शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

यशवंत की गलती है लेकिन संपादक जी आपकी मंशा क्या है?



यशवंत सिंह मामले में तीन पक्ष हैं, तीन में से सबसे पहला पक्ष है उनका जो ये मानते हैं कि यशवंत ने जो कुछ किया गलत किया लेकिन उसके बदले में जो कुछ किया वो गलत ही नहीं बल्कि आपराधिक होने की अतिरेकता है। दूसरा पक्ष है जो ये मानता है कि यशवंत ने कुछ गलत किया ही नहीं और तीसरा पक्ष है जो ये मानता है कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि क्या अनैतिक और गलत हुआ, यशवंत के साथ ऐसा ही होना चाहिए। चलिए बात करते हैं इन तीन पक्षों की और यशवंत की, जिन्हें इन तीनों ही बातों से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता।
सबसे पहले बात कि यशवंत का कृत्य किस श्रेणी में आता है, तो ये डॉ नूतन ठाकुर के लेख में साफ है कि यशवंत नशे में एक अलग शख्स है, जो बिल्कुल सोचना नहीं चाहता...बिल्कुल उत्श्रृंखल और दरअसल इसी पर लगाम लगाने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। लेकिन क्या यशवंत ने जो एसएमएस और फोन कॉल्स देर रात एक आदरणीय महामाननीय और देश के सबसे सरोकारी सम्पादक को किए वो ठीक थे। साफ कहना चाहूंगा कि किसी को भी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ फोन करना और एसएमएस करना सौ फीसदी गलत है, और किसी को इरादतन नशे में या होश में परेशान करना और भी ज़्यादा गलत है। यशवंत सिंह ने निस्संदेह कोई अश्लील एसएमएस नहीं किया पर अगर किया और जो साफ है तो ये सौ फीसदी गलत था। न केवल देर रात किसी की पत्नी को फोन करना गलत है बल्कि उस पर अकड़ते हुए एसएमएस करना और भी अनैतिक। लेकिन सवाल ये है कि यशवंत सिंह ने जो पैसे मांगे वो क्यों मांगे...एसएमएस का मजमून साफ कर रहा है कि ये एक शरारत थी। लेकिन हां किसी के भी जीवन में खलल डालने का हक किसी को नहीं, इसलिए यशवंत की ये गलती ज़रूर है  पर दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया के तरीके से उसकी मंशा पर सवाल उठने लाजिमी हैं।
लेकिन दरअसल इसकी प्रतिक्रिया में जो हुआ, वो ठीक है? दरअसल इस वक्त ज़्यादा मौजू सवाल यही है, क्योंकि इस घटना की परिघटना के तौर पर प्रबुद्ध और प्रतापी एलियन छाप सम्पादक जी की जो प्रतिक्रिया सामने आई वो अतिरेक का दूसरा नाम थी। आप में से कितने लोग ये मान सकते हैं कि लाख बुराईयां होने के बाद क्या यशवंत इतने मूर्ख हैं कि वो एक चैनल के सम्पादक(जिसके तमाम राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक-असामाजिक संबंध हों) को बीच सड़क मोटरसाइकिल से उसकी कार रोक कर, उस से रंगदारी वसूलने की मांग दिन दहाड़े करेंगे। ज़ाहिर है कि एफआईआर फ़र्ज़ी है, जिसे सम्पादक जी ने एक इंटरव्यू में स्वीकारा भी था। क्या यशवंत सिंह पर जो धाराएं लगा दी गईं, वो फ़र्ज़ी नहीं है? क्या जिस तरह ये गिरफ्तारी हुई वो ठीक है? दरअसल पुलिस के जिस आपराधिक तरीके से फर्ज़ी एफआईआर दर्ज करने से लेकर फर्ज़ी एनकाउंटर तक जाने के तरीकों का तमाम पत्रकार चैनलों और अखबारों में विरोध करते रहे हैं, ये सम्पादक जी उसी तरीके से अपनी दुश्मनी निकाल रहे हैं।
अब खैर आगे की बात मैं अपने आप को उस श्रेणी में रखता हूं जो ये मानती है कि यशवंत ने निस्संदेह वो एसएमएस कर के गलत किया लेकिन जो प्रतिक्रिया में किया गया, वो अतिरंजित था और आपराधिक भी। खैर आगे की ओर आते हैं, बात करते हैं मामले के तार्किक पहलू की, दरअसल यशवंत के खिलाफ जिस तरह के केस दर्ज करवाए गए, उसको लेकर किसी को भी शक नहीं है कि वो मामले प्रथम दृष्टया फ़र्ज़ी हैं और साथ ही जिस तरह यशवंत की गिरफ्तारी हुई वो और चौंकाने वाला मामला है। ज़ाहिर है कि इसका जवाब ज़िले के कप्तान साहब के पास होगा और निकट भविष्य में उनको वो जवाब देना भी पड़ेगा। क्या अगर कोई शख्स आपको लम्बे समय से परेशान कर रहा है तो एक टीवी चैनल के सम्पादक के नाते आपके लिए उसको समझाना या पुलिस के पास जाना भी कोई मुश्किल काम था और सबसे बड़ी बात क्या जब आप पुलिस की मदद लेंगे तो असल शिकायत की जगह गलत और बेहद संगीन धाराएं लगवाएंगे? तो फिर आप कैसे अपनी मंशा को दुनिया के सामने रखेंगे, वो तो इन फर्ज़ी धाराओं से ही जगज़ाहिर हो जाएगी।
मामला एक और तरह से समझिए कि दरअसल ये पूरा तौर तरीका यशवंत सिंह की गलती को तो सामने लेकर आता ही है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा इन माननीय सम्पादक जी की प्रवृत्ति को सामने लेकर आता है। पता नहीं आप क्या मानते हैं लेकिन किसी के भी खिलाफ गलत एफआईआर दर्ज कराने और झूठे आरोप लगा कर उसका नुकसान करने की कोशिश को भारतीय संविधान और कानून संज्ञेय अपराध मानता है, एसएमएस भेजने और फोन कर के परेशान करने से ज़्यादा संज्ञेय। भारतीय दंड विधान यानी कि IPC के तहत धारा 211 और 182 के तहत इस तरह की झूठी एफआईआर कराने वाले के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। यही नहीं इसमें दोष सिद्ध होने पर 6 महीने से 7 साल और कुछ मामलों में आजीवन कारावास भी हो सकता है। ज़ाहिर है एफआईआर करवाने वाले की प्रवृत्ति और नीयत आपराधिक है और अगर नहीं है तो अभी भी वक्त है, गलती का अहसास कर के बेवजह की गई शिकायतें वापस ली जा सकती हैं। हालांकि कप्तान साहब के लिए ये कितना बुरा होगा, वो खुद महसूस कर पाएंगे कुछ दिनों में, उन्होंने वर्दी पहन के कानून तोड़ने में मदद जो की है।
साफ है कि यशवंत की गलती ज़रूर है लेकिन फर्ज़ी केस करने के बाद ज़्यादा बड़ी गलती सम्पादक महोदय और उनको सहयोग करने वाले पुलिस वालों की है। मज़े की बात ये है कि ये ही सम्पादक अपने चैनलों पर किसी भी तरह के फ़र्ज़ी केस और एनकाउंटर पर दोषियों को सज़ा की मांग करते हैं। अब जब सम्पादक ही ऐसे करे, तो क्या उसे आपराधिक प्रवृत्ति का न माना जाए? यहां पर ये ध्यान में रखना होगा कि यशवंत सिंह ने शराब के नशे में जो कुछ किया वो निंदनीय है और आप चाहें तो उसे क्षमा न करें पर क्या किसी की गाड़ी में खरोंच मार देने पर कत्ल की धारा लगा कर फांसी दी जा सकती है? बड़ा अहम सवाल ये है कि अगर रसूखदार लोग अपने सामर्थ्य और पहुंच के हिसाब से कानून का दुरुपयोग करते रहेंगे तो कैसी दुनिया बनेगी ये?
यहां पर एक सवाल आता है उन सारे लोगों के लिए जो ये मानते हैं कि यशवंत के साथ जो किया गया अच्छा किया गया, आप सब ज़रा खुले दिमाग से सोच कर बताएं कि क्या अगर आपके साथ ऐसा ही कोई करे तो वो अच्छा होगा। क्योंकि सब कुछ व्यक्तिगत झगड़े में किया गया, तो आप सबका भी किसी न किसी के साथ निजी झगड़ा होगा ही, ऐसे में अगर कोई आप पर हत्या के प्रयास, अपहरण-रंगदारी की कोशिश के आरोप लगा के फर्ज़ी एफआईआर करवा दे तो क्या आप इसे सही कहेंगे। यहां ये ज़िक्र करना ज़रूरी है कि ऐसा समर्थन करने वाले ज़्यादातर लोग किसी न किसी तरीके से यशवंत से चिढ़ते हैं या भड़ास से डरते हैं। क्यों डरते हैं ये बताना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है...लेकिन यशवंत से कितना भी असहमत होने के बावजूद कैसे आप किसी के ऊपर लगे गलत आरोपों के आधार पर फर्ज़ी केस बनाने का समर्थन कर सकते हैं?
लेकिन एक तीसरा पक्ष भी है और ये वो लोग हैं जो बजाय यशवंत के रवैये को लेकर संजीदा होने और सोचने के, बार बार उनका अंधा पक्ष ले रहे हैं। हमें ये मानना पड़ेगा कि नशा करना गलत नहीं लेकिन उसके नशे में लोगों की ज़िंदगी में खलल डालना गलत है। वादी सम्पादक जी कैसे भी व्यक्ति हैं, उनकी मर्ज़ी के बिना उनको एसएमएस या फोन कॉल नीति के विरुद्ध है। इसलिए हम सब मिल कर ये कोशिश करें कि यशवंत जब लौटें, तो अपनी इस समस्या से निजात पाएं।
यशवंत सिंह को लेकर शायद अब तक का सबसे संजीदा लेख रहा नूतन ठाकुर का, जिसमें न केवल एक भाई के तौर पर यशवंत को शराब के नशे में बेसुध होने की हद तक डूब जाने की डांट भी मिली तो यशवंत नाम के सिक्के के दो पहलुओं पर बात भी हुई। जो मैंने लिखा हो सकता है कुछ लोगों को ये कुछ जगह यशवंत के खिलाफ भी लगे। लेकिन जो लगता है उसे ही कहना सबसे महत्वपूर्ण है। हालांकि हां लेख खत्म करते वक्त माननीय सम्पादक जी के लिए एक सवाल छोड़ जाता हूं, कि क्यों न आपके खिलाफ फर्ज़ी एफआईआर और केस के लिए 182 और 211 के तहत मामला दर्ज हो, और साथ ही आपके टीवी चैनल के कार्यक्रमों के द्वारा ब्रॉडकास्ट नियमों के उल्लंघन का मामला जिसमें अंधविश्वास फैलाना, किसी की छवि खराब करना और लोगों को डरा के माहौल बिगाड़ने की कोशिश (तमाम भूत प्रेत, नाग नागिन मार्का कार्यक्रम जो कभी उस चैनल ने चलाए, 2012 में दुनिया का खत्म होना और एक सम्प्रदाय के धर्मगुरु को आतंकी दिखा देना...जिसके पीछे इन्हीं सम्पादक जी की ज़िम्मेदारी क्यों न मानी जाए) के लिए 295 ए जैसी धाराओं में मामला दर्ज करवा दिया जाए। क्या कहते हैं सम्पादक जी, यशवंत ने जो किया वो छोटा अपराध था तो आपने इतना कुछ कर दिया, आप पर तो सारी सच्ची धाराएं लगेंगी, क्या कहते हैं...क्या विचार है? सोचिएगा और समझिएगा कि रसूख आज है, कल नहीं रहेगा, समझ और संवेदनशीलता ही आगे काम आएगी...लोक व्यवहार काम आएगा...और हां लोगों का प्यार काम आएगा, जो आप कमा नहीं पाए...बेचारे...
मयंक

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

तुम बहुत दिनों तक बनी दीप कुटिया की...



नैतिकता के नामर्द सिपाहियों को गौर से देख लीजिए
चलती सड़क, देश के "व्यस्त शहरों" में से एक, आस पास मौजूद पढ़े लिखे ज़िम्मेदार "नौजवानों की फौज" और फ़िर भी नोच फेंके गए उसके शर्म, लज्जा और लिहाज के गहने. वही गहने जो उसकी माँ ने पैदा होते ही तन पर पहले कपडे के साथ उसे पहना दिए. और आज उसके कपड़ों और गहनों के साथ-साथ उतर गया उसकी आँखों पर पड़ा वो चश्मा जिससे वो देखती थी हर पुरुष को अपने रक्षक के रूप में. वो चीख रही थी कि "मेरी इज्ज़त ख़राब मत करो, तुम्हारे घर में भी बहन है" लेकिन उसके वो "ज़िम्मेदार रक्षक" बन गए थे “नैतिकता के कर्णधार”, जो उसे सज़ा दे रहे थे उसके "अनैतिक कर्मों" की.

चिंता मत कीजिये मैं आपको नहीं याद दिलाउंगी वो सारी ऐसी घटनाएं जो इस वाकये से पहले भी न जाने कितनी बार दोहराई जा चुकी हैं, क्यूंकि जब आप वो सब भूल ही चुके हैं तो ये घटना भी आपके मस्तिष्क में ज्यादा दिन के लिए नहीं टिकने वाली. बदलते समाचार चैनलों की रफ़्तार टिकी हुई थी के कौन सा चैनल दिखा रहा था वो विडियो. अजी ग़लत मत समझिएगा दरअसल हम तो जानने की कोशिश कर रहे हैं के असल में हुआ क्या था, क्यूंकि बिना सब कुछ जाने हम कैसे कह दें के उन "नैतिकता के कर्णधारों" ने कुछ ग़लत किया. हो सकता है गलती उस लड़की की रही हो.
अरे माना के भारतीय समाज पुरुष-प्रधान समाज है लेकिन उसका भी तो ठोस कारण है, अब आप भी जानते ही हैं के पुरुष ज्यादा मज़बूत होते हैं, वही तो हैं जो इन अबलाओं की, कभी भाई, कभी पिता, कभी पुत्र और परिवार के मुखिया के तौर पर, रक्षा करता है. ये तो इन औरतों की आदत है, कुछ ज़रा सी बात हुई नहीं के रोना, चीखना, चिल्लाना शुरू. ये तो, ये भी नहीं समझती कि इनके हाथ में परिवार की इज्ज़त है, इनका बस चले तो सारे खानदान की नाक कटवा कर रखे दें. अब आप ही बताइए ऐसी औरतों के हाथों में सारे निर्णय छोड़ हम क्या घर संभालना शुरू कर दें?? अजी पूरी सृष्टि उथल-पुथल हो जाएगी!!

वैसे आपमें से कई लोगों ने उस पूरे हादसे की विडियो फुटेज न जाने कितनी मर्तबा देखी होगी, क्या एक पल को भी आपको ये ख्याल आया, के क्या होता अगर उस लड़की की जगह आपकी अपनी बहन, बेटी, पत्नी या घर की कोई भी स्त्री होती? क्या तब भी आप सिर्फ उस विडियो फुटेज को बार बार रिफ्रेश करके देखते? अरे कोई बात नहीं, मैं जानती हूँ के आपके पास मेरे इस सवाल का जवाब है ही नहीं, क्यूंकि दुर्भाग्यवश अगर वो आपके घर की कोई महिला होती तो इस समय आप इस लेख को पढने की हालत में ही न होते, और अब जब आप पढ़ ही रहे हैं तो दिमाग के किसी कोने में यही रट रहे होंगे कि क्या ज़रूरत थी उस लड़की को किसी पब में जाने की और वो भी देर रात, उसको तो उसके कर्मों की सज़ा मिल ही गई, हमारे घर कि औरतें तो कभी ऐसा न करें और अगर करें तो बागपत के उस गाँव की तरह हमारे घर पर भी बैठेगी एक खाप, और बन जायेंगे उनके आचरण के लिए नियम और कानून.

अगर आप ये सोच रहे हैं के मैं किस पक्ष की ओर से लिख रही हूँ तो कृपया इस लेख को यहीं पढ़ना बंद कर दें क्यूंकि अगर आप अभी तक समझ नहीं पाए तो कहीं न कहीं मुझे आपसे भी घृणा होगी. बचपन से आज तक पुरुषों के इस आचरण से मुझे घोर आपत्ति रही है, मौका मिला नहीं के किसी भी महिला की शारीरिक संरचना को भंग करने से नहीं चूकते, चाहे बात उन हाथों की हो जो बस मौका तलाशते हैं उस घृणा की भावना को प्रगाड़ करने की, या वो नज़रें जो मानो एक निगाह में ही आपका मानसिक बालात्कार कर दे. जो महिलाएं इस लेख को पढ़ रही हैं वो समझ सकती हैं के मेरा इशारा किस ओर है, और पुरुषों से बेहतर तो मेरी इस बात को कोई समझ ही नहीं सकता, आख़िरकार "मज़ा पाने" वाली तरफ तो आप या आप ही के साथी मौजूद होते है. कहने को घर के मुखिया एक महिला के बगैर अपने जीवन और परिवार की कल्पना तक न कर सकने वाले वो सब पुरुष भूल जाते हैं की चाहे वो पुरुष हो या महिला सबके जीवन का पहला पायदान एक ही था, बस एक गुणसूत्र की फेरबदल ने आपका लिंग निर्धारित कर दिया और हो गए आप "महाराजा"!!

मेरी हिम्मत नहीं हुई उस विडियो को दोबारा देखने की, क्यूंकि एक बार में उसने मुझे इस हद्द तक कचोट दिया के अगर दोबारा देख लेती तो रात के इस पहर सड़कों पर तमाम पुरुषों को गालियाँ देते हुए अकेले ही एक मोर्चे पर निकल पड़ती और यकीन मानिए अगर आप इस सोच में हैं के मेरा हश्र भी वैसा हो सकता है तो अब समय आ गया है के खुल कर दो-दो हाथ हो ही जाएँ. अभद्र भाषा और अश्लील आचरण पर अपना एक छत्र राज समझने वाले ये न भूलें के उन्हें उनके पैरों से घुटनों पर लाने के लिए मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, एक बात की जगह एक लात ही काफी होगी. लद गए शब्दों, उपदेशों, वाद-विवाद, और जिरह के दिन, बस एक बात दिमाग में बिठा लीजिये के "लातों के भूत बातों से नहीं मानते".

मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से त्रस्त ज़्यादातर महिलाएं समझौतों पर टिकी ज़िन्दगी जीती हैं, फ़िर तमाम उम्र पहले ख़ुद और बाद में अपनी बेटियों को उस आग में झोंक देती है. इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को लगभग सभी प्रमुख समाचार चैनलों ने दिखाया, मैं बस इतना जानना चाहूंगी के कब तक आपके सरोकार सिर्फ खबर को दिखाने तक सिमट कर रहेंगे? मानवाधिकार आयोग कब तक केवल चीखता चिल्लाता रहेगा? वो पुलिस जो अभी भी आँखें, कान और मूंह बंद करके बैठी है, कब भूलेगी की गाँधी जी का समय बीत चूका है? और तो और आप लोग जो शायद इस लेख को इसकी आखिरी पंक्ति तक पढ़ें, आपकी आत्मा कब जागेगी???

















इला जोशी 
(लेखिका एक मल्टीनेशनल में बिज़नेस मैनेजमेंट प्रोफेश्नल हैं और स्वतंत्र लेखन और कविता करती हैं)

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