सोमवार, 28 नवंबर 2011

दो कप चाय...अदरक वाली...

सोचना
आदत ही बुरी है
फिर सोचा कि शाम हुई
फिर
तुम ज़ेहन में आए
अब सोचता हूं
कि न सोचूं तुम्हे
और सोचता ही जाता हूं
तुम्हारे बाल
तुम्हारे होंठ
तुम्हारी हंसी
तुम्हारा स्पर्श
और सर्दी की उस शाम की
वो बारिश...
सोच रहा हूं बना लूं फिर
वो अदरक की चाय
दो कप..
एक मेरा, एक तुम्हारा
दोनो पी लूं फिर
तुम मुझसे अलग कहां हो...

6 टिप्‍पणियां:

  1. सोच से ही तो सारी बात उठी... तो सोचना अच्छा हुआ न

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  2. सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार..

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  3. वाह क्या बात है कितने खूबसूरती से और बेयड सरल शब्दों मे आपने अपने दिल की बात कह डाली ....बहुत अच्छा लगा आपकी यह पोस्ट पढ़कर ...समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है :-)

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  4. सच, एक ही तो हैं दोनों!
    सुन्दर!

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