गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

ब्लॉगर मीट भी होगी....संगठन भी बनेगा....

अविनाश वाचस्पति जी से क्षमा मांगते हुए ये सब कुछ लिख रहा हूं....उन्होंने मना किया था कि किसी भी तरह का आक्रोश दिखाना उचित नहीं है....और हर एक की राय का सम्मान ज़रूरी है....वाचस्पति जी ने मुझसे कहा कि अगर कोई एक भी नाराज़ है तो उसे प्यार से मनाएंगे पर वाचस्पति जी माफ कीजिएगा कुच लोग नाराज़ नहीं हैं...नासाज़ हैं....और उनकी तबीयत ठीक होने वाली भी नहीं है.....अरे आपने, मैने या किसी ने भी अगर ब्लॉगर संगठन बनाने की बात कह दी तो इस पर अपनी राय लोग भले ही व्यक्त करें....लेकिन नाराज़ होने का हक किसको हो सकता है....और फिर सहमत न होने का मतलब तोहमत लगाना कतई नहीं होता है....अगर कोई संगठन बनाने के हक में नहीं है तो न हो पर कोई कैसे यह निर्णय करेगा कि हम ब्लॉगिंग के शुभचिंतक हैं या नहीं....और जिनको लगता है कि संगठन बनाने से ब्लॉगिंग की क्षति होगी वो ज़रा ये तो बताएं कि बिना किसी संगठन के कैसे ब्लॉगिंग का भला करेंगे या कर रहे हैं....
क्या जिन लोगों के साथ आप एक आभासी दुनिया में रोज़ जी रहे हैं....जिनसे आप अपना सुख दुख बांट रहे हैं....उनसे मिलना या ब्लॉगर मीट करना कोई गुटबाज़ी है और फिर अगर इस मिलन को हम ब्लॉगर मीट की जगह कुछ और कहने लगें तो आप संतुष्ट हो जाएंगे....और क्या उद्देश्य बदल जाएगा....आप मजदूरों के हित के लिए बने उनके संगठन के खिलाफ हैं?.....या फिर कर्मचारियों के कल्याण के लिए उनके संगठन के खिलाफ....महिलाओं के शोषण और अत्याचार रोकने के लिए उनके संगठन के खिलाफ आप कुछ नहीं बोलते हैं....पत्रकारों के संगठन भी जायज़ हैं....पर लेकिन एक बेचारा ब्लॉगर जो बिना किसी आर्थिक लालच के ब्लॉगिंग कर रहा है....उसने गलती से संगठन बनाने की बात बोल भी दी....तो अरे ये क्या बक रहे हो.....गुटबाज़ी करोगे....राजनीति करोगे....और पता नहीं क्या क्या....आप संस्कृति बचाओ मंच बनवा देंगे पर एक ऐसा मंच जहां हर क्षेत्र से जुड़े ब्लॉगर जुड़ेंगे ऐसे किसी भी फोरम से आपको ऐतराज है....क्यों भला?
हम बचपन से रटते आ रहे हैं संघे शक्ति....एकता में बल है....कबूतर से लेकर लकड़ी के गट्ठर तक की कहानियां याद कर डाली....पर संगठन के महत्व को नहीं समझ पाए....और मेरी समझ में यह नहीं आता कि आखिर अविनाश भाई ने ऐसी कौन सी बात कह दी थी....अरे क्या कहीं ये कहा गया था कि फलाने प्रकार के ब्लॉगर ही इस संगठन के सदस्य होंगे....या हम किसी एक विचारधारा....लेखन शैली....या धर्म-सम्प्रदाय के ब्लॉगरों को इस संगठन से जोड़ेंगे....अरे मोहल्ले के लोग तक होली मनाने के लिए संगठन बना सकते हैं फिर ब्लॉगरों के संगठन में ही आपत्ति क्यों....
क्या संगठन का उपयोग केवल गुटबाज़ी और राजनीति के लिए ही होता है....क्या अगर कोई संगठित हो रहा है तो मतलब सिर्फ ये है कि वो अपने व्यक्तिगत हित साधेगा....क्या संगठन रचनात्मक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नहीं बन सकते हैं....क्या संगठन से सामाजिक दायित्व नहीं निभाए जाते हैं....और क्या हमारे इसी ब्लॉग जगत में कई तरह के अनकहे....अघोषित....और अवांछित संगठन-गुट नहीं बने हुए हैं.....इस सवाल का जवाब मुझे चाहिए नहीं क्योंकि जवाब सबको मालूम है.....और चिल्ला कर चीख कर विरोध करने से बेहतर था कि कोई रचनात्मक सुझाव देते.....क्या आपको मालूम है कि अनेक ब्लॉगर ऐसे हैं जो शौकिया लिखते हैं लेकिन अच्छों से भी बहुत अच्छा लिखते हैं....लेकिन फिर भी उनके ब्लॉग्स पर तमाम बौद्धिक ब्लॉगरों की एक टिप्पणी तक नहीं आती है(जबकि कुछ ब्लॉग्स पर अस्तरीय पोस्टों पर भी ....) क्या ये किसी तरह की गुटबाज़ी का हिस्सा नहीं....
हम में से कोई लेखक है...पत्रकार है....तो कई इंजीनियर....प्रोग्रामर....डॉक्टर....शिक्षक....खिलाड़ी....विद्यार्थी और गृहिणियां भी हैं.....लेकिन क्या उनको जोड़ने का प्रयास गुटबाज़ी है.....और अगर ये है तो तमाम तरह के लांछन लगने और सहने के बाद भी कम से कम मैं संगठन बनाना चाहता हूं....इसलिए नहीं कि ये मेरा व्यक्तिगत स्वार्थ है....बल्कि इसलिए कि मैं उन सबको गलत साबित करना चाहता हूं जो संगठन बनाने के ख्याल को तमाम अन्यथा सिद्धांतो से जोड़ते हैं....
अविनाश जी माफ कीजिएगा....ये भावावेश नहीं है बहुत सोच समझ कर लिख रहा हूं....क्योंकि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे.....मैं देखता हूं कि कई पुराने....खांटी....तथाकथित वरिष्ठ ब्लॉगर इस मामले में सही का पक्ष जानते हुए भी चुप रहे....पर मैं बोलूंगा.....आपने कविता मांगी थी पर मैं लेख लिख रहा हूं......आप ने संगठन को ना ना कहा था.....मैं हां कहूंगा अभी भी पक्ष में खड़ा हूं....खड़ा रहूंगा.....ब्लॉगिंग मेरे लिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है.....और वो सब जो ब्लॉगिंग का हिस्सा हैं मेरे परिवार का हिस्सा है.....मुझे लगता है कि ब्लॉगिंग की बेहतरी के लिए संगठन ज़रूरी है....जिसे गलत लगता है आकर बहस करे और खुद को साबित करे.....अरे अगर ब्लॉगर संगठन के पक्ष और विपक्ष में लोग हैं तो दो तरह के गुट तो वैसे ही बन गए....और सबको अपने पक्ष में कर पाना कभी भी सम्भव नहीं रहा....और कुछ लोग केवल बवाल फैलाने में ही लगे हैं....उनकी पोस्ट्स ऐसे ही हिट होती हैं...क्या किया जाए मैं तो कविता लिखता हूं....आज ये सब लिखने पर मजबूर हो गया.....पर एक बात अच्छी तरह समझता हूं कि अब अगर पीछे हटे तो ये लोग अपने उद्देश्य में सफल हो जाएंगे....वो नहीं होने देना है.....ये बात जारी रहेगी....
मयंक सक्सेना

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

कोरे कागज़ की अभिव्यक्ति....


हाल ही में एक जगह किसी संदर्भ में लिखा कि कई बार कागज़ कोरा छोड़ देना भी एक अभिव्यक्ति है.....फिर लगा कि कागज़ कोरा छोड़ने पर भी कागज़ कारा किया जा सकता है.....सो कर डाला....


कोरे कागज़
पर कुछ लिख देना....
कह देना भावों को
क्या सम्भव है हमेशा
पूरा कर पाना
शब्दों के अभावों को
कुछ कहा जाए
तो भी
हमेशा
कुछ अनकहा रह ही जाएगा
पर कई बार
जो लिखा नहीं गया
वो भी कुछ कह जाएगा
शब्दों के अर्थ
हमेशा शब्दों में नहीं
उनके मध्य भी होते हैं
कई बार चेहरे मुस्कुराते
पर ह्रदय रोते हैं
कई बार सुख दिखता नहीं
दुख
केवल महसूस किया जाता है
दरअसल भीतर के शोर का
बाहर के सन्नाटे से
गहरा नाता है....
कभी कभी सुख
अधिकता में बयान नहीं हो पाता
और दुख जब ज़्यादा हो
तो कहा नहीं जाता
प्रेम की पहली अनुभूति
शब्दों से परे है
और दुनिया के नरसंहारों से
शब्द भी डरे हैं
सुबह ताज़ा खिले
फूल की खुशबू
स्कूल जाते मासूमों की
मुस्कुराहट का जादू
चायवाले छोटू की चंद तस्वीरें
घर की दीवारों पर खिंची
आड़ी तिरछी लकीरें
मां के हाथ से
खाना दाल-भात
भाषा-प्रांत के लिए
सड़कों पर उत्पात
सड़कों पर बहते खून को
पोंछ पाने में नाकाम रहना
सब कुछ देख कर भी
चुपचाप....कुछ न कहना
और भी तमाम बातें
असंख्य भाव
कई चीज़ें
हादसे...घटनाएं...
हर्ष....विषाद...
जब हों भाषाओं से अलहदा
अभिव्यक्ति से परे
शब्दातीत....
तब कुछ न कहना
सर्वश्रेष्ठ उक्ति है
अक्सर कागज़ कोरे छोड़ देना ही
असल अभिव्यक्ति है.....

मयंक सक्सेना

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

लोहे का स्वाद...


धूमिल की कविताएं आपको पहले भी पढ़वा चुका हूं....सम्भवतः हिंदी के सबसे चमत्कारिक...झकझोर देने वाले कवियों में से....ये कविता उनकी आखिरी कविता मानी जाती है....

"शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग"
लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है.

धूमिल
1936 -1975

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

दुई घाटन के बीच


तीन दिनों के लिए संस्थान की ओर से महाकुम्भ की कवरेज के लिए हरिद्वार में था....दिन भर खबरें तलाशने के बाद जब सब सो रहे होते थे....मैं कुम्भ के तिलिस्म....देश की संस्कृति और जनजीवन के रहस्य टटोलने....या शायद खुद का भी वजूद तलाशने हरिद्वार की गलियों...घाटों....और नागाओं के साथ साथ आम आदमी के शिविरों को घूमा करता था.....ऐसे में ही एक दिन दो घाटों के बीच दोनो ओर देखते हुए कुछ सवाल उठे जो कविता बन गए......


देवापगा की

इस सतत प्रवाहमयी

प्रबल धारा के साथ

बह रहे हैं

पुष्प

बह रहे हैं

चमक बिखेरते दीप

स्नान कर

पापों से निवृत्त होने का

भ्रम पालते लोग

अगले घाट पर

उसी धारा में

बह रहे हैं

शव

प्रवाहित हैं अस्थियां

तट पर उठ रही हैं

चिताओं से ज्वाला

दोनों घाटों के बीच

रात के तीसरे पहर

मैं

बैठा हूं

सोचता हूं

क्या है आखिर

मार्ग निर्वाण का?

पहले घाट पर

जीवन के उत्सव में...

दूसरे घाट पर

मृत्यु के नीरव में....?

या फिर

इन दोनों के बीच

कहीं

जहां मैं बैठा हूं.....

मयंक सक्सेना -12-02-2010, हरिद्वार

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी