बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मौसम के संदेश

वसंत का मौसम अब अवसान की ओर है.....कुछ दिन पहले इसकी शुरुआत पर भी मैंने एक कविता आप को पढ़वाई थी....आज फिर एक और कविता लाया हूँ......इसाक अश्क की कविता मौसम के मिजाज़ की बात करती है, जिसे शायद हम केवल महसूस कर सकते हैं पूरी तरह बयान नहीं......तो बेहतर हैं मेरे बयान पढने की जगह आप कविता ही पढ़ें,
बिना टिकट के
बिना टिकिट के
गंध लिफाफा
घर-भीतर तक डाल गया मौसम।
रंगों डूबी-दसों दिशाएँ
विजन डुलाने-लगी हवाएँ
दुनिया से बेखौफ हवा में
चुम्बन कई उछाल गया मौसम।
दिन सोने की सुघर बाँसुरी
लगी फूँकने-फूल-पाँखुरी,
प्यासे अधरों पर खुद झुककर
भरी सुराही ढाल गया मौसम।
बिना टिकिट के.....
इसाक अश्क

2 टिप्‍पणियां:

  1. बिना टिकिट के
    गंध लिफाफा
    घर-भीतर तक डाल गया मौसम।

    रंगों डूबी-दसों दिशाएँ
    विजन डुलाने-लगी हवाएँ
    दुनिया से बेखौफ हवा में
    चुम्बन कई उछाल गया मौसम।
    दिन सोने की सुघर बाँसुरी
    लगी फूँकने-फूल-पाँखुरी,
    बहुत प्यारे शब्दों से guthi हुई है ये रचना

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