शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

लोहे का स्वाद...


धूमिल की कविताएं आपको पहले भी पढ़वा चुका हूं....सम्भवतः हिंदी के सबसे चमत्कारिक...झकझोर देने वाले कवियों में से....ये कविता उनकी आखिरी कविता मानी जाती है....

"शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग"
लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है.

धूमिल
1936 -1975

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छे मयंक । धूमिल की यह कविता अच्छी लगी । मेरा ब्लॉग देखो.. http://kavikokas.blogspot.com

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