गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

ब्लॉगर मीट भी होगी....संगठन भी बनेगा....

अविनाश वाचस्पति जी से क्षमा मांगते हुए ये सब कुछ लिख रहा हूं....उन्होंने मना किया था कि किसी भी तरह का आक्रोश दिखाना उचित नहीं है....और हर एक की राय का सम्मान ज़रूरी है....वाचस्पति जी ने मुझसे कहा कि अगर कोई एक भी नाराज़ है तो उसे प्यार से मनाएंगे पर वाचस्पति जी माफ कीजिएगा कुच लोग नाराज़ नहीं हैं...नासाज़ हैं....और उनकी तबीयत ठीक होने वाली भी नहीं है.....अरे आपने, मैने या किसी ने भी अगर ब्लॉगर संगठन बनाने की बात कह दी तो इस पर अपनी राय लोग भले ही व्यक्त करें....लेकिन नाराज़ होने का हक किसको हो सकता है....और फिर सहमत न होने का मतलब तोहमत लगाना कतई नहीं होता है....अगर कोई संगठन बनाने के हक में नहीं है तो न हो पर कोई कैसे यह निर्णय करेगा कि हम ब्लॉगिंग के शुभचिंतक हैं या नहीं....और जिनको लगता है कि संगठन बनाने से ब्लॉगिंग की क्षति होगी वो ज़रा ये तो बताएं कि बिना किसी संगठन के कैसे ब्लॉगिंग का भला करेंगे या कर रहे हैं....
क्या जिन लोगों के साथ आप एक आभासी दुनिया में रोज़ जी रहे हैं....जिनसे आप अपना सुख दुख बांट रहे हैं....उनसे मिलना या ब्लॉगर मीट करना कोई गुटबाज़ी है और फिर अगर इस मिलन को हम ब्लॉगर मीट की जगह कुछ और कहने लगें तो आप संतुष्ट हो जाएंगे....और क्या उद्देश्य बदल जाएगा....आप मजदूरों के हित के लिए बने उनके संगठन के खिलाफ हैं?.....या फिर कर्मचारियों के कल्याण के लिए उनके संगठन के खिलाफ....महिलाओं के शोषण और अत्याचार रोकने के लिए उनके संगठन के खिलाफ आप कुछ नहीं बोलते हैं....पत्रकारों के संगठन भी जायज़ हैं....पर लेकिन एक बेचारा ब्लॉगर जो बिना किसी आर्थिक लालच के ब्लॉगिंग कर रहा है....उसने गलती से संगठन बनाने की बात बोल भी दी....तो अरे ये क्या बक रहे हो.....गुटबाज़ी करोगे....राजनीति करोगे....और पता नहीं क्या क्या....आप संस्कृति बचाओ मंच बनवा देंगे पर एक ऐसा मंच जहां हर क्षेत्र से जुड़े ब्लॉगर जुड़ेंगे ऐसे किसी भी फोरम से आपको ऐतराज है....क्यों भला?
हम बचपन से रटते आ रहे हैं संघे शक्ति....एकता में बल है....कबूतर से लेकर लकड़ी के गट्ठर तक की कहानियां याद कर डाली....पर संगठन के महत्व को नहीं समझ पाए....और मेरी समझ में यह नहीं आता कि आखिर अविनाश भाई ने ऐसी कौन सी बात कह दी थी....अरे क्या कहीं ये कहा गया था कि फलाने प्रकार के ब्लॉगर ही इस संगठन के सदस्य होंगे....या हम किसी एक विचारधारा....लेखन शैली....या धर्म-सम्प्रदाय के ब्लॉगरों को इस संगठन से जोड़ेंगे....अरे मोहल्ले के लोग तक होली मनाने के लिए संगठन बना सकते हैं फिर ब्लॉगरों के संगठन में ही आपत्ति क्यों....
क्या संगठन का उपयोग केवल गुटबाज़ी और राजनीति के लिए ही होता है....क्या अगर कोई संगठित हो रहा है तो मतलब सिर्फ ये है कि वो अपने व्यक्तिगत हित साधेगा....क्या संगठन रचनात्मक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नहीं बन सकते हैं....क्या संगठन से सामाजिक दायित्व नहीं निभाए जाते हैं....और क्या हमारे इसी ब्लॉग जगत में कई तरह के अनकहे....अघोषित....और अवांछित संगठन-गुट नहीं बने हुए हैं.....इस सवाल का जवाब मुझे चाहिए नहीं क्योंकि जवाब सबको मालूम है.....और चिल्ला कर चीख कर विरोध करने से बेहतर था कि कोई रचनात्मक सुझाव देते.....क्या आपको मालूम है कि अनेक ब्लॉगर ऐसे हैं जो शौकिया लिखते हैं लेकिन अच्छों से भी बहुत अच्छा लिखते हैं....लेकिन फिर भी उनके ब्लॉग्स पर तमाम बौद्धिक ब्लॉगरों की एक टिप्पणी तक नहीं आती है(जबकि कुछ ब्लॉग्स पर अस्तरीय पोस्टों पर भी ....) क्या ये किसी तरह की गुटबाज़ी का हिस्सा नहीं....
हम में से कोई लेखक है...पत्रकार है....तो कई इंजीनियर....प्रोग्रामर....डॉक्टर....शिक्षक....खिलाड़ी....विद्यार्थी और गृहिणियां भी हैं.....लेकिन क्या उनको जोड़ने का प्रयास गुटबाज़ी है.....और अगर ये है तो तमाम तरह के लांछन लगने और सहने के बाद भी कम से कम मैं संगठन बनाना चाहता हूं....इसलिए नहीं कि ये मेरा व्यक्तिगत स्वार्थ है....बल्कि इसलिए कि मैं उन सबको गलत साबित करना चाहता हूं जो संगठन बनाने के ख्याल को तमाम अन्यथा सिद्धांतो से जोड़ते हैं....
अविनाश जी माफ कीजिएगा....ये भावावेश नहीं है बहुत सोच समझ कर लिख रहा हूं....क्योंकि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे.....मैं देखता हूं कि कई पुराने....खांटी....तथाकथित वरिष्ठ ब्लॉगर इस मामले में सही का पक्ष जानते हुए भी चुप रहे....पर मैं बोलूंगा.....आपने कविता मांगी थी पर मैं लेख लिख रहा हूं......आप ने संगठन को ना ना कहा था.....मैं हां कहूंगा अभी भी पक्ष में खड़ा हूं....खड़ा रहूंगा.....ब्लॉगिंग मेरे लिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है.....और वो सब जो ब्लॉगिंग का हिस्सा हैं मेरे परिवार का हिस्सा है.....मुझे लगता है कि ब्लॉगिंग की बेहतरी के लिए संगठन ज़रूरी है....जिसे गलत लगता है आकर बहस करे और खुद को साबित करे.....अरे अगर ब्लॉगर संगठन के पक्ष और विपक्ष में लोग हैं तो दो तरह के गुट तो वैसे ही बन गए....और सबको अपने पक्ष में कर पाना कभी भी सम्भव नहीं रहा....और कुछ लोग केवल बवाल फैलाने में ही लगे हैं....उनकी पोस्ट्स ऐसे ही हिट होती हैं...क्या किया जाए मैं तो कविता लिखता हूं....आज ये सब लिखने पर मजबूर हो गया.....पर एक बात अच्छी तरह समझता हूं कि अब अगर पीछे हटे तो ये लोग अपने उद्देश्य में सफल हो जाएंगे....वो नहीं होने देना है.....ये बात जारी रहेगी....
मयंक सक्सेना

26 टिप्‍पणियां:

  1. सही बात-अब ये दुनिया आभासी कहां है।
    सब एक दुसरे से मिल रहे हैं आमने सामने।

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  2. मयँक जी, किसी भी विधा में मत-विमर्श के लिये एकजुट होकर बैठना बिल्कुल सही बात है, बहुत सारे सकारात्मक मुद्दे स्वतः ही जुड़ जाते हैं ।

    इनके सँयोजन के लिये एक स्थायी सँगठन का होना कुछ चुभने वाला है । इसे लोकताँत्रिक तरीके से चलाने के लिये पदाधिकारियों का मनोनयन या चयन होगा, ज़ाहिर है यह प्रक्रिया देर सबेर लॉबीईंग और अन्य कई तरह के समीकरणों को बनाने तोड़ने की शिकार होगी ।
    यदि अमर सिंह सरीखे विषवमन करने वाले पैठ बना लें, तो बोलो हरि ॐ तत्सत ।
    बिरली निष्ठायें ही अपने सँस्था को लेकर अटल रह पाती हैं ।
    यह मेरा विरोध नहीं बल्कि क्षुद्र बुद्धि विश्लेषण है, अलबत्ता सहकारिता के स्तर पर किसी भी विचार को मूर्त रूप दिया जा सकता है ।

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  3. इसमें कोई दो मत नहीं की जब भी संगठन की बात होगी लोग..उसके विघठन के बारे में ही सोचेंगे...लेकिन बिना संगठन के ये चलेगा भी नहीं...सब अपनी डफली अपना राग बजाते रहेंगे...अनुशासन के लिए ये करना ही पड़ेगा...ये अलग बात है की हर संगठन की तरह उसमें राजनीति, घुसपैठी आएगी ही,,, तो बात इसकी करें ना की इन समयाओं का सामना कैसे किया जाएगा...लेकिन ये कहना की संगठन बने ही नहीं ...बचकाना ही है....मतलब की डूबने के डर से पानी में ही ना उतरें...
    हद्द है...संगठन के बिना कभी काम हुआ भी है...क्या...संगठन बहुत जल बनान चाहिए नहीं तो कल सरकार क्या फैसला लेगी...कोई नहीं जानता ...अगर बन जायेगी तो कम से कम अपना एक मंच होगा जिसमें हम अपनी आवाज़ उठा सकेंगे.....वर्ना...कुछ भी हो सकता है ....
    इस बात कि तरफ कोई नहीं सोच रहा है....एक संगठन तैयार होना ही चाहिए....बेसह्क वो सहकारिता के तौर पर हो....हमारे अधिकारों और कर्तव्य का खाका भी निर्धारित करना होगा...जिस तरीके से ब्लॉग्गिंग का विकास हो रहा है आह नहीं तो कल कोई ना कोई मालिक बन ही बैठेगा...फिर बजाते रहिएगा ताली आप सब....जो इसके खिलाफ हैं वो सिर्फ़ आज देख रहे हैं...कल का कोई इल्म नहीं है उनको...उनको ये लग रहा है इसमें भी राजनीति आ जायेगी...तो हम बता दें राजनीति तो आएगी ही आएगी आप चाहे कि मत चाहें...वैसे भी अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ता..

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  4. संगठन में बुराई कुछ नहीं है। उस के उजले और अंधेरे दोनों पक्ष हैं. अब कुछ लोगों ने सोच लिया है कि संगठन बनाना है तो वह बनेगा। लेकिन यह सोच कि वह अकेला होगा गलत है। अनेक संगठन बनेंगे, उन के अपने रंग होंगे। सोहार्द्र भी होगा लेकिन तलवारें भी खिंचेंगी। लेकिन उन का क्या? यह सब तो बिना संगठन भी होता रहा है।

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  5. लगता होली में सभी बौरा गये हैं ! मयंक जी , संगठन बनाने के विरोध में एक पोस्ट हमने भी लिखी थी . लेकिन उसमें फायदे नुकसान और विकल्प भी सुझाये गये थे . एक बार फ़िर कह रहा हूँ ब्लॉगजगत अपने आप में एक संगठन है और ब्लोगर मीट उसका औजार ( किसी ने भी अब तक ब्लोगर मीट का विरोध नहीं किया है ) . ब्लॉगजगत को किसी अन्य संगठन की जरुरत नहीं है दिल्ली को छोडिये अन्य जगहों पर भी ब्लोगर लोग बगैर किसी खास संगठन के ब्लॉगजगत को हीं संगठन मान कर आपस में मिलते हैं और तमाम मुद्दों पर चर्चा करते हैं . दिल्ली का आलम तो यह है की एकाध सम्मलेन हुआ नहीं की संगठन बनाने की कोशिश में जुट गये . आप पत्रकारों संघ की बात करते हैं , तो कभी प्रेस क्लब , दिल्ली पत्रकार संघ आदि में जाकर देखिये क्या हश्र है ! और यहाँ जो लोग आये हैं ब्लोगिंग में वो उसी से छुटकारा पाने यह सोच कर आये हैं की यहाँ किसी तरह की मठाधीशी करने वाला कोई नहीं है . लोग कहते हैं हम कोई मठाधीश नहीं , अरे साहब , मठाधीशी हीं तो है महज कुछ लोगों के मिलन को दिल्ली ब्लोगर मीट कहना जबकि उसमें से कई लोग आयात किये गये हों . अगर किसी को अनुमान हो तो जरा परता लगायें की दिल्ली में रहने वाले हिंदी ब्लोगरों की संख्या ? फ़िर , अपनी मठाधीशी को कोसें !

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  6. यह बात समझ से बाहर है कि यदि कोई अपना संगठन बना रहा है तो किसी के पेट में दर्द क्यों हो रहा है। और यदि किसी के पेट में दर्द होता भी है तो उससे संगठन बनाने वालों को क्या फर्क पड़ना है?

    आपकी बातों से पूर्णतः सहमत!

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  7. मयंक जी, आपने इतना आदर दिया है, आभारी हूं। समाज में अच्‍छाई की पहचान तभी होती है जब थोड़ी सी बुराई भी हो। अगर बुराई ही नहीं होगी तो अच्‍छाई को कैसे पहचाना-जाना जाएगा ? पर उस बुराई की अच्‍छाई से तुलना और क्‍या बेहतर है, अगर इसका निर्णय बुराईधारक पर ही छोड़ दें तो मेरा मानना है इससे बेहतर परिणाम ही प्राप्‍त होंगे। इसी का इंतजार है। रही नासाजी की बात तो चाहे नाराजी हो चाहे नासाजी - सब बेहतरी से जुड़ सकते हैं। यही एक बात तो है ब्‍लॉगजगत में जो मुझे सकारात्‍मक लगती है और इसी के तथा आप सबके बल पर मैं यह मानता हूं कि जो और किसी माध्‍यम में संभव नहीं है, वो सब कुछ ब्‍लॉगमाध्‍यम में इसकी संपूर्णता में संभव है।

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  8. मयंक जी बहुत ही सटीक बात लिखी है आक्रोश में तो मै भी हूँ ,, पता नहीं इन लोगो को क्या हो जाता है कही भी कुछ भी आप सार्थक करने का प्रयाश करे इन्हें उसमे बदबू आ ही जाती है आखिर बदबू ढूडने की प्रवर्ती जो है ( यहाँ मै ये लायने सीधे सीधे जयराम विप्लव के लिए प्रयोग कर रहा हूँ ) कोई नहीं हम अपने फैसले पर अडिग है संगठन तो बनेगा ही ...वैसे मै जयराम विप्लव जी को राय दे रहा हूँ की अपना ब्लॉग ब्लोग्वानी से हटा ले और स्वतंत्र लेखन करे मतलब खुद लिखे और खुद पढ़े आखिर वो भी तो भिन्न भिन्न मतों और विचारधाराओं और विभिन्न सैन्राच्नाओ का संगठन ही है ,,,,,,,
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  9. Harek cheez ke do pahlu hote hain..sangathan banane walon ne zaroor har baat pe vichar kiya hoga !
    Bhavishy me sangathan chalane me gar faydese adhik nuqsaan nazar aaye to sangathan band bhi kiya ja sakta hai,lekin us dishame koshish to avashy honi chahiye!

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  10. jab teeno lok 'www' ke teen alphabets mein simat raha hai to physical space ki bahut aawashyata nahi hai... waise mujhe iske background ka jyada nahi pata... lekin... iss se lobbying shuru to hogi hi... jaise anya sangathon mein hota hai... duniya bhar se hindi premi... padhne aur liknewale jud rahe hain aur hindi samridh ho rahi hai... koi sangathan banane se jahan yeh sangathan banega (maniya dilli mein) to yahan ke log hi iske karta dharta honge aur koi canda mein reh raha hindi blogger khud ko upeshit feel karega... aap yahn karyakram karenge aur uski khabar duniya tak pahunegi to bahar ka blogger isolation mein feel karega... behtar yahi hai ki koi aisa concept sochiye ki yeh sangathan blog ki virtual world mein bane aur iske padadhikari bhi virtual world mein kaam karen... iss se blog sangatha aur bhi behtar, vishwa vyapi aur saarthak hoga aur har eak tak pahuchega...
    arun 9811721147

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  11. श्रीमान प्रवीन शुक्ल जी , आप जो चाहें कहें आपका अपना मुंह है . आप संगठन बनायें ना बनाएं आपकी मर्जी और आपका अधिकार भी है . एक बार फ़िर दुहरा रहे हैं कि ब्लॉगजगत को हीं अपना संगठन मानकर काम करें तो सबका भला है . नहीं तो परिणाम खुद बखुद दिखने लगेगा . और इतना हीं है तो बगैर चिलम-चिल्ली के संगठन बना लेना चाहिए आपको आक्रोश करने की कोई जरुरत हीं नहीं है . और रही बात ब्लोगवाणी पर दिखाने की तो ब्लोगवाणी कोई संगठन नहीं है और ना हीं किसी खास विचार से बंधा हुआ वहां पूरा ब्लॉगजगत उपलब्ध है और पूरी बहस में मेरा यही मानना रहा है कि ब्लॉगजगत अपने आप में एक समग्र संगठन है फ़िर नये तरह से किसी तरह के पद-सोपान वाले किसी संगठन की जरुरत नहीं है . आप तो निजी तौर पर बातों को दिल पे ले रहे हैं . आप जैसे व्यक्ति को इस उम्र में इस तरह की बचकानी बात नहीं करनी चाहिए यदि किसी बहस में सामने वाले के तर्कों से इतना हीं आक्रोश उत्पन्न हो रहा है तो जाकर किसी चरमपंथी संगठन में शामिल हो जाइये ब्लोगिंग में ऐसा नहीं चलता है . आपने इस बहस में एक भी तर्क संगठन बनाने के पक्ष में नहीं रखे .

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  12. वाह जयराम विप्लव जी ,,,कमाल की खबर निकाल लाए आप एकदम एक्सक्लुसिव ..कि दिल्ली ब्लोग बैठक , जिसके लिए मैं पहले भी कह चुका हूं कि वो सिर्फ़ और सिर्फ़ राज भाटिया भाई से मिलने का एक बहाना भर था , और कोई मीट नहीं था , यदि आपका ईशारा उसी तरफ़ है तो ..उसमें कुछ लोग आयात करके लाए गए थे ..अरे इसका क्या सिस्टम होता है भाई हमें भी बताया जाए ..हम भी आयात होना चाहेंगे ..और कमाल की बात है कि इसमें शामिल न हो पाने के बावजूद आप इतना जान गए ....पहले बताते तो और खुशी होती.....
    अजय कुमार झा

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  13. हालाँकि मैं इस विषय के पक्ष विपक्ष में नहीं रहा मगर जिस तरह उंगलियाँ उठाई जा रही हैं ऐसा लग रहा है जैसे अविनाश ने कोई संगठन की बात कर महा अपराध कर दिया है यह आश्चर्यजनक है ! जहां तक मैं समझ पाया अविनाश का आशय ब्लागरों को कुछ सुविधाएँ देने के लिए संगठन बनाने का था जैसे बाहर से आये साथियों के लिए रुकने का प्रवंध, और नए शहर में उनके लिए मदद करना शामिल था ! किसी अन्य और यहाँ तक कि अनजान साथी की के लिए ऐसा करने के लिए बहुत साहस और मानवता चाहिए हाँ उसका दुरुपयोग नहीं हो पाए इसके लिए पर्याप्त सतर्कता बरती जाना चाहिए !
    किसी भी संगठन को चलने के लिए भीड़ कभी नेतृत्व नहीं देती भीड़ को नेतृत्व देने के लिए एक या दो ईमानदार पथ प्रदर्शक ही चाहिए, अगर अविनाश कोई अच्छा कार्य करना चाहते हैं तो उन्हें किसी से राय लेने की आवश्यकता ही नहीं है संगठन बनते ही लोग अपने आप जुड़ते चले जायेंगे हाँ "दिल साफ़ होना चाहिए ..."
    इस गोष्ठी में शामिल होकर बहुत अच्छे लोगों से मिलवाने के लिए अविनाश वाचस्पति को हार्दिक धन्यवाद ! खुशदीप जी के साथ कुछ देर बैठकर लगता है जैसे सत्संग हो गया हो !
    संगठन कभी बुरा नहीं होता चाहे किसी नाम से हो, उद्देश्य स्वहित न होकर "जनहित" होना चाहिए

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  14. अभी कोई सदस्यता अभियान शुरू नही हुआ है और ना ही किसी महान ब्लोगर पर ये दवाव बनाया गया है कि वो किसी सन्गठन मे शामिल हो. जो बनाना चाह रहे है उन्हे बिरोध करने बाले किस हक से रोक लेगे ये भी बता दे.

    अविनाश भाई एक नाम है लेकिन जो लोग उनकी सरलता और सहजता के दीवाने है उनके धैर्य का इम्तेहान ना लिया जाय.

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  15. @ जयराम

    यह आयात निर्यात ब्‍लॉगिंग में
    एक नया नजरिया है भैया
    मैं भी सीखना चाहूंगा।

    @ प्रवीण शुक्‍ल

    आक्रोश बिल्‍कुल नहीं
    और बिल्‍कुल नहीं रोष
    सवाल और आपत्ति करने का
    सबका हक है
    और उन्‍हें संतुष्‍ट करने का
    है कर्तव्‍य हमारा।

    @ हरि शर्मा

    इम्‍तहान भी अगर लिया जा रहा है
    तो अनुत्‍तीर्ण नहीं होना है
    धीरज जरा नहीं खोना है
    दीवाने आप नहीं मेरे
    दीवाना मैं हूं आप सबका
    दीवाना मैं प्रभात जी का हूं
    जयराम जी का भी हूं

    मैं कोई कन्‍या तो नहीं
    होली पर सब दीवाने मेरे हो जायें।
    निरख परख कर
    तर्क की कसौटी पर
    महा मजबूती से कसकर
    तब ही मानना मेरा कहा
    जब मन को हो जच रहा।

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  16. आयातित ब्लॉगर!
    हद हो गई कुंठा की

    दिल्ली ब्लॉगर मीट तो केवल एक विशेषण है, प्रतीक है एक समयखंड का भई! आखिर इलाहाबाद ब्लॉगर मीट या रांची ब्लॉगर मीट में पूरे शहर के ब्लॉगर आ गए थे क्या? या फिर मुंबई दंगों में पूरी मुंबई के नागरिक चपेट मे आ गए थे क्या

    Organization और Association में बहुत अंतर है यह भी जान लीजे। न पता चले तो डिक्शनरी देख लें

    आज-कल के मेरे आकलन से कथित संगठन का विरोध कुछ (राजनैतिक) पत्रकार जैसे लोग करते दिख रहे हैं

    जा की रही भावना जैसी

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  17. ठीक है भई, जिसे जो करना है करो...बस ब्लागपोस्ट लिख कर सूचित करते रहना ...

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  18. वह ब्लोगर मीट था कि नहीं यह तो अब भोंपू लगा कर बताया जा रहा है लेकिन मीट की रिपोटिंग तो बड़े धूम-धाम से दिल्ली ब्लोगर मीट का शीर्षक देकर किया जा रहा था . और बात रही कुंठा की तो मुख्यधारा की की राजनैतिक और सामाजिक सम्मेलनों ,सेमिनारों,गोष्ठियों आदि से वैसे भी फुर्सत नहीं एक ब्लोगर मीट में शामिल ना हो तो पेट दर्द हो जाए . हाँ , लिखता हूँ उस नाते एक ब्लोगर कहलाने का अधिकार है और अपनी बात रखने का भी .

    और इस दौरान लोगों को अविनाश जी से जबाब देना सीखना चाहिए यहाँ कोई लड़ाई नहीं हो रही इसे संवाद कहते हैं और लड़ाई और संवाद में अंतर होता है चाहें तो हिंदी शब्दकोष देख सकते हैं . और कई लोग तो यहाँ ऐसे उछल रहे है जैसे सामने होने पर हमें मार हीं डालें

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  19. अविनाश भाई से एक बार फ़िर कहना चाहूँगा कि पूरा हिंदी ब्लॉगजगत खुद में एक संगठन है इसी को लेकर चलिए क्यों इसी क्षेत्र, विचार,जाती-पंथ आदि के नाम बाँटने का रास्ता खोलने का जिम्मा अपने सर उठाना चाहते हैं . आप भले हीं ऐसा ना चाहें पर भविष्य में जल्द हीं ऐसा हो जायेगा और इस तरह के संगठनों से लाभ हनी की गणना तो बाद की बात है इतना जरुर है कि लोगों में अध्यक्ष ,उपध्यक्स कहलाने का बड़ा शौक होता है . ब्लॉग जगत को छोटे -छोटे टुकड़ों में बाटने से अच्छा है एक साथ मिलकर रखिये . होली की सभी को शुभकामनायें !

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  20. ब्लॉग जगत को छोटे -छोटे टुकड़ों में बाटने से अच्छा है एक साथ मिलकर रखिये

    पहले किसी ने एक साथ रखने की कितनी कोशिश किस तरह से की है कोई बता पाएगा?

    क्या यह प्रयास अभी नहीं किया जा रहा?

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  21. संगठन भी बनेंगे, शुरू में बनानेवाले ही पदाधिकारी होंगे , फिर कुछ नये लोग जुड़ेंगे , फिर कुछ महत्वाकान्क्षी लोग जुड़ेंगे , फिर वे संगठन में तोड़फोड़ करेंगे , फिर कुछ लड़ाई - झगड़े होंगे ,फिर नये लोग आ जायेंगे , फिर पुराने उन्हे गाली देंगे ....कुछ ब्लॉग्स पर लेखन के नाम पर यही चलता रहेगा .. इस तरह ब्लॉगिंग की दुनिया चलती रहेगी ।

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  22. @ प्रभात गोपाल

    निष्‍कर्ष तो आप से ही चाहेंगे
    चाहना है ये मेरे सच्‍चे मन की।

    @ जयराम 'विप्‍लव'

    कोई किसी को नहीं मारेगा
    आप निश्चिंत रहें
    देने होंगे प्राण तो मैं रहूंगा सबसे आगे

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काल चक्र

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देवनागरी