बुधवार, 23 दिसंबर 2009

खाकी...लाल बत्ती और शराब....

ये दृश्य उत्तर भारत में कहीं का भी हो सकता है....पर फिलहाल उत्तर प्रदेश का है....शहर का नाम है ग़ाज़ियाबाद....और जगह ग़ाज़ियाबाद का रेलवे स्टेशन....और उस स्टेशन का विजय नगर का प्रवेश द्वार....23 दिसम्बर यानी कि कल रात करीब सवा दस बजे...एक मित्र को ट्रेन पकड़ा कर उतरा ही था....कि देखा कि बाहर एक लाल बत्ती की एम्बेसडर खड़ी है....सरकारी....सफेद रंग की....नम्बर भी बताऊंगा अभी....खैर आगे बढ़ते हैं....मैं अभी अपनी बाइक का लॉक खोल ही रहा था कि एक फोन आ गया...इतने में गाड़ी के अंदर से एक भद्दी सी गाली के साथ पीछे रखे पान के खोखे की तरफ एक फरमाइश उछाली गई....अबे....*&*)_(%*&_ एक सिगरेट ला जल्दी....
आवाज़ से लग गया कि जनाब लोग शराब के नशे में हैं....मुड़कर गाड़ी के अंदर देखा तो खून खौल उठा....लाल बत्ती की गाड़ी के अंदर बैठी थी खाकी.....खाकी बोले तो अपने रक्षक पुलिस वाले...और कोई कांस्टेबल या सिपाही नहीं...साक्षात यम का रूप लिए एक दरोगा साहब भी विराजमान थे....और सुना रहे थे अपनी वीरता का एक किस्सा....उनके अलावा गाड़ी में तीन लोग और थे....दो तो साफ साफ पुलिस की वर्दी में दिख रहे थे....एक शायद हेड कांस्टेबल और दूसरा कांस्टेबल.....एक की मूंछें नत्थूलाल जैसी थी....और एक कुछ युवा था....चौथा शख्स ड्राईइविंग सीट पर था....हो सकता है पुलिसवाला हो...या न भी हो....खैर ये तीनो वर्दी में थे....और इन पर कानून की रक्षा की ज़िम्मेदारी थी...पर तीनो कानून तोड़ रहे थे...चौथा भी शामिल था....पर शायद वर्दी में नहीं था....कौन कौन से कानून ये तोड़ रहे थे इस पर भी बात कर लेते हैं....
  • पहला ये सार्वजनिक स्थल पर मदिरापान कर रहे थे.....जी हां लाल बत्ती की इस गाड़ी के अंदर शराब के दौर पर दौर चल रहे थे...वो भी खुलेआम रेलवे स्टेशन पर....बल्कि युवा पुलिस वाला तो हाथ में पैग लेकर सड़क पर घूम रहा था....
  • दूसरा ये कि ये तीनो रेलवे स्टेशन के परिसर में ये हरकत कर रहे थे...जहां तक मेरी जानकारी है वो ज़मीन गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन के अंतर्गत आती है.....
  • तीसरा ये कि तीनो ही वर्दी में थे....यानी कि ऑन ड्यूटी मदिरा सेवन हो रहा था....
  • चौथा ये कि उसके बाद इन लोगों ने उस कार के सीडी प्लेयर पर एक बेहद ही अश्लील गाना चला कर उसकी आवाज़ को पूरे वॉल्यूम पर कर दिया....और उसी वक्त एक ट्रेन आई होने के कारण वहां आस पास तमाम महिलाएं भी खड़ी थी...मतलब सार्वजिनक स्थल पर अश्लील व्यवहार का भी मामला....
  • पांचवां ये कि उसके बाद मैं जो इनको देख रहा था...मुझ पर निगाह पड़ते ही मुझे इशारे से बुलाया गया...और धमकाने वाले अंदाज़ में कहा गया कि देख क्या रहा है बे....मेरे थोड़ा तेवर दिखाने पर चुपचाप कार में बैठ गए साहब....
  • छठा....अब ये बताइए कि जब चारों ही पी रहे थे....तो गाड़ी भी ड्राइवर साहब ने पी कर ही चलाई होगी...एक और मामला....शराब पी कर गाड़ी चलाने का...इसमें तो साहब दो साल की कैद भी हो सकती है.....
अब इसके आगे की बात कि आप में से जो लोग कानून के जानकार हों....ये ज़रूर बताएं कि आखिर कौन कौन से अभियोग लगते हैं इन पुलिस वालों पर....दिनेशराय जी आप से ज़रूर जानना चाहूंगा....अब ये बताएं साहब कि ऐसों के हवाले तो हमारी आपकी सुरक्षा है....आज गंदे गाने चलाए कल पता चला कि कार से बाहर उतर कर स्त्रियों से अभद्रता ही करने लगें...भई नशे में जो ठहरे....अच्छा और ये भी बता दूं कि गाड़ी जिस भी व्यक्ति की रही होगी...वह कोई जनसेवक ही था और वहां नहीं था....गाड़ी पर लाल बत्ती थी...और ये पुलिस वाले शायद सुरक्षा या एस्कोर्ट ड्यूटूीपर थे....और जिन साहब की गाड़ी थी अगर वो इस बात से अनभिज्ञ हैं तो उनसे भी निवेदन है कि ऐसा न होने दें....वरना फिर रुचिका जैसी किसी मासूम की कोई वहशी पुलिसवाला जान ले लेगा....
अब बताता हूं गाड़ी का नम्बर....क्योंकि सबसे ज़रूरी ये है कि इन नीच पुलिसवालों की पहचान हो....उस लाल बत्ती की एम्बेसडर का नम्बर था......
UP32 BN5931

अब साहब गाड़ी का नम्बर भी सबके सामने है....सरकारी गाड़ी थी...नम्बर लखनऊ का है पर पुलिस गाज़ियाबाद की ही थी.....लेकिन सवाल जस का तस है कि जब कानून के रक्षक ही अपराधियों सरीखा व्यवहार कर रहे हों....तब क्या किया जाए और कैसे माओवादियों...या नक्सलियों को गलत ठहराया जाए...और कैसे माना जाए कि आदिवासी इलाकों में पुलिस ज़ुल्म नहीं करती होगी....जब शहरों का ये हाल है....और फिर जब पुलिस ऐसी है तो क्या नागरिक कानून हाथ में ले लें...करें क्या...जवाब चाहिए.....
गाड़ी का नम्बर एक बार फिर नोट कर लें.....
UP32 BN5931

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

तेरे जाने के बाद-3




हाल ही में हिमांशु ने कविताओं की श्रृंखला सी शुरु की....दो हिस्से लिखे...तेरे जाने के बाद....शीर्षक से......दोनो ही बेहतरीन....आज अचानक उसके आगे कुछ लिखने का विचार आया....सो उसी श्रृंखला में एक कड़ी और जोड़ रहा हूं...और हिमांशु का आभारी हूं....कई दिन बाद लिखवाने के लिए.....हिमांशु की रचनाओं का लिंक है....


तेरे जाने के बाद
कुछ दिन तक
हवाओं ने तड़पाया
दिशाओं ने उलझाया
नींद आई
तो तेरे ख्वाब ने जगाया
सोच ने
बस तुझको ही पाया

लेकिन अब
हवाएं
एक सी ही लगती हैं
दिशाएं
भ्रम नहीं देती हैं
नींद
अब तेरे ख्वाबों के बिन है
सोच
अब बोझ नहीं लेती है

तेरे जाने के बाद
कलम
जो उदास थी
अब फिर चल पड़ी है
कागज़
जो कोरे थे
फिर कारे हो रहे हैं

और इन पर
अब प्रेम के गीत नहीं हैं
न ही
विरह के आंसुओं से
ये भीग रहे हैं

अब
फिर से
ये
भूख की आवाज़ बनेंगे
फिर
ये विप्लव का साज़ बनेंगे
अब इन पर
श्रृंगार तो होगा
सुहाग का रंग
सुर्ख तो होगा
पर वो खून की सुर्खी होगी
अधरों की नहीं....
अब कविता फिर बहेगी
पर
अल्हड़ धार सी नहीं
चक्रवात की मार सी होगी

प्रेम के इस संसार में
मैं भूला था
कि बाहर एक दुनिया
और भी है
और
मैं नहीं था
होकर भी
इस संसार में

लेकिन
तेरे जाने के बाद
जो तंद्रा टूटी है
जो खुली हैं आंखें....

तो अब दिख रहे हैं
नंगे जिस्म...
भूखे लोग.....
बिलखते बच्चे......
चिढ़ा रहे हैं
वहशी आंखें...
चालाक लोग....
बेरहम दिल....
और
तेरे जाने के बाद
लगता है
कि
तेरा जाना अच्छा ही है
क्योंकि अब
मैं देख सकता हूं ये सब....

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

वो कहते हैं कि..... हैप्पी बड्डे........




एक सुकून और खुशी का अहसास है...तो साथ ही साथ ये एक चिंता भी है कि आज ताज़ा हवा दो साल का हो गया....आज से करीब दो साल पहले एक शिशु रूप में ये ब्लॉग मैने और मेरे सखा हरीश बरौनिया ने मिल के शुरु किया था....और आज ये दो साल का हो गया और वक्त कैसे गुज़रता गया पता ही नहीं चला....सच में वाकई बच्चे बहुत जल्दी बड़े हो जाते हैं....सुकून और खुशी इस बात की है कि नौकरी और ज़िंदगी की जद्दोजहद के बीच भी ताज़ा हवा बहती रही.... और चिंता इस बात की कि हाल के दिनों में इसे ज़्यादा वक्त नहीं दे पा रहा हूं...पर जब जन्मा है तो बच्चा पल ही जाएगा ये सोच कर ऐतबार कर लेता हूं इसके आगे भी चलते रहने का....आज तक इस पर जो कुछ भी लिखा गया आप सब ने हमेशा हौसला बढ़ाया....एक एक का नाम लेना न तो आसान है....और न ही उचित क्योंकि एक भी नाम छूटा तो बवाल समझो....सो आप सभी का आभार....और आभार भी क्यों....आप नहीं हौसला बढ़ाएंगे तो कौन बढ़ाएगा....
लगातार ब्लॉगिंग कर के एक बात जो और समझ में आई वो ये है कि आप जब भी कुछ लिखें तो परवाह न करें कि क्या होगा...क्यों परवाह कर के भी कोई फायदा नहीं....ब्लॉगिंग का जन्म ही अपनी कम कहने दूसरे की उधेड़ने के लिए ज़्यादा हुआ है...हालांकि इसने अभिव्यक्ति के मायने बदले भी हैं....और बिगाड़े भी....पर फिर भी सकरात्मक असर ज़्यादा रहे...एक पत्रकार होने के नाते काम की जो भूख दफ्तर शांत नहीं कर पाया वो ब्लॉगिंग ने शांत की....सबसे अच्छी बात ये है कि ब्लॉगिंग के पुरोधा और शिखर पुरुष अन्य क्षेत्रों की तरह नहीं है...वो भी हमारी आप की तरह आम आदमी हैं...ज़मीन के आदमी हैं...और आपको सहज उपलब्ध हैं....और नए ब्लॉगर को हमेशा हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में परिवार जैसा ही लगता है...जहां तमाम मतभेद हैं...पर फिर भी सब एक साथ हैं....
हाल के दिनों में थोड़ी तल्खी और राजनीतिक गतिविधियां आई....कुछ एक लोग धार्मिक-जातिगत-वैचारिक ज़हर उगलने लगे.....(किसी एक पक्ष की बात नहीं कर रहा हूं) पर हां अभी तक ताज़ा हवा इससे बचा रहा है....लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं....और मेरा अब तक का दो साल का अनुभव बेहतरीन रहा है....हां टिप्पणियों की संख्या कम हुई है क्योंकि ज़्यादातर पाठक खुद भी ब्लॉगर हो गए हैं....पर ये भी अच्छा ही है, अच्छा होता कि पाठक संख्या भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती....
एक दो लोगों का नाम ज़रूर लेना चाहूंगा, पहले तो श्री श्री श्री 1008 समीर लाल उड़नतश्तरी जी महाराज का जो मेरे लिए दुनिया का आठवां अजूबा हैं...पता नहीं कैसे इतना पढ़ लेते हैं....हर अच्छी पोस्ट पढ़ते हैं...और इसके बाद इतना समय भी बचा लेते हैं कि लिख भी डालते हैं...खैर टिप्पणियों के रेकॉर्ड होल्डर तो वो हैं ही....आज तक हर अच्छी पोस्ट पर उनकी टिप्पणी मिली....भले ही वो अकेली टिप्पणी रही हो....इसके बाद है नाम अनुपम अग्रवाल जी का जनाब पेशे से सरकारी इंजीनियर हैं...पर लेखन और कविता का ऐसा शौक कि मुझसे फोन पर ब्लॉगिंग की दीक्षा ली और ब्लॉग जगत को बेहतरीन पोस्टों से नवाज़ दिया...ऐसा जुनून नहीं देखा भैया....गजबै आदमी हैं....हालांकि आजकल लिखते नहीं न जाने क्यूं तो इस मौके पर अनुरोध करूंगा कि लिखना फिर शुरु कर दें....फिर है नम्बर अपने हिमांशु भैया....उर्फ़ कवि हिम...उर्फ़ हिम लखनवी का....अब नामै तीन ठो हैं तो आदमी तो खतरनाक होंगे ही...हिमांशु भैया गुरु जी गुरू जी करते करते हमका गुड़ बनाए दिहिन और खुद शक्कर हुई गए....जनाब की उम्र है 22 साल और काव्य संग्रह छप गया है अमां यार....यहै नाम ब्लॉग का भी है और ब्लॉग पर लिखी गई रचनाओं का ही संग्रह है....वो भी बहुत जोर लगाते हैं कि हम लिखते रहें...कई दिन तक कुछ न लिखो तो फोन करके कह देते हैं कि बहुत दिन हो गए लिख काहे नहीं रहे हैं....इसके अलावा संगीता पुरी जी से भी एक बार बड़ी लम्बी बहस चली थी सो उनका भी धन्यवाद क्योंकि इसी बहाने बहुत दिन बाद फिर से लिखना शुरु कर दिया था....देविका भी डांटती रहती है कि लिखना क्यों छोड़ दिया है....और हां गुंजन भाई जब ब्लॉग पढ़ते दिखते हैं तो भी शर्म आ जाती है....
और भी बहुत नाम हैं....पर सबको धन्यवाद तो दे ही चुका हूं....पर आज दूसरी सालगिरह पर एक वादा कि अब नियमित लिखूंगा....नौकरी के पहलू के सिवा जन्नतें और भी हैं....और ताज़ा हवा बेसाख्ता चलेगी...गजबै चलेगी....और हां पोस्ट पढ़ कर निकल मत लीजिएगा...विश करिएगा...वो क्या कहते हैं अंग्रेज़ी में हैप्पी बड्डे....और कवि एकांत श्रीवास्तव की एक कविता जो जन्मदिन की खुशी और चिंता दोनो को ज़ाहिर करती है उसके साथ छोड़ता हूं कलम....



आकाश के थाल में
तारों के झिलमिलाते दीप रखकर
उतारो मेरी आरती

दूध मोंगरा का सफ़ेद फूल
धरो मेरे सिर पर
गुलाल से रंगे सोनामासुरी से
लगाओ मेरे माथ पर टीका
सरई के दोने में भरे
कामधेनु के दूध से जुटःआरो मेरा मुँह

कि नहीं आई
कोई सनसनाती गोली मेरे सीने में
कि नहीं भोंका गया मुझे छुरा
कि नहीं जलाया गया मेरा घर
कि वर्ष भर जीवित रहा मैं ।

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी