सोमवार, 16 अगस्त 2010

आज़ादी....

(सोचा था कि पीपली लाइव पर लिखूंगा....पर लगा कि ये पहले...कल पीपली लाइव देख कर आया हूं...और कल अब लिखूंगा फिल्म के बारे में....)

बदबूदार नालों के किनारे
पलते इंसानों के झुंड
ज़हरीले कारखानों के दरवाज़ों पर
तालों की जगह
लटके नरमुंड
अस्पतालों के आंगनों में
ज़मीन पर लेटे-अधलेटे
असहाय जिस्म
हर अल सुबह
शहर के चौराहों पर
बिकती इंसानों की किस्म
सस्ती शराब
और
उससे भी सस्ती जान
शहरों में मरता मजदूर
या
गांवों में किसान
बुर्जुआ के खातों में
गिरवी सरकारें
हर रोज़ उठती...
गिरती दीवारें
आज़ादी...
लफ़्ज भी घिनौना सा है...
आज़ादी
थमाया गया एक खिलौना सा है...
आज़ादी
के गीत गाओ
आज़ादी
का जश्न मनाओ
आज़ादी
बस सोचते रहो
आज़ाद हो
बस सोचने को...
आज़ादी
बस मानो कि हो आज़ाद
आज़ाद हो मानने को
खुशकिस्मत हो
कि नहीं घुसा
अब तक तुम्हारे सीने में
इस आज़ादी का
कोई खंज़र
आज़ादी जो दी गई है
भेड़ियों को
कर रही है खौफ़ज़दा
हर मंज़र
मनाओ आज़ादी का जश्न
कि ज़िंदा हो इस साल भी
मनाओ
अपने भगवान, अल्लाह, गॉड से
कि बचे रहो अगले साल भी
और बचे रहो...
इतना ही काफी है
क्योंकि आज़ादी मांगने की
सज़ा है मौत...
नहीं कोई माफी है...
................................................................

1 टिप्पणी:

  1. कुछ लोगों को है कुछ भी कर सकने की आज़ादी ...
    कुछ लोग तो मांग भी नहीं सकते आजादी ...!

    उत्तर देंहटाएं

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी