सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

आप सभी से इसका जवाब चाहिए...


ये एक चिट्ठी है, एक चिट्ठी जो शायद आप में से कुछ को सच्ची लगे और हिलाए भी...कुछ को शायद ये चिट्ठी नकली लगे, नाटक लगे, प्रोपेगेंडा लगे...कुछ को ये पढ़ कर भरोसा ही न हो..और कुछ की आंखें खुलें...पर यकीन मानिए कि ये सच है और सरकारें इस सच को जानती हैं, क्योंकि ये उन्ही का बोया हुआ सच है, उन्हीं का बनाया हुआ सच है...एक महिला की लड़ाई हम सब लड़ ज़रूर रहे हैं, लेकिन हमारी लड़ाई कुछ भी हासिल कर पाने में अब तक असफल रही है या फिर इसका हासिल लम्बे वक्त में मिलेगा...पर हां सोनी सोरी को सलाम है, सलाम है इरोम शर्मिला को...जो हमारी लड़ाई बिना ये सोचे लड़ रही हैं, कि हासिल क्या होगा...शायद ये ही उनका हासिल है कि हम उनको सलाम करते रहें...और अपनी अक्षमताओं पर शर्मिंदा होते रहें...सोनी सोरी की चिट्ठी आप सब के लिए...

-मयंक सक्सेना


प सब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवी संगठन, मानवाधिकार महिला आयोग, देशवासियों से एक आदिवासी पीड़ित लाचार एक आदिवासी महिला अपने ऊपर हुए अत्याचारों का जवाब मांग रही है और जानना चाहती है कि

मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है।

जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी।

पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि तुम रंडी औरत हो, मादरचोद गोंडइस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्‍यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।

( आखिर पुलिस प्रशासन के आफिसर ने ऐसा क्यों कहा। इतिहास गवाह है कि देश की लड़ाई हो या कोई भी संकट, नारियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया था। इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाया, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया। आज जो महिलाएं हर कार्य क्षेत्र में आगे होकर कार्य कर रही हैं, क्या वो भी अपना सौदा कर रही हैं। हमारे देशवासी तो एक दूसरे की मदद करते हैं - एकता से जुड़े हैं, फिर हमारी मदद कोई क्यों नहीं कर सकता। आप सभी से इस बात का जवाब जानना चाहती हूं।)

संसार की सृष्टि किसने की? बलशाली, बुद्धिमान योद्धाओं को जन्म किसने दिया है? यदि औरत जाति न होती तो क्या देश की आजादी संभव थी? मैं भी तो एक औरत ही हूं, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया। जवाब दीजिए

मेरी शिक्षा को भी गाली दी गयी। मैंने एक गांधीवादी स्कूल माता रुक्मणि कन्या आश्रम डिमरापाल में शिक्षा प्राप्त की है। मुझे अपनी शिक्षा की ताकत पर पूरा विश्वास है, जिससे नक्सली क्षेत्र हो या कोई और समस्या फिर भी शिक्षा की ताकत से सामना कर सकती हूं। मैंने हमेशा शिक्षा को वर्दी और कलम को हथियार माना है। फिर भी नक्सली समर्थक कहकर मुझे जेल में डाल रखा है। बापूजी के भी तो ये ही दो हथियार थे। आज महात्मा गांधी जीवित होते, तो क्या उन्हें भी नक्सल समर्थक कहकर जेल में डाल दिया जाता। आप सभी से इसका जवाब चाहिए।

ग्रामीण आदिवासियों को ही नक्सल समर्थक कह कर फर्जी केस बनाकर जेलों में क्यों डाला जा रहा हैऔर लोग भी तो नक्सल समर्थक हो सकते हैं? क्या इसलिए क्योंकि ये लोग अशिक्षित हैं, सीधे-सादे जंगलों में झोपड़ियां बनाकर रहते हैं या इनके पास धन नहीं है या फिर अत्याचार सहने की क्षमता है। आखिर क्यों?

हम आदिवासियों को अनेक तरह की यातनाएं देकर, नक्सल समर्थक, फर्जी केस बना कर, एक-दो केसों के लिए भी 5-6 वर्ष से जेलों में रखा जा रहा है। न कोई फैसला, न कोई जमानत, न ही रिहाई। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हम आदिवासियों के पास सरकार से लड़ने की क्षमता नहीं है या सरकार आदिवासियों के साथ नहीं है। या फिर ये लोग बड़े नेताओं के बेटा-बेटी, रिश्तेदार नहीं हैं इसलिए। कब तक आदिवासियों का शोषण होता रहेगा, आखिर कब तक। मैं आप सभी देशवासियों से पूछ रही हूं, जवाब दीजिए।

जगदलपुर, दंतेवाड़ा जेलों में 16 वर्ष की उम्र में युवक-युवतियों को लाया गया, वो अब लगभग 20-21 वर्ष के हो रहे हैं। फिर भी इन लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यदि कुछ वर्ष बाद इनकी सुनवाई भी होती है, तो इनका भविष्य कैसा होगा। हम आदिवासियों के साथ ऐसा जुल्म क्यों? आप सब सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी संगठन और देशवासी सोचिएगा।

नक्सलियों ने मेरे पिता के घर को लूट लिया और मेरे पिता के पैर में गोली मार कर उन्हें विकलांग बना दिया। पुलिस मुखबिर के नाम पर उनके साथ ऐसा किया गया। मेरे पिता के गांव बड़े बेडमा से लगभग 20-25 लोगों को नक्सली समर्थक कहकर जेल में डाला गया है, जिसकी सजा नक्सलियों ने मेरे पिता को दी। मुझे आप सबसे जानना है कि इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार, पुलिस प्रशासन या मेरे पिता। आज तक मेरे पिता को किसी तरह का कोई सहारा नहीं दिया गया, न ही उनकी मदद की गयी। उल्टा उनकी बेटी को पुलिस प्रशासन अपराधी बनाने की कोशिश कर रही है। नेता होते तो शायद उन्हें मदद मिलती, वे ग्रामीण और एक आदिवासी हैं। फिर सरकार आदिवासियों के लिए क्यों कुछ करेगी?


छत्तीसगढ़ मे नारी प्रताड़ना से जूझती
स्व हस्ताक्षरित
श्रीमती सोनी सोरी

(मोहल्ला और अविनाश भाई को इस के लिए आभार...)

1 टिप्पणी:

  1. सोनी सोरी को ऐसी सज़ा सिर्फ इसलिए नहीं दी गयी के वो आदिवासी इलाकों से है बल्कि कहीं न कहीं उनका एक सशक्त स्त्री होना इस पुरुष-प्रधान समाज को कून्ठित करने के लिए पर्याप्त था..दरअसल वो एक नहीं दो-दो लड़ाइयाँ लड़ रहीं हैं, एक अपनी ज़मीन बचाने की और दूसरी अपने अस्तित्व को बचाए रखने की, यहाँ गौर करने लायक बात है की ये दोनों ही लड़ाइयां अपने आप में ही कितनी बड़ी हैं...शहरों में रहने वाले हम में से ज़्यादातर तो लड़ने में न सिर्फ शारीरिक वरन मानसिक तौर पर भी अक्षम हैं...सोनी और इरोम की लड़ाइयां शहरों में रहने वालों को न तो दिखाई देती है और न ही सुनाई...इस पर वो बापू के तीन बन्दर बने रहना पसंद करते हैं, अन्याय देख कर भी अनदेखा करते रहो, अपनी सुविधा के अनुसार सुनो और हाँ बोलने की गलती कतई मत करना क्यूंकि किसी ने तर्क मांग लिए तो बगले झांकोंगे...और सरकार के तो कहने ही क्या, पहले उनके घर पर कब्ज़ा कर लिया फ़िर उन्ही को जेलों में बंद कर दिया...सोनी सोरी के सुनवाई तब नहीं हो पा रही है जब हमारे देश की राष्ट्रपति एक महिला हैं और केंद्र सरकार को भी एक परदे के पीछे से एक महिला ही चला रही है...जब तक शहरों में रहने वाले सुविधाभोगी लोग अपने विलास से ऊपर उठकर नहीं सोचेंगे इसी तरह कई सोनी और इरोम सरकार की तानाशाही पर बलि चढ़ती रहेंगी..और हाँ एक दिन आएगा जब यही सरकार इन शहरों की अपनी मांदों में छुपे लोगों को निकाल बाहर करेंगी तब शायद इन्हें सोनी और इरोम का बलिदान समझ आएगा...लेकिन एक मिनट, शहरों में तो सोनी और इरोम नहीं होती...

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