रविवार, 22 फ़रवरी 2009

आधा चांद मांगता है पूरी रात


आज आपके सामने रख रहा हूँ कवि और फिल्मकार नरेश सक्सेना की एक कविता जो ख़ास इसलिए है कि ज़िन्दगी की पूरी तासीर घोल कर सामने रख देती है। कम ही कविताओं में यह बात देखने को मिलती है तो स्वाद ले कर देखें .....

आधा चांद मांगता है पूरी रात

पूरी रात के लिए मचलता है
आधा समुद्र
आधे चांद को मिलती है पूरी रात
आधी पृथ्वी की पूरी रात
आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
पूरा सूर्य
आधे से अधिक
बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग
आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन
आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव
आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत
आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन
आधे इलाज की देते पूरी फीस
पूरी मृत्यु
पाते आधी उम्र में।

आधी उम्र, बची आधी उम्र नहीं
बीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजन
पूरा स्वाद
पूरी दवा
पूरी नींद
पूरा चैन
पूरा जीवन

पूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिए

हम नहीं समुद्र, नहीं चांद, नहीं सूर्य
हम मनुष्य, हम--
आधे चौथाई या एक बटा आठ
पूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।

नरेश सक्सेना
(कवि का ग्वालिअर में १९३९ में हुआ था, इनको १९७३ में हिन्दी साहित्य सम्मलेन पुरस्कार एवं १९९२ में फ़िल्म निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।)
(* साथ का चित्र : पिकासो की प्रसिद्द कृति फिगर्स ऑन अ बीच )

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब पढ़वाने के लिए शुक्रिया

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  2. पूरी रात के लिए मचलता है
    आधा समुद्र
    आधे चांद को मिलती है पूरी रात
    आधी पृथ्वी की पूरी रात
    आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
    पूरा सूर्य

    आधे से अधिक
    पढ़वाने के लिए शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  3. सक्सेना जी की रचना के लिए आभार.

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  4. Sach Sir Is Desh ke karodologon ka pura jiwan hi hasraton me kat jata hai.Is aadhepan ko aapne bahut hi samvedna ke saath samjha hai aur use shabdon me piroya hai.mai aapka bahut bada prashansak hu.

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