा कर लोट पोट कर दिया, इस तस्वीर में एक देसी दवाई के बम्पर वैद्य ने अंग्रेजी भाषा में अपनी काबिलियत का ऐसी काबिलियत से वर्णन किया है की पढ़कर ही मज़े लिए जा सकते हैं,

हैं न अंग्रेज़ी ज़बरदस्त !

बुधवार, 18 मार्च 2009

हो ना हो ........

एक नई दुल्हन मेरा मतलब है नई ग़ज़ल पेश ऐ खिदमत है.....

चल पड़ सफ़र पे, कोई तेरे साथ हो न हो
हंस दे तू खुल के, कोई हसीं बात हो न हो

ख़्वाबों में हर इक रोज़, मिलते रहना उससे तुम
क्या जाने हक़ीकत में, मुलाक़ात हो न हो

जिससे भी मिलो, खुल के मिलो, हंस के मिलो तुम
न जाने कल को फिर यही, जज़्बात हो न हो

चंद रोज़ तुम सुकूं से दिन गुज़ार लो
रोशन फिर ख़यालों की कायनात हो न हो

उलझो न सवालों में, जवाबों से बचो तुम
शायद हमेशा ऐसे ही हालात हों न हो

बस एक बार मुड़ के तुम न देखना मुझे
फिर ज़हन में तुम्हारे ख़यालात हो न हो

आ तो गए मयंक सियासत में एक दिन
बस देखना पहली ही शह में मात यो न हो

मयंक सक्सेना

सोमवार, 16 मार्च 2009

बस देखें और मज़ा लें....दिल पे ना लें.....



आगे पढ़ें http://cavssanchar.blogspot.com/2009/03/blog-post_16.html

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

शोर...

१४ जून १९५० को जन्मे विष्णु नागर हिन्दी के प्रतिष्ठित कवियों में से हैं। हिन्दी पत्रिका कादम्बिनी के पूर्व सम्पादक (सम्प्रति वर्तमान में सन्डे नई दुनिया के सम्पादक) की साहित्यिक कृतियाँ हैं मैं फिर कहता हूँ चिड़िया(1974) (कविता संग्रह), तालाब में डूबी छह लड़कियाँ (1981) (कविता संग्रह), संसार बदल जाएगा (1985) (कविता संग्रह) । आज का दिन (1981) (कहानी संग्रह)......इनकी एक लघु कविता पढ़ें,

शोर

मेरे भीतर इतना शोर है
कि मुझे अपना बाहर बोलना
तक अपराध लगता है
जबकि बाहर ऐसी स्थिति है
कि चुप रहे तो गए।

विष्णु नागर

गुरुवार, 12 मार्च 2009

आज बिरज में होली रे रसिया.....

वैसे तो मैं थोडा सुस्त हूँ पर मुआफी चाहूंगा इस बार होली पर घर चला गया था इसलिए पिछले तीन चार दिन से कुछ नहीं लिखा....मैं बड़े दावे से कहता हूँ की लिखना मेरे लिए जल भोजन और श्वास है पर घर मोक्ष है और इसलिए फिर घर गया तो होली के रंग में ऐसा डूबा की लेखन भूल गया। फिलहाल आज लौट आया हूँ और याद कर रहा हूँ कल लखनऊ में खेली गई होली। विस्तृत पोस्ट तो बाद में पर परसों रात पूजा के बाद ढोलक उठा कर जो पहला गीत मैंने गाया था....उसे सुनवा देता हूँ, अरे नहीं अपनी नहीं शोभा गुर्टू की मधुर आवाज़ में ......ये एक लोकगीत है जो सदियों से ब्रिज और जहाँ जहाँ भी होली के त्यौहार और संगीत के रसिक हैं, गाया जा रहा है और सुना जा रहा है.....
इसीलिए परसों रात मैंने भी ढोलक उठाई और शुरू हो गया....आज बिरज में होली रे रसिया ....

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गीत गाकर देखिये, फिर जहाँ मन में प्रेम और बोली में रस हो वहीं ब्रिज है !
आज बिरज में होली रे रसिया
होरी है रे रसिया, बरजोरी है रे रसिया

आज बिरज में ...

इत तन श्याम सखा संग निकसे
उत वृषभान दुलारी है रे रसिया

आज बिरज में ...

उड़त गुलाल लाल भये बादर
केसर की पिचकारी है रे रसिया

आज बिरज में ...

बाजत बीन, मृदंग, झांझ, डफली
गावत दे -दे - तारी रे रसिया

आज बिरज में ...

श्यामा श्याम मिल होली खेलें,
तन मन धन बलिहारी रे रसिया,
आज बिरज में होली रे रसिया !
होली की शुभकामनायें

रविवार, 8 मार्च 2009

माँ काश तुम नारी होती.....


महिला दिवस पर समझ नहीं आया की क्या विशेष लिखा जाए, बचपन से घर में माँ, मौसियों, बुआओं दादियों, नानियों और बहनों को देखते बड़ा हुआ। समय के साथ लगातार स्त्रियाँ वही रही पर उनके किरदार बदलते गए....माँ सास बनी, बहनें किसी की बहू, किसी की भाभी तो किसी की पत्नी, किसी की बहन मेरी भाभी बनी तो कभी कोई बेटी मेरी संगिनी बन जायेगी.........बदलते किरदारों में ही हम हमेशा नारी को पहचानते हैं पर क्या वो इन किरदारों में उलझ कहीं खो तो नहीं गई ?


माँ काश तुम नारी होती.....


माँ
जब तुम बेटी थी
तब तुम
लाडली थी पिता की
रोज़ उनकी दिन भर की थकान को
बदल देती थी मुस्कराहट में


माँ
जब तुम बहन हुई
तब बाँधी तो राखी भाई को तुमने
पर खड़ी हुई ख़ुद आगे
उस पर खतरे की
हर आहट में

माँ
जब थी तुम प्रेमिका
तब एक एक जोड़ा गया
सिक्का
दे डाला था कॉलेज के
उस धोखेबाज़ युवक को

माँ
जब तुम बनी पत्नी
पति की हर
ग़लत हरक़त पर भी
ना दिल में दी जगह
तुमने शक को

माँ
जब तुम बहू थी
तब हर बात
हर ताना, हर व्यंग्य
हर कटाक्ष हर तारीफ़
तुमने निरपेक्ष भाव से सहा

माँ
जब तुम माँ बनी
पहली बार
कितना दर्द सहा
पर किसी से
कभी नहीं कहा

माँ
तुम जब भी
बेटी थी, बहन थी
पत्नी थी या माँ थी
तब भी हर बार तुम माँ ही रही
और कुछ कहाँ थी

पर माँ
तुम सब कुछ थी
तो स्त्री क्यों नहीं हो पायी
क्यों अपने भीतर की
स्त्री को
छुपा दिया इन आवरणों में

क्यूँ ख़ुद के अस्तित्व को
ख़त्म कर डाला
लगा कर
अपने ऊपर चिप्पियाँ हज़ार
हर बार

क्या एक माँ, एक बहन
या कुछ भी और
होने के साथ साथ
तुम्हारे लिए लाज़मी नहीं था
एक स्त्री भी होना

क्यूँ जब तुम बेटी थी
तो बेटे से कम हिस्से पर खुश हो गई....
क्यूँ जब तुम बहन थी
तो खाई
भाई के हिस्से की डांट

क्यूँ हर बार
यह सुन कर भी चुप रहीं
कि लड़की तो धन है पराया
क्यों प्रेमी से ही विवाह का
साहस मन में नहीं आया

क्यों किताबें ताक पर रखी
और थाम ली हाथों में
कड़छियां
नहीं पूछा कभी पिता से कि
क्यों काम करें केवल लड़कियां

क्यों नहीं कभी कहा
कि नहीं
काम में कैसा बंटवारा
सब कमाएं, सब पढ़ें
क्या हमारा
तुम्हारा

मां
क्यों खुद अपनी बेटी को
बोझ मान लिया
क्यों नहीं बहू को लाड़
बेटी सा किया

मां
तुम तो मां थी न
फिर क्या मुश्किल था
तुम्हारे लिए
माँ तो सब कुछ कर सकती हैं ना

माँ
तो फिर
क्यूँ नहीं हो पायी तुम
एक स्त्री
माँ
क्यूँ तुम पर हावी रहा
हमेशा कोई नर

कितना अलग होता
तुम मां, बहन या कुछ भी
होने से पहले
एक नारी होती अगर.....

(मैं ऋणी हूं अपनी मां का जिनकी वजह से आज कुछ बन पाया......पर आज भी अखरता है कि कब तक बच्चों को पालने सिखाने और बड़ा करने की ज़िम्मेदारी, रसोई के बर्तनों का शोर और सलीके सीखने का ज़ोर केवल स्त्रियों पर ही रहेगा और बेटे को पाल कर बड़ा आदमी बना देने वाली माँ बेटी से अन्याय करने पर मजबूर हो जाती है ?)

शनिवार, 7 मार्च 2009

अब मैं वो नहीं.....

महिला दिवस की पूर्व संध्या पर .....
सिसकियाँ ....
बंद कमरों में घुटन
और दिमाग के भीतर की सीलन
अब और नही बची

अबकी सही उम्र
से पहले
किताबे लिए हाथों में मेंहदी
भी नहीं रची

अब गली के मोड़ पर
बैठे शोहदों को देख कर
लगता
कोई डर नहीं

अब घर से संवर कर
निकलने पर
पड़ोसियों के तानों का
कोई असर नहीं

अब लड़कों के साथ
खेलने पर
माँ
नाराज़ नहीं होती

अब लड़ती हूँ
बराबर से
अकेले में जाकर
नहीं रोती

अब चलती हूँ
तो सर उठा कर
देखती हूँ लोगों को
आत्मविश्वास से

लड़ी हूँ
सदियों से
तब जा कर आज यहाँ हूँ
अपने प्रयास से ........

मंगलवार, 3 मार्च 2009

अँधेरे चारों तरफ़ .......

सुबह सुबह दफ्तर पहुँचते ही हलचल दिखी....समझ में आ गया कि कुछ हुआ है पर जब पता चला कि लाहौर में श्रीलंकाई टीम पर हमला हुआ है और कई खिलाडी घायल हुए हैं तो होश उड़ गए......जब आंखों के सामने से उसके विसुअल्स गुज़रे तो जैसे काटो तो खून ही नहीं....इस घटना का दुःख शायद क्रिकेट को ही नहीं बल्कि इंसानियत को भी लंबे वक़्त तक सालता रहेगा.....राहत इन्दौरी की एक ग़ज़ल याद आ गई जो कहती है,

अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे

राहत इन्दौरी

सोमवार, 2 मार्च 2009

यह फागुनी हवा .........

मित्रों वसंत जा चुका है और फागुन का मौसम आ चुका है। फागुन के मौसम को बौराने का मौसम कहा जाता है,
मतलब बुढाऊ को चढी जवानी फागुन में
बूढा की कमर बनी कमानी फागुन में
मतलब मौसम ऐसा जो बदन ही नहीं दिल के भी पुराने दर्दों को जगह देता है। मौसम है इन दर्दों को सहलाने का और फिर जल्द ही होली भी हो ही लेगी.....तो पढ़ें फणीश्वर नाथ रेनू की एक कविता फागुन पर जो सारिका के 1 अप्रैल 1979 के अंक में प्रकाशित हुई थी ....मज़ा आएगा

यह फागुनी हवा

यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा
ले आई...ई...ई...ई
मेरे दर्द की दवा!

आंगन ऽ बोले कागा
पिछवाड़े कूकती कोयलिया
मुझे दिल से दुआ देती आई
कारी कोयलिया-या
मेरे दर्द की दवा
ले के आई-ई-दर्द की दवा!

वन-वन
गुन-गुन
बोले भौंरा
मेरे अंग-अंग झनन
बोले मृदंग मन--
मीठी मुरलिया!
यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा ले के आई
कारी कोयलिया!

अग-जग अंगड़ाई लेकर जागा
भागा भय-भरम का भूत
दूत नूतन युग का आया
गाता गीत नित्य नया
यह फागुनी हवा...!

फणीश्वर नाथ रेणु (रचना वर्ष १९५६)

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मौसम के संदेश

वसंत का मौसम अब अवसान की ओर है.....कुछ दिन पहले इसकी शुरुआत पर भी मैंने एक कविता आप को पढ़वाई थी....आज फिर एक और कविता लाया हूँ......इसाक अश्क की कविता मौसम के मिजाज़ की बात करती है, जिसे शायद हम केवल महसूस कर सकते हैं पूरी तरह बयान नहीं......तो बेहतर हैं मेरे बयान पढने की जगह आप कविता ही पढ़ें,
बिना टिकट के
बिना टिकिट के
गंध लिफाफा
घर-भीतर तक डाल गया मौसम।
रंगों डूबी-दसों दिशाएँ
विजन डुलाने-लगी हवाएँ
दुनिया से बेखौफ हवा में
चुम्बन कई उछाल गया मौसम।
दिन सोने की सुघर बाँसुरी
लगी फूँकने-फूल-पाँखुरी,
प्यासे अधरों पर खुद झुककर
भरी सुराही ढाल गया मौसम।
बिना टिकिट के.....
इसाक अश्क

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

अंधेरों का सफर .....

अक्सर सफर में लंबे अंधेरे होते हैं और रौशनी दूर तक नहीं दिखती ......कई बार दर्द होता है और दवा भी ख़ुद ही को करनी होती है। कई बार अपने सवालों के लिए अपने आप से ही जवाब माँगना होता है......कई बार नाउम्मीद होने पर ख़ुद ही उम्मीद की सड़क खोजनी होती है। यह हम सबके साथ होता है और ऐसे में ही ऐसी कुछ नज्में और गज़लें निकलती हैं ....
अंधेरों का सफर .....
दीवारों से टकराता रस्ता ढूंढता हूं
अक्सर अंधेरों में घूमता हूं

दीवारों पर लिखी इबारतों का मतलब
साथ खड़े अंधेरों से पूछता हूं

टटोलता खुद के वजूद को
अपने ही ज़ेहन में मुसल्सल गूंजता हूं

बार बार लड़ अंधेरे में दीवारों से
बिखरता हूं, कई बार टूटता हूं

अकड़ता हूं, लड़ता हूं, गरजता हूं
अंधेरे में, अंधेरे को घूरता हूं

अहसास है रोशनी की कीमत का
दियों की लौ चूमता हूं

हर तीन दीवारों के साथ
खड़ा है दरवाज़ा एक
बस इसी उम्मीद के सहारे
अक्सर अंधेरों में घूमता हूं

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

आधा चांद मांगता है पूरी रात


आज आपके सामने रख रहा हूँ कवि और फिल्मकार नरेश सक्सेना की एक कविता जो ख़ास इसलिए है कि ज़िन्दगी की पूरी तासीर घोल कर सामने रख देती है। कम ही कविताओं में यह बात देखने को मिलती है तो स्वाद ले कर देखें .....

आधा चांद मांगता है पूरी रात

पूरी रात के लिए मचलता है
आधा समुद्र
आधे चांद को मिलती है पूरी रात
आधी पृथ्वी की पूरी रात
आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
पूरा सूर्य
आधे से अधिक
बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग
आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन
आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव
आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत
आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन
आधे इलाज की देते पूरी फीस
पूरी मृत्यु
पाते आधी उम्र में।

आधी उम्र, बची आधी उम्र नहीं
बीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजन
पूरा स्वाद
पूरी दवा
पूरी नींद
पूरा चैन
पूरा जीवन

पूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिए

हम नहीं समुद्र, नहीं चांद, नहीं सूर्य
हम मनुष्य, हम--
आधे चौथाई या एक बटा आठ
पूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।

नरेश सक्सेना
(कवि का ग्वालिअर में १९३९ में हुआ था, इनको १९७३ में हिन्दी साहित्य सम्मलेन पुरस्कार एवं १९९२ में फ़िल्म निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।)
(* साथ का चित्र : पिकासो की प्रसिद्द कृति फिगर्स ऑन अ बीच )

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

प्रेम, तुम और समाज का ठेका.....


आज फिर एक और बवाली दिन है तमाम उन दिनों की तरह जब हमारे मुल्क में धर्म के नौटंकी बाज सडकों पर उतर कर पुलिस का काम अपने हाथ में ले लेते हैं और पुलिस वर्दी में सिविलियन बनी रह जाती है। ये बवाली लोग दो तरह के हैं एक जो कुंठित हैं दूसरे वो जिनको किसी भी तरह प्रसिद्धि चाहिए। ये वही लोग हैं जो ज़िन्दगी भर एक चींटी भी नहीं मार पाते और ऐसे मौके पर निहत्थे लोगों को समूह बना कर पीट कर उनका अपमान कर बड़े खुश होते हैं और अपनी पुरानी कुंठाएं दूर कर लेते हैं। दरअसल सच ये है कि इस दिन के अलावा सारे दिनों में ये वही कर रहे होते हैं जो वैलेंटाइन दिवस के दिन कुछ बेवकूफ जोड़े करते हैं। मेरा मतलब यह कि बेवकूफी किसी एक दिन प्रेम को मनाना है क्यूंकि यह तो हमेशा ही है.....पर मैं इसके सख्त ख़िलाफ़ हूँ कि कोई किसी को यह सिखाये कि उसे क्या करना है वो भी वे लोग जिन्होंने ख़ुद ज़िन्दगी में कुछ नहीं किया।
कभी गौर से देखियेगा इस इस समाज सुधारक भीड़ में ज़्यादातर लोगों की शक्लें.....वे ज़्यादातर आवारा और फालतू लोगों की होती हैं, और जो इसे संस्कृति से जोड़ते है उन्हें यह जान लेना चाहिए कि बिना किसी अपराध के किसी का अपमान या शारीरिक प्रताड़ना ना तो सभ्यता है और ना ही संस्कृति। यहाँ संस्कृति के ठेकेदारों के उल्लेख करना चाहूंगा कि कुछ शताब्दियों पहले तक हमारी ही संस्कृति में यही समय बसंतोत्सव या मदनोत्सव के तौर पर मनाया जाता था, जिसे प्रेम और मदन (कामदेव) का त्यौहार माना जाता था.....यकीन नहीं हो तो थोडी और पढ़ाई करें और फिर प्रेम से ज्यादा दिक्कत हो खजुराहो के मंदिरों में आग लगा दें.....उन्हें क्यूँ कला और संस्कृति का प्रतीक मानते हैं.....खैर सच कहूँ तो नफरत है उन दोगले लोगों से है जो कल ख़ुद अपने साथ एक कन्या घुमा रहे थे पर आज उसी भीड़ में शामिल है......तो इसी पे कुछ लिख मारा .....


कल वो भी शायद वहीं मिलें....

तुम हो आज़ादी के शौकीन
रह सकते घरों में बंद नहीं
पर घर में रह जाओ आज
उनको यह पसंद नहीं

या तो हो तैयार कि
जो चाहोगे करोगे
या यह सोचो बच निकलो
जो उनसे डरोगे

हाथों में लो हाथ
निकल जाओ तुम घर से
या इक दिन छुप जाओ
घर में उनके डर से

तुम कहते हो इसे इश्क
वो कहते नंगई
तुम ठहरे सीधे सादे
वो पक्के दंगई

तुम कह दोगे दिल की
ठेकेदार समाज के चिढ़ जाएंगे
लेकर लाठी डंडा
तुमसे भिड़ जाएंगे

अगले दिन मिल लेना
वो इससे बेहतर है
प्यार कभी भी कर सकते हो
इसमें क्या चक्कर है

अगले दिन भी हो सकता है
वो मिल जाएं
साथ की सीट पर बैठे
सिनेमा हॉल में आएं

पर अगले दिन
तुमसे कुछ न कह पाएंगे
साथ में अपनी प्रेयसी
जो लेकर आएंगे

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

नीरज जी की सालगिरह पर ......


हरिवंश राय बच्चन की यशस्वी परम्परा के अकेले जीवित कवि गोपाल दास नीरज का आज जन्मदिन है....आज उनको बधाइयां देते हुए हम उनके स्वास्थ्य और सुख की कामना करते हैं। इस अवसर पर पेश हैं उनकी कुछ बेजोड़ कविताओं, गीतों और दोहों के अंश.....बोले तो मेडले !


दोहे

मौसम कैसा भी रहे कैसी चले बयार
बड़ा कठिन है भूलना पहला-पहला प्यार

कवियों की और चोर की गति है एक समान
दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान

दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार
तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार

गागर में सागर भरे मुँदरी में नवरत्न
अगर न ये दोहा करे, है सब व्यर्थ प्रयत्न

गीत

कारवाँ गुज़र गया
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई
गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गये
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ
मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ तुम शहज़ादी रूप नगर की
हो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहाँ पर होगा ?

मीलों जहाँ न पता खुशी का
मैं उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ नित
होंठ करें गीतों का न्योता,
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...
मेरा कुर्ता सिला दुखों ने
बदनामी ने काज निकाले
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
नभ ने सब तारे जड़ डाले
मैं केवल पानी ही पानी तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो मन का हवन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...

कविता

दीप और मनुष्य

एक दिन मैंने कहा यूँ दीप से
‘‘तू धरा पर सूर्य का अवतार है,
किसलिए फिर स्नेह बिन मेरे बता
तू न कुछ, बस धूल-कण निस्सार है ?’’

लौ रही चुप, दीप ही बोला मगर
‘‘बात करना तक तुझे आता नहीं,
सत्य है सिर पर चढ़ा जब दर्प हो
आँख का परदा उधर पाता नहीं।

मूढ़ ! खिलता फूल यदि निज गंध से
मालियों का नाम फिर चलता कहाँ ?
मैं स्वयं ही आग से जलता अगर
ज्योति का गौरव तुझे मिलता कहाँ ?’’

ये उस महान कवि की कृतियाँ हैं जिसे एक वक़्त के मठाधीशों ने मंचीय गीतकार कह कर नकार दिया था.....

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

वसंत.......


सुमित्रानंदन पन्त का नाम कौन साहित्य प्रेमी नहीं जानता, प्रकृति पर अपने बेजोड़ रचनाकर्म के चलते उनको प्रकृति का सुकुमार कवि भी कहा जाता है। आज प्रस्तुत है वसंत पर उनकी एक अनुपम कृति.....
वसंत
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह, मग़, वन में आया वसंत
सुलगा फागुन का सूनापन
सौन्दर्य शिखाओं में अनंत
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर उर में मधुर दाह
आया वसंत, भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह
पल्लव पल्लव में नवल रूधिर
पत्रों में मांसल रंग खिला
आया नीली पीली लौ से
पुष्पों के चित्रित दीप जला

अधरों की लाली से चुपके
कोमल गुलाब से गाल लजा
आया पंखड़ियों को काले- पीले
धब्बों से सहज सजा

कलि के पलकों में मिलन स्वप्न अ
लि के अंतर में प्रणय गान
लेकर आया प्रेमी वसंत
आकुल जड़-चेतन स्नेह प्राण

सुमित्रा नंदन पन्त

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

गाँधी की टी आर पी

आज गांधी जी की पुण्यतिथि थी ....अब आप कहेंगे की हम जानते हैं ....तो कैसे मान लें की आप जानते थे ? आपने ना तो उस पर ब्लॉग लिखा...न ही टिप्पणी की और ना ही कुछ और ...फिर क्या सबूत है की आप जानते थे ? अच्छा अच्छा आप जानते थे पर आप भूल गए थे। बहुत बढ़िया फिर मुंबई हमले के बाद से अभी तक नेताओं को क्यों गरिया रहे हो ? कोई हक है क्या ?
खैर आपसे बहस नहीं करनी है और यह बहस का मुद्दा होना भी नहीं चाहिए क्यूंकि जिस भी मुद्दे पर हमारे देश में एक बार बहस शुरू हो जाती है वो फिर बहस में ही जिंदा रह जाता है बाकी ख़त्म हो जाता है। हाँ तो बात कर रहा था मैं बापू की पुण्य तिथि की, आज सुबह से प्रतीक्षा में था की वो मीडिया जिसका मैं हिस्सा हूँ और जो आज का सबसे बड़ा बहस का मुद्दा है; क्या करता है आज के दिन। सुबह अखबार उठाया तो हिन्दुस्तान जो देश का अलमबरदार बनने के दम भरता है उसके पहले पन्ने पर गांधी की एक तस्वीर तक के दर्शन नहीं हुए.....पहला झटका ......बापू का स्कोर ....शून्य पर एक .....दिल निराशा से भर गया, दूसरे पन्ने पर एक सरकारी विज्ञापन था सो मतलब की बापू अगर बिकते हैं तो हैं नहीं तो नहीं......
खैर जैसे तैसे हिम्मत कर के रिमोट उठाया, दूरदर्शन नहीं लगाया .....मालूम था की वो याद रखेगा। सारे चैनल पलट डाले पर कहीं भी कुछ नहीं। इस समय रात हो चली है और अभी तक किसी भी टीवी चैनल ने बापू को याद करने की ज़हमत नहीं उठाई है। हमारे चैनल ने भी नहीं जो कहता है ज़रा सोचिये हाँ रात दस बजे के कार्यक्रम की शुरुआत को प्रभावी करने के लिए उनको ज़रूर शामिल किया गया । कल ही इंडिया टीवी टी आर पी में सबसे ऊपर पहुँचा है और उनके एक शीर्ष पुरूष जो अब शिखर पुरूष होने के भ्रम में हैं, उन्होंने कहा की यह खबरों की जीत है।
अब मैं भ्रम में हूँ की क्या वाकई गांधी ख़बर नहीं रहे.....या ख़बर अब ख़बर नहीं रही.....क्या पंकज श्रीवास्तव जी मेरी आवाज़ सुन रहे हैं....उन्होंने अभी एक लेख लिखा है, और संजीव पालीवाल जी जिन्होंने अभी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ज़िम्मेदारी के ढोल पीटे थे ब्लोगिया बहस में .....शायद मैं यह ब्लॉग इसलिए लिख रहा हूँ की मैं चैनल में बहुत छोटे पद पर हूँ और नीति निर्माता नहीं हूँ पर गांधी तो राष्ट्र निर्माता थे उनको भुला दिया......भूल गए कह देने से क्या काम चलेगा ....क्या हम अपनी जिम्मेदारियों को याद रखने का ढोंग करके ख़ुद ही को तो नहीं धोखा देते हैं.....क्या पत्रकारिता केवल बिकाऊ ख़बर है ? फिर ये समाज सेवा का ढोंग क्यूँ ?
यही सवाल अखबार वालों से भी है की क्या अगर आज विज्ञापन नहीं मिलते तो अखबार में गांधी भी नहीं दीखते .........? मैं परेशान हूँ, दुखी भी और कुंठित भी.....मौका मिला तो इसे बदलना चाहूँगा पर क्या मेरे जैसे कथित आदर्शवादी को कोई मौका देगा ?
* आज विभिन्न चैनलों द्बारा प्रसारित कार्यक्रम.....
चांद और फिजा की प्रेम कहानी का सच आज तक
सुष्मिता बनेंगी झांसी की रानी जी न्यूज़
फिरौती का आयडिया
मामा-भांजे की करतूत एन डी टीवी इंडिया
राजू श्रीवास्तव को धमकी आई बी एन सेवेन
राजू श्रीवास्तव को धमकी इंडिया टीवी

अब आप समझ गए होंगे की क्या है गाँधी की टी आर पी
उत्तर की प्रतीक्षा में

(कुछ चैनलों ने गाँधी जी को औपचारिकता निभाने के लिए याद ज़रूर किया पर वह औपचारिकता ही रही १० सेकेण्ड के आस पास.......क्या चाँद मोहम्मद अगर दिन भर के स्लोट के अधिकारी थे तो राष्ट्रपिता आधे घंटे के भी नहीं ?)

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी