शनिवार, 19 जनवरी 2013

कौन से आदर्श, कैसी ज़िद और एक सपने की मौत...


" बहेलिये ने उस निरीह पक्षी को मार गिराने के लिएजो उड़ कर किसी बड़े खेत में बैठ गया थापूरी फसल को ही आग लगाने की कोशिश की।"


उस शाम मैं एनएसडी समकालीन रंगमंच के उद्घाटन कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाया, अब सोचता हूं तो अजीब सी दुविधा होती है...एकबारगी लगता है कि काश वहां पहुंच जाता तो जो हुआ उसे रोक पाता, फिर सोचता हूं कि अगर न रोक पाता तो...अच्छा ही हुआ नहीं पहुंच पाता। लेकिन पत्रिका के पहले अंक के बंडल हाथ में थामे मेट्रो से उतर मंडी हाउस पैदल आते पत्रिका के सम्पादक और शायद हम में से सबसे साधारण जीवन जी रहे पत्रकार राजेश चंद्र के लिए ये दुविधा नहीं दुष्कर घड़ी है। राजेश चंद्र के हाथ में जो बंडल है, वैसे ही न जाने कितने बंडल घर पर बंधे रखे हैं, और वो इस सोच में हैं कि क्या एक महात्वाकांक्षी और अद्भुत पत्रिका का पहला अंक बिना बिके रह जाएगा। राजेश चंद्र के स्वप्न के साथ दुष्कर्म हुआ है और जैसा कि घरों में होता रहा है, ये दुष्कर्म भी अपनों ने ही किया है। मशहूर रंगकर्मी अरविंद गौड़ उन कुछ लोगों में से थे, जिन्होंने राजेश चंद्र को इस पत्रिका को निकालने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन पत्रिका के विमोचन के मौके पर एनएसडी के मंच पर जा कर बजाय पत्रिका के बारे में बात करने के, अरविंद जी ने व्यक्तिगत कुंठा, गुस्से और आरोपों के लिए जिस तरह से समकालीन रंगमंच के मंच को रंगमंच बना दिया, वो वाकई अफ़सोसनाक होने से ज़्यादा शर्मनाक था। अरविंद जी मेरे कुछ बेहद घनिष्ठ लोगों में से हैं...बिल्कुल बड़े भाई जैसे, लेकिन धीरे धीरे बढ़ती असहिष्णुता और विरोध न स्वीकारने की आदत के साथ साथ, हर मंच पर अपनी बात कहने की आदत उनको उन सब से दूर लिए जा रही है, जो उनके साथ खड़े हैं। संभव है कि उनको और लोग मिल जाएंगे, लेकिन पुराने साथियों की कमी की पूर्ति स्वार्थ के लिए आने वाले लोग नहीं कर सकते हैं...ख़ैर अरविंद जी के थिएटर का स्तर भी उनके बदलते स्वभाव के साथ खड़ा है...लेकिन रंगकर्म सिर्फ रंगकर्म ही तो नहीं है...समाज बदलने का जो सपना थिएटर दिखाता है, क्या उसके लिए पहले खुद को बदलना ज़रूरी नहीं...अरविंद जी, आपसे डांट भी सुनी है और ख़ुद की समीक्षा भी सुनी है...निंदक नियरै राखिए में भरोसा रखता हूं, सो आपसे अपने सम्बंधों को दांव पर लगा कर शायद ये आखिरी बार कह रहा हूं कि थोड़ा संभल कर, थोड़ा सहज होकर, थोड़ा संवेदनशील हो कर सोचिएगा कि क्या सुधार कि गुंजाइश सिर्फ समाज में है, खुद में नहीं...और हां जनवादी न होना बुरा नहीं है...न होकर उसका आवरण ओढ़ना ज़्यादा बुरा है...एक अनुज और हितैषी के तौर पर अपनी इस तल्ख लेकिन शुभेच्छु टिप्पणी के साथ मैं आप को सिर्फ अपने सपने के कुछले जाने से चर्म से मर्म तक बुरी तरह चोटिल पत्रकार राजेश कुमार की इस ई मेल के साथ छोड़े जा रहा हूं, जो उन्होंने एएएसडी की निदेशक अनुराधा कपूर, अरविंद गौड़ और भानु भारती के नाम, इस मुहावरा बन चुके कार्यक्रम के ठीक अगले दिन लिखी थी, ये हम सबका भरोसा है कि राजेश भाई फीनिक्स बनेंगे...राख से उठ खड़ा होना थिएटर की ताकत है...राजेश भाई आपके पास तो शोले भी हैं और चिंगारियां भी...

राजेश कुमार की इस ईमेल को ही उनका औपचारिक बयान और पक्ष माना जाए

आदरणीय अनुराधा जी,
नमस्कार।
कल 14 जनवरी 2013 को शाम 5 बजे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के परिसर में भारतीय रंगमंच पर केन्द्रित पत्रिका " समकालीन रंगमंच " के लोकार्पण समारोह में जिस तरह की अनपेक्षित, दुर्भाग्यपूर्ण और अशोभनीय घटना हुई तथा आमंत्रित रंगकर्मियों में से कुछ ने जिस प्रकार मंच, समारोह के प्रयोजन और अवसर को दरकिनार कर अपनी राजनीतिक कुत्सा की निर्लज्ज अभिव्यक्ति की - उसने इस समारोह के आयोजनकर्ता और एक रंगकर्मी होने के नाते मुझे काफी व्यथित, लज्जित और हतप्रभ किया है और इस प्रकरण के बाद भिन्न-भिन्न प्रकार की जैसी प्रतिक्रियाएं सुनने में आ रही हैं उसके बाद मेरे लिए यह अति आवश्यक हो गया है कि  इस असहज परिस्थिति में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए अपना पक्ष स्पष्ट करूँ। इस क्रम में मैं कहना चाहता हूँ कि,
(1) कल के आयोजन में जो कुछ हुआ, उसके पीछे न तो एक व्यवस्था का विरोध करने की कोई क्रांतिकारिता थी, और न ही यह विचारों अथवा पक्षधरता के बीच कोई टकराहट ही थी। साफ तौर पर यह एक रचना और रचनाकार पर दुर्भावनापूर्ण व्यक्तिगत हमला था और एक गरीब के कोमल सपने को कुचलने की नीयत थी। बहेलिये ने उस निरीह पक्षी को मार गिराने के लिए, जो उड़ कर किसी बड़े खेत में बैठ गया था, पूरी फसल को ही आग लगाने की कोशिश की।
(2) "समकालीन रंगमंच " पत्रिका के प्रकाशन का निर्णय हर प्रकार से मेरा नितांत वैयक्तिक निर्णय है और मैंने अपनी रचनात्मक ज़रूरतों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के ख्याल से ही यथासामर्थ्य इसे निकलने की पहल की है। मेरी इस आकांक्षा और प्रयोजन की सिद्धि में जिन रंगकर्मी मित्रों का जैसा भी सहयोग मिला है, मैं उनका इसलिए भी हृदय से सम्मान करता हूँ कि उन्होंने एक बेहतर पत्रिका निकालने  की मेरी काबिलियत और जज्बे पर भरोसा किया और किसी भी शर्त की कोई पेशकश नहीं की।
(3) मैं उन सभी रंगकर्मी मित्रों एवं विद्वज्जनों का आभारी हूँ जिन्होंने जोखिम से भरे मेरे इस निर्णय को प्रोत्साहित किया और सहर्ष अपनी रचनाएँ छापने को दीं। मैं उन सभी रंगकर्मियों, साहित्यकारों एवं पत्रकारों  का आभारी हूँ जो समय निकाल कर इस लोकार्पण समारोह में शामिल हुए और उन्होंने इस नयी पत्रिका का स्वागत किया।
(4) मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और उसकी निदेशक महोदया का आभारी  हूँ जिन्होंने मेरे आग्रह पर प्रतिष्ठित भारत रंग महोत्सव के तयशुदा और अतिव्यस्त कार्यक्रम के बीच पत्रिका के लोकार्पण हेतु मंच, संसाधन और अवसर उपलब्ध करने में ज़रा भी विलम्ब नहीं किया और निश्चित रूप से इसके पीछे उनके मन में यही भावना थी की एक वैयक्तिक पत्रिका होते हुए भी यह प्रयास समकालीन रंग परिदृश्य में सकारात्मक हस्तक्षेप की संभावनाओं से युक्त है अतः देश के एकमात्र नाट्य विद्यालय को ऐसे किसी भी प्रयास को संरक्षण और जगह देनी चाहिए।
(5) यह समारोह और मंच राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय या भारत रंग महोत्सव का नहीं बल्कि "समकालीन रंगमंच" पत्रिका का था और इसमें जो भी लोग आमंत्रित थे या शरीक हुए वे पत्रिका के संपादक के आमंत्रण पर एक लोकार्पण समारोह में शामिल होने आये थे। यह एक सामान्य तथा बेहद अनौपचारिक किस्म का लोकार्पण कार्यक्रम था। कार्यक्रम से पहले और मंच से भी यह बात रखी  गयी थी कि हम किसी संगोष्ठी या सेमिनार के लिए नहीं बल्कि एक उद्घाटन के साक्षी बनाने के लिए इकठ्ठा हुए हैं। 
(6) एक आयोजक, रंगकर्मी और संपादक होने के नाते आमंत्रित वरिष्ठ, अनुभवी और सम्माननीय रंगकर्मियों से यह आशा रखना कि वे मंच और अवसर की गरिमा का निर्वाह करेंगे- कोई अपराध नहीं था, और इस बात की तो कतई उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि बार-बार अनुनय-विनय करने पर भी वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को थोड़ी देर के लिए विराम नहीं देंगे।
(7) पत्रिका के मंच से अपेक्षित गरिमा का निर्वाह न करते हुए तथा विषयांतर करते हुए आदरणीय श्री अरविन्द गौड़ जी ने अपने अतिथि संबोधन में जिस प्रकार की तल्खी के साथ गैरज़रूरी और बेमौके की राजनीतिक टिप्पणियां कीं, उसके बाद विवाद को रोकना और समारोह को जारी रखना संभव नहीं रह गया। उनसे अपेक्षा थी कि वे समकालीन परिदृश्य में रंगमंच में संवाद और समीक्षा की जगह और ज़रुरत पर विचार रखते और कुछ ऐसे उपाय सुझाते जिनसे एक नवजात पत्रिका के दीर्घ जीवन की कोई राह निकलती। परन्तु एक शिशु के जन्मोत्सव में भी आत्म-प्रचार की लालसा को संयमित करने का उन्होंने कोई इरादा नहीं जताया। एक आयोजक के नाते इस घटना की  नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए मैं समारोह में उपस्थित सभी रंगकर्मियों, साहित्यकारों एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रशासन के समक्ष क्षमाप्रार्थी हूँ कि इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को रोक पाने में सफल नहीं हुआ और आप सबकी भावनाएं आहत हुईं।
(8) मैं वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक श्री भानु भारती जी से क्षमा मांगता हूँ कि वे मुझ अकिंचन के आमंत्रण को स्वीकार कर समारोह में उपस्थित हुए और पत्रिका का लोकार्पण भी किया परन्तु उन्हें अपने विचार, अनुभव तथा सुझाव रखने का उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराने  के दायित्व का मुझसे निर्वहन नहीं हो सका। यहाँ तक कि मैं मंच से उनके प्रति कृतज्ञता भी नहीं ज्ञापित कर सका।
                                                                                                                                  
आदरणीय अरविन्द गौड़ जी से मैं अब भी यह आशा रखता हूँ कि वे कल के अपने आचरण पर पुनर्विचार करेंगे और सार्वजनिक तौर पर अफ़सोस प्रकट करेंगे। वे इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय  नाट्य विद्यालय के नहीं बल्कि अपने एक रंगकर्मी मित्र के आमंत्रण पर उसका उत्साह बढ़ाने आये थे, पर उन्हें यह बात याद नहीं रही। अगर उनका विचार बदल गया था और वे मुझे या मेरे इस अकिंचन प्रयास को क्षति पहुँचाना चाहते थे तो ऐसा वे बहुत शांत और संयत तरीके से करने में भी सक्षम थे। एक छोटे से कस्बे से निकल कर न मालूम किस किस तरह की मुश्किलों की खाई को पार करते हुए यहाँ तक पहुंचे मेरे जैसे बेहद मामूली रंगकर्मी और समीक्षक पर इतनी ताक़त और तैयारी से हमला कर उन्होंने अपनी ऊर्जा और शक्ति क्यों जाया की, यह बात मेरी समझ से परे है।
- राजेश चन्द्र 
संपादक ,
समकालीन रंगमंच, दिल्ली।

"राजेश भाई के जज़्बे को सलाम कीजिए और पत्रिका की सालाना या आजीवन सदस्यता के लिए उनको 9871223317 पर कॉल कीजिए, या फिर  rajchandr@gmail.com पर ई मेल कीजिए... "
   

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