बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मौसम के संदेश

वसंत का मौसम अब अवसान की ओर है.....कुछ दिन पहले इसकी शुरुआत पर भी मैंने एक कविता आप को पढ़वाई थी....आज फिर एक और कविता लाया हूँ......इसाक अश्क की कविता मौसम के मिजाज़ की बात करती है, जिसे शायद हम केवल महसूस कर सकते हैं पूरी तरह बयान नहीं......तो बेहतर हैं मेरे बयान पढने की जगह आप कविता ही पढ़ें,
बिना टिकट के
बिना टिकिट के
गंध लिफाफा
घर-भीतर तक डाल गया मौसम।
रंगों डूबी-दसों दिशाएँ
विजन डुलाने-लगी हवाएँ
दुनिया से बेखौफ हवा में
चुम्बन कई उछाल गया मौसम।
दिन सोने की सुघर बाँसुरी
लगी फूँकने-फूल-पाँखुरी,
प्यासे अधरों पर खुद झुककर
भरी सुराही ढाल गया मौसम।
बिना टिकिट के.....
इसाक अश्क

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

अंधेरों का सफर .....

अक्सर सफर में लंबे अंधेरे होते हैं और रौशनी दूर तक नहीं दिखती ......कई बार दर्द होता है और दवा भी ख़ुद ही को करनी होती है। कई बार अपने सवालों के लिए अपने आप से ही जवाब माँगना होता है......कई बार नाउम्मीद होने पर ख़ुद ही उम्मीद की सड़क खोजनी होती है। यह हम सबके साथ होता है और ऐसे में ही ऐसी कुछ नज्में और गज़लें निकलती हैं ....
अंधेरों का सफर .....
दीवारों से टकराता रस्ता ढूंढता हूं
अक्सर अंधेरों में घूमता हूं

दीवारों पर लिखी इबारतों का मतलब
साथ खड़े अंधेरों से पूछता हूं

टटोलता खुद के वजूद को
अपने ही ज़ेहन में मुसल्सल गूंजता हूं

बार बार लड़ अंधेरे में दीवारों से
बिखरता हूं, कई बार टूटता हूं

अकड़ता हूं, लड़ता हूं, गरजता हूं
अंधेरे में, अंधेरे को घूरता हूं

अहसास है रोशनी की कीमत का
दियों की लौ चूमता हूं

हर तीन दीवारों के साथ
खड़ा है दरवाज़ा एक
बस इसी उम्मीद के सहारे
अक्सर अंधेरों में घूमता हूं

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

आधा चांद मांगता है पूरी रात


आज आपके सामने रख रहा हूँ कवि और फिल्मकार नरेश सक्सेना की एक कविता जो ख़ास इसलिए है कि ज़िन्दगी की पूरी तासीर घोल कर सामने रख देती है। कम ही कविताओं में यह बात देखने को मिलती है तो स्वाद ले कर देखें .....

आधा चांद मांगता है पूरी रात

पूरी रात के लिए मचलता है
आधा समुद्र
आधे चांद को मिलती है पूरी रात
आधी पृथ्वी की पूरी रात
आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
पूरा सूर्य
आधे से अधिक
बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग
आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन
आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव
आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत
आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन
आधे इलाज की देते पूरी फीस
पूरी मृत्यु
पाते आधी उम्र में।

आधी उम्र, बची आधी उम्र नहीं
बीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजन
पूरा स्वाद
पूरी दवा
पूरी नींद
पूरा चैन
पूरा जीवन

पूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिए

हम नहीं समुद्र, नहीं चांद, नहीं सूर्य
हम मनुष्य, हम--
आधे चौथाई या एक बटा आठ
पूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।

नरेश सक्सेना
(कवि का ग्वालिअर में १९३९ में हुआ था, इनको १९७३ में हिन्दी साहित्य सम्मलेन पुरस्कार एवं १९९२ में फ़िल्म निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।)
(* साथ का चित्र : पिकासो की प्रसिद्द कृति फिगर्स ऑन अ बीच )

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

प्रेम, तुम और समाज का ठेका.....


आज फिर एक और बवाली दिन है तमाम उन दिनों की तरह जब हमारे मुल्क में धर्म के नौटंकी बाज सडकों पर उतर कर पुलिस का काम अपने हाथ में ले लेते हैं और पुलिस वर्दी में सिविलियन बनी रह जाती है। ये बवाली लोग दो तरह के हैं एक जो कुंठित हैं दूसरे वो जिनको किसी भी तरह प्रसिद्धि चाहिए। ये वही लोग हैं जो ज़िन्दगी भर एक चींटी भी नहीं मार पाते और ऐसे मौके पर निहत्थे लोगों को समूह बना कर पीट कर उनका अपमान कर बड़े खुश होते हैं और अपनी पुरानी कुंठाएं दूर कर लेते हैं। दरअसल सच ये है कि इस दिन के अलावा सारे दिनों में ये वही कर रहे होते हैं जो वैलेंटाइन दिवस के दिन कुछ बेवकूफ जोड़े करते हैं। मेरा मतलब यह कि बेवकूफी किसी एक दिन प्रेम को मनाना है क्यूंकि यह तो हमेशा ही है.....पर मैं इसके सख्त ख़िलाफ़ हूँ कि कोई किसी को यह सिखाये कि उसे क्या करना है वो भी वे लोग जिन्होंने ख़ुद ज़िन्दगी में कुछ नहीं किया।
कभी गौर से देखियेगा इस इस समाज सुधारक भीड़ में ज़्यादातर लोगों की शक्लें.....वे ज़्यादातर आवारा और फालतू लोगों की होती हैं, और जो इसे संस्कृति से जोड़ते है उन्हें यह जान लेना चाहिए कि बिना किसी अपराध के किसी का अपमान या शारीरिक प्रताड़ना ना तो सभ्यता है और ना ही संस्कृति। यहाँ संस्कृति के ठेकेदारों के उल्लेख करना चाहूंगा कि कुछ शताब्दियों पहले तक हमारी ही संस्कृति में यही समय बसंतोत्सव या मदनोत्सव के तौर पर मनाया जाता था, जिसे प्रेम और मदन (कामदेव) का त्यौहार माना जाता था.....यकीन नहीं हो तो थोडी और पढ़ाई करें और फिर प्रेम से ज्यादा दिक्कत हो खजुराहो के मंदिरों में आग लगा दें.....उन्हें क्यूँ कला और संस्कृति का प्रतीक मानते हैं.....खैर सच कहूँ तो नफरत है उन दोगले लोगों से है जो कल ख़ुद अपने साथ एक कन्या घुमा रहे थे पर आज उसी भीड़ में शामिल है......तो इसी पे कुछ लिख मारा .....


कल वो भी शायद वहीं मिलें....

तुम हो आज़ादी के शौकीन
रह सकते घरों में बंद नहीं
पर घर में रह जाओ आज
उनको यह पसंद नहीं

या तो हो तैयार कि
जो चाहोगे करोगे
या यह सोचो बच निकलो
जो उनसे डरोगे

हाथों में लो हाथ
निकल जाओ तुम घर से
या इक दिन छुप जाओ
घर में उनके डर से

तुम कहते हो इसे इश्क
वो कहते नंगई
तुम ठहरे सीधे सादे
वो पक्के दंगई

तुम कह दोगे दिल की
ठेकेदार समाज के चिढ़ जाएंगे
लेकर लाठी डंडा
तुमसे भिड़ जाएंगे

अगले दिन मिल लेना
वो इससे बेहतर है
प्यार कभी भी कर सकते हो
इसमें क्या चक्कर है

अगले दिन भी हो सकता है
वो मिल जाएं
साथ की सीट पर बैठे
सिनेमा हॉल में आएं

पर अगले दिन
तुमसे कुछ न कह पाएंगे
साथ में अपनी प्रेयसी
जो लेकर आएंगे

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

नीरज जी की सालगिरह पर ......


हरिवंश राय बच्चन की यशस्वी परम्परा के अकेले जीवित कवि गोपाल दास नीरज का आज जन्मदिन है....आज उनको बधाइयां देते हुए हम उनके स्वास्थ्य और सुख की कामना करते हैं। इस अवसर पर पेश हैं उनकी कुछ बेजोड़ कविताओं, गीतों और दोहों के अंश.....बोले तो मेडले !


दोहे

मौसम कैसा भी रहे कैसी चले बयार
बड़ा कठिन है भूलना पहला-पहला प्यार

कवियों की और चोर की गति है एक समान
दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान

दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार
तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार

गागर में सागर भरे मुँदरी में नवरत्न
अगर न ये दोहा करे, है सब व्यर्थ प्रयत्न

गीत

कारवाँ गुज़र गया
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई
गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गये
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ
मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ तुम शहज़ादी रूप नगर की
हो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहाँ पर होगा ?

मीलों जहाँ न पता खुशी का
मैं उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ नित
होंठ करें गीतों का न्योता,
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...
मेरा कुर्ता सिला दुखों ने
बदनामी ने काज निकाले
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
नभ ने सब तारे जड़ डाले
मैं केवल पानी ही पानी तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो मन का हवन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...

कविता

दीप और मनुष्य

एक दिन मैंने कहा यूँ दीप से
‘‘तू धरा पर सूर्य का अवतार है,
किसलिए फिर स्नेह बिन मेरे बता
तू न कुछ, बस धूल-कण निस्सार है ?’’

लौ रही चुप, दीप ही बोला मगर
‘‘बात करना तक तुझे आता नहीं,
सत्य है सिर पर चढ़ा जब दर्प हो
आँख का परदा उधर पाता नहीं।

मूढ़ ! खिलता फूल यदि निज गंध से
मालियों का नाम फिर चलता कहाँ ?
मैं स्वयं ही आग से जलता अगर
ज्योति का गौरव तुझे मिलता कहाँ ?’’

ये उस महान कवि की कृतियाँ हैं जिसे एक वक़्त के मठाधीशों ने मंचीय गीतकार कह कर नकार दिया था.....

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

वसंत.......


सुमित्रानंदन पन्त का नाम कौन साहित्य प्रेमी नहीं जानता, प्रकृति पर अपने बेजोड़ रचनाकर्म के चलते उनको प्रकृति का सुकुमार कवि भी कहा जाता है। आज प्रस्तुत है वसंत पर उनकी एक अनुपम कृति.....
वसंत
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह, मग़, वन में आया वसंत
सुलगा फागुन का सूनापन
सौन्दर्य शिखाओं में अनंत
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर उर में मधुर दाह
आया वसंत, भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह
पल्लव पल्लव में नवल रूधिर
पत्रों में मांसल रंग खिला
आया नीली पीली लौ से
पुष्पों के चित्रित दीप जला

अधरों की लाली से चुपके
कोमल गुलाब से गाल लजा
आया पंखड़ियों को काले- पीले
धब्बों से सहज सजा

कलि के पलकों में मिलन स्वप्न अ
लि के अंतर में प्रणय गान
लेकर आया प्रेमी वसंत
आकुल जड़-चेतन स्नेह प्राण

सुमित्रा नंदन पन्त

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी