सोमवार, 19 दिसंबर 2011

हामी..मुस्कुराहट...धूप...मेरा आसमान और तुम...

ख्यालों की सिगरेट
जलती जा रही थी...
झड़ती जा रही थी
तगाफ़ुलों की राख
अचानक मैंने कहा तुम से
‘सुनो मेरी ओर से हां है...’
तुम ने मुस्कुरा के कहा,
‘मेरी तरफ से तो कब से हां है..’
फिर मैंने कहा ‘फूल’
तुम ने कहा खुशबू...
मैंने कहा संगीत
तुम ने कहा जादू...
मैंने कहा हवा
तुम ने आसमान
फिर मैंने कहा बादल..
तुमने कहा सूरज
मैंने कहा धूप
तुमने कहा मुस्कुराहट
और फिर तुम बन कर धूप
छा गई
मेरे ज़ेहन की सर्दियों के आसमान पर
मुस्कुराहट की तरह...

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

समय के नाम...


देखो इतिहास का सूरज
डूब रहा है
समय की घाटी में
देवता
धर्म की किताबों में
जा छुपे हैं
महापुरुष
गमलो में
उगने की तैयारी में हैं
घरों की दीवारों पर
चढ़ते मनीप्लांट
अमरबेल में बदल गए हैं
ज़ेहन की दीवारों पर
काई जम आई है
शास्त्रों के साथ
दियासलाई रखी है
महान मस्तिष्क
बह गए वेश्यालय के बाहर
पेशाबघरों में
सच की रात
छा रही है
सच जो काले हैं
अंधेरे से
रोशनी जो झूठी थी
खत्म हो गई है
हमारे समय के सच
व्याभिचारी बूढ़े से
घिनौने
आज़ादी से अश्लील
लोकतंत्र से
तानाशाह
गाभिन पागल महिला से
विद्रूप
ही तो हैं
आओ चलें कूद जाएं
समय की नदी में
इतिहास के
डूबते सूरज के साथ

(समय के नाम...2-12-2011...समय 1.40 देर रात)

सोमवार, 28 नवंबर 2011

दो कप चाय...अदरक वाली...

सोचना
आदत ही बुरी है
फिर सोचा कि शाम हुई
फिर
तुम ज़ेहन में आए
अब सोचता हूं
कि न सोचूं तुम्हे
और सोचता ही जाता हूं
तुम्हारे बाल
तुम्हारे होंठ
तुम्हारी हंसी
तुम्हारा स्पर्श
और सर्दी की उस शाम की
वो बारिश...
सोच रहा हूं बना लूं फिर
वो अदरक की चाय
दो कप..
एक मेरा, एक तुम्हारा
दोनो पी लूं फिर
तुम मुझसे अलग कहां हो...

बुधवार, 21 सितंबर 2011

अंजलि हार गई...(कविता)


(ये कविता भारतीय फौज से कोर्ट मार्शल कर के बर्खास्त की गई पहली महिला अधिकारी फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता को समर्पित है...फौज से लेकर निजी जीवन तक पुरुषों के उत्पीड़न के खिलाफ लड़कर हार गई एक महिला को सैल्यूट है ये कविता...)







मैंने जब भी देखा उनको
उनकी निगाहें
बस मेरी देह पर थीं
कभी
मेरी छातियों को घूरती
कभी मेरी कमर
को बेहूदे तरीके से मापती
मैं कभी संभलती
कभी कांपती
और वो सही कहते हैं
मेरा चेहरा तो
उनको याद भी नहीं
दरअसल उसको उन्होंने
कभी देखा ही नहीं
नहीं देखा कि
मेरी आंखों में कितनी
मासूमियत थी
जो आप देख पाते थे पापा
वो नहीं देख सकते थे
मां
मेरी वो मुस्कुराहट
जो तुमको दिखती थी
क्योंकि वो कली को खिलते देख
खुश नहीं थे
वो तो उसे मसलने आए थे
और पापा...मां
जब मैं चिल्लाई
तो वो बोले
पंख निकल आए हैं इसके
मैंने कहा
मैं उड़ना चाहती हूं
बंधन तोड़
वो बोले
काट दो इसके पर
और फिर पापा
उन्होंने मुझ पर
चमन में बहार को रोकने की
साज़िशों का इल्ज़ाम लगाया
पर मैं लड़ती गई
मेरे पंखों को
उड़ने की कोशिश का
मुजरिम पाया
मैं फिर भी लड़ रही थी
और पापा उन्होंने देखा
कि मेरे पंख बाज़ुओं में
बदल गए हैं
और हौसले
बयानों में
तो
उन्होंने मेरे बाज़ू काट दिए
और
ज़ुबान पर
छुरी चलवा दी...
मैं फिर भी लड़ती गई
पर अब मेरे कटे बाज़ुओं में
जुम्बिश
और गायब ज़ुबान के बयान
खो गए हैं
और वो तो
अब मुझे पहचानते भी नहीं हैं
दरअसल मैं अब
अस्तित्व में ही नहीं हूं
और अब जब
सब मुझे भूल गए
इससे पहले कि तुम मुझे
मां पापा
और मैं खुद को भूल जाऊं
मुझे जाने दो...
मेरे आखिरी पल के
इस अहसास को
नियति मान लेना
कि मैं
हमेशा की तरह हार गई...
मयंक सक्सेना

सोमवार, 5 सितंबर 2011

हम बुद्धिजीवी हैं ...(भाग-1)


(ये कविता किन के लिए लिखी गई है, इसे लिखने से इसका मर्म समाप्त हो जाएगा...मैं जानता हूं कि आप जानते हैं...ये पहला भाग है, अगले का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा)

बिनायक सेन
लड़ रहे थे आदिवासियों के लिए
गांव में
और वो उनके साथ थे
अपने
एसी कमरों में बैठे

जब इरोम
अनशन पर थी
तो वो उड़ा रहे थे
पांच सितारा होटलों में
महंगी विदेशी शराब

जब गुजरात में
एक पूरी कौम का
खात्मा हो रहा था
तो वो डर से
वहां झांकने नहीं पहुंचे

जब जंगलों में
जल, जंगल और ज़मीन की
लड़ाई चालू थी
तब वो
सरकारी फंडिग के
दौरे पर
विदेशी रिसॉर्ट में
करवा रहे थे
मसाज

दलितों-वंचितों के घर
जब जले
तो वो सोते रहे
उठे और राख पर
बड़बड़ाने लगे
वो दलितों में
सवर्ण जो थे

और अब
जब लोग सड़कों पर हैं
वो फिर भी घरों में हैं
लोगों को
भीड़ बता रहे हैं
खारिज कर रहे हैं
आंदोलन से उन्हें
नफरत है
क्योंकि लोगों के साथ
आने के लिए
छोड़ना पड़ेगा
अपना एसी कमरा
और गर्मी बहुत है

-मयंक सक्सेना

बुधवार, 31 अगस्त 2011

मोहभंग....

प्रेम कविताओं के बीच के
संक्षिप्त अंतराल में
याद आती रही
बच्चों की फीस
घर का राशन
पेट्रोल के दाम
मां की दवा
पिता का इलाज
पत्नी की फटी साड़ियां
अपने पुराने गल चुके जूते
दफ्तर के दोस्तों से लिया गया
उधार
गली का बनिया
बॉस का गुस्सा
कागज़ों के बढ़ते दाम
प्रकाशक की अकड़
और फिर स्याही
हल्की पड़ने लगी
कलम रुक के चलने लगी
और
एक दिन घर पर
खिलौने की ज़िद करते
अपने बच्चे को
पीटने के बाद
उसने तय किया
कि अब वो प्रेम कविताएं
नहीं लिखेगा....

मयंक सक्सेना

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

क्या हम ग्रीस से सबक सीखेंगे?

पिछले लम्बे वक्त से ग्रीस में चल रहे वित्तीय संकट को लेकर ज़ाहिर है कि यूरोपीय यूनियन के सभी देश लगातार चिंतित हैं। लेकिन भारत समेत एशियाई देशों में इस पूरे परिदृस्य को लेकर लगभग बेसुधी सा आलम है। दरअसल ये आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि ग्रीस या किसी भी पश्चिमी देश की समस्याओं से अपने को जोड़ कर देखने की न तो हमें फुर्सत है और न ही हमें इसके लिए मानसिक तौर पर शुरुआत से तैयार ही किया गया है। हम आमतौर पर त्योहारों, राजनेताओं, फिल्मों, धर्म और क्रिकेट के कॉकटेल के हैंगओवर में रहते हैं और किसी भी समस्या का हल तब खोजते हैं, जब पानी सर से ऊपर चला जाता है। हमें समस्याओं का रोना रोने में महारथ हासिल है लेकिन समस्याओं से बचने के पूर्वकालिक उपाय सोचने के लिए हमारे पास समय नहीं है।

दरअसल ग्रीस केवल एक मिसाल भर है कि किस तरह पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाएं अपने सबसे बदशक्ल रूप की ओर बढ़ रही हैं। अमेरिका एक शुरुआत थी और उससे हम ज़्यादा सबक सीखने में नाकाम रहे क्योंकि एक तो अमेरिका अपने विशाल पूंजीकोश के दम पर उससे अभी तक लड़ पा रहा है, दूसरा हम पर उस मंदी का कोई ज़्यादा असर नहीं पड़ा। लेकिन हम शायद इसी बात से बेहद उत्साहित हैं कि पिछली मंदी से हम लड़ ले गए, हमें ये सोचना भी गंवारा नहीं कि अगली बार भी हम लड़ पाएं, ये ज़रूरी नहीं है। ज़ाहिर है इसी लिए हमारी सरकार हमेशा की तरह बर्फ सी ठंडी है, देश आंदोलन-आंदोलन खेल रहा है, विपक्ष असल मुद्दों से ध्यान भटकाने में लगा है और हमारी प्यारी मीडिया हमेशा की तरह खबरों को बासी समोसों की तरह दोबारा गर्म कर के तरह तरह की चटनियों के

साथ बेचने की कोशिश में है।

दरअसल ग्रीस का संकट उन तमाम विकासशील मुल्कों के लिए एक संकेत है जो विदेशी कर्ज़ के बल पर विकास बल्कि तेज़ विकास का दम भर रहे हैं। ग्रीस का आर्थिक संकट उस हेरफेर की उपज है जो आमतौर पर इस तरह के तमाम देश विदेशी कर्ज़ हासिल करने के लिए करते हैं। ग्रीस ने कुछ ऐसा ही किया था, देश के सरकारी हिसाब में फ़र्ज़ीवाड़ा कर के लाभ दिखाया, जीडीपी को बढ़ चढ़ा के पेश किया गया और उसके आधार पर लगातार कर्ज़ लिया जाता रहा। ये कर्ज़ आज जीडीपी के अनुपात में 180 फीसदी पहुंच चुका है, और 2009 में यूरोपीय यूनियन की जांच में इस वित्तीय हेरफेर का खुलासा हुआ। ग्रीस को इस सच के सामने आने के बाद एक साल की मोहलत दी गई, 110 अरब यूरो का पैकेज दिया गया, लेकिन ग्रीस ने सुधरने का ये मौका भी गंवाया, पर क्या ये संभव मौका भी था इस पर आगे बात क्योंकि अभी पहला सवाल ये है कि ये वित्तीय हेरफेर हुई क्यों और क्या ऐसा हो सकता है कि ग्रीस अपने आप में ऐसा अकेला मामला हो?

निसंदेह ये अपने आप में अकेला मामला नहीं हो सकता है, क्योंकि दुनिया भर के देश लगभग इसी तरह की व्यवस्था, जिसे आप विश्व बैंक या यूरोपीय यूनियन मान सकते हैं, का पालन कर रहे हैं। वैसा ही विदेशी निवेश, कर्ज़ और उस से होने वाले विकास कार्य और एवज में कर्ज़दाता संस्था की तमाम शर्तों को मानना। मोटा विदेशी कर्ज़, एवज में राजनैतिक आर्थिक सुधारों नाम पर चालाक शर्तें और साथ साथ बड़ी संख्या में मल्टीनेशनल विदेशी ब्रैंड्स को देश में असीमित व्यापारिक हित बांटना और अपनी देशज अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर देना। दरअसल ये व्यवस्था कृषि जैसे देशज उद्यम को तो पीछे कर ही देती है, साथ ही साथ एक देश को पंगु बनाती है, उसे विदेशी सहायता का मोहताज बनाती है, विदेशी निवेश पर निर्भर कर देती है। इन दोनो के लालच में शुरु होता है विकास दर और उत्पादन दर को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का खेल, और उसकी परिणिति होता है ग्रीस। दुनिया में आज ऐसे देशों की बड़ी संख्या है जो विदेशी ऋण लेते हैं, केवल भारत की ही बात करें , तो हर भारतीय नागरिक पर 200 डॉलर का कर्ज़ है, ऐसे में कैसे मान लिया जाए कि दुनिया के और देश जीडीपी और विकास दर जैसे आंकड़ों में हेरफेर कर के अधिक निवेश और ज़्यादा कर्ज़ पाने की कोशिश नहीं करते होंगे।

इस परिप्रेक्ष्य में अहम सवाल ये है कि क्या वाकई ग्रीस भारत के लिए खबर नहीं है और हमें ग्रीस को देख चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं। ये मेरा व्यक्तिगत मत लग सकता है लेकिन दुनिया के सभी तथाकथित प्रगतिशील देशों को इस घटना से चिंतित होने की ज़रूरत है, और ग्लोब के तमाम विकासशील देशों की तरह भारत की प्रगति का बड़ा हिस्सा भी उसी विदेशी निवेश और कर्ज़ पर निर्भर है, जिसकी इस लेख में बात की जा रही है। दरअसल विदेशी निवेश कोई पाप नहीं है, लेकिन समस्या ये है कि विश्व बैंक या आईएमएफ या फिर यूरोपीय यूनियन की नीतियां आपको मजबूर करती हैं कि आप इस विदेशी निवेश की प्रासंगिकता, आवश्यक्ता और सीमा पर न सोच पाएं। और इसके तमाम उदाहरण आपको दिखेंगे, ज़ाहिर है कि लगातार सरकार को लाभ दे रही सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों में भी जब विनिवेश की बात होने लगे, तो ये सोचना लाज़िमी है कि हम आखिर ये क्या और क्यों कर रहे हैं।

ग्रीस निश्चित तौर पर एक महत्वपूर्ण सबक होना चाहिए, और इस बात को समझने के लिए अर्थशास्त्री होना ज़रूरी नहीं कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है, कृषि नीतियां सर्वहारा की दुश्मन क्यों होती जा रही हैं, निजी बैंकिंग किस तरह ऑपरेट कर रही है और बाज़ार को किस तरह से कुछ भी बदलने के लिए आज़ाद छोड़ा जा रहा है। बाज़ार के समर्थक लगातार ये दुहाई देते हैं कि ग्लोबलाईज़ेशन ने किस तरह से देश को बदल दिया है। युवा मोटी तन्ख्वाह पर आईटी जैसे सेक्टर्स में काम कर रहे हैं और लोगों के रहन सहन का स्तर सुधरा है। सवाल ये है कि ये आंकड़ें कितनी आबादी पर लागू हो रहे हैं, क्या जो आईटी या मैनेजमेंट नहीं जानता, उसके रहन सहन में भी सुधार हुआ है। क्या हैजे से मरने वाले नवजात शिशुओं की तादाद कम हो गई है? क्या गरीबी रेखा के नीचे लोग अब गिने चुने बचे हैं और क्या जीडीपी हमारे सकल विकास के साथ साथ प्रति व्यक्ति विकास को भी दर्शाती है। सवाल ये है कि जो सरकार जीडीपी की घोषणा धूमधाम से, माइक-कैमरों पर करती है, वही प्रति वयक्ति आय के आंकड़ों के आने पर प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करती, क्यों नहीं सार्वजनिक तौर पर गरीब लोगों की प्रति व्यक्ति औसत आय पर चर्चा होती है। क्या ये आंकड़ें केवल एनजीओ के गोरखधंधे को बढ़ावा देने के लिए हैं।

दरअसल भारत की जीडीपी भी एक सुनहरा धोखा है, जैसे कि ग्रीस में हो रहा था। ग्रीस में आज जनता सड़क पर है, क्योंकि सरकार ने कटौती प्रस्ताव पारित किया है। इससे लोगों की तन्ख्वाहें कम होंगी, टैक्सों का बोझ बढ़ेगा और मुद्रा का दिन पर दिन अवमूल्यन होने से महंगाई भी बढ़ सकती है। हमारे जैसे देशों में भी एक तबका है जो बेहद मोटी तन्ख्वाहों पर नौकरी कर रहा है, और न केवल उसकी जीवनशैली बेहद विलासितापूर्ण हो गई है बल्कि वो असल मुद्दों से दूर भी है। यहां पर मैं स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि केवल जंतर मंतर पर इकट्ठे होकर नारे लगा देने भर से युवा पीढ़ी सतर्क और सजग नहीं मानी जा सकती है, क्योंकि वो बस्तर और मणिपुर के अपने हमउम्र साथियों के बारे में कोई जानकारी नहीं रखती। दरअसल ग्रीस वो वर्तमान है, जो तमाम विकासशील देशों का भविष्य हो सकता है। ग्रीस, जिसे सभ्य जीवन शैली का प्रणेता माना जाता है, आज नव विकासवाद के दुष्प्रभावों का मरीज़ है। आपको समझना पड़ेगा कि बचपन से ही आपको जिस तरह उपभोक्ता बनाया जाता है, उसके अपने दुष्प्रभाव भी होंगे और उनसे बचने के लिए रास्ते ढूंढने होंगे, जो केवल आंकड़ों की बाज़ीगरी से नहीं निकलेंगे, बल्कि खुद अपनी सहायता करने से सामने आएंगे। ये संभव नहीं है कि आप बाज़ारवाद के फ़ायदे के मज़े उठाएं और उसके नुकसानों से बचे रहें।

ग्रीस के संकट को भारतीय परिप्रेक्ष्यों में बदल कर देखना होगा, दरअसल शायद ये कहना ज़्यादा सही होगा कि अमेरिका के मुकाबले ग्रीस का संकट भारतीय माहौल और परिस्थितियों के ज़्यादा करीब है और इसीलिए अमरीकी मंदी के असर से बच निकल आने को इस तर्क के पीछे का अति आत्मविश्वास बनाना घातक हो सकता है, कि हम तो अमेरिकी मंदी से भी अप्रभावित रहे। गोल दुनिया लगातार घूमती है और हम वहीं लौट कर आते हैं जहां से हमने चलना शुरु किया था, दुनिया में जिन सिद्धांतो को अव्याव्हारिक बता कर खारिज किया गया, वो समाजवादी अर्थव्यवस्था वापस राह में खड़ी है, जिस पूंजीवादी व्यवस्था को विकास की सीढ़ी मान के चढ़ा गया, उसके दूसरी ओर ढलान है। ज़ाहिर है समानता ही समतल हो सकती है, बाकी हर रास्ते में चढ़ाई के बाद ढलान होगी ही। बेहतर होगा कि भारत की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पूंजीवादी बनाने के प्रयासों के खिलाफ आवाज़ उठाई जाए, नीति निर्धारक भी सोचें और आप भी। ग्रीस की आवाज़ें अनसुनी करना महंगा पड़ सकता है।

मयंक सक्सेना

mailmayanksaxena@gmail.com

बुधवार, 29 जून 2011

इतनी सस्ती थी कि विद नमकीन 'चार आने' की पी...




चवन्नी की विदाई का वक्त है पूरे मुल्क के साथ लखनऊ का दिल भी बुझा-बुझा सा है. क्योंकि ये वो अमीर शहर है जिसने हमेशा चवन्नी को भी सर आंखों पर उठाया है. सुबूत चाहिए तो आफताब लखनवी के कुछ अश्आर आपकी खिद्मत में पेश किए दे रहा हूं-

मै अगर छू लूं चवन्नी को अधन्ना हो जाए

‘वो’ अगर बांस को छू ले तो गन्ना हो जाए(वो=महबूबा)

***

मेरे वालिद अपना बचपन याद करके रो दिए

इतनी सस्ती थी कि विद नमकीन चार आने की पी

पूरी बोतल मेरा छोटा भाई तन्हा पी गया

मैने मजबूरी में लस्सी भर के पैमाने में पी

ये अलग बात है कि नए दौर के लखनऊ ने आफताब लखनवी को ज़मानों पहले भुला दिया और दस बीस बरस में चवन्नी भी उसके ज़हन से गैर हाजिर हो जाएगी. वो चवन्नी जो कभी लखनऊ की ज़बान और बयान के आगे आगे चलती थी. लखनऊ के मकबूल तहज़ीबी जुमलों में चवन्नी का अच्छा खासा दखल था.

अगर किन्ही हज़रत में मर्दानगी कम है तो उनके लिए कहा जाता था कि ‘अमां उनकी चवन्नी कम है’. अगर कोई मोहतरम अक्ल से पैदल हैं तो उनके लिए गढ़ा गया जुमला था कि ‘अमां फुलां साहब चवन्नी गिराए घूमते हैं.’ और अगर कोई कंजूस है तो उसके लिए- ‘अमां छोड़िए वो तो रूपए में पांच चवन्नी बनाते हैं.’ हालांकि तमाम लखनवी तहज़ीब के इन तमाम एजाजो-इकबाल के बावजूद चवन्नी के फेयरवेल के दिन जो मुहावरा मैने सबसे ज्यादा सुना वो‘चवन्नीछाप’ का था, जिसे सुनकर शायद चवन्नी भी दिल शिकस्ता (टूटे हुए दिल वाली) हो जाती होगी.

जहां तक मेरी जानकारी है ये मुहावरा 80 के दशक में कानपुर में उपजा और बाद में पूरे हिन्दोस्तान में बीमारी की तरह फैला. होता यूं था कि कानपुर से एक दौर में नौटंकी की पार्टियां पूरे देश में जाती थीं. इनमें उत्तेजक प्रसंग आने पर दर्शक मंच की तरफ चवन्नियां उछालते थे. बाद में ये चलन सिनेमा हाल तक जा पहुंचा. इन्ही लोगों को चवन्नी छाप कहा जाता था. मुहावरा पूरी तरह इंसानी मेयार बताने के लिए था लेकिन बाद में चवन्नी का मेयार भी इसी से तय होने लगा. दुनिया ये भूल गई किइसी चवन्नी से बचपन अपने बेशुमार ख्वाब खरीद लेता था.

बहुत पुरानी बात नहीं है जब लखनऊ में चिच्चा(पन्नी की छोटी पतंग) और डग्गा(कागज की छोटी पतंगें जिनके पीछे छोटी सी पूंछ लगी होती है.)पतंगों की कीमत चवन्नी हुआ करती थी. दो चवन्नी मिलाकर मै और मेरा भाई सुपर कमांडो ध्रुव नागराज या डोगा की एक कामिक्स किराए पर लाते थे,जिसे पढ़ते पढ़ते ही मै निराला, मीर और तहलका तक पहुंचा. 25 पैसे में इनाम खोलने का एक कूपन मिलता था जिसमें कभी कभी घड़ी और मिथुन या धरमिंदर का बड़ा पोस्टर तक हाथ लग जाता था. शक्तिमान का स्टिकर भी चवन्नी में ही दस्तयाब था. मांएं अपने बच्चों को नज़र और हाय से बचाने के लिए चवन्नी की शरण में ही जाती थी. फिर बच्चे अपनी करधनी और गले से चवन्नी लटकाए घूमते थे. यही नहीं आंख दुखने पर मां जो देसी ट्यूब (जिसे आम जुबान में गल्ला कहते हैं,) बच्चे के लगाती थी वो भी चवन्नी का मिलता था. इसके साथ ही संतरे की वो सदाबहार टाफियां भी याद आती हैं जो मेरे पूरे बचपन भर ‘चवन्नी की दो वाली’ संज्ञा से ही नवाज़ी जाती रहीं. (अंग्रेजी में मजबूत कुछ बच्चे इन्हे आरेंज वाली टाफी भी कहते थे). इसी तरह कुछ टाफियों का नाम 'चवन्नी वाली' भी था. संतरे की फांक जैसा लैमनजूस या लैमनचूस (पता नहीं इसका सही नाम क्या होता है,) भी चवन्नी का ही मिल जाता था.

बचपने का रिजर्व बैंक यानि गुल्लक को तोड़कर अपनी अमीरी दिखाने के लिए जब सिक्कों की कुतुब मीनार बनाई जाती थी तो उसकी सबसे ऊपरी मंजिल भी चवन्नी से ही बनती थी. ये भी कहा जाता था कि चवन्नी को अगर कड़वे तेल में डुबो कर रेलगाड़ी के नीचे रख दो तो वो चुम्बक बन जाती है, कई दफा ये प्रयोग मैने भी सिटी स्टेशन और चारबाग की पटरियों पर आजमाया लेकिन सफल नहीं रहा. चवन्नी को उंगली की चोट से देर तक घुमाने की

प्रतियोगिताएं भी खूब होती थी जिसमें इनाम वही चवन्नी होती थी. स्कूल के बाहर काला वाला तेज़ाब मिला हुआ चूरन भी चवन्नी में एक पुड़िया मिल जाता था जो कि जबान पर छाला निकालने के लिए काफी होता था. इसी तरह आइसक्रीम के ठेलों पर डिस्को नाम की एक आकर्षक चीज (पन्नी में भरा ठंडा रंगीन मीठा पेय) का दाम भी 25 पैसे था.

लेकिन फिर एक वक्त और भी आया जब इसी चवन्नी के दिन ऐसे बदले कि सफर पर जाते वक्त ढूढ ढूढ के चवन्नियां रखी जाने लगी. भिखारियों को देने के लिए. और भिखारी भी इन्हे, देने वालों को चवन्नीछाप कहके वापस कर देने लगे. बच्चों ने चवन्नी लेकर दुकान जाना

बंद कर दिया और अगर कोई बच्चा पहुंच गया भी तो दुकानदार ने बनियागिरी दिखाते हुए उसका दिल तोड़कर उसे ये कहते हुए लोटा दिया कि चवन्नी नही चलेगी. जबकि मुझे घर के पास वाला बनारसी आज भी याद है जिसने मुझे 25 पैसे की इमली की गोली एक बिस्सी यानी 20 पैसे में इस शर्त के साथ दी थी कि मै पंजी या 5 पैसे उसे बाद में दे दूंगा. हालांकि मै उन्हे कभी दे नहीं पाया और पता नहीं बनारसी दादा कहां चले गए. चवन्नी के बंद होने पर व्यवहारिक रूप से कोई क्षोभ जरूरी नहीं है. लेकिन फिर भी चूंकि ये घटना अतीत के खूबसूरत पन्ने दोबारा पलट गई है इसलिए माहौल का जज्बाती होना लाजिमी है. पहले बनारसी दादा गए, फिर बचपन गया और आज बचपन के खजाने का सबसे बड़ा सिक्का यानि चवन्नी भी रूखसत हो गई.



हिमांशु बाजपेयी
(
लेखक युवा पत्रकार और कवि हैं. देखने में तो नहीं पर लिखने में बेहद खतरनाक और मारक हैं. हालांकि ज्यादा जाने जाते हैं, जज्बाती और इश्किया शायरी के लिए. पर मुझे लगता है कि
नौस्टेल्जिया आधारित लेख लिखने वाले सबसे अच्छे लेखकों में से हैं. लखनऊ में रहते हैं और लखनऊ शहर को लेकर बेहद जज्बाती बल्कि ओब्सेस्ड टाइप हैं. फिलहाल लखनऊ में ही तहलका हिंदी के संवाददाता हैं.)

रविवार, 17 अप्रैल 2011

कौन से मौसम में चले आए हो बादल...

बेमौसम बरसात ने दिल्ली को भिगो डाला है...अब बैठे ठाले मोबाइल में कुछ अशआर लिखे...उन्हें दिल्ली की बेमौसम लेकिन बामज़ा बारिश को समर्पित करता हूं...

ये कौन से मौसम में चले आए हो बादल
क्या तुम भी शायरों की तबीयत में ढल गए

तपते थे जिस्म तुमने भिगोए हैं इस तरह
मौसम की तरह रूह के तेवर बदल गए

जैसे मिजाज़ ए यार बदलता है यक ब यक
तुम आए और प्यास के मंज़र मचल गए

भीगा हूं मैं भी, यार भी भीगा हुआ होगा
बस बारिशों में अबकि तगाफुल निकल गए

है जिस्म भी हारा हुआ और रूह परेशां
आए जो तुम गरज के तो अरमान पल गए

हर रात तुम्हारे लिए जलता रहा हूं मैं
पानी में लगी आग देखो तुम भी जल गए...

मयंक सक्सेना

गुरुवार, 24 मार्च 2011

काल तुझसे होड़ है मेरी...(आलोक तोमर की अंतिम कविता)

तात को गए आज चार दिन हो गए....सबने उनके लिए खूब लिखा...सब उस जीवट को सलाम करते रहे जो केवल आलोक तौमर की ही बपौती था...सब उनके साथ वक्त को याद करते रहे...सबने कहा कि वो आदमी हमेशा साहसी रहा....लड़ता रहा....और मौत से भी लड़ता रहा....पिछली कविता मेरी थी, जो तात को समर्पित थी....आज ये वो कविता है जो तात ने लिखी थी...दुनिया छोड़ने से कुछ दिन पहले...इसे पढ़कर उनके न केवल अद्भुत लेखन बल्कि उनकी हिम्मत और जिजीविषा का भी अंदाज़ होता है....काल तुझसे होड़ है मेरी.....


"तात (आलोक तोमर) की हस्तलिपि में ये कविता "



काल तुझसे होड़ है मेरी...

काल तुझसे होड़ है मेरी
जानता हूं चल रही है
मेरी तुम्हारी दौड़
मेरे जन्म से ही
मेरे हर मंगल गान में
तुमने रखा है ध्यान में
एक स्वर लहरी,
शोक की रह जाए
आपके दूत मुझसे मिलें हर मोड़ पर
और जीवन का बड़ा सच
चोट दें, कह जाएं
सारे स्वप्न, सारी कामनाएं, आसक्तियां
तुम्हारे काल जल में बह जाएं
लेकिन अनाड़ी भी हूं
अनूठा भी, किंतु
तुम्हारी चाल से रूठा भी
काल की शतरंज से कभी जुड़ा
और एक पल टूटा भी
तुम सृष्टि के पीछे लगाते दौड़
देते शाप और वरदान
और प्रभंजन, अप्रतिहत
चल रही है
दौड़ तुमसे मेरी
ए अहेरी
काल, तुझसे होड़ है मेरी.....

आलोक तोमर

मंगलवार, 22 मार्च 2011

तुम मेरे आलोक थे....

ये कविता मेरे तात (आलोक तोमर) को समर्पित है...तात आप अजीब सी हालत कर गए हैं...आपसे तमाम बार झगड़ा हुआ, बोलचाल भी बंद हुई और आप बीमार भी पड़े पर ऐसी बदहवासी वाली स्थिति कभी नहीं आई....तमाम लोग जिनको आपके बारे में तमाम भ्रम रहे उनसे मैं कभी लड़ा नहीं क्योंकि वो आपसे कभी मिले ही नहीं थे....तो वो क्या जानते आपके बारे में...मैं लगातार परेशान हूं और सब आपकी गलती है...कई अखबारों और पोर्टलों के कहने के बावजूद आपके लिए कोई लेख लिख पाने में असमर्थ रहा...और अब लिखने बैठा तो ये आलम कि लेख की जगह कविता निकली...पता नहीं कितने दिनों में उबर पाऊंगा...हो सकता है कि कुछ संस्मरण लिख पाऊं...आपको तो याद ही होंगे तात वो सब वाकये...पर ये कविता नई है...सो हर बार की तरह इसे भी आपको ही पहले पढ़वाना है....पर इस बार ये आपके लिए है, आपको समर्पित है...आपसे जो बातें कह न पाया...वो लिख दी हैं....आप से कभी कहा नहीं पर आप मेरे जैसे तमाम लड़ते रहने वालों के लीडर थे, जिसे आप अपनी भाषा में सरगना कहते थे....कविता....

जब वृक्षों ने इंकार किया
छांव देने से
तब तुम सर पर छा गए
जब जब बादलों ने मना किया
बरसने से
तुम गरजते आ गए
लड़खड़ाया जब हौसला
तो संभालने वाले
तुम्हारे हाथ थे
जब सब खड़े थे दूर
तकते तमाशा
तुम ही तो साथ थे
जब वाणी अटक रही थी
कंठ में
मेरी ओर से तुम चिल्लाए थे
जब आंसू बह आए थे
अनायास
तुम मुस्काए थे
तुम्हारे जीवट से
हिम्मत थी मेरी
तुम्हारी मुस्कुराहट से आशाएं
तुम्हारे शब्द
मेरा बाहुबल थे
तुम्हारी कलम मेरी भुजाएं
जीवन के
अनगढ़
अनंत पथ पर
अनगिनत कष्ट थे,
शोक थे
पर सूर्यास्त पर
भय मिटाते
राह दिखाते
तुम मेरे आलोक थे....

(आलोक तोमर की एक पुरानी तस्वीर)

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

जश्न जारी है...

ज़ाहिर है मेरी लम्बे वक़्त बाद आ रही इस पोस्ट से कम से कम हिमांशु ज़रूर खुश होंगे....क्योंकि अर्से बाद कुछ ब्लॉग पर आया है और वो भी एक ग़ज़ल...पर दरअसल इस ग़ज़ल के दो शेर करीब एक-डेढ़ साल से किसी डायरी के पन्ने पर थे...आज पूरे कर डाले....तो उम्मीद करते हैं कि लिखने का ये जश्न जारी रहेगा...

तमाम मातमों पर, इक उम्मीद भारी है
बची है रात, और अपना जश्न जारी है

झुकी जो पलक तेरी, एक अश्क टप से गिरा
मेरी हथेलियों में, क़ायनात सारी है

ज़मीं भी फ़तह की है, आसमान भी जीता
कि दिल की जंग ही, हम ने ऐ दोस्त हारी है

तमाम ओर चरागों ने मुंह छुपाया क्यों
कि तेरे रुख से, चरागों की पर्दादारी है

मैं तुझको रोकता कैसे, मैं चाहता भी अगर
तेरी मर्ज़ी पे मैंने, खुशियां अपनी वारी है

मैं खिलखिला के हंसा, आंख मेरी भर आई
ज़रूर दर्द की, खुशियों से नातेदारी है

'मयंक' जानते हैं, तू न आएगा अब फिर
मगर जो नाम लिया, फिर से बेक़रारी है
मयंक सक्सेना

काल चक्र

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देवनागरी