शनिवार, 20 नवंबर 2010

बरखा और वीर... हमें आपसे सफाई नहीं चाहिए

लेख के शीर्षक से ज़रा भी हैरान न हों क्योंकि हम जो नई पीढ़ी से आते हैं, अपनी पिछली पीढ़ी के कुत्सित सचों से अब ज़रा भी हैरान नहीं होते हैं। हम जानते हैं कि वो जो कहते हैं, जो दिखते हैं और जो करते हैं उसमें एक परस्पर विरोधाभासी अंतर है और हम उनको इसके लिए माफ़ नहीं करते हैं पर उनसे सफाई भी नहीं चाहते हैं। हमें पता है कि मूर्ति पूजन का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन सबकी मूर्तियां समय अपने आप ध्वस्त करता जा रहा है फिर चाहें वो बड़े पत्रकार हों, महान समाजसेवी या फिर वो नेता ही क्यों न हों। और एक ऐसे युग में जब सूचना प्रकाश से तेज़ गति से चलती हो, बरखा दत्त या वीर सांघवी किसी के भी सच हमसे छुपे नहीं रह सकते हैं और हम जानते हैं कि कोई भी जो चीख-चिल्ला कर दूसरों से सवाल पूछ रहा हो, उसके अपने भेद ब्लैक होल सरीखे गहरे हो सकते हैं।

अब बात कर लेते हैं मुद्दे पर, तमाम टिप्पणियां आती हैं, कई लोग बरखा दत्त और वीर सांघवी को अपना आदर्श बताते हुए निराश दिखते हैं, कुछ को पत्रकारिता के हाल को देख कर दुख होता है, कुछ पूरे सिस्टम को ही भ्रष्ट बताते हैं तो कुछ कहते हैं कि बरखाओं और वीरों का पक्ष भी सुनना चाहिए। पर सवाल है कि क्यों आखिर हम निराश हों, क्यों सिस्टम को कोसें, क्यों हम किसी से सफाई मांगें....क्या हम इतनी समझ नहीं रख सकते हैं कि इस देश मैं, समाज में और समय में क्या क्या हो सकता है? दरअसल इससे भी मज़ेदार बात ये है कि हम ये क्यों न समझें कि बरखाओं और वीरों के पास इन सब के जवाब में कोई तर्क नहीं है लेकिन वो न तो शर्मिंदा हैं और उन्हें इस देश की न्याय व्यवस्था में पूरा भरोसा है कि वो कुछ भी करें कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा।

कुछ लोग इस विचार को नकरात्मक ठहरा देंगे पर दरअसल नकरात्मक क्या है...हम या ये व्यवस्था? मैं बेहद साफगोई से कहता हूं कि अगर नई पीढ़ी के कुछ लोग बरखा दत्त को अपना आदर्श मानते हैं और वीर सांघवी सरीखा पत्रकार बनना चाहते हैं तो कृपया ये सब भूल जाइए। इन दोनो और बल्कि इनके अलावा भी तमाम चमकते चेहरों में केवल ग्लैमर के अलावा कुछ भी नहीं है जो आपको आकर्षित करे....ये सारे चमकते चेहरों की चमक उधार की...घूस की...या दलाली की है। लिप्सा, दोहरे चेहरे और भ्रष्टाचार के अलावा इन्हें किसी भी मामले में आदर्श नहीं माना जा सकता है।

अब बरखा दत्त की बात, अगर मैं सही हूं तो कुछ ही समय पहले एक अंग्रेज़ी ब्लॉगर चैतन्य कुंते को मानहानि का नोटिस भेज कर बरखा ने सार्वजनिक माफी मांगने पर मजबूर किया था। उस ब्लॉगर की गलती केवल इतनी थी कि उसने बरखा की पत्रकारिता की शैली पर सवाल उठाया था...खैर बात पुरानी है बरखा आज उससे बुरी स्थिति में हैं और देखना मज़ेदार होगा कि क्या इस बार वो कानूनी कार्रवाई करना चाहेंगी। ज़ाहिर है इस बार विधिक सहायता लेना उनके सर पर उल्टा भी पड़ सकता है। खैर वो कहती हैं कि उनकी जो बातचीत नीरा राडिया नाम की सदाचरण की पुतली से सामने आई है वो किसी और परिप्रेक्ष्य में की गई थी। हो सकता है बरखा दत्त अदालत में ये साबित भी कर दें कि वो बातचीत Out of Context थी पर ज़रा एक बार बातचीत के कुछ हिस्से देखिए....

RADIA: Yeah. Listen, the thing is that they need to talk to him directly. That is what the problem is.

BARKHA: Haan so, apparently PM’s really pissed off that they went public.

RADIA: But that’s Baalu’s doing, naa… he was not instructed by Karunanidhi to do that.

BARKHA: Oh, he wasn’t?

RADIA: This is not. He was told to come away and tell Congress that.

BARKHA: And he went public

RADIA: Well, the media… media, the media was standing outside.

BARKHA: Oh God. So now what? What should I tell them? Tell me what should I tell them?

RADIA: I’ll tell you what it is---the problem and I have had a long chat with both his wife and with the daughter right

क्या इस बातचीत से निकलने वाले मतलब एक किशोरवय भी नहीं समझ सकता है...और फिर क्या नीरा राडिया नाम की जिन महिला से बरखा ये और तमाम और गोपनीय जानकारिया साझा कर रही थी वो उनके चैनल की एडीटर इन चीफ या सीईओ थी....या कोई और बड़ी पत्रकार...या केवल गपशप के लिए इस तरह की बातें हो रही थी...आप सबको याद दिलाना चाहूंगा कि ये वो वक्त था जब पूरे देश की मीडिया की निगाहें देश के राजनीतिक नाटक पर लगी थी जो डीएमके और कांग्रेस के बीच चल रहा था....ऐसे में बरखा दत्त अंदरूनी सूचनाएं नीरा राडिया से अगर बांट रही थी तो इसके निहितार्थ क्या बिल्कुल पाक साफ हो सकते हैं...फिर क्यों ये ख़बरे एक संवाददाता के तौर पर उन्होंने अपने चैनल को नहीं दी...क्यों और फिर बरखा दत्त नीरा राडिया से एक आज्ञाकारी कर्मचारी की तरह पूछती हैं कि “Oh God. So now what? What should I tell them? Tell me what should I tell them?” बरखा जी क्या हम सब आपको वाकई ऐसे बेवकूफ लगते हैं?

ये केवल एक संवाद है, ज़रा नीरा राडिया और महाराजाधिराज ए. राजा के बीच के वार्तालाप पर ग़ौर करिए,

RADIA: Hi! I got a message from Barkha Dutt just now.

RAJA: Huh?

RADIA: Barkha Dutt

RAJA: What does she say?

RADIA: She says… that she has been following up the story with Prime Minister’s Office tonight. In fact, she was the one who told me that Sonia Gandhi went there. She says that he [the PM, presumably] has no problem with you, but he has a problem with Baalu.

ये वही नीरा राडिया हैं जो बरखा दत्त से भी बात कर रही थी और फिर वो सारा ज्ञान जो बरखा दत्त इनको प्रदान कर रही थी, उसे ये ए. राजा से साझा कर रही थीं। ऐसे में बरखा दत्त या तो ये ही नकार दें कि ये आवाज़ उनकी है (जो फॉरेंसिक जांच में साफ हो जाएगा) या फिर कोई तर्क न दें....और वो दे भी नहीं रही हैं...बल्कि हर मौके पर चीखने वाली, वीरांगना आज इतनी असहाय हो गई हैं कि खुद कुछ बोलने की जगह अपने संस्थान को आगे कर दिया....ये वही संस्थान हैं जो मंदी के नाम पर छंटनी करने में ज़रा देर नहीं लगाते, और आज किसी बड़े की पोल खुली है तो कर्मचारी हित के नाम पर मानहानि की धमकी दे रहे हैं। ज़ाहिर है इनको पता है कि इस लोकतंत्र में केवल बड़ों को लूट की छूट है, छोटों को सांस लेने की भी आवाज़ करने की आज़ादी नहीं है। वी द पीपल कहने वाली बरखा और उनके जैसे तमाम केवल एक धंधे में लगे हैं....वो जनता को सपने बेचते हैं और स्टूडियो से बाहर आ कर जनता के सपनों को बेच देते हैं। और बरखा क्योंकि कहानी इतनी साफ है कि और सफाई की गुंजाइश नहीं है इसलिए या तो ये टेप ही फ़र्ज़ी साबित हो जाए....नहीं तो हमें आपकी सफाई नहीं चाहिए।

अब बात वीर सांघवी की, वीर सांघवी का टेप सुनते हुए मैं कई बार बहुत जो़र से हंसा और कई बार बिल्कुल तरस आया कि इतना हट्टा कट्टा दिखने वाला शख्स और इतना दबंग माने जाने वाला पत्रकार क्या वाकई इतना दयनीय है। उस टेप में वाकई नीरा राडिया वीर सांघवी को डिक्टेट कर रही हैं कि उन्हें अपने एक तथाकथित लाबीइंग करने वाले लेख में क्या लिखना है और क्या नहीं। देखिए टेप में एक जगह किस तरह दोनो बात करते हैं,

RADIA: But basically, the point is what has happened as far as the High Court is concerned is a very painful thing for the country because what is done is against national interest.

VIR: Okay.

RADIA: I think that’s the underlying message.

VIR: Okay. That message we will do. That allocation of resources which are scarce national resources of a poor country cannot be done in this arbitrary fashion to benefit a few rich people.

RADIA: That’s right.

VIR: Yeah. That message we will get across, but what other points do we need to make?

ये बातचीत साफ दिखाती है कि वीर सांघवी तो जैसे नीरा राडिया के बिल्कुल इशारों पर एक लेख या साक्षात्कार कर रहे हों, और यकीन न हो तो आगे देखिए कि किस तरह वीर सांघवी ये तक कह देते हैं कि मुकेश अंबानी को पूरा साक्षात्कार रिहर्सल कर के देना होगा,

VIR: Mukesh can talk straight, can say things. You can rehearse. You can work out a script in advance. You can go exactly according to the script. Anil can’t do any of those things, no?

RADIA: Right. But we can do that, no?

VIR: Yeah.

RADIA:Yeah?

VIR: But Mukesh has to be on board. He has to sort of realise. It has to be fully scripted.

RADIA: No, that’s what I mean. I think that’s what he’s asking me.

VIR: Yes, it has to be fully scripted.

RADIA: He is saying is that, ‘Look Niira’, that ‘I don’t want anything extempore.’

VIR: No, it has to be fully scripted. I have to come in and do a run through with him before.

RADIA: Yeah, yeah.

VIR: We have to rehearse it before the cameras come in.

और ये सब सामने आने के बाद वीर सांघवी अपने ब्लॉग पर क्या लिखते हैं, क्या सफाई देते हैं इससे कतई कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। अगर वो पाक साफ़ हैं और सारे आरोप झूठे हैं तो आएं कानूनी अखाड़े में और लड़ें मुकदमा पर ज़ाहिर है वहां भी इन सबको सज़ा मिलना मुश्किल ही है। इनकी सज़ा केवल यही है कि ये हमारे सामने आकर सफाई देने का साहस ही न कर पाएं....ये जनता का सामना करने की हिम्मत ही न कर पाएं....ये जानें और समझें कि जनता और इनके प्रशंसक सब इनका सच जानते हैं....और इसीलिए उनको किसी तरह की सफाई देने का कोई मतलब नहीं है।

बरखा और वीर कोई अपवाद नहीं हैं न अपनी तरह के अकेले हैं, ये अलग बात है कि वो इस प्रकरण के बाद अलग थलग पड़ जाएं। एक और बड़ा और कड़वा सच ये है कि तमाम समाचार पत्रों और चैनलों के पास ये सारा सच और इसके सबूत पहले से मौजूद थे पर किसी ने भी इतना नैतिक साहस नहीं दिखाया कि इस ख़बर को उठाता। कुछ महीने पहले जब पहली बार ये मामला उठातो तो इन लोगों का नाम सामने आते ही एनडीटीवी समेत ज़्यादातर चैनलों ने ये ख़बर ही गिरा दी....किसी की इतनी तक हिम्मत नहीं हुई कि कोई बिना नाम लिए ही ये कह देता कि दो बड़े पत्रकारों की भी भूमिका संदिग्ध है।

जो लोग बरखा और वीर की चुप्पी पर सवाल उटा रहे हैं उनसे केवल एक निवेदन है कि उनसे किसी सच की उम्मीद न करें, उनसे सफाई न मांगे....क्या आपको अपने बुद्धि और विवेक पर भरोसा नहीं है....क्या आपने टेप नहीं सुने हैं या आप बदलते समय के कड़वे सचों से वाकिफ़ नहीं हैं। कैसे कोई आम आदमी की, किसान की और गरीब की आवाज़ उठाने की बात करने वाला इंसान करोड़ों कमा सकता है....कैसे कोई देश के आम आदमी को अपनी बपौती मान सकता है....और कब तक हम ठगे जाते रहेंगे...नेताओं....पत्रकारों और ढोंगी समाजसेवियों के ढोंग से....दरअसल ये समय हमें रोज़ शर्मसार ज़रूर करता है, कई ऐसे सचों से रूबरू कराता है जो सुनना हम में से कोई नहीं चाहता है...पर सच कहें तो इस समय की सबसे बड़ी खासियत यही है कि कोई भी शख्स कितना भी बड़ा क्यों न हो, वो महान और पवित्र होने का दावा नहीं कर सकता, उसके सच सामने ज़रूर आएंगे....और इसी लिए बरखा और वीर हमें आपसे कोई सफाई नहीं चाहिए.....

शब्द..
भाव.....
मात्रा......
छंद..........
कविता.........
जहां से नहीं थी
आशा
वहीं से देखो
फूट रहे हैं
क्रोध...
शोभ...
द्रोह......
विद्रोह....
ध्वंस हुई हैं
सदियों से पूजित
मूर्तियां
देखो युग के
प्रतिमान
टूट रहे हैं

(मई में पहली बार बरखा दत्त और वीर सांघवी के किस्से चर्चा में आने के बाद, और हाथ में इनके नाम वाले दस्तावेज़ आने के बाद ये कविता लिखी गई थी।)


गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

लोकतंत्र के 'शाही' इमाम...

उनको आम आदमी 'शाही' इमाम के तौर पर जानता है...पता नहीं उनकी कितनी इज़्ज़त करता है पर हां उनके पुराने और नए कारनामों को अब समझने ज़रूर लगा है। बुखारी अपने को आम मुसलमान का रहनुमा समझते हैं पर दरअसल उनके जैसों की राजनीतिक सौदेबाज़ियों ने केवल मुसलमानों की उम्मीदों का सौदा किया है और उनको वक्त से और पीछे ले जाने का काम किया है। तथाकथित शाही इमाम की आंखों को ही अगर गौर से देखा जाए तो उसमें से मक्कारी झांकती दिखती है और ज़ाहिर है ज़्यादातर मज़हब के ठेकेदारों की असली फितरत मक्कारी ही है....वो क्या कहते हैं कुछ घंटे बाद उन्हें खुद याद नहीं रहता...उनके इस अलोकतांत्रिक पद (शाही इमाम) की तरह ही उन्हें ये भी लगता है कि उनकी हैसियत भी शाही है और वो जो चाहेंगे जैसा चाहेंगे करेंगे....जैसा कि अभी लखनऊ में हुआ, एक सहाफी पर ज़ुबानी और फिर जिस्मानी हमला करवा कर उन्होंने दिखा दिया कि उनकी असली ज़ेहनी हालत क्या है...बुखारी पर लानतें भेजते हुए और उनको अपना नेता मानने वालों से सहानुभूति जताते हुए हम शीबा असलम फ़हमी का ये लेख प्रकाशित कर रहे हैं....पता नहीं लोकतंत्र में कोई भी शाही कैसे हो सकता है....
-मयंक सक्सेना

अहमद बुख़ारी द्वारा लखनऊ की प्रेस वार्ता में एक नागरिक-पत्रकार के ऊपर किये गए हमले के बाद कुछ बहुत ज़रूरी सवाल सर उठा रहे हैं. एक नहीं ये कई बार हुआ है की अहमद बुख़ारी व उनके परिवार ने देश के क़ानून को सरेआम ठेंगे पे रखा और उस पर वो व्यापक बहस नहीं छिड़ी जो ज़रूरी थी. या तो वे ऐसे मामूली इंसान होते जिनको मीडिया पहचानता ही नहीं तो समझ में आता था, लेकिन बुख़ारी की प्रेस कांफ्रेंस में कौन सा पत्रकार नहीं जाता? इसलिए वे मीडिया के ख़ास तो हैं ही. फिर उनके सार्वजनिक दुराचरण पर ये मौन कैसा और क्यों? कहीं आपकी समझ ये तो नहीं की ऐसा कर के आप 'बेचारे दबे-कुचले मुसलमानों' को कोई रिआयत दे रहे हैं? नहीं भई! बुख़ारी के आपराधिक आचरण पर सवाल उठा कर भारत के मुस्लिम समाज पर आप बड़ा एहसान ही करेंगे, इसलिए जो ज़रूरी है वो कीजिये ताकि आइन्दा वो ऐसी फूहड़, दम्भी और आपराधिक प्रतिक्रिया से भी बचें और मुस्लिम समाज पर उनकी बदतमीज़ी का ठीकरा कोई ना फोड़ सके.

इसी बहाने कुछ और बातें भी; भारतीय मीडिया अरसे से बिना सोचे-समझे इमाम बुखारी के नाम के आगे 'शाही' शब्द का इस्तेमाल करता आ रहा है. भारत एक लोकतंत्र है, यहां जो भी 'शाही' या 'राजा-महाराजा' था वो अपनी सारी वैधानिकता दशकों पहले खो चुका है. आज़ाद भारत में किसी को 'शाही' या 'राजा' या 'महाराजा' कहना-मानना संविधान की आत्मा के विरुद्ध है. अगर अहमद बुखारी ने कोई महान काम किया भी होता तब भी 'शाही' शब्द के वे हकदार नहीं इस आज़ाद भारत में. और पिता से पुत्र को मस्जिद की सत्ता हस्तांतरण का ये सार्वजनिक नाटक जिसे वे (पिता द्वारा पुत्र की) 'दस्तारबंदी' कहते हैं, भी भारतीय लोकतंत्र को सीधा-सीधा चैलेंज है.

रही बात बुख़ारी बंधुओं के आचरण की तो याद कीजिये की क्या इस शख्स से जुड़ी कोई अच्छी ख़बर-घटना या बात आपने कभी सुनी? इस पूरे परिवार की ख्याति मुसलमानों के वोट का सौदा करने के अलावा और क्या है? अच्छी बात ये है कि जिस किसी पार्टी या प्रत्याशी को वोट देने की अपील इन बुख़ारी-बंधुओं ने की, उन्हें ही मुस्लिम वोटर ने हरा दिया. मुस्लिम मानस एक परिपक्व समूह है. हमारे लोकतंत्र के लिए ये शुभ संकेत है, लेकिन पता नहीं ये बात भाजपा जैसी पार्टियों को क्यों समझ में नहीं आती? वे समझती हैं की 'गुजरात का पाप' वो 'बुख़ारी से डील' कर के धो सकती हैं.

एक बड़ी त्रासदी ये है कि दिल्ली की जामा मस्जिद जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर है और एक ज़िन्दा इमारत जो अपने मक़सद को आज भी अंजाम दे रही है. इसे हर हालत में भारतीय पुरातत्व विभाग के ज़ेरे-एहतेमाम काम करना चाहिए था, जैसे सफदरजंग का मकबरा है, जहां नमाज़ भी होती है. क्यूंकि एक प्राचीन निर्माण के तौर पर जामा मस्जिद इस देश के अवाम की धरोहर है, ना की सिर्फ़ मुसलमानों की. मुग़ल बादशाह शाहजहां ने इसे केवल मुसलमानों के चंदे से नहीं बनाया था, बल्कि देश का राजकीय धन इसमें लगा था और इसके निर्माण में हिन्दू-मुस्लिम दोनों मज़दूरों का पसीना बहा है और श्रम दान हुआ है. इसलिए इसका रख-रखाव, सुरक्षा और इससे होनेवाली आमदनी पर सरकारी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए. ना की एक व्यक्तिगत परिवार की? लेकिन पार्टियां ख़ुद भी चाहती हैं कि चुनावों के दौरान बिना किसी बड़े विकासोन्मुख आश्वासन के, केवल एक तथाकथित परिवार को साध कर वे पूरा मुस्लिम वोट अपनी झोली में डाल लें. एक पुरानी मस्जिद से ज़्यादा बड़ी क़ीमत है 'मुस्लिम वोट' की, इसलिए वे बुख़ारी जैसों के प्रति उदार हैं ना कि गुजरात हिंसा पीड़ितों के रिफ्यूजी कैम्पों से घर वापसी पर या बाटला-हाउस जैसे फ़र्ज़ी मुठभेड़ की न्यायिक जांच में!

ये हमारी सरकारों की ही कमी है कि वह एक राष्ट्रीय धरोहर को एक सामंतवादी, लालची और शोषक परिवार के अधीन रहने दे रहे हैं. एक प्राचीन शानदार इमारत और उसके संपूर्ण परिसर को इस परिवार ने अपनी निजी मिलकियत बना रखा है और धृष्टता ये की उस परिसर में अपने निजी आलिशान मकान भी बना डाले और उसके बाग़ और विशाल सहेन को भी अपने निजी मकान की चहार-दिवारी के अन्दर ले कर उसे निजी गार्डेन की शक्ल दे दी. यही नहीं परिसर के अन्दर मौजूद DDA/MCD पार्कों को भी हथिया लिया जिस पर इलाक़े के बच्चों का हक़ था. लेकिन प्रशासन/जामा मस्जिद थाने की नाक के नीचे ये सब होता रहा और सरकार ख़ामोश रही. जिसके चलते ये एक अतिरिक्त-सत्ता चलाने में कामयाब हो रहे हैं. इससे मुस्लिम समाज का ही नुकसान होता है कि एक तरफ़ वो स्थानीय स्तर पर इनकी भू-माफिया वा आपराधिक गतिविधियों का शिकार हैं, तो दूसरी तरफ़ इनकी गुंडा-गर्दी को बर्दाश्त करने पर, पूरे मुस्लिम समाज के तुष्टिकरण से जोड़ कर दूसरा पक्ष मुस्लिम कौम को ताने मारने को आज़ाद हो जाता है.

बुख़ारी परिवार किसी भी तरह की ऐसी गतिविधि, संस्थान, कार्यक्रम, आयोजन, या कार्य से नहीं जुड़ा है, जिससे मुसलामानों का या समाज के किसी भी हिस्से का कोई भला हो. ना तालीम से, ना सशक्तिकरण से, ना हिन्दू-मुस्लिम समरसता से, ना और किसी भलाई के काम से इन बेचारों का कोई मतलब-वास्ता.... तो ये काहे के मुस्लिम नेता?

शीबा असलम फहमी

(लेखिका जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं पर ज्यादा अपने स्त्री विमर्श और सामाजिक लेखन को लेकर जानी जाती हैं, हंस के साथ मिल कर नियमित जेंडर जिहाद कर रही हैं....कानपुर में पैदाइश हुई और १४ साल से दिल्ली में रहने के बाद भी जुबां की सलाहियत लखनऊ वाली ही है...मुस्लिम समाज का एक प्रगतिशील चेहरा जो अपने स्तर पर अपनी तरह से कोशिशें कर रहा है...और इस सब से बढ़ कर एक अच्छी मित्र...)

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

इंसानियत का बरगद...

(अयोध्या और उस तरह के तमाम मामलों से ये कहानी उपजी है....क्योंकि इंसानियत बरगद वाकई ठूंठ रह गया है....)
कहीं, किसी शहर में, एक सड़क पर
एक पंछी ने
कुछ बीज छिटकाए
मौसम ने
कुछ बीज पनपाए
उगा एक
बरगद
उस मंदिर के आंगन में
बढ़ता गया
हो गया आदमकद
फिर बन गया बुत
औरतों ने
उस पर धागे कसे
परिक्रमा की, उपवास रखे
उसकी डालियों पर, जटाओं पर झूले
बच्चे हंसे ,
हुआ वो गदगद
और चढ़ा, और बढ़ा
बढ़ती ऊंचाई, फैलती शाखाएं
झूमती जटाएं
निकल मंदिर के आंगन से
पहुंची पड़ोस के बरामदे में
छा गई
मस्जिद के वजू के हौज पर
छांव करने लगीं नमाज़ियों के सर
बरगद पर बसने लगे
परिंदे
बुनने लगे घोंसले
किसी को भगवान मिला
किसी को खेल
किसी को छांव
और
पंछियों को घर
एक दिन मगर
शहर में आग सी बरसी
मरे इंसान
पर
गिनती में आए हिंदू-मुसलमान
बरगद
जानता न था फ़र्क करना
पर
एक दिन
उससे पूछे बिन
इंसानों ने किया गजब
बना दिया
उसका भी मज़हब
तिलक बोला, "बरगद हिंदू है"
टोपी ने कहा, "मुसलमान"
बरगद कुछ न बोला
रह गया बस हैरान
फिर तिलक त्रिशूल बन गया
टोपी तलवार
मचा हाहाकार
कुछ भी पहले सा न रहा
उस साल बारिश न हुई
बस खून बहा
अब बरगद के चारों ओर
ख़ाकी का पहरा है
जहां चहकते थे परिंदे
अब
सन्नाटा गहरा है
मंदिर में कब से
बरगद सींचा नहीं गया है
मस्जिद पर छाई डालियों को
काट दिया है
न वहां पूजा है, न नमाज़
न खेलते बच्चे हैं
न गाती औरतें
और
न सुस्ताते नमाज़ी
पंछी
जो अजान से जागते थे
आरती के वक़्त
घोंसलों में भागते थे
मंदिर में दाने चुग कर
वजू के पानी पर
झुककर
करते थे ज़िंदगी बसर
पंछी वो
अब दर बदर हैं...
मंदिर में अभी भी बज रहे हैं शंख
नमाज़ में झुक रहे सर हैं
लेकिन इंसानों के झगड़े में
बरगद ठूंठ.....
और पंछी
बेघर हैं....

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

अपनी हिंदी - काका हाथरसी

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
कहँ ‘ काका ' , जो ऐश कर रहे रजधानी में
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
कहँ ‘ काका ' कविराय, ध्येय को भेजो लानत
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत

काका हाथरसी


गुरुवार, 26 अगस्त 2010

बीज कभी नहीं मरते हैं...


कभी मन से
रोपे गए
कभी अनजाने में
गिर के ज़मीन पर
दब गए
ज़मीन में
जैसे थोपे गए

कभी
लगातार बरसातों से
बेअसर
कभी उग आते
कुछ बूंदों से ही
भीगकर

चिड़ियों के
छिटकाए
किसानों के बिखराए
बचपन में फेंके गए
भूले बिसराए

खेतों में
खलिहानों में
गलियारों में
आंगनों में
मकानों की बाहरी
दीवारों में

पुरानी उजाड़
खंडहर होती
मिलों में
उदास
सुनसान दिलों में

फूटते
बंज़र ज़मीन का
सीना फाड़ कर
अचानक
मृत्यु की गोद से
निकल होते अमर

अंकुरित होते
छाती तान कर
ऊपर की ओर
चढ़ते
फिर हर रोज़
बढ़ते

न जाने कितने बरस
मर कर भी
जिया करते हैं
अपने अंद समाए
पूरी एक
ज़िंदगी मुकम्मल
बंजर ज़मीन हो
या दिल
बीज
कभी नहीं मरते हैं...

मयंक सक्सेना

शनिवार, 21 अगस्त 2010

धूल-गुबार में जंतर मंतर...रंगरंगीला परजातंतर...

उस वक्त तक मैं भूल चुका था कि मैं फिल्म देख रहा हूं, कुछ कुछ ऐसा लगने लगा था कि मैं भी उस भीड़ का हिस्सा हूं जो नत्था के घर के बाहर जुटी हुई थी...अब वो आम ग्रामीण हों...या मीडियावाले...उनमें से कोई एक बन कर मैं कहानी का हिस्सा बनता जा रहा था....शुरुआत में कई घटनाक्रमों पर लगातार हंसता रहा पर एक दृश्य में राकेश अपनी मोटरसाइकिल रोक कर मिट्टी खोदते बूढ़े़ का नाम पूछता है....और जवाब आते ही जैसे शरीर झनझना जाता है...तुरंत गोदान आंखों के सामने से चलती जाती है....किसान से मजदूर हो जाने की व्यथा....और नाम वही जो गोदान के नायक का था...होरी महतो...गाय खरीद कर वैतरणी पार कर जाने की इच्छा कर के जीवन को नर्क बना लेने वाला प्रेमचंद का होरी महतो....लगने लगा था कि अब फिल्म गंभीर हो चली है...और अंदाज़ा सही था...

होरी महतो के घर के बाहर दो चार लोग...राकेश को पता चलता है कि सुबह अपने ही खोदे गड्ढ़े में होरी का शव मिला...राकेश का अंग्रेज़ी चैनल की पत्रकार से पूछ बैठना कि जब सब गरीब हैं तो नत्था क्यों ख़बर है...सब क्यों नहीं...???? नंदिता का जवाब कि क्योंकि नत्था मरने वाला है...और फिर राकेश का सवाल कि होरी महतो तो मर गया उसका क्या.....और नंदिता का जवाब कि तुम अगर ये सब नहीं बर्दाश्त कर सकते तो गलत पेशे में हो....क्या वाकई राकेश जैसे तमाम लोग गलत पेशे में हैं....या पेशा ही गलत हो गया है....

फिल्म पर तमाम बहसें पढ़ रहा हूं...कई लोग अंधभक्त हुए जा रहे हैं तो कई लोग फिल्म को कमज़ोर कह रहे हैं....क्यों आखिर....कहां और क्या कमी है फिल्म में...पीपली लाइव अपने समय का एक गंभीर व्यंग्य है...व्यंग्य जो लोगों को हंसाते हंसाते सवाल छोड़ दे....सोचने को मजबूर कर दे...डार्क सटायर....हां ज़ाहिर है अगर आप किसानों की आत्महत्या पर फिल्म देखने गए छद्म बुद्धिजीवी हैं तो आप निराश होंगे...फिल्म केवल किसानों की बात नहीं करती है...फिल्म में किसान है..गांव है...नेता हैं...मंत्री हैं...मुख्यमंत्री हैं....नौकरशाह हैं...पत्रकार भी हैं और आम लोग भी....पुलिस भी...कुल मिला कर पूरे सिस्टम पर है...तंत्र पर भी और परजातंतर पर भी....कुछ ने कहा कि फिल्म ने किसानों का मज़ाक उड़ाया...वाकई हास्यास्पद है कि कुछ नकली लवोग किसानों पर एक ऐसी फिल्म बनाएं जो केवल अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में दिखे...उसे न तो आम आदमी देख पाए और न ही समझ पाए...तो मज़ाक वो है किसानों के साथ या ये.....हां अगर व्यंग्य की समझ ही नहीं है तो सौ खून माफ़ हैं....

दरअसल पीपली लाइव एक शानदार कोलाज है....एक उपन्यास है जिसके अंक छोटे पर पूरे हैं....कोलाज में देश भर के रंगरंगीले दर्शन होते हैं....और हर एक संवाद अपने आप में मुकम्मल कहानी है उस किरदार की...उस समाज की....वो चाहें हिंदी के पत्रकार कुमार दीपक हों...अंग्रेज़ी की नंदिता....नत्था हों...उसके बड़े भाई...उसकी पत्नी...या पुलिस वाले और नेता....या फिर कानून समझाते नौकरशाह....ज़ाहिर है जिनका भी पेट भरा है सब एक ही से हैं फिर चाहें वो हाई कोर्ट की अनुमति का इंतज़ार करते नौकरशाह हों...मुस्कुरा कर मज़े लेते कृषि मंत्री....राजनैतिक रोटियां सेंकते नेता हों...या गू में ख़बर ढूंढते पत्रकार....पीपली लाइव के हम्माम में सब नंगे दिखे....ज़ाहिर है किसान तो पहले से ही बिना कपड़ों के है....

कुछ लोगों से एक बात और फिल्म का क्रेडिट कृपया आमिर को देना छोड़ें...व्यावसायिक मजबूरी या विनम्रता के चलते सकता है अनुषा और महमूद ये कर रहे हों...पर पीपली पूरी तरह से इन्हीं दोनो की फिल्म है....मीडिया चैनल लोगों को लगातार गुमराह करते रहे...उनको पता था कि फिल्म में सबसे ज़्यादा मज़ाक उन्हीं का उड़ाया गया है पर वो नाटक करते रहे जैसे कुछ पता ही न हो...कहते रहे कि फिल्म किसानों पर है....मीडिया का इतना सटीक चित्रण अभी तक किसी फिल्म में नहीं हुआ....दीपक चौरसिया एक बार ये फिल्म ज़रूर देखें...अगर नहीं देखी है तो....मैंने अब तक ऐसी फिल्म नहीं देखी...शानदार दास्तानगोई अनुषा-महमूद...

हां आखिरी और सबसे ज़रूरी बात कि शायद निर्देशक का मन हम में से ज़्यादातर लोग समझ नहीं पाए....मुझे लगता है कि फिल्म का असली नायक नत्था नहीं था...फिल्म में दो नायक थे...और कहानी की आत्मा को ज़िंदा रखने के लिए दोनो का मरना ज़रूरी था....सो होरी महतो और राकेश दोनो मर गए....कहानी में नायक उसका संदेश होता है और ये ही वो दो थे जो सवाल छोड़ जाते हैं....होरी महतो को तो मरना ही था वो तमाम गांवों में रोज़ मर रहा है.....और राकेश मैं जानता हूं कि तुम असल में नहीं मरे हो...पर पता नहीं क्यों तुम्हारे किरदार की मौत से मैं बेहद दुखी हूं....क्योंकि हमारे बीच से भी तुम काफी पहले ही मर चुके हो....और फिल्म की ही तरह हमें हकीकत में भी नहीं पता है कि तुम मर चुके हो राकेश.....हमें माफ़ कर देना.....

(ये पंक्तियां न तो फिल्म में हैं....न ही ऑडियो ट्रैक में...पर शायद असल लिरिक्स में रहीं थीं...)

ये देखो ये बड़े हुज़ूर...

पकड़ कैमरा खड़े हैं दूर...

मज़े ले रहे हैं भरपूर...

और यहां मैया हमारी मरी जात है....

महंगाई डायन खाए जात है...

-मयंक सक्सेना

mailmayanksaxena@gmail.com

सोमवार, 16 अगस्त 2010

आज़ादी....

(सोचा था कि पीपली लाइव पर लिखूंगा....पर लगा कि ये पहले...कल पीपली लाइव देख कर आया हूं...और कल अब लिखूंगा फिल्म के बारे में....)

बदबूदार नालों के किनारे
पलते इंसानों के झुंड
ज़हरीले कारखानों के दरवाज़ों पर
तालों की जगह
लटके नरमुंड
अस्पतालों के आंगनों में
ज़मीन पर लेटे-अधलेटे
असहाय जिस्म
हर अल सुबह
शहर के चौराहों पर
बिकती इंसानों की किस्म
सस्ती शराब
और
उससे भी सस्ती जान
शहरों में मरता मजदूर
या
गांवों में किसान
बुर्जुआ के खातों में
गिरवी सरकारें
हर रोज़ उठती...
गिरती दीवारें
आज़ादी...
लफ़्ज भी घिनौना सा है...
आज़ादी
थमाया गया एक खिलौना सा है...
आज़ादी
के गीत गाओ
आज़ादी
का जश्न मनाओ
आज़ादी
बस सोचते रहो
आज़ाद हो
बस सोचने को...
आज़ादी
बस मानो कि हो आज़ाद
आज़ाद हो मानने को
खुशकिस्मत हो
कि नहीं घुसा
अब तक तुम्हारे सीने में
इस आज़ादी का
कोई खंज़र
आज़ादी जो दी गई है
भेड़ियों को
कर रही है खौफ़ज़दा
हर मंज़र
मनाओ आज़ादी का जश्न
कि ज़िंदा हो इस साल भी
मनाओ
अपने भगवान, अल्लाह, गॉड से
कि बचे रहो अगले साल भी
और बचे रहो...
इतना ही काफी है
क्योंकि आज़ादी मांगने की
सज़ा है मौत...
नहीं कोई माफी है...
................................................................

बुधवार, 28 जुलाई 2010

26 साल...


आज मेरा जन्मदिन है....क्योंकि आज के ही दिन सन 1984 में मैंने लखनऊ के क्वीन्स मैरी अस्पताल (के.जी.एम.सी) में जन्म लिया था...शायद रोते हुए ही...और अब तक की सारी उम्र भी रोते हुए ही काट दी...शायद हम सारे इंसान एक जैसे होते हैं...रोते रहते हैं और इसीलिए पैदा भी रोते हुए ही होते हैं....जब शुरुआत ही ऐसी है तो खाक बाकी हंसी होगी...खैर आज 26 साल का हो गया हूं और एक बात बेहतर समझता हूं कि दरअसल मुश्किलें ही ज़िंदगी और ज़िंदा होने का सबब देती हैं....नहीं करिहो का ज़िंदा रह के....सुबह से लोग शुभकामनाएं दे रहे हैं...फोन ससुरा कम था कि अब मोबाइल...एसएमएस....ईमेल...ऑर्कुट और फेसबुक भी है....लगा कि कुछ तो लिख ही दूं...तो कुछ भी लिखने के चक्कर में कुछ लिखा डाला है....आज मेरा जन्मदिन है आशा है कम से कम आज तो आप एक कविता झेल ही लेंगे.....

26 साल...

26 साल

बिना किसी मुश्किल

कट जाते

मुश्किल था

ऐसा सोचना भी

पर हर वक्त

बैठा, उठा

रहा

जहां कहीं

सोचा बस यही

घबराता हुआ

मनाता रहा दिल

कि काश न होती

कोई भी मुश्किल

और इसी मनाने में

सोचने-विचारने

घबराने में

कट गए

निपट गए

ये 26 साल

और मैं

हर बार

करता रहा पार

ये मुश्किल

कि सोचना

न आए मुश्किल

और मुश्किलें आती गई

और आगे

आने वाले सालों में भी

होगा ऐसा ही कुछ....

क्योंकि

सोच से बड़ी

कोई मुश्किल नहीं....

मयंक सक्सेना

28-07-1984

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

पूर्णता अपूर्ण है.....

सबसे गहरी कविताएं,

निरुद्देश्य लिखी गईं

जल्दबाज़ी में उकेरे गए

सबसे शानदार चित्र

हड़बड़ी में गढ़े गए

सबसे अद्भुत शिल्प

सबसे महान अविष्कार

हो गए अनजाने में ही

सबसे पवित्र है

असफल पहला प्रेम


कभी सरल रेखा में

रास्ता नहीं बनाती नदियां

दिन भर आकार बदलती हैं

परछाईयां

हर रोज़ चांद का चेहरा

बदल जाता है

दिन भी कभी छोटा

कभी बड़ा हो जाता है

कभी भी पेड़ पर हर फल

एक सा नहीं होता

ठीक वैसे, जैसे एक सी नहीं

हम सबकी शक्लें


सबसे सुंदर स्त्री भी

सर्वांग सुंदर नहीं होती

सबसे पवित्र लोगों के सच

सबसे पतित रहे हैं

सबसे महान लोगों ने कराया

सबसे ज़्यादा लज्जित

सबसे ईमानदार लोगों के घर से

सबसे ज़्यादा सम्पत्ति मिली

सबसे सच्चा आदमी

उम्र भर बोलता रहा झूठ...


और ठीक ऐसे ही

कभी भी कुछ भी

पूर्ण नहीं है

न तो कुछ भी

सच है पूरा...न झूठ....

पूर्णता केवल एक मिथक है

एक छलावा

ठीक ईश्वर की तरह ही

एक असम्भव लक्ष्य...

जिस पर हम

केवल रुदन करते हैं व्यर्थ

कुछ भी पूर्ण नहीं है

न शब्द और न अर्थ

हम केवल मानते हैं कि

पूर्ण होगा शायद कुछ....

जो वस्तुतः नहीं है कहीं

केवल अपूर्णता ही तो पूर्ण है

अपने अर्थ में....

और वैसे ही हम सब

पूरी तरह अपूर्ण...........


मयंक सक्सेना (9 जुलाई, 2010)

रविवार, 4 जुलाई 2010

वक्त...हालात...ज़िंदगी...

वक़्त
दगाबाज़ है
बहुत
एक सा रहने के
भरोसे दिला कर
कभी भी बदल जाता है

हालात
का वादा था
बने रहने का
पर
वक्त को देख
वक्त के साथ
चलने की ज़िद में
मचल जाता है

ज़िंदगी
साथ देने का इसका
नहीं कोई वादा भी
और
पता भी नहीं
कब छोड़ेगी साथ
पर चल रही है
और
साथ है तब भी
साथ छोड़ चुके हैं
जब वक़्त और हालात....

(दरअसल ज़िंदगी की सबसे अच्छी बात ये है कि य़े चलती रहती है.....और शायद सबसे बुरी बात भी यही है....)

शुक्रवार, 25 जून 2010

हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है...गर्रर्रर्र...पहली किस्त..Part-I


इसे नौजवान अपनी महबूबा से भी ज़्यादा मोहब्बत करते थे। इतनी मोहब्बत कि इसे आज भी देखते हैं तो हम में से कई बल्कि वो जो तब नौजवान थे और अब अधेड़ हैं अपने अपने दिलों पर हाथ रख लेते हैं। और दिल में से एक ही आवाज़ आती है कि वाह..... तेरा जवाब नहीं है...., पुराने इश्क के किस्से ताज़ा हो जाते हैं और यादों का समंदर अपनी लहरों के आगोश में ले लेता है....स्कूल, कॉलेज और बाज़ारों पर उसकी वो दिलकश आवाज़ यूं लगता है आज भी कानों में गूंज रही है। यकीनन वो हम सबकी महबूबा थी....आज सुबह अचानक ही डॉ. अनुराग आर्या से फेसबुक चैट ने फिर उसी याद दिला कर बेचैन कर दिया है....और रात को नींद भी नहीं आ रही है....पता नहीं डॉ. साहब भी चैन से सो पाए हैं या नहीं....

अब रहस्य की परतें खोल ही देते हैं और राज़ खुलते ही आप में से ज़्यादातर मुझ से सहमत होंगे। मई 1985 में सड़कों पर एक शाहकार उतरा था, शाहकार ऐसा जो 11 साल तक नौजवानों के दिलों की धड़कन बना रहा। चेरी लाल रंग के आउटफिट्स में क्या कमाल लगती थी, और आज तक लगती है....यामाहा RX100.....याद है न....देखा कानों में गूंज उठी न आवाज़....भीग गए न यादों के समंदर की लहरों में.....

पहली बार RX100 को एक दोस्त के चाचा के हाथ में देखा था....तब केवल 10 साल का था....उसके पहले इसे तमाम हिट फिल्मों में देख चुका था और पापा के विजय सुपर पर बैठ कर जो आवाज़ मुंह से पैदा की जाती थी वो दरअसल RX100 से ही प्रेरित थी और टेलीविज़न पर देखी जाने वाली फिल्मों में इस शानदार बाइक से सुनकर मुंह से निकाली जाती थी....लगता था कि कब बड़े होंगे और हाथ में लाल या काली ये सुंदरी होगी....

पहली बार RX100 पर बैठने का सौभाग्य मिला पड़ोस में रहने वाले एक भैया के साथ, वो एक दिन किसी दोस्त की बाइक लेकर आए और हम मोती नगर से चारबाग तक उनके पीचे बैठकर गए...उम्र थी कोई 12 साल की...रास्ते भर बाइक के साथ आवाज़ निकालते रहे....खैर सपना अभी भी अदूरा था खुद इसे चलाने का....आश्चर्य भी होता था कि क्यों आखिर एक दोस्त के बड़े भाई का अपने पिता से इसी बाइक को लेने को लेकर झगड़ा होता था जबकि वो उनको इससे भी महंगी राजदूत दिलाना चाहते थे....पर शायद हर रहस्य के खुलने की एक उम्र होती थी उस वक्त....आज की तरह नहीं कि उम्र से पहले ही सारे राज़ खुल जाते हो....सही भी थी किसी बात को न जानने पर एक रोमांच सा बना रहता था....सो उम्र के साथ साथ राज़ खुलने लगे....

और बड़े हुए तो सीएमएस राजेंद्र नगर में दसवीं में पढ़ते वक्त हालांकि सड़कों पर चारों ओर हीरो होंडा सीडी 100 चलती दिखाई पड़ती थी.... लेकिन स्कूल से लौटते वक्त जब लड़कियों के महाविद्यालय नवयुग कन्या विद्यालय के सामने से गुज़रना होता....तो मोहल्ले से लेकर शहर तक के तमाम शोहदे (जिनमें से कुछ मोहल्ले के भैया भी थे) वहां इकट्ठे होते.....और वहां कावासाकी...सुजुकी और हीरो होंडा नहीं बल्कि RX100 दिखाई देतीं....शान से अकड़ती हुई....कभी दोस्तों से उधार ली गई....एकसीलेरेटर बेदर्दी से उमेठ दिया जाता था....गर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्रर्रर्र....और जिसके लिए उमेठा गया होता वो कनखियों से देख मुस्कुराती हुई चली जाती.....जो रिक्शों से जाती बाइक 10 की स्पीड में रखकर उनके साथ या पीछे चला जाता....और कुछ थोड़ा आगे जाकर इंतज़ार करती थी कि जनाब आएं और मोहतरमा को बाइक पर बिठाकर घर के उतना ही पहले छोड़ दें जितना कॉलेज के आगे से उनको पिक किया था....इस दृश्य को लगभग हर रोज़ देखने की आदत पड़ गई थी....और धीरे धीरे RX100 का एक जुनून समझ में भी आने लगा था.....पर और कई बाकी थे....जैसे और बड़ा होना भी बाकी था....

खैर हाईस्कूल के बाद बारहवीं भी पास कर ली....दुनिया के कई गुप्त ज्ञान अब ज्ञात थे...हालांकि तथ्य उतने पक्के नहीं थे पर हां इतने समझदार हो गए थे....कि लड़कियों को देखकर दिल में फिल्मी गाने और सफेद कपड़ों में नाचती माधुरी ज़रूर उतर आती थी....शाहरुख की तरह अक्सर अकेले में दोनो हाथ फैलाने में अनोखा सा अहसास होता था....ये वो दौर था जब RX100 आनी बंद हो चुकी थी....पर हां जितनी भी शहर में अभी बची थी उनका जादू बरकरार था....सपना अब भी जस का तस था कि जब जेब में अपनी कमाई आएगी तब भले ही सेकेंड हैंड खरीदें लेकिन RX100 ज़रूर घर आएगी....और हां पड़ोस की...स्कूल की कई लड़कियों को अपने पीछे बैठे भी कई बार सपनों में ज़रूर देखा...बैकग्राउंड साउंड में कोई फिल्मी गाना होता था....पर साथ में एक और मधुर आवाज़.....गर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र....गर्रर्रर्रर्रर्रर्र.....गर्रर्रर्रर्र.....

खैर अभी तो इसी आवाज़ को याद करिए...यादों की लहरें लगातार आ रही हैं....पर उनसे तार्रुफ़ कल कराऊंगा....अभी बहुत रात बीत चुकी है....सोना ही पड़ेगा....RX100....महबूबा आज सपनें में आएगी....पर पिक्चर (पोस्ट) अभी बाकी है मेरे दोस्त....मोहब्बत की कहानी के कई रंग बाकी हैं....और अभी तो मिलन भी बाकी है....कल बात करेंगे पहले मिलन की.....
तब तक गर्रर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्र......

मंगलवार, 1 जून 2010

मूर्ति ध्वंस.....(लघु कविता...क्षणिका...)

शब्द..
भाव.....
मात्रा......
छंद..........
कविता.........
जहां से नहीं थी
आशा
वहीं से देखो
फूट रहे हैं
क्रोध...
शोभ...
द्रोह......
विद्रोह....
ध्वंस हुई हैं
सदियों से पूजित
मूर्तियां
देखो युग के
प्रतिमान
टूट रहे हैं

(ये कविता बरखा दत्त और वीर सांघवी जैसे तमाम प्रतिमानों को समर्पित है....और इस युग को भी जिसे मैं प्रतिमानों के ध्वंस का युग मानता हूं...कभी इस विषय पर भी एक पोस्ट....पर फिर कभी....)

बुधवार, 26 मई 2010

ब्लॉगर बैठक पर शंका निवारण...जवाब...एजेंडा....और अनुरोध...



(सबसे पहले अपने एक बेहद लाडले साथी को स्पष्ट कर दूं कि ये पोस्ट किसी सफाई के तौर पर नहीं लिख रहा हूं, इसका कल ही वादा किया था....वो निभा रहा हूं....)

हां तो कल हम पहुंचे थे स्वल्पाहार के डिब्बों तक....तो आगे चलते हैं....मेरे बगल में एक तरफ थे इरफ़ान भाई और एक ओर थे खुशदीप जी....ऐसा इसलिए था कि मैं पहले ही बस और रेल के अंदाज़ में उन दोनो के बीच की कुर्सी पर अपना पिट्ठू बैग रख कर सीट घेर चुका था.....वैसे भी खुशदीप जी और इरफान भाई तो नोएडा से साथ ही आए थे....कहीं आपस ही में न बतियाते रहें तो बीच में हड्डी ज़रूरी थी....हां तो इरफान भाई, खुशदीप जी के साथ आते आते ही शीतल पेय गटक चुके थे पर स्वल्पाहार का डिब्बा जब खुला तो उनका मुंह खुला रह गया...बोले "अरे मयंक जी इतना सारा कैसे खाया जाएगा, मैं तो घर से भी खाना खा के निकला हूं, इसमें से आप भी ले लीजिए कुछ...." इस कथन के साथ ही भाई ने अपने डिब्बे से समोसा निकाल कर हमारे डिब्बे में बिठा दिया.....हम तो घर से सुबह चले थे....और कुंवारे हैं तो बिना खाए ही चले थे....सो एक बार भी मना नहीं किया....ज़ाहिर है पापी पेट का सवाल था....इसके बाद शुरु हुआ तस्वीरें लेने का दौर और हमेशा की तरह कैमरे तब ज़्यादा चमके जब खाना खाया जा रहा था....तस्वीरें आपने देखी ही हैं....पर इसके बाद शुरु हुआ असली दौर....
अगले दौर को असली दौर क्यों कह रहा हूं ये जानना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अब तक इस पूरे सत्र का चूंकि हम में से किसी भी ब्लॉगर ने ठीक ढंग से उल्लेख नहीं किया इस वजह से फिर से इस मिलन की नीयत पर उंगलियां उठ रही हैं....ज़ाहिर है हमने वहां काम की बातें की पर ब्लॉग पर ज़लज़ला और खाने की बातें ज़्यादा....शायद वक्त की कमी की वजह से.....तो भाई लोगों सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि अगला सत्र था ब्लॉगरों...यानी कि हिंदी चिट्ठाकारों के संगठन और उसके उद्देश्यों पर चर्चा का.....
हालांकि अविनाश जी के आदेश और सलाह पर संगठन के निर्माण हेतु एजेंडा मैं बनाकर लाया था पर चौखट वाले चाचा पवन चंदन जी का सुझाव था कि पहले सब अपनी अपनी सलाह रखें...परेशानियां बताएं....बात कहें....और फिर एजेंडे को पेश किया जाए....जहां जहां ज़रूरत होगी एजेंडे में संशोधन भी हो जाएगा.....सलाह बढ़िया लगी और फिर एक एक कर के सब ने अपना मत रखा....सामाजिक सेवाओं से लेकर लड़ाई तक की बात कही गई....बेनामियों और लापताओं को भाव न देने की बात हुई.....बीच बीच में हंसी मज़ाक भी होता रहा....व्यक्तिगत टीका टिप्पणी से परहेज़ की बात कही गई....हिंदी में नए ब्लॉगरों को जोड़ने की बात हुई....और इसके अलावा ये भी सवाल उठ ही गया कि वाकई एजेंडा क्या है....
इसके बाद आई बारी हमारी....एजेंडा तो तैयार ही था....भाई लोगों....(माताओं-बहनों नें भी) उसमें संशोधन और संकलन भी करवा दिए थे....तो हमने अपनी बात रखी....ये सारे ब्लॉगर्स की बात के बाद प्रस्तावित किया गया एजेंडा है....और सम्भवतः सबकी शिकायतों का निराकरण कर देगा कि ऐसी बैठकें केवल खाने और खानापूर्ति के लिए होती हैं.....तो लीजिए बिंदुवार एजेंडा.....
  1. हिंदी ब्लॉगरों का एक संगठन बने जिसमें किसी भी धर्म, जाति, लिंग, सम्प्रदाय, नागरिकता और विचारधारा का ब्लॉगर सदस्य बन सकता हो।
  2. इस संगठन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य और आवश्यक्ता यह है कि सरकार द्वारा किसी भी सम्भावित सेंसरशिप, तानाशाही और ब्लॉगरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ़ एकजुट हुआ जा सके जो भविष्य में अवश्यम्भावी है।
  3. यह संगठन हिंदी चिट्ठाकारी में साम्प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देगा और किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने वाली चिट्ठाकारी के खिलाफ़ लड़ेगा।
  4. ब्लॉगरों का संगठन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देगा और निरंतर समाज से अंधविश्वास दूर करने का काम करेगा।
  5. हिंदी चिट्ठों द्वारा कम्प्यूटर और इंटरनेट के प्रयोग के लिए हिंदी देशज भाषा और वर्तनी विकास की दिशा में काम किया जाएगा।
  6. अलग अलग भाषाओं का साहित्य ब्लॉगर आम आदमी की भाषा में अनूदित कर के उसे लोकप्रिय करेंगे ही और साथ ही भाषा को भी।
  7. अभी तक हिंदी साहित्य में उपेक्षित विषयों जैसे बाल साहित्य, वैज्ञानिक साहित्य आदि पर काम किया जाए।
  8. अधिक से अधिक संख्या में हिंदी के नए ब्लॉगरों को जोड़ा जाए।
  9. विषयों की विविधता सुनिश्चित की जाए, अधिक से अधिक और लोकोपयोगी विषयों पर ब्लॉगिंग हो।
  10. नियमित ब्लॉगरों की क्षेत्रवार और राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय बैठकें हों और छात्रों और ब्लॉगरों के लिए उपयोगी वर्कशॉप्स का आयोजन हो।
  11. स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हिंदी चिट्ठाकारी का प्रचार प्रसार हो।
  12. हिंदी से जुड़ी लोक बोलियो और लोक भाषाओं को प्रोत्साहन दिया जाए, हर ब्लॉगर अपनी लोक बोली या भाषा में भी नियमित लेखन करे।
  13. नए ब्लॉगर्स की सहायता की जाए।
  14. ब्लॉगर्स की सामाजिक, व्यक्तिगत और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  15. हिंदी चिट्ठाकारी में लगातार बढ़ रही व्यक्तिगत टीका टिप्पणी और तथाकथित कुंठित ब्लॉगिंग पर लगाम कसी जा सके।
  16. हिंदी चिट्ठाकारी को अपनी भाषा हिंदी के लिए आंदोलन के मंच के तौर पर इस्तेमाल किया जाए।
  17. ब्लॉगिंग को एक सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन के तौर पर स्थापित किया जाए, इसे लोकतंत्र का पांचवा खंभा बनाया जाए।
  18. संगठन के सदस्यों की सहायता से अपने सामाजिक दायित्वों का भी लगातार निर्वहन हो।
  19. संगठन एक त्रैमासिक (प्रारंभ में) प्रिंट पत्रिका निकाले जिसमें गत तीन माह की चुनिंदा ब्लॉग रचनाएं संकलित हों। (रचनाओं के रचनाकार का संगठन का सदस्य होना ज़रूरी नहीं है)
  20. संगठन का एक सामूहिक ब्लॉग बनाया जाए जहां न केवल फोरम्स हो बल्कि संगठन की सूचनाओं से लेकर फंड तक का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए।
हम मानते हैं कि संगठन न केवल ब्लॉगिंग को दिशा देगा बल्कि इसकी दशा भी सुधारेगा। ये संगठन है कोई गुट नहीं है....हम एक ऐसा अनोखा संगठन चाहते हैं जहां विचारधाराओं की कोई बंदिश नहीं है....सबके पास लोकतंत्र है...क्योंकि ब्लॉग लोकतंत्र का ही प्रतीक है....एक ऐसा संगठन जहां अलग अलग विचारधाराओं के वे सभी लोग एक दूसरे का हाथ थामें खड़े हों जो अंततः देश और दुनिया का भला चाहते हैं....मतभेद जहां मनभेद न बने....जहां वाकई हम एक आदर्श दुनिया का सपना देख सकें...जी सकें....जहां लिंग...भाषा....जाति...सम्प्रदाय.....विचारधारा का भेद मिट चुका हो....और वसुधैव कुटुम्कम की परिकल्पना साकार हो.....
जैसा कि कृष्ण कहते हैं गीता में 'सर्वभूतेषु हिते रतः' और करआन शरीफ़ कहती है, 'खुदा सारी खिलकत को बरकत दे....' हम कहते हैं तथास्तु...आमीन.....

संघे शक्तिः

आप में से जो भी लोग इस बारे में और सुझाव देना चाहते हैं वो टिप्पणी के तौर पर दर्ज कर सकते हैं....विरोध भी और सहमति भी.....जो साथ आना चाहते हैं वो....और जो नहीं आना चाहते वो भी अपने कारण ज़रूर दें...अपनी राय ज़रूर दे....आप ई मेल भी कर सकते हैं....
mailmayanksaxena@gmail.com

ये कुछ लोगों को मेरा जवाब भी था....और सवाल भी.....कि आखिर क्या गलत था इसमें....और क्या वाकई ये बैठक दिशाहीन थी.....

आज मामला सीरियस हो गया कल इस बैठक की कुछ मज़ाकिया बातें.....और हां साथियों गलती हमारी है कि हमने बैठक के असल मुद्दों से ज़्यादा गौण मुद्दों पर पोस्ट लिखी.....हमारा ध्यान भले ही बैठक पर था पर अगर पोस्ट में असल मु्द्दों के ज़िक्र पर खाने का वर्णन और आपस की गुफ्तगू हावी हो गई...तो संदेश तो गलत जाना ही था न.....खैर गलती मेरी भी है...मैंने भी पोस्ट देर में डाली....और खाने का ज़िक्र मैंने भी किया.....सबसे क्षमा प्रार्थना के साथ अनुरोध कि हम से कभी भी ये संदेश न जाए कि ब्लॉगरों को बैठक के उद्देश्य से ज़्यादा पोस्टों पर टिप्पणियों की चिंता है.....यकीन मानें मेरी सर्वश्रेष्ठ रचना पर आजतक कोई टिप्पणी नहीं है....पॉपुलिस्ट पोस्टों का मोह कभी कभार छोड़ना चाहिए......

बाकी एजेंडा सबके सामने है और बैठक की दिशा और नतीजे भी.....

फिर मिलेंगे....

मंगलवार, 25 मई 2010

जब वी मेट....शायद सबसे लेटलतीफ रिपोर्ट...और लम्बी भी....

जब से अविनाश जी ने बताया था कि रविवार को सब मिल रहे हैं...सब से मतलब अपने उस परिवार से था जो पूरे देश में फैला है...ब्लॉगरों का परिवार...या कहें तो चिट्ठाजगत, तब से ही दिमाग में खलबली मत गई थी, ऐसे में अविनाश जी ने जब खुला सार्वजनिक आमंत्रण नुक्कड़ पर प्रकाशित किया तो रहा नहीं गया। लगा कि अपना बी कुछ योगदान हो तो आनन फानन में एक आमंत्रण पत्र फोटोशॉप में डिज़ाइन कर के अविनाश जी को मेल कर मारा पर जल्दबाज़ी में तारीख गलत छप गई...और फिर उस पर भी खूब मज़े ले लिए गए, और वो भी मेरे नहीं वाचस्पति जी के....तो वाचस्पति जी से क्षमायाचना...खैर 22 की रात को सबसे तेज़ टीवी चैनल की सबसे ज़मीनी पर वरिष्ठ एंकर के बेटे के जन्मदिन की दावत में इतनी देर लगा दी गई कि घर लौटना हुआ सुबह के तीन बजे, ज़ाहिर है सोते सोते बज गया चार....और फिर शुरु हुए ब्लॉगर मिलन के सपने....
फिर अचानक सपने में ही एक गहरा काला सा साया दिखाई दिया, जिसका चेहरा तो नहीं दिखा पर सारे ब्लॉगरचिल्ला रहे थे "भागो-भागो बेनामी है....बेनामी का शोर मचा ही ता कि दूसरी ओर शोर उठा और कुर्सियां हवा में उड़ने लगीं, छत कांपने लगीं और कान में अविनाश जी की आवाज़ आई कि मयंक जी ज़लज़ला आ गया है..." और इसी सपने से डर कर जैसे ही आंख खोली तो देखा कि मोबाइल पर अविनाश जी का नम्बर फ्लैश हो रहा है। फोन उठाया तो अविनाश जी का सुपरिचित अंदाज़ और प्यारा सा प्रश्न कि कितने बजे तक पहुंच रहे हैं, कहां से चलेंगे और कैसे जाएंगे....उसके बाद पता चला कि ललित जी भी साथ हैं और ललित जी से बी ऐसे दुआ सलाम हुई जैसे पता नहीं कितने सालों से जान पहचान हो हमारी....
इसके बाद समझ में आया कि भैया बड़ी देर हो चुकी है, और फौरन तैयार होना शुरु किया गया...जल्दबाज़ी में एक चारलाईना पोस्ट डाली कि ब्लॉर सम्मेलन पलक पांवड़े बिछाए सबका स्वागत कर रहा है....और घर से निकल पड़ा गया। इस वक्त दोपहर के सवा एक बज चुके थे गले में अंगोछा डाला और बाइक को किक कर के निकल पड़ानोएडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन की ओर...सिटी सेंटर पहुंचकर गाड़ी को पार्किंग में लगाकर स्टेशन पर पहुंचा और जेब में से मेट्रो के उस रूटमैप का प्रिंटआउट निकाला जो घर से लेकर चला था.....और खोला तो वो कह रहा था कि भई नोएडा से पहुंचे कीर्ती नगर और फिर वहां से बदलें नांगलोई के लिए मेट्रो...और फिर उतर जाएं जाट धर्मशाला के लिए....तो फिर ले लिया गया नांगलोई रेलवे स्टेशन तक का एक टोकन....और चढ़ गए लाला मेट्रो में।सफ़र जितना सोचा था उतना भी आसान नहीं था, पत्रिका पढ़ते हुए जब कीर्ति नगर पहुंचे तो पता चला कि अभी वहां से नांगलोई की लाइन शुरु ही नहीं हुई है....अब तक पौने तीन बज चुके थे और दो बार अविनाश वाचस्पति जी का फोन आ चुका था....मन में एक शर्मिंदगी की बताइए पहली बार में ही फ़जीहत करवा ली, बड़े बड़े वादे किए थे अविनाश जी से और वक्त पर पहुंच ही नहीं पाएंगे....खैर अविनाश जी को फोन पर ही बताया कि अब आगे का सफ़र ऑटो से ही तय करना पड़ेगा और फिर कर लिया गया एक ऑटो...
ऑटो वाले चचा बड़े सज्जन आदमी निकले, प्रतापगढ़ के रहने वाले और जब उन्होंने अपने जैसी बोली सुनी तो अवधी में ही बतियाते रहे और सफ़र कट गया....और हम उतर पड़े जाकर छोटूमल जाट धर्मशाला के सामने....ऑटो से बाहर उतरे तो चौखट पर ही पवन जी मिल गए.....और अपने चिर परिचित अंदाज़ में चुटकियां लेते हुए उन्होंने स्वागत किया....इसके साथ ही मिले विनोद जी और वर्मा जी....मिलते ही लगा कि ठेठ बनारसी लोगों से गले मिल रहा हूं...खैर सफ़र में बहुत थक चुका था और जैसे ही अविनाश जी ने कहा कि शीतल पेय ले लूं तो शीतल पेय न पीने की आदत के बावजूद दो गिलास पी गया...और माणिक को खूब आशीर्वाद दिया...अब तक हम चौखट पार कर के नुक्कड़ तक आ चुके थे और सामने ही सामना हो गया बड़ी बड़ी सीधी खड़ी मूंछों से जो हमें देख कर मुस्कुरा रही थी...जी हां वो एक ही बार में पहचान लिए गए अपने भाईललित शर्मा जी, उसके बाद बगल में ही बैठी संगीता पुरी जी को जब हमने अपना परिचय दिया तो वो बी तुरंत ही पहचान गई...और बोली अच्छा आप ही मयंक सक्सेना हैं दरअसल संगीता जी से मेरा परिचय एक बार आपसी नोंक झोंक से हुआ था...और उनकी मेल मैंने आज भी सहेज कर रखी है। तब तक अंदर आ गए थे मेरे पसंदीदा ब्लॉगर....जो फौजी कैप लगाए एक और यात्रा को तैयार दिख रहे थे...अपने मुसाफ़िर जाट नीरज भाई, उनके साथ थे अंतर सोहिल.....नीरज भाई से मिला...हस्तिनापुर जाने की योजना भी बना डाली और उसके बाद काफी देर तक रतन सिंह शेखावत जी से ब्लॉगिंग की दिशा पर लम्बी चर्चा चलती रही....
अब सवाल ये ता कि अभी तक बैठक शुरु क्यों नहीं हुई थी...तो जवाब ये था कि अभी तक खुशदीप सहगल जीऔर मशहूर कार्टूनिस्ट इरफ़ान भाई नहीं पहुंचे थे....और फिर दोनो भी आ ही गए और विधिवत एक गोलाकार समूह में बैठकर शुरु हो गई बैठक....सबसे पहले अविनाश वाचस्पति जी जो कि इस बैठक के सूत्रधार थे उन्होंने अपनी बात सबके बीच रखी जो कि आप सब चौखट पर पढ़ चुके हैं....और इसके बाद जब तक तालियों की गूंज थमती तब तक आ चुके थे गर्मागर्म स्वल्पाहार (जो कि कहीं से भी अल्प नहीं था) के डिब्बे...और तय हुआ कि इन्हें निपटाने के बाद ही आगे की बैठक जारी की जाएगी....तो फिलहाल हम भी रोक रहे हैं कलम को ब्रेक के लिए आप तब तक स्वल्पाहार को निहारिए....और साथ में उस मेट्रो मैप को भी जिसने हमारी ऐसी तैसी कर डाली.....









(शेष कल....कल की किस्त में वो एजेंडा जो मैंने बैठक में पेश किया...और भी बहुत कुछ मज़ेदार बाते....)

शनिवार, 22 मई 2010

3 बजे याद है न....


अविनाश जी के साथ मैं खड़ा हूं आपके इंतज़ार में....

तो मिलते हैं सही वक्त पर...

सही जगह...

सही इरादों को....

सही अंजाम पर पहुंचाने....

जाट धर्मशाला

नांगलोई....

बस कुछ ही घंटों बाद....

शुक्रवार, 21 मई 2010

प्रताप सोमवंशी...एक पत्रकार की कविकारिता...


किसी के खास आग्रह पर एक लम्बी कविता पर काम कर रहा हूं....विषय भी एक आध दिन में कविता के साथ पढ़वा दूंगा....तो फिलहाल पढ़ें प्रसिद्ध पत्रकार प्रताप सोमवंशी की कुछ कविताएं...मुझे हमेशा लगता है कि प्रताप मीडिया में चंद अच्छा लिखने वालों में से एक हैं...और ये कविताएं बताती हैं कि ऐसा क्यों है....क्यों हर अच्छा लेखक मूलतः एक कवि होता है....                                                                                                                                                           

उसने मिट्टी को छुआ भर था....                                                                                                                                  

उसने मिट्टी को छुआ भर था

धरती ने उसे सीने से लगा लिया

उसने पौधे लगाए

ख़ुश्बू उसकी बातों से आने लगी

पेड़ समझने लगे उसकी भाषा

फल ख़ुद-ब-ख़ुद

उसके पास आने लगे

पक्षी और पशु तो

सगे-सहोदर से बढ़कर हो गए

जो मुश्किल भाँपते ही नहीं

उन्हें दूर करने की राह भी सुझाते हैं



मैने पूछा भाई प्रेम सिंह !

क्या कुछ खास हो रहा है इन दिनों

खिलखिला पड़े वो

कहने लगे-

लोग जिस स्वर्ग की तलाश में हैं

मैं वही बनाने में जुटा हूँ


कितना प्रतिभाशाली है.

कितना प्रतिभाशाली है
काम नहीं है खाली है


केवल फल से मतलब है
कैसे कह दूं माली है


थोड़ा और दहेज जुटा
बिटिया तेरी काली है


इनके हिस्से सारे सुख
उनके हिस्से गाली है


सपनों की दुकानें हैं
भाषण है और ताली है


प्रताप सोमवंशी

(प्रताप सोमवंशी वरिष्ठ पत्रकार हैं....पर उनकी कविताएं बोलती हैं कि दिल से एक मासूम और संवेदनशील कवि हैं। प्रताप ने  दक्षिण एशियाई मीडिया फेलोशिप के तहत वषॆ १९९९ में बुंदेलखंड के सिलिका खनन क्षेत्रों की महिलाओं पर अध्ययन  औरत और धरती का साझा दुख के नाम से किया। जनसत्ता, दैनिक भास्कर, वेबदुनिया डाट काम में विभिन्न पदों पर रहे। चित्रकूट पर एक वृत्त-चित्र का निर्देशन। रेडियो के लिए कई लघु नाटिकाएं लिखीं। कविताओं का कन्नड़, बांग्ला, उर्दू में अनुवाद सम्प्रति हिंदुस्तान समाचार पत्र में वरिष्ठ सम्पादकीय पद पर कार्यरत।)
 

बुधवार, 19 मई 2010

कालजयी...प्रगतिशील...साहित्कार....

हम माओवादियों को

तब मानेंगे आदिवासी

जब

खत्म हो चुका होगा

वर्ग संघर्ष

जंगलों में फैला खून

प्रतिष्ठित कर देगा

पूंजीवाद का उत्कर्ष


जब

सारी श्रमिक महिलाएं

गाभिन हो जाएंगी

मालिकों के बलात्कार से

तब

रच डालेंगे हम

आधी आबादी का

मुक्तिरण

अपनी कलम की धार से


जब शोषण की अतिरेकता से

शोषित ही

समाप्त हो जाएंगे

तब चारों ओर

हमारे गद्य काव्य

सर्वहारा को न्याय दिलाने

व्याप्त हो जाएंगे


जब नहीं होगी

हमारी किंचित भी आवश्यक्ता

बस तभी उपस्थित होंगे

हम

हर बार....

हम

कालजयी....प्रगतिशील....

साहित्यकार...


(ये कविता 18 मई 2010 को इंडिया हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर सभागार में ओम थानवी के ब्लॉगिंग को दिशाहीन और अहम से भरी बताने के बाद....और राजेंद्र यादव के इस वक्तव्य के बीच लिखी गई कि भाषा साहित्यकार की बपौती है....और आम आदमी साहित्य नहीं रच सकता....दो दिन से पसोपेश में हूं कि जो मैं लिखता हूं वह साहित्य नहीं इन दो लोगों ने ऐसा कह दिया है....साहित्य नहीं है तो ये क्या है....और साहित्य है तो क्या मैं आम आदमी नहीं रहा....बाकी CAVS संचार पर विस्तृत विचार मंथन करूंगा इस आयोजन पर...जिसका नाम था "मीडिया में खत्म होती साहित्य की जगह".....अविनाश भाई अच्छा लगता अगर वक्ताओं के नाम पट्टिकाओ पर हिंदी में छपे होते....हालांकि कार्यक्रम मैं मानता हूं सफल रहा....)

मयंक सक्सेना

9310797184


रविवार, 16 मई 2010

तीन लघु कविताएं....

ये वो तीन छोटी कविताएं हैं जो अचानक अनायास दिमाग में कभी आई और फेसबुक पर पोस्ट कर दी गई....अब ब्लॉग पर भी डाल रहा हूं....वैसे कई लोग टोकते भी रहते हैं कि थोड़ी छोटी कविताएं लिखा करो....तो ये है छोटी कविताओं की श्रृंखला में शुरुआती तीन कविताएं......

1.न दैन्यं न पलायनं
मेरे मन में
विचार हैं
तुम्हारे पास
बाहुबल
मेरी ज़ुबां पर
शब्द हैं
है तुम्हारे हाथ
संगीनें
तुम फिर भी
लड़ाई से
डर रहे हो
लड़ो मुझसे
पलायन क्यों कर रहे हो.....

2. भरोसा
रात
गहरी हो रही है....
गहरा रहा है...
भरोसा
आएगा कुछ देर में...
सवेरा...
हर रोज़ जैसा........

3. कमीना!
सच कह देता हूं...
कभी भी
सामने हो भले...
कोई भी
निडरता से...
पर उन्हें लगता है
निर्लज्जता सा...
सरलता से...
पर उन्हें
समझ आता है
कुटिल सा...
हां
कड़वा ही होता है..
और
कड़वा ही लगता है...
सच
वो सुन नहीं सकते...
पर मैं
बोलता हूं
कर चौड़ा सीना...
वो कहते हैं...
मैं हूं कमीना!

मयंक सक्सेना

बुधवार, 5 मई 2010

यकीन मानो रात हर रोज़ अलग सी होती है....

रात.... हर रोज़ आती है....
शायद सबको एक ही सी लगती है हर बार....
या ज़्यादातर
पर रात हर रोज़ अलग सी होती है....

कभी गीत सी गेय होती है...
तो कभी अनगढ़ सी गद्य कविता...
कभी छंदों में बंधी
तो किसी रोज़
वर्जनाओं के बंध तोड़ बहती सरिता...

कहीं नववधू सी
कुछ छिपती कुछ दृश्य सी
कभी सब कुछ कहती
पर अनकही...
झींगुरों के सुरों पर नाचती...
रात की नर्तकी का
जैसे हो सन्नाटा मौन प्रेमी

तपते बुखार में
सिरहाने बैठी माँ सरीखी
रात जगती है हर रोज़
जब हम सो जाते हैं....
शायद इसी लिए हर रोज़
रात का नयापन देख नहीं पाते हैं....
पर यकीन मानो
रात हर रोज़ अलग सी होती है....

मयंक सक्सेना

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी