सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

नीली साड़ी...सपना...और तुम


जब ढलने लगे रात

पौ फटने से पहले

आ जाया करो

तुम

मेरे सपनों में

पहन वही नीली साड़ी

जिसके किनारे लटकता था

एक रेशमी धागा

और उससे जड़ा

एक नीला नग

और हां

उस दिन की ही मानिंद

खोल कर आना

अपने काले बाल

उनकी खुशबू बिखरती है

खुले होने पर

आ जाना

मेरे सपनों में

मेरे सोने पर

वो नीला रंग

जैसे हो

सुरमई नदी कोई

नीले पानी से भरी

जैसे कोई फूल

उस अंग्रेज़ी नाम वाले

देसी जंगली पौधे का

हां वही

कॉर्नफ्लावर

जैसे हो आसमान

उस खुली

बिन बादल

दोपहर का

नीला...सपाट...अनंत

और उसी वक्त

तुम मेरी आंखों में

आंचल अपना

लहरा जाना

मेरे सपनों में

आ जाना

छूकर अपनी आंखों से

मेरी आंखों को

दे दो

मुझे

रोशनी

बिखेर दो काजल

थोड़ा सा

मेरी भी पलकों के

कोरों पर

थोड़ा सा संगीत

बहा दो

अपनी सांसों का

मेरी धड़कन के

शोरों पर

आज ही

आ जाओ

आओ कि

मेरे सपने

बेकाबू हैं

बेसब्र हैं

बेताब हैं

कि आओ तुम इनमें

और

फिर कभी

नींद ही न आए...

मयंक सक्सेना

21-02-2012 (1.10 रात)

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

आप सभी से इसका जवाब चाहिए...


ये एक चिट्ठी है, एक चिट्ठी जो शायद आप में से कुछ को सच्ची लगे और हिलाए भी...कुछ को शायद ये चिट्ठी नकली लगे, नाटक लगे, प्रोपेगेंडा लगे...कुछ को ये पढ़ कर भरोसा ही न हो..और कुछ की आंखें खुलें...पर यकीन मानिए कि ये सच है और सरकारें इस सच को जानती हैं, क्योंकि ये उन्ही का बोया हुआ सच है, उन्हीं का बनाया हुआ सच है...एक महिला की लड़ाई हम सब लड़ ज़रूर रहे हैं, लेकिन हमारी लड़ाई कुछ भी हासिल कर पाने में अब तक असफल रही है या फिर इसका हासिल लम्बे वक्त में मिलेगा...पर हां सोनी सोरी को सलाम है, सलाम है इरोम शर्मिला को...जो हमारी लड़ाई बिना ये सोचे लड़ रही हैं, कि हासिल क्या होगा...शायद ये ही उनका हासिल है कि हम उनको सलाम करते रहें...और अपनी अक्षमताओं पर शर्मिंदा होते रहें...सोनी सोरी की चिट्ठी आप सब के लिए...

-मयंक सक्सेना


प सब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवी संगठन, मानवाधिकार महिला आयोग, देशवासियों से एक आदिवासी पीड़ित लाचार एक आदिवासी महिला अपने ऊपर हुए अत्याचारों का जवाब मांग रही है और जानना चाहती है कि

मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है।

जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी।

पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि तुम रंडी औरत हो, मादरचोद गोंडइस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्‍यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।

( आखिर पुलिस प्रशासन के आफिसर ने ऐसा क्यों कहा। इतिहास गवाह है कि देश की लड़ाई हो या कोई भी संकट, नारियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया था। इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाया, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया। आज जो महिलाएं हर कार्य क्षेत्र में आगे होकर कार्य कर रही हैं, क्या वो भी अपना सौदा कर रही हैं। हमारे देशवासी तो एक दूसरे की मदद करते हैं - एकता से जुड़े हैं, फिर हमारी मदद कोई क्यों नहीं कर सकता। आप सभी से इस बात का जवाब जानना चाहती हूं।)

संसार की सृष्टि किसने की? बलशाली, बुद्धिमान योद्धाओं को जन्म किसने दिया है? यदि औरत जाति न होती तो क्या देश की आजादी संभव थी? मैं भी तो एक औरत ही हूं, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया। जवाब दीजिए

मेरी शिक्षा को भी गाली दी गयी। मैंने एक गांधीवादी स्कूल माता रुक्मणि कन्या आश्रम डिमरापाल में शिक्षा प्राप्त की है। मुझे अपनी शिक्षा की ताकत पर पूरा विश्वास है, जिससे नक्सली क्षेत्र हो या कोई और समस्या फिर भी शिक्षा की ताकत से सामना कर सकती हूं। मैंने हमेशा शिक्षा को वर्दी और कलम को हथियार माना है। फिर भी नक्सली समर्थक कहकर मुझे जेल में डाल रखा है। बापूजी के भी तो ये ही दो हथियार थे। आज महात्मा गांधी जीवित होते, तो क्या उन्हें भी नक्सल समर्थक कहकर जेल में डाल दिया जाता। आप सभी से इसका जवाब चाहिए।

ग्रामीण आदिवासियों को ही नक्सल समर्थक कह कर फर्जी केस बनाकर जेलों में क्यों डाला जा रहा हैऔर लोग भी तो नक्सल समर्थक हो सकते हैं? क्या इसलिए क्योंकि ये लोग अशिक्षित हैं, सीधे-सादे जंगलों में झोपड़ियां बनाकर रहते हैं या इनके पास धन नहीं है या फिर अत्याचार सहने की क्षमता है। आखिर क्यों?

हम आदिवासियों को अनेक तरह की यातनाएं देकर, नक्सल समर्थक, फर्जी केस बना कर, एक-दो केसों के लिए भी 5-6 वर्ष से जेलों में रखा जा रहा है। न कोई फैसला, न कोई जमानत, न ही रिहाई। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हम आदिवासियों के पास सरकार से लड़ने की क्षमता नहीं है या सरकार आदिवासियों के साथ नहीं है। या फिर ये लोग बड़े नेताओं के बेटा-बेटी, रिश्तेदार नहीं हैं इसलिए। कब तक आदिवासियों का शोषण होता रहेगा, आखिर कब तक। मैं आप सभी देशवासियों से पूछ रही हूं, जवाब दीजिए।

जगदलपुर, दंतेवाड़ा जेलों में 16 वर्ष की उम्र में युवक-युवतियों को लाया गया, वो अब लगभग 20-21 वर्ष के हो रहे हैं। फिर भी इन लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यदि कुछ वर्ष बाद इनकी सुनवाई भी होती है, तो इनका भविष्य कैसा होगा। हम आदिवासियों के साथ ऐसा जुल्म क्यों? आप सब सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी संगठन और देशवासी सोचिएगा।

नक्सलियों ने मेरे पिता के घर को लूट लिया और मेरे पिता के पैर में गोली मार कर उन्हें विकलांग बना दिया। पुलिस मुखबिर के नाम पर उनके साथ ऐसा किया गया। मेरे पिता के गांव बड़े बेडमा से लगभग 20-25 लोगों को नक्सली समर्थक कहकर जेल में डाला गया है, जिसकी सजा नक्सलियों ने मेरे पिता को दी। मुझे आप सबसे जानना है कि इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार, पुलिस प्रशासन या मेरे पिता। आज तक मेरे पिता को किसी तरह का कोई सहारा नहीं दिया गया, न ही उनकी मदद की गयी। उल्टा उनकी बेटी को पुलिस प्रशासन अपराधी बनाने की कोशिश कर रही है। नेता होते तो शायद उन्हें मदद मिलती, वे ग्रामीण और एक आदिवासी हैं। फिर सरकार आदिवासियों के लिए क्यों कुछ करेगी?


छत्तीसगढ़ मे नारी प्रताड़ना से जूझती
स्व हस्ताक्षरित
श्रीमती सोनी सोरी

(मोहल्ला और अविनाश भाई को इस के लिए आभार...)

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

मुझे माफ़ कर देना....


मैं तब तक शायद
मारा जा चुका होऊंगा....
मेरी लाश को
वो गुमनाम गड्ढों में
गाड़ रहे होंगे
रास्ते के
लैम्प पोस्ट पर
झूल रही होगी
एक संघर्षकारी की लाश
हो रही होंगी
गुमशुदा बाग़ियों की
तलाश
खलिहानों में
लगा दी गई होगी आग
आज़ादी के मुंह से
निकल रहा होगा
झाग
जंगलों में से
मातम की आवाज़
आएगी
शहरों में सन्न झुग्गियों से दूर
कहीं हो रहा होगा
जश्न
रोशन कंगूरों के
अंधेरों में
बलात्कारी हंसेंगे
और
रोएगी शांति
हक की बात पर
नप जाएगी गर्दन
जूतों के तलों के
नीचे
बंदूकों की बट से
तड़तड़ाती गोलियों से
भेद की बोलियों से
कुचली जाएगी
तुम्हारी क्रांति
तब जब
हम सबकी ज़िंदा लाशें
सड़कों पर
घसीटी जा रही होंगी
तुम हमेशा की तरह
यहीं कहीं
बैठी मिलोगी
नाराज़
और
रूठी
कि मैं तुम्हारा
ख्याल नहीं रखता हूं....


..........................06-02-2012.......(1.09 रात)..............................

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

आओ-आओ...नाटक देखो...

चाय की दुकान पर बैठा अखबार पर चर्चा कर रहा लोगों का वो झुंड अचानक उठ कर उस शोर की दिशा में चल देता है...शोर में आवाज़ सुनाई दे रही है, कुछ युवाओं की...अरे क्या कह रहे हैं ये...ये चिल्ला रहे हैं...आओ आओ...नाटक देखो...और फिर देखते ही देखते उस मंझोले शहर के नुक्कड़ पर लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है। काले कपड़ों में तैयार वो युवा एक सुर में आवाज़ देते हैं और एक गीत के साथ नाटक शुरु होता है...लोग खूब तालियां बजाते हैं...हंसते हैं...फिर अचानक गंभीर हो जाते हैं...फिर तालियां बजाते हैं...और फिर अचानक से उदास हो उठते हैं...नाटक के अंत में एक धवल केश और दाढ़ी वाला शख्स हाथ जोड़कर लोगों के बीच आ खड़ा होता है...उनसे उस नुक्कड़ नाटक के सरोकारों पर बात करता है, उस के मुद्दों पर बात करता है...उसके बाद शुरु होता है चाय का सिलसिला और लगभग हर शख्स चाहता है कि वो इन बच्चों को चाय नाश्ता कराकर ही जाने दे...
नाटक का अगला सीन पर्दा हटने के साथ शुरु होता है...खचाखच भरे सभागार में कुछ युवा प्रोसीनियम पर एक नाटक कर रहे हैं...दर्शकों में चुप्पी है...चुप्पी टूटती है लेकिन तालियों की आवाज़ों के साथ...कोर्ट मार्शल के उस दृश्य में विकॉश राय बने बजरंग बली सिंह कैप्टेन बी डी कपूर बने शिव कपूर से जिरह कर रहे हैं...सन्नाटा तालियों की गूंज में बदल जाता है...लेकिन अगले ही क्षण जब नाटक की शुरुआत से चुप...बिल्कुल निस्तब्ध बैठे वीरेन बसोया अदालत के कटघरे में फूट फूट कर रो रहे होते हैं...तो लोग चुप होते हैं, बिल्कुल निशब्द...स्तब्ध और आक्रोशित...नाटक खत्म होते ही वो सफेद दाढ़ी और बालों वाला शख्स फिर से मंच पर आता है, और उस भद्र भीड़ से भी उस नाटक के सरोकारों पर बात करता है...लेकिन इस बार एक बदलाव और है, इस नाटक में कुछ पात्र वो किशोर-किशोरियां भी निभा रहे हैं, जो उस नुक्कड़ नाटक के दर्शक थे...
ये कमाल पूरी तरह से एक आदमी के नाम लिखा है...अरविंद गौड़, और काले कपड़ों से रंगीन रोशनियों तक ये है उनका रंगमंडल...अस्मिता।
दरअसल ये दो तस्वीरें हैं जो अस्मिता के उन दो चेहरों को जोड़ती हैं, जो देश के उन दो हिस्सों को जोड़ती हैं, जिन्हें हम इंडिया और भारत कहते हैं। नुक्कड़ नाटक के दर्शक और प्रोसीनियम के दर्शक दोनो ही उद्वेलित हो रहे हैं, एक अपने अधिकारों के लिए जाग रहे हैं, तो दूसरे अपने रवैये के लिए शर्मिंदा हो रहे हैं। दरअसल ये ही कमाल है अरविंद गौड़ नाम के उस शख्स का जिसके लिए साधारण बने रहना सबसे असाधारण कमाल है, ये ही सादगी उनकी भी आभा पिछले तीन दशकों से बढ़ा रही है, और इसी आभा से अस्मिता को चमकते 19 साल हो गए हैं।
जी हां...अस्मिता अपने 19 साल पूरे कर रहा है, अस्मिता 20 वें साल में प्रवेश कर रहा है और साथ ही 2 दशक की यात्रा तय कर आज भी जारी है प्रतिरोध के थिएटर का ये सफ़र। एक अभिनव प्रयोग अस्मिता, जो कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के साथ रामलीला मैदान में हज़ारों लोग जुटा लाता है तो कभी इरोम शर्मिला के साथ जंतर मंतर पर एक काले कानून के खिलाफ आवाज़ उठाता खड़ा होता है। कभी ये गांधी और अम्बेडकर के बीच के रिश्ते को समझने की कोशिश करता करता, वर्ण व्यवस्था की जड़ पर कुदाल चला देता है तो कभी जिन्नाह की रूह को ज़िंदा कर अपने सिर पर इनाम रखवाता है पर झुकना स्वीकार नहीं करता। अस्मिता के ये 20 साल उतार-चढ़ाव से भरे रहे तकनीक से लेकर अभिनेताओं तक सब कुछ बदला लेकिन कुछ नहीं बदला है तो वो है अरविंद गौड़ की जिजीविषा, प्रतिरोध की शैली और अस्मिता की मुखरता।
अस्मिता की बात करते वक्त तमाम और लोगों की तरह मैं गिनवा सकता हूं कि यहां से कौन कौन से अभिनेता निकल कर बॉलीवुड में नाम बन गए हैं लेकिन थिएटर से इतर भी दरअसल अस्मिता की अपनी एक अलग दुनिया है। ये एक अद्भुत परिवार है, जिसमें न जाने कितने सदस्य हैं। 60 से ज़्यादा वर्तमान अभिनेताओं के साथ (जिनमें से ज़्यादातर युवा हैं और 25 साल से कम उम्र के हैं) ये अलग ही घर है। एक घर जहां लगभग हर चौथे दिन किसी का जन्मदिन होता है और हर जन्मदिन पर एक उत्सव। एक ऐसा परिवार जो एक दूसरे के लिए तो दिन रात खड़ा ही है, दूसरों की मदद के लिए भी सबसे आगे है। रामलीला मैदान में आपको याद होगा अस्मिता के काले कपड़े वाले बच्चों का जज़्बा। न जाने कितनी बार मैंने देखा कि अस्मिता के सदस्य कभी किसी की मदद के लिए रक्तदान करने तो कभी किसी मोहल्ले-बस्ती की सफाई में श्रमदान करने निकल पड़ते हैं। एक एसएमएस एक-एक मोबाइल से न जाने कहां कहां पहुंच जाता है। दिल्ली की ये सड़के उन रातों को जूतों के निशानों को अपने ज़ेहन से मिटा नहीं पाई हैं, जब अरविंद गौड़ को इसी दिल्ली ने नाटक करने से प्रतिबंधित कर दिया था। अरविंद गौड़ उस दौर में हर रात मंडी हाउस से शाहदरा अपने घर तक पैदल जाया करते थे और शायद वो ही न झुकने की ज़िद उनके अंदर आज भी कूट कूट कर भरी है...
अरविंद गौड़...और अस्मिता को न जाने कितने साल से सिर्फ चाय और पारले जी के सहारे दिन रात मेहनत करते देख रहा हूं। हो सकता है कि हम में से कई अस्मिता के कलाकारों के अभिनय पर सवाल उठा दें। उनके कम उम्र और कम अनुभव पर सवाल उठा दें...लेकिन अरविंद गौड़ का थिएटर जो सवाल उठा रहा, क्या उनके जवाब हम देने को तैयार हैं? क्या हम इस योगदान को नकार सकते हैं कि देश और समाज के बारे में शून्य समझ रखने वाली एक पूरी पीढ़ी के न जाने कितने युवाओं के दिमाग अरविंद गौड़ बदल चुके हैं। थिएटर के ज़रिए किस कदर सोशल चेंज हो सकता है, ये अरविंद गौड़ और अस्मिता से हम लम्बे समय तक सीख सकते हैं।
हर बार जब अस्मिता जाता हूं, इन जोशीले नौजवान साथियों से मिलता हूं तो कई बार डर लगता है कि कहीं पूंजीवाद की आंधी और इंडिया की शाइनिंग किसी रोज़ अरविंद गौड़ और अस्मिता को न बदल दे। लेकिन तभी रिहर्सल्स के बाद अरविंद जी को साहित्यकार लक्ष्मण राव जी (लक्ष्मण राव के बिना अस्मिता की कहानी अधूरी है...)की चाय की दुकान पर ज़मीन पर ही बैठा देखता हूं, और हाथ से इशारा कर मुझे बुलाते हैं...तो लगता है कि नहीं उम्मीदें अभी बाकी हैं और उम्मीदों को बाकी रहना ही होगा...दिल्ली के आईटीओ पर हिंदी भवन के बाहर बैठा मैं सोच रहा हूं कि काश देश में ऐसे 10 अस्मिता होते, तो क्या हो सकता था...काश अरविंद जी हमेशा ऐसे ही रहें...और अस्मिता भी...बचा रहे बुर्जुआ से और बाज़ार से...अरविंद जी आप सुन रहे हैं न...
(अस्मिता के 20वें साल में प्रवेश के मौके पर कुछ सशक्त प्रस्तुतियां दिल्ली में हो रही हैं...जिस कड़ी में 4 फरवरी को शाम 7 बजे दिल्ली के श्रीराम सेंटर में कोर्ट मार्शल, 12 फरवरी को मयूर विहार में बुज़ुर्गों के लिए अम्बेडकर और गांधी की विशेष प्रस्तुति दोपहर 3 बजे, श्रीराम सेंटर में ही 18 फरवरी को शाम 7 बजे एक मामूली आदमी, 19 फरवरी को दोपहर 3 बजे श्रीराम सेंटर में मोटेराम का सत्याग्रह और 19 फरवरी को ही शाम 7 बजे अम्बेडकर और गांधी का श्रीम सेंटर में मंचन होगा...देखिए कि आप इनमें से किसमें आकर इस दो दशक के जश्न में शामिल हो सकते हैं...)
(नोट - यह किसी तरह का पी आर का लेख नहीं है...लेखक का अपना मत है...आपके मत भिन्न हो सकते हैं...)

मयंक सक्सेना

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