गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

याद रहा क्रिसमस, बधाई मिली वाजपयी को...भूले महामना को ?

२५ दिसम्बर, साल की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तारीखों में से एक ! एक ओर ईसा के अवतरण की कहानी की परम्परा ....... बड़ा दिन और सैंटा क्लॉस की किवदंतियों को जीवित कर देने का दिन....दिन याद करने का उस इंसान को जिसने दुनिया को शायद पहली बार अहिंसा का पाठ पढाया ( यह अलग बात है कि उसके अनुयायी ही उसे भूल गए)। पहले ताज़ा हवा की ओर से सबको बड़े दिन की शुभकामनायें।
इस दिन की एक ख़ास बात और......शायद एक यह बात भी है जो इसे और उल्लासपूर्ण बनाती है कि ठीक एक हफ्ते बाद ही रोमन संवत का नया साल शुरू हो जाता है.....तो इस दिन में एक रोमांच भी शामिल है। आज ही के दिन देश के सम्मानित नेता और पूर्व प्रधानमन्त्री अटल जी का भी जन्मदिन है। अटल जी एक उम्दा कवि भी हैं और ओजस्वी वक्ता भी.....
आज के दिन कई टीवी, अखबार और ब्लॉग लेखों में क्रिसमस और अटल जी के बारे में पढ़ा पर एक कमी खली सो उसको शरीके ज़िक्र करूंगा और याद भी दिलाना चाहूँगा...( हो सकता है कुछ ब्लोगरों ने चर्चा की हो ....पर अखबार और टीवी तो खैर अब नाउम्मीद ही करते हैं) आज प्रसिद्द स्वतंत्रता आंदोलनकारी, विद्वान्, पत्रकार और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक आचार्य महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की भी जयंती है और बनारस के अखबारों को छोड़कर किसी ने इसकी चर्चा भी की हो।
महामना मालवीय के बारे में क्या बात की जाए ..... जन्म हुआ २५ दिसम्बर १८६१ को इलाहाबाद में ....एक विद्वान के तौर पर ख्याति अर्जित की, पत्रकार के तौर पर दो अखबार हिंदुस्तान (हिन्दी) और द इंडियन यूनियन (अंग्रेज़ी) में स्थापित किए। १९०९ और १९१८ में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। पर सबसे बड़ा उपकार जो पंडित जी ने भारतीय लोगों पर किया वह यह था कि उन्होंने एक ऐसे संस्थान की नींव डाली जो न केवल भारत अपितु विश्व में अतुलनीय है....और श्रेष्ठता के झंडे गाड रहा है।
१९१६ में स्थापित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा शिक्षण संस्थान है। इसमे कोई १२८ शिक्षण विभाग हैं, १५००० से ऊपर शिक्षार्थी, जिसमे तकनीकी संस्थान और चिकित्सा संस्थान दुनिया में सबसे अच्छों में से हैं। यहाँ के विज्ञान संकाय को एशिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
यही नहीं १९३१ में हुई गोलमेज वार्ता में भी महामना, गांधी जी के साथ शामिल हुए। सबसे बड़ी बात यह थी कि देश के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों से लेकर आम आदमी तक उनकी एक ही छवि रही। सब उनके साथ थे।
बुरा यह नहीं लगा कि लोग महामना को भूल गए, बुरा यह लगा कि जिनको याद रखना चाहिए वे भूल गए। हम में से कई पत्रकार और लेखक उसी काशी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं और दुनिया भर पर अपने बी एच यु अलुमनी होने का रॉब झाड़ते रहते हैं और हम ही उस दिन को भूल गए ?
देश के वे नेता भूल गए जो संसद में अपने अपने वोट बैंक के हिसाब से महापुरुषों की तसवीरें लगवाने के लिए चीखा करते हैं......और हम सब भूल गए जो नेताओं पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाते हैं !
क्या ऐसे में पाठ्य पुस्तकों में इन महापुरुषों के बारे में पढाये जाने का कोई औचित्य है जब हम इन्हे केवल परीक्षा पास करने की मजबूरी मानते हों ?
खैर चलिए अभी ऐसा वक्त नहीं आया कि हम क्रिसमस भूल जाते....पर क्या क्रिसमस पर वाकई हम ईसा या उनके उपदेशों को याद करते हैं .....या केवल पार्टी करते हैं....कहीं ऐसा तो नहीं कि अगर बाज़ार ना याद दिलाये तो हम इसे भी भूल जायेंगे ?
सोचिये क्या ऐसा तो नहीं कि बाज़ार हमें वही चीज़ें याद रखने पर मजबूर कर रहा है जिनमे उसका फायदा है ?
फिलहाल इजाज़त .....बड़े दिन की बधाई.....अटल जी को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएं.....महामना को खैर जाने ही दीजिये अंत में अटल जी की ही एक कविता पढ़ डालते हैं,

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़ हो
सिर्फ ऊँचाई का अंधड़ हो ,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

अलविदा .... !

आज एक ऐसी नज़्म लाया हूँ जो मेरे दिल के बहुत करीब है.....यह नज़्म लखनऊ छोड़ने से पहले लिखी गई थी...उस समय हर नवयुवक की तरह अपने शहर में बहुत कमियाँ और बदहाली दिखती थी....ऐसा नहीं था की लखनऊ पर नाज़ नहीं था पर लगता की यहाँ कुछ होना नहीं है...यहाँ कोई अपनी कीमत नहीं जानता...कब यह शहर छूटे और ये लोग कीमत हमारी जान पाएं....दुःख, गुस्से और निराशा की स्थिति में यह नज़्म लिखी थी और कुछ ही दिन बाद लखनऊ छूट गया और आज ३ साल होने को हैं और लखनऊ से दूर हैं....बहुत याद आता है शहर ऐ लखनऊ ! अभी पुरानी डायरी के ही पन्ने पलट रहा हूँ तो यह नज़्म सामने पड़ी है......लखनऊ को छोड़ने के पहले लिखी गई यह नज़्म, अब हमारे लखनऊ से छूट जाने का दस्तावेज बन गई है !

अलविदा लखनऊ !

इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
सुबह न चमकेगी ऐसे
सांझ न दमकेगी ऐसे
और सहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

ना तराने होंगे मेरे
ना फ़साने होंगे मेरे
देर से आने पे अब ना
वो बहाने होंगे मेरे

और नज़र को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

घर लगेगा एक पिंजर
लोग अनजाने लगेंगे
रास्ते सुनसान होंगे
महल वीराने लगेंगे

इस नगर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

खिलखिला भी ना सकोगे
मुस्कराहट जाएगी गुम
जान जाओगे उसी दिन
मेरे होने की तलब तुम

हर पहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

सोच लो कि कल से आख़िर
किस से तुम रूठा करोगे
जानता हूँ आज इतराते हो
कल आहें भरोगे

जब बसर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

आंख में बस होंगे आंसू
होंठ पर फरियाद होगी
जिस तरफ़ देखोगे मुड़कर
सिर्फ़ मेरी याद होगी

और सफर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

यह नज़्म लिखते पर यह नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी लखनऊ से इतनी दूर हो जायेंगे, ज़ाहिर सी बात जिनको अपने वजूद और कीमत का एहसास दिलाना चाहता था उनको तो इस दूरी से यह एहसास हुआ ही है....पर ख़ुद को भी वही एहसास हुआ है जो उनके लिए सोचा था .....आज अच्छी जगह से तालीम ले कर अच्छी जगह नौकरी कर रहे है.....बड़े चैनल में....काम है, नाम है.....पैसा भी आ ही रहा है....पर अगर कुछ नहीं हैं तो वो है लखनऊ !
और लखनऊ केवल लखनऊ नहीं है....क्या है...ये केवल लखनऊ वाले जानते हैं !
अभी के लिए खुदा हाफिज़ !

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

काश !

हिमांशु की फरमाइशें और ब्लॉग जगत की उम्मीदें पिछली पोस्ट के बाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं, अब एक बार फिर पुरानी डायरी के पीले पन्नों को पलटना पढ़ रहा है....ज़िन्दगी के कुछ ऐसे किस्से जिनमे से कुछ भुलाए नहीं जा सकते, कुछ याद नहीं रह गए और कुछ जानबूझ कर भुला दिए गए हैं....उन से फिर से दो चार होना पड़ रहा है। फिलहाल कल जनाब हिमांशु उर्फ़ हिम लखनवी का फ़ोन आया और गुजारिश की गई कि क्यों नहीं पुरानी डायरी से कुछ और पेश करते तो जनाब पेश ऐ खिदमत है एक और नज़्म ऐ इश्क ....यह भी थोड़ा प्रयोगधर्मी है सो कमियाँ बर्दाश्त करें,

काश !

ऐ काश कभी ऐसा होता !
तुम राह में मुझको मिल जाते
मैं देख के तुम को मुस्काता
तुम पूछते मुझसे "कैसे हो?"

ऐ काश कभी ऐसा होता !
मैं अपनी ही धुन में रहता
और तुम अपने दिल में कहते
मुझको पसंद हो ' जैसे हो'

ऐ काश कभी ऐसा होता !
तुम देख के मुझको छिप जाते
मन में कुछ सोच के मुस्काते
फिर ख़ुद ब ख़ुद शरमा जाते

ऐ काश कभी ऐसा होता !
जब इंतज़ार मेरा करने पर
तेरी आँखें भर आती
और फिर मेरे आने पर तुम
मुंह फेर के गुस्सा दिखलाती

ऐ काश कभी ऐसा होता !
मैं वही बहाने बतलाता
तुम कहती मुझसे झूठे हो
और मैं कहता छोडो जाने भी दो
ऐसे क्यो रूठे हो

ऐ काश कभी ऐसा होता !
मेरी आँखें तुम पढ़ लेते
बिन कहे मेरे तुम सुन लेते
हाथों में मेरा हाथ लिए
जीवन तुम अपना बुन लेते

ऐ काश कभी ऐसा होता !
हाँ काश कभी ऐसा होता !!

यह कविता भी उसी दौर में लिखी गई थी जब जीवन में हर नई सुबह, प्रेम का नया झोंका ले आती थी....सूरज की लाली में, गालों की लालिमा और गुलाब का हर फूल, अधरों की सुर्खियों की बात करता था.....हर बार ऊपर आकाश की ओर देख कर निकलता था काश !
पर पिछली कविता पढ़ कर यह तो ज़ाहिर ही हुआ होगा की यह काश ....काश ही रह गया ! खैर यह भी कोई गैरमामूली बात नहीं की यह काश तब से अब तक जिंदा है .......हर रोज़ एक नए चेहरे को देख कर नया काश ..... कि काश !
खैर वह काश तो पूरा नहीं हो पाया पर हिमांशु का काश अब पूरा हो रहा है कि सक्सेना जी गीत पर गीत ...नज़्म पर नज़्म डाल रहे हैं !!!

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

मैं जानता था !

हिमांशु बार बार कहता रहता है....( अमां यार वाला हिमांशु ) की भइया आप अब गीत नहीं लिखते....आपसे गीत की अपेक्षा है, ये छंदमुक्त कविता यो हर ऐरा गैर लिखने लगा है ! तब मेरा उत्तर प्रायः यह होता है की लिखने की परिस्थितियाँ होती हैं और देश और दुनिया की वर्तमान हालत ऐसी नहीं कि प्रेमगीत लिखे जाएँ.....पर इस बात पर इधर वह कुछ ज्यादा ही खिन्न है सो आज एक पुरानी डायरी खोली और एक पुराना गीत दिखा जो संभवतः ग्रजुअशन के विश्वविद्यालय वाले वक्त में लिखा गया था.....हिमांशु यह तुम्हारे लिए .... नया गीत लिखने की इजाज़त मुल्क के हालत और दिल नहीं देता ....जल्द ही लिखूंगा पर अभी ये ही पढ़ कर संतोष करो ! यह गीत आम गीतों से कुछ भिन्न मातृ वाला है ...पढो प्रयोग था
मैं जानता था !

हाथ झटक कर छुडा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था
मेरी आंखों की अंजुली में जल आंसू का भर जाओगे एक दिन
मैं जानता था

मैं अक्सर सोचा करता था
क्या तुम बिन भी रहना होगा ?
जीवन के प्रवाह को क्या
एकाकी बहना होगा ?
क्या कोई पल ऐसा होगा ?
क्या कोई तुम जैसा होगा ?
पलकों पर बूंदों की झिलमिल झिलमिल झालर सजवाओगे एक दिन
हाथ झटक कर छुडा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था

मैंने जब भी तुमको देखा
सदा नया सा तुमको पाया
आख़िर यह बतलाओ कहाँ से
रूप सलोना तुमने पाया ?
कहाँ से सीखा फूलों जैसा
खिल खिल जाना
और काँटों से भी मुस्का कर
घुल मिल जाना
मेरे मन के भी काँटों से क्या तुम बोलो मिल पाओगे एक दिन
हाथ झटक कर छुडा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था

जब जब तुम नाराज़ हुए थे
तुम्हे मनाया
तुमको देखा, ख़ुद को खोया
तुमको पाया
हर रोज़ सुबह उठ कर
क्यों तेरा नाम लिया था
हर रात सपन में
बस तेरे ही साथ जिया था
क्या फिर लौट के इन सपनों में तुम आओगे एक दिन
हाथ झटक कर छुड़ा के दामन तुम जाओगे एक दिन
मैं जानता था

मैं जानता था और फिर भी
मैं जान न सका
सत्य विराट था
पर पहचान न सका
अब दिल में गुबार
आँखों में पानी है
शायद यही
हां यही ज़िन्दगानी है
और आखिरी एक प्रश्न है ईश्वर से अब
क्या तुम मुझको मेरे मन से मिलवाओगे एक दिन
हाथ झटक कर...........................

आखिरी में बशीर बद्र के चाँद आशार इसे नजर करता हूँ ...
वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे
चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे

इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे

मैं समझता था मुहब्बत की ज़बाँ ख़ुश्बू है
फूल से लोग इसे ख़ूब समझते होंगे

भूल कर अपना ज़माना ये ज़माने वाले
आज के प्यार को मायूब समझते होंगे

( यह कविता २५ फरवरी २००६ को लिखी गई थी.....लिखने के कारणों पर चर्चा ना ही हो अच्छा है.....जब वक़्त के साथ जवानी के शुरूआती दिनों के ज़ख्म भर जाएँ तो उन्हें ना ही कुरेदना अच्छा है.....)

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

भूल गए हैप्पी बड्डे !

कल १६ दिसम्बर था और था विजय दिवस। विजय आज यानी कि कल के दिन ही १९७१ में भारतीय सेना के रणबांकुरों ने पाकिस्तानी सेना के ९०,००० सिपाहियों को आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया था और आज हम उसी पाकिस्तान के छद्म युद्ध का सामना कर रहे हैं। इस विजय दिवस पर मैंने पिछले वर्ष १६ दिसम्बर को भी एक पोस्ट लिखी थी और अचानक विजय दिवस के बहाने याद आया कि अरे ताज़ा हवा को एक साल हो गया और यह सालगिरह बिना किसी हो हल्ले के निकल गई...........क्या यार.....इतनी लापरवाही !
खैर अब भूल गए सो भूल गए पर अब याद आ गया है तो बताये देते हैं कि भइया अपने ब्लॉग को एक साल पूरा हो गया है और दिसम्बर की १४ तारीख को आपका ब्लॉगशिशु ताज़ा हवा एक साल का हो गया है। आज याद आ रहा है वो एक एक लम्हा जब यह शिशु पल बढ़ रहा था.....जब यह जन्मा ...... जब इसे आप सब बडो ने पुचकारा, गोद में खिलाया ..... माता गूगल और पिता मयंक सक्सेना की इस संतान ने मुझे बिना विवाह के पिता बनने का जो गौरव प्रदान किया है उसकी समता तो केवल स्वर्गीय अभिनेता महमूद ही कर सकते थे....( महमूद ने एक फ़िल्म में यही किरदार निभाया था )....
फिलहाल बैठा हूँ और गुजरा वक्त जैसे आंखों के सामने बाइस्कोप जैसा चल रहा है....जब यह शिशु पहली बार हिन्दी ब्लोगिंग परिवार की गोद में सौंपा गया, तब किस तरह आप सब ने इसे परिवार के अलग अलग सदस्यों की तरह प्यार दुलार दिया। इन सब में से कोई इस शिशु का भाई बना, कोई चाचा, कोई ताऊ, कोई दादा- दादी और उम्मीद है कि जल्द ही कोई पहली प्रेयसी भी मिल ही जायेगी ........
जब ताज़ा हवा शुरू हुआ तो शायद यह मालूम भी नही था कि ब्लोगवाणी, चिट्ठाचर्चा या हिन्दी ब्लोग्स जैसा कोई एग्रीगेटर होता है जहाँ दुनिया को आपके ब्लॉग का पता चले....सो कुछ अपने यार-दोस्त ही इसे पढा करते थे....पहली पोस्ट जिसे सम्पादकनामा के नाम से प्रस्तुत किया था उसमे कई बड़ी बड़ी बातें थी जिसमे इसे एक बड़ा सामूहिक ब्लॉग बनाने के विचार थे पर खैर उनकी जाने दें ( वैसे भी एक उस विचार को छोड़ कर बाकी कोई भी विचार अभी तक तो फ्लॉप हुआ नहीं दिखता) ..... पहली पोस्ट पर केवल कुछ मित्रों की प्रतिक्रियाएं थी, उनका मज़ा लें;

गुंजन सक्सेना ने इरादों पर ही प्रश्नचिन्ह लगा डाला, वे बोले....
"हवाएं कब से चलना स्टार्ट होंगी?... गुंजन"
मनीष ने थोडी दिलासा दी पर व्यंग्य कर ही डाला,
"havaa acchi chal rahi hai lekin thodi dhimi है"
जैसे यह थोड़ा था कुमार अजीत ने चुनौती ही दे डाली, वे कहते हैं...
"मयंक भाई, ताज़ा हवा ब्लाग सम्बन्धित आपके इरादों पर भी चलती रहे....आपका अजीत"
ऐसी हालत में जब ब्लॉग का बुखार चढ़ते ही उतरने लगा था (हालांकि इनमे से सबकी मंशा अच्छी ही थी ) दो टिप्पणियां ऐसी आई जिन्होंने हौसला बाँध दिया.......
देविका ने बड़ी प्रेरक बात लिखी,
"hawaon ka irada, hausla e bandi ka hai। par sirf hawa ban k mat ho rawan, balki us toofan ka manzar bana, ki galat soch tujh se dare aur kamzor tera daman thaame।umeed hai ki yeh apne naam aur kaam ko zimmedari se nibhaye."
रोहिणी ने भी हौसला बढाया, कहा...
"posts n updates dekh kar lag raha hai k blog 'taaza hawa' apne naam ko saarthak kar raha hai.. sampaadak ko badhaai,शुभकामनाएं"


समस्या उस समय यह थी कि न तो हिन्दी टंकण के अधिक टूल उपलब्ध थे और न ही उपलब्ध टूल्स के बारे में आम इंटरनेट यूज़र को ज़्यादा जानकारी...इसलिए हमारे टिप्पणीकारों की अधिकतर टिप्पणियां रोमन में ही होती थी.... खैर इसके बाद ब्लॉग पर उम्मीद है कि, १६ दिसम्बर, ज़रा याद करो कुर्बानी, आवाज़ ऐ खल्क ( यह हरीश बरौनिया ने लिखा था), मोदी का रहस्य, सचिन का भाग्य जागा और मीडिया के अकाल पर एक भी टिप्पणी नहीं आई और हौसला हिचकोले खाने लगा........तब अहसास हुआ कि TRP या BRP की क्या अहमियत है और फटाफट एक साभार लेख चिपका दिया....मौसम के अनुकूल......रवीश कुमार का मफ़लर ..... खैर तरक़ीब ज़्यादा काम तो नहीं आई पर एक टिप्पणी आ गई....
नितिन ने रवीश जी के लिए संदेश लिखा...,
"रवीश जी अब तक मफलर बांधता था आज पढ़ भी लिया, शुक्रिया !"
(रवीश जी का मैं भी आभारी हूँ की उन्होंने सदैव अपने लेखों को मुझे साभार प्रकाशित करने की अनुमति दी है....)
इसके बाद पढ़ाई पूरी होने वाली थी और एक एक कर के सारे साथी या तो इन्टर्न शिप या फिर नौकरी के लिए साथ छोड़ रहे थे.....माहौल इमोशनल था और फिर लिख डाली पंछी .....
यह वह समय था जब के जद्दोजहद शुरू हो गई थी .... मेरी प्रोफाइल लिखा था कि "अक्सर बेकार रहता हूँ इसलिए ब्लॉग लिखता हूँ...." इसके बाद २६ जनवरी को काका हाथरसी की एक कविता ठेली और रवीश जी ने एक कमेन्ट दिया जो ताज़ा हवा पर किसी बाहरी ब्लागर का पहला आवागमन था,
"मयंक जी पढ़ लिया आपका ब्लाग। २६ जनवरी के दिन ही। और कविता भी २६ जनवरी पर। अच्छा है।
बेकारी में ही तो रास्ता निकलता है। जब भी हम बेकार होते हैं तभी नया सोचते हैं। इसलिए ब्लाग बनाने की बधाई। लिखते रहिए।"
रवीश जी की टिपण्णी मेरे ब्लॉग जीवन के लिए शायद उस समय बहुत बड़ी उपलब्धि थी, शायद तब भान भी ना था कि अभी तो ब्लोगिंग के और भी महारथी हैं.....इसके बाद गांधी जी की पुन्य तिथि पर एक कविता डाली जिस पर पणजी से यती ने टिप्पणी की,
"is kavita k baremai likh ne k liye shabda nai hai bas itna hi kahungi aachi hai"
खैर कारवाँ चल तो चुका ही था .....इसके बाद विज़न 202०, सपने बीनने वाला, यह ज़मीं हमारी नहीं (परम मित्र स्वप्रेम की) आदि रचनाएं आईं और सराही गईं। इसके बाद जलियांवाला बाग की बरसी पर हमने बात की कि क्या वाकई हम अपने शहीदों को भूलने लगे है.....अप्रैल वह समय था जब मैं एक अदद नौकरी के लिए मीडिया जगत में संघर्ष कर रहा था और इस महीने केवल एक पोस्ट आई। मई में ४ पोस्ट लिखी पर टिप्पणी शून्य रही.....एक तो सामने रोजगार की तलाश .... एक भी टिप्पणी न देख कर रहा सहा आत्मविश्वास भी जाता रहा, सोचा अब कोई ब्लाग व्लाग नहीं लिखना और नतीजतन जून में शर्मनाक तरीके से एक भी पोस्ट नहीं रही और मामला सन्नाटा !
पर वाकई यह बदलाव का समय निकला और २१ जुलाई को देश के एक प्रतिष्ठित और सबसे पुराने न्यूज़ चैनल में नौकरी लग गई। फिर क्या था.....निकल पड़ी और ब्लोगिंग फिर शुरू.....अगले ही दिन अपने मुल्क के महान नेताओं की बदौलत अगली पोस्ट आ गई, शीर्षक था सत्ता के सौदागर या पोलिटिकल मैनेजर्स .......... अगली पोस्ट थी राही मासूम रज़ा की कविता गंगा और महादेव ...इसके बाद बंगुलुरु और अहमदाबाद में लगातार धमाके हुए और टीवी समाचार चैनलों के न्यूज़रुम के माहौल पर कुछ आहें निकल पड़ी खून के आंसू और आंसुओ का खून ! इस पर संजय तिवारी जी ने कहा,
"गहरी संवेदनाएं हैं. इसको ही अपने काम में उतारिए. बहुत कुछ बदलेगा."
इसके बाद 31 जुलाई को हिमांशु ने प्रेमचंद की जयंती और रफ़ी की पुण्यतिथि पर एक रचना भेजी प्रेमचंद और रफी ......इसके बाद अगस्त की पहली पोस्ट थी हरकिशन सिंह सुरजीत के अवसान से जुड़ी जिसमें मेरा व्यक्तिगत संस्मरण भी जुड़ा था युगांत ...... । इसके बाद आई ११ अगस्त और लाई ओलम्पिक में अभिनव बिंद्रा के स्वर्ण पदक जीतने की ख़बर....ताज़ा हवा ने कहा बिंद्रा.....सलाम ! इस पर शोभा महेन्द्रू ने कहा,
"आप आशावादी रहें। भारत और भी पदक जीतेगा। जीत की बहुत- बहुत बधाई"
भविष्यवाणी सच निकली !!
१५ अगस्त आई और हमने कहा हुआ जनतंत्र का जन्म ! उड़नतश्तरी सरसराई, "स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं।" इसके बाद जन्माष्टमी पर याद दिलाई कृष्ण भक्त रसखान। ... की, इसके बाद आखिरी कलाम.....सलाम में ताज़ा हवा ने दी अहमद फ़राज़ साहब को श्रद्धांजलि। १ सितम्बर को दुष्यंत के जन्मदिन पर उन्हें याद किया हिमांशु ने और समझाए दुष्यंत के मायने .... और क्रांतिकारी कवि वेणुगोपाल के अवसान पर किया उनको याद...क्रन्तिकारी का अवसान .... शिक्षक दिवस पर गुरुजनों को याद किया राधाकृष्णन, कबीर, तुम्हारे या फिर अपने बहाने ...? इसके बाद उठाई हमने आवाज़ .....
समीरलाल जी ने कही "सच में सबकी बात है। बहुत उम्दा रचना!!!"
Shastri बोले, "हम तो जोर से चिल्लायेंगे !!"
और हिंदी दिवस पर प्रसून जोशी से साभार कहलवाया हिंदी को आजादी चाहिए !
इसके बाद दिल्ली में धमाके हो गए और फिर आए मकडियां , बीच की दीवार और आतंक का फिर हमला ......२८ और 29 सितम्बर को हमने याद किया भगत सिंह को उनकी माँ की अपील .... और उनकी चिट्ठियों के ज़रिए ! अदम गोंडवी की ग़ज़ल पर डॉ .अनुराग ने कहा,
"ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
बस एक शेर में सारी बात कह दी..."
हालांकि कई बातें कहनी बाकी थी सो आगाज़ हुआ एक नए ब्लागर का और उन्होने कहा इक शमा और जला लूँ ......इसके बाद नन्ही पुजारन से परिचय हुआ और समझा बाढ़ और अकाल को तभी आया करवाचौथ और हमने कहा आज फिर ..... इस पर दिनेशराय द्विवेदी जी ने पूछा,
"कविता सुंदर है। लेकिन क्या आप इस परंम्परा को अपनी बेटी तक चलाने का इरादा रखते हैं।"
इसके बाद हमने बात कही जो राही मासूम ने कही थी लेकिन मेरा लावारिस दिल ,इस पर Suresh Chandra Gupta जी ने फ़रमाया,
मन्दिर बनाया आपने,
मस्जिद बनाई आपने,
दिल बनाया जिस ने,
निकाल दिया उसे दिल से,
फ़िर दिल लावारिस तो होना ही था।
उसके बाद चुनाव आए और बाल दिवस भी....चुनावी ग़ज़ल भी आई और वरुण कुमार सखाजी की टिप्पणी भी कि,
अच्छा लिखते हो ग़ज़ल-ए-बयां पसंद आया पहली बार इस ब्लॉग पर आया हूँ। वधाई हो इस हक़ीक़त को जानते तो सभी हैं,मग़र कौन बनेगा दर्द की दवा,ज़ख़्म का मलहम। तेजस्वी ओजस्वी लोग मीडिया की शरण में हैं जो उद्योगपतियों की कठपुतली हैं आखिर क्यों ये तथाकथित क्रांतीवीर राजनीति नहीं ज्वाइन करते। मयंक जी से उम्मीदें बहुत हैं।
ज्ञानपीठ मिलने के बाद भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में अडिग कुंवर नारायण को भी याद किया और महिला दिवस पर जनानो की मर्दानगी को भी......यह सब चलता रहता पर तभी मुम्बई ने पूरी दुनिया को हिला दिया.....हम क्या अलग थे ? बहुत कोशिश की कहने की जाने दो ! पर दिल उबल पड़ा कि क्या वाकई हम इसी मीडिया के हिस्से हैं ..... निकल पड़ी कुछ नज्में...दिल की बातें हैं..... और मानवाधिकार दिवस पर याद किया कि क्या ज़रूरी हैं .........................
और देखते ही देखते यह शिशु एक वर्ष का हो गया......यकीन तो वाकई नहीं होता पर सच है......अब तक वही कहा और लिखा जो ठीक लगा
न भाषा भाव शैली है, न कविता सारगर्भित है
ह्रदय का भाव सुमन है, ह्रदय से ही समर्पित है
पर अब शिशु और उसका पिता आप सभी परिवारजनों को धन्यवाद देना चाहता है, हम दिल से आभारी हैं,
समीरलाल जी, कविता जी, शोभा जी, रवीश जी, यती, सुरेश जी, अनुपम जी, शास्त्री जी, महेन्द्र जी, संजय जी, अशोक जी, राकेश जी, रश्मि जी, नीरज जी, सुशील जी, हरि जी, संगीता जी, दिनेश राय द्विवेदी जी, निशू जी, योगेन्द्र जी, रंजना जी, तनु जी जिन सबने ताज़ा हवा के अभिभावकों की बख़ूबी भूमिका वहन की......इसके बाद शुक्रगुज़ार हूं अपने साथियों देविका, अजीत, नितिन, स्वप्रेम, वरुण, अनुभव जी, गुंजन, रोहिणी, मनीष और उन सभी का जो हम को पढ़ते हैं ....... या आगे पढ़ेंगे ....
अब कहो कि सालगिरह भूल गए तो यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं, अब हम लोग जब अपने शहीदों की जन्म तिथियाँ और पुण्य तिथियाँ भूल जाते हैं, हम सड़क पर पड़े घायल को भूल जाते हैं, हम कचरे में खाना ढूंढते बच्चों को भूल जाते हैं, हम रोज़ होने वाले आतंकी हमलों को भूल जाते हैं, हम अपने समाज और मुल्क के हित भूल जाते हैं, और तो और अक्सर हम अब इंसानियत भूल जाते हैं......फिर मैं तो अपने अदने से ब्लॉग की सालगिरह ही भूला था.....सो इस भूल को आप भूल जाओ और अब आगे ताज़ा हवा पर आने वाले और नियमित और बेहतर लेखों का मज़ा लें .....!
इस प्रण के साथ कि आगे से हम और नियमित और धुँआधार पोस्ट्स आपके लिए लायेंगे ......अभी के लिए विदा

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

ज़रूरी हैं .........................


माथे पर चिंता की लकीरें

धीरे धीरे बदलती झुर्रियों में

दिन भर बीनता कचरा

रात आ पसरता झुग्गियों में



जूठन में कलेवा ढूंढता

तलाशता जिंदगी जनाजों में

उतरन से ढकता आबरू

बचता ठण्ड से अलावों में



वो जो बुहारता है सड़कें

वह जो उठाता है मैला

वह जो घर घर फेरी करता है

लेकर एक फटा सा थैला



वो जो खींचता है अपने ही जैसे

एक आदमी को, रिक्शे में बिठा कर

वो जो ऊंची इमारतें चमकाता है

ख़ुद को रस्से पर लटका कर



तपती धूप में आदमी वो जो

ढोता है तसलों में भर भर मिटटी

औरत जिसकी गोद में है शिशु

और कंधे पर गिट्टी



वो जो उतरा है गली के

खुले हुए गटर में

ताकि माहौल ना ख़राब हो

खुशबुओं के शहर में



वो जिसके रईस हमउम्र

जाते हैं अपनी अपनी कारों में स्कूल

जो लड़ते हुए ज़िन्दगी से

अपना बचपन गया है भूल



जिनको हम अक्सर बिना बात

छूटते ही दे देते हैं अश्लील सी गाली

मार देते हैं तमाचा अक्सर

इनके बगल से निकलते हैं बचकर




हम डरते हैं की इनके छूने से

हमारा अस्तित्व ना मैला हो जाए कहीं

पर सबसे ज्यादा काम हमारा

करते हैं लोग वही



इन सबके और हम सबके बीच

शारीरिक समता के अलावा

क्या कोई और समानता है ?


क्या हम मानव हैं

और अगर नहीं हैं तो कौन हैं ये ?

अगर मानव के अधिकार होते हैं

और हमारे अधिकार हैं

तो ज़ाहिर हैं हम ही मानव हैं



फिर ये कौन हैं ?

क्या ये कड़ी हैं कोई

जो पशु और मानव को जोड़ती है

या कोई हथौडी है सत्य की जो

मानव होने के भ्रमों को तोड़ती है



क्योंकि जीवन के लिए

साँस और विचार ज़रूरी है

मानव होने के लिए

अधिकार ज़रूरी हैं .........................


मानवाधिकार दिवस पर विशेष प्रस्तुति......यह कविता मैंने अभी लिखी पर कहीं ना कहीं यह बचपन में पढ़ी गई एक कविता से प्रभावित है जो संभवतः अज्ञेय ने लिखी थी......

मयंक सक्सेना (9310797184)

रविवार, 7 दिसंबर 2008

नज्में...दिल की बातें हैं.....


अभी ब्लोग्वानी देख रहा था और पाया कि हमारे ब्लॉगर बन्धु और भगिनियां अभी तक मुंबई शोक से उबर नहीं पाये हैं.......और इस मायने में वे वाकई हिन्दुस्तान का प्रतीक रूप माने जा सकते हैं। हिन्दुस्तान भी इस दुःख से अभी उबर नहीं पा रहा है.....और शायद अभी इसमे वक़्त भी लगेगा। पर जैसा मैंने कहा कि इस मायने में तो मैं अपने अल्फाज़ वापिस लूँगा कि इस मायने में ही नहीं बल्कि हर मायनों में ब्लॉग जगत एक छोटा हिन्दुस्तान है.....अलग अलग जातियाँ, भेष ..... तरीका, सलीका, मान्यताएं और अलग अलग विचार। हम सब रोज़ अलग अलग मुद्दों पर बात करते है....उस पर विचार देते हैं.....टिपियाते हैं।

हम में हर तरह के लोग हैं। कुछ जाति और धर्म के पूर्वाग्रहों से दूर तो कई धर्म परायण ...... कुछ अति उत्तेजित रहते हैं तो कुछ हर स्थिति में शांत। कुछ धर्म को राजनीति से जोड़ते हैं तो कुछ राजनीति से ही दूर रहते हैं....कुछ सुनहरे भविष्य को लेकर आशान्वित हैं और कुछ कहते हैं कि कुछ बदलने वाला नही ! इनमे से कई धैर्य वाले हैं....खुले विचारों के हैं...धर्मनिरपेक्ष हैं तो कुछ जल्दबाज़ और कट्टर ..... पर कुल मिलकर बड़ी बात यह है कि यह लिख रहे हैं....अपने विचार खुले तरीके से रख रहे हैं....हिदोस्तान की ही तरह तमाम मतभेद होने के बावजूद ये मुंबई के बारे में लिख रहे हैं और इनके विचार और तरीके भले ही अलग अलग हो पर महत्वपूर्ण यह है कि इन सबको कहीं न कहीं देश ही फ़िक्र है.....( तरीकों और विचारों से भले मैं और आप सहमत न हो पाएं...)

खैर अभी मुंबई और मुल्क से जुड़ी कुछ पोस्ट पढ़ रहा था और कुछ नज्में याद आई जो पेश कर रहा हूँ ये कवितायें मुल्क की और अवाम की बातें करती हैं तो गौर फ़रमाएँ,


ग़र चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे

अदम गोंडवी की नज्में मुझे ख़ास पसंद हैं क्यूंकि ये आम आदमी के पसीने की महक और गाँव की मिटटी की सोंधी खुशबू समेटे होती हैं, पहली है गर चाँद तवारीखी तहरीर बदल दोगे, ये नज़्म उनके लिए है जो सारे मुसलमानों को गद्दार मानते हैं;


ग़र चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे

क्या इनसे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे


जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आई

मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे ?


जो अक्स उभरता है रसख़ान की नज्मों में

क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे ?


तारीख़ बताती है तुम भी तो लुटेरे हो

क्या द्रविड़ों से छीनी जागीर बदल दोगे ?


मैं अपना सलीब आप उठा लूँ

अगली नज़्म है अहमद नदीम कासमी की .... नदीम साहब अपनी नज्मों के लिए मशहूर हैं, ये नज़्म नज़र करता हूँ मुंबई के लोगों को ..... मुल्क के हालात को ..... दुनिया के हालात को !


फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ
आँखों को बुझा लूँ कि हक़ीक़त को बदल दूँ

हक़ बात कहूंगा मगर है जुर्रत-ए-इज़हार
जो बात न कहनी हो वही बात न कह दूँ

हर सोच पे ख़ंजर-सा गुज़र जाता है दिल से
हैराँ हूँ कि सोचूँ तो किस अन्दाज़ में सोचूँ

आँखें तो दिखाती हैं फ़क़त बर्फ़-से पैकर
जल जाती हैं पोरें जो किसी जिस्म को छू लूँ

चेहरे हैं कि मरमर से तराशी हुई लौहें
बाज़ार में या शहरे-ख़मोशाँ में खड़ा हूँ

सन्नाटे उड़ा देते हैं आवाज़ के पुर्ज़े
यारों को अगर दश्त-ए-मुसीबत में पुकारूँ

मिलती नहीं जब मौत भी मांगे से, तो या रब
हो इज़्न तो मैं अपना सलीब आप उठा लूँ

( पैकर=चेहरे, लौहें=कब्र पर लगा पत्थर, दश्ते-मुसीबत=मुसीबतों का जंगल, इज़्न=इजाज़त )


कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये

और तीसरी और आख़िर ग़ज़ल है हमारे हुक्मारानों के, धर्म के ठेकेदारों के और हम सबके नाम क्यूंकि सब जिम्मेदार हैं इन हालातों के लिए....जो धोखा देते हैं वो भी और जो धोखा खाते हैं वो भी ! चाँद पर पहुँचने से पहले हमें अपनी धरती के हालात ठीक करने होंगे.....तो शायद आज की पोस्ट के अंत के लिए दुष्यंत की इस ग़ज़ल से ज्यादा कुछ सटीक नहीं हो सकता है............


कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये

कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है

चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही

कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता

मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये


अंत में बशीर बद्र के अल्फाजों में कहें तो,


हमसे हो नहीं सकती दुनिया की दुनियादारियाँ

इश्क़ की दीवार के साये में राहत है बहुत


उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मी

रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत


आख़िर में यही कि ज़िन्दगी अपना रास्ता ढूंढ ही लेती तो उम्मीद बनाए रखें !

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मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

क्या वाकई हम इसी मीडिया के हिस्से हैं .....


अजीब सा लगा जब कल रात को एन डी टीवी और आज दोपहर स्टार न्यूज़ पर संजय दत्त के आतंकवाद पर विचार सुने। पहले तो कल रात यही तय करना मुश्किल था की क्या वाकई मैं एन डी टीवी देख रहा हूँ ...... स्टार से तो खैर इतना अनापेक्षित नहीं था। मैं यहाँ कोई निर्णय देने नहीं बैठा पर क्या यह वाकई उचित था ?
मेरा यह मतलब कतई नहीं है कि एक नागरिक के तौर पर संजय दत्त आतंवादी हमलों पर कोई विचार नहीं रखते या उन्हें देश की फ़िक्र नहीं ...... बिल्कुल होगी ( आख़िर देश की सबसे ज्यादा फ़िक्र फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों को ही तो है ! ) पर आतंवाद पर विचार जानने और दुःख व्यक्त करने के लिए संजय दत्त ही क्यूँ ?
ज्ञात हो कि ये वही महानुभाव हैं जिन्हें दाउद से प्राप्त ऐ के ५६ और विस्फोटक रखने के अपराध में सज़ा भी मिल चुकी है.....(अगर कोई यह कहे कि यह केवल आरोप है तो बन्धु आरोप सिद्ध हो चुके हैं अतः यह अपराध है। ) और अब जब यह माना जा रहा है कि इन हमलों में दाउद की मिलीभगत है तब हमारे पत्रकार संजय दत्त जैसे व्यक्ति का साक्षात्कार करके इस तरह के विषय पर राय जान रहे हैं......यह आख़िर है क्या मज़ाक या व्यंग्य ?
क्या संजय दत्त के अलावा किसी फ़िल्म अभिनेता का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता था ? यही नही मुख्तार अब्बास नकवी के बयान पर भी संजय की पत्नी मान्यता का बयान लिया गया जो शायद ही किसी सामाजिक मुद्दे से कभी जुड़ी रही हो (कहीं यह कुछ सेटिंग तो नहीं) ! यह विडम्बना ही है कि इनमे से कोई भी किसी एक भी घायल या मृतक के घर या शवयात्रा में नहीं पहुँचा होगा .....
फिर संजय दत्त ? तब तो फिर हम अबू सालेम की बाईट भी आतंक वाद पर ले सकते हैं.....अभी तो उस पर केस चल ही रहा है.....!
सबसे बड़ा हैरतनाक वाक्य यह रहा कि एन डी टीवी ने सबसे पहले संजू बाबा का इंटरव्यू प्रसारित किया .... कम से कम उनसे यह अपेक्षा नहीं की जाती है ! मुआफ करें एन डी टीवी के पत्रकारों पर आपके सबसे बड़े मुरीदों में से एक आपसे आज बहुत खिन्न है ! मुआफ करें पर अगर आप इस तरह की पत्रकारिता करते हैं तो कृपा करके आम आदमी की बात करना छोड़ दें.....ख़बर वही जो सच दिखाए .....तो क्या परदे की गांधीगिरी देश का सच है ? जुबां पर सच....दिल में इंडिया तो क्या संजय और मान्यता जुबान का वह सच हैं जिसके दिल में इंडिया है ?
वाकई यह शर्मनाक है.....आप माने या ना माने !
बाकी स्टार से भी यह अपील तो करूँगा ही कि कम से कम ऐसे लोगों की बाईट ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर ना लें ... यह आपकी भी छवि का मामला है.....वैसे भी और फ़िल्म अभिनेता मर गए थे क्या जो माफिया और दुबई से सम्बद्ध एक व्यक्ति इस तरह देश और मुंबई की नुमाइंदगी के लिए आप लोगों ने खड़ा कर दिया ? क्या दो ही दिन पहले ख़त्म हुए हादसों में मारे गए और शहीदों के लिए आपके मन में कोई सम्मान नहीं है ?
हलाँकि आप यह कह सकते हैं कि संजय दत्त के दुबई से संबंधों की कोई पुख्ता पुष्टि नहीं है पर शक तो है न....ऐसे किसी संदिग्ध को भी आप इस तरह महिमामंडित कैसे कर सकते हैं ? तो फिर क्यूँ नहीं चारा घोटाले के विरोध में लालू जी की और सिख दंगो पर दुःख जताने के लिए जगदीश टाइटलर के वक्तव्य ले लेते हैं ?
मैं यह अपेक्षा नहीं रखता कि आप माफ़ी मांगेंगे या शर्मिंदा होंगे (आजतक ऐसा कभी हुआ है ?) बस गुजारिश है कि एक बार सोचियेगा ज़रूर कि इससे कितने लोगो की भावनाएं आहत हुई होंगी और उनके परिवारजन जो ९३ के मुंबई हमलों में मरे होंगे ......
खैर आप शर्मिंदा हो या ना हों ..... मैं शर्मिंदा हूँ कि क्या वाकई मैं इसी मीडिया का हिस्सा हूँ !

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी