बुधवार, 28 जुलाई 2010

26 साल...


आज मेरा जन्मदिन है....क्योंकि आज के ही दिन सन 1984 में मैंने लखनऊ के क्वीन्स मैरी अस्पताल (के.जी.एम.सी) में जन्म लिया था...शायद रोते हुए ही...और अब तक की सारी उम्र भी रोते हुए ही काट दी...शायद हम सारे इंसान एक जैसे होते हैं...रोते रहते हैं और इसीलिए पैदा भी रोते हुए ही होते हैं....जब शुरुआत ही ऐसी है तो खाक बाकी हंसी होगी...खैर आज 26 साल का हो गया हूं और एक बात बेहतर समझता हूं कि दरअसल मुश्किलें ही ज़िंदगी और ज़िंदा होने का सबब देती हैं....नहीं करिहो का ज़िंदा रह के....सुबह से लोग शुभकामनाएं दे रहे हैं...फोन ससुरा कम था कि अब मोबाइल...एसएमएस....ईमेल...ऑर्कुट और फेसबुक भी है....लगा कि कुछ तो लिख ही दूं...तो कुछ भी लिखने के चक्कर में कुछ लिखा डाला है....आज मेरा जन्मदिन है आशा है कम से कम आज तो आप एक कविता झेल ही लेंगे.....

26 साल...

26 साल

बिना किसी मुश्किल

कट जाते

मुश्किल था

ऐसा सोचना भी

पर हर वक्त

बैठा, उठा

रहा

जहां कहीं

सोचा बस यही

घबराता हुआ

मनाता रहा दिल

कि काश न होती

कोई भी मुश्किल

और इसी मनाने में

सोचने-विचारने

घबराने में

कट गए

निपट गए

ये 26 साल

और मैं

हर बार

करता रहा पार

ये मुश्किल

कि सोचना

न आए मुश्किल

और मुश्किलें आती गई

और आगे

आने वाले सालों में भी

होगा ऐसा ही कुछ....

क्योंकि

सोच से बड़ी

कोई मुश्किल नहीं....

मयंक सक्सेना

28-07-1984

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

पूर्णता अपूर्ण है.....

सबसे गहरी कविताएं,

निरुद्देश्य लिखी गईं

जल्दबाज़ी में उकेरे गए

सबसे शानदार चित्र

हड़बड़ी में गढ़े गए

सबसे अद्भुत शिल्प

सबसे महान अविष्कार

हो गए अनजाने में ही

सबसे पवित्र है

असफल पहला प्रेम


कभी सरल रेखा में

रास्ता नहीं बनाती नदियां

दिन भर आकार बदलती हैं

परछाईयां

हर रोज़ चांद का चेहरा

बदल जाता है

दिन भी कभी छोटा

कभी बड़ा हो जाता है

कभी भी पेड़ पर हर फल

एक सा नहीं होता

ठीक वैसे, जैसे एक सी नहीं

हम सबकी शक्लें


सबसे सुंदर स्त्री भी

सर्वांग सुंदर नहीं होती

सबसे पवित्र लोगों के सच

सबसे पतित रहे हैं

सबसे महान लोगों ने कराया

सबसे ज़्यादा लज्जित

सबसे ईमानदार लोगों के घर से

सबसे ज़्यादा सम्पत्ति मिली

सबसे सच्चा आदमी

उम्र भर बोलता रहा झूठ...


और ठीक ऐसे ही

कभी भी कुछ भी

पूर्ण नहीं है

न तो कुछ भी

सच है पूरा...न झूठ....

पूर्णता केवल एक मिथक है

एक छलावा

ठीक ईश्वर की तरह ही

एक असम्भव लक्ष्य...

जिस पर हम

केवल रुदन करते हैं व्यर्थ

कुछ भी पूर्ण नहीं है

न शब्द और न अर्थ

हम केवल मानते हैं कि

पूर्ण होगा शायद कुछ....

जो वस्तुतः नहीं है कहीं

केवल अपूर्णता ही तो पूर्ण है

अपने अर्थ में....

और वैसे ही हम सब

पूरी तरह अपूर्ण...........


मयंक सक्सेना (9 जुलाई, 2010)

रविवार, 4 जुलाई 2010

वक्त...हालात...ज़िंदगी...

वक़्त
दगाबाज़ है
बहुत
एक सा रहने के
भरोसे दिला कर
कभी भी बदल जाता है

हालात
का वादा था
बने रहने का
पर
वक्त को देख
वक्त के साथ
चलने की ज़िद में
मचल जाता है

ज़िंदगी
साथ देने का इसका
नहीं कोई वादा भी
और
पता भी नहीं
कब छोड़ेगी साथ
पर चल रही है
और
साथ है तब भी
साथ छोड़ चुके हैं
जब वक़्त और हालात....

(दरअसल ज़िंदगी की सबसे अच्छी बात ये है कि य़े चलती रहती है.....और शायद सबसे बुरी बात भी यही है....)

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी