बुधवार, 21 सितंबर 2011

अंजलि हार गई...(कविता)


(ये कविता भारतीय फौज से कोर्ट मार्शल कर के बर्खास्त की गई पहली महिला अधिकारी फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता को समर्पित है...फौज से लेकर निजी जीवन तक पुरुषों के उत्पीड़न के खिलाफ लड़कर हार गई एक महिला को सैल्यूट है ये कविता...)







मैंने जब भी देखा उनको
उनकी निगाहें
बस मेरी देह पर थीं
कभी
मेरी छातियों को घूरती
कभी मेरी कमर
को बेहूदे तरीके से मापती
मैं कभी संभलती
कभी कांपती
और वो सही कहते हैं
मेरा चेहरा तो
उनको याद भी नहीं
दरअसल उसको उन्होंने
कभी देखा ही नहीं
नहीं देखा कि
मेरी आंखों में कितनी
मासूमियत थी
जो आप देख पाते थे पापा
वो नहीं देख सकते थे
मां
मेरी वो मुस्कुराहट
जो तुमको दिखती थी
क्योंकि वो कली को खिलते देख
खुश नहीं थे
वो तो उसे मसलने आए थे
और पापा...मां
जब मैं चिल्लाई
तो वो बोले
पंख निकल आए हैं इसके
मैंने कहा
मैं उड़ना चाहती हूं
बंधन तोड़
वो बोले
काट दो इसके पर
और फिर पापा
उन्होंने मुझ पर
चमन में बहार को रोकने की
साज़िशों का इल्ज़ाम लगाया
पर मैं लड़ती गई
मेरे पंखों को
उड़ने की कोशिश का
मुजरिम पाया
मैं फिर भी लड़ रही थी
और पापा उन्होंने देखा
कि मेरे पंख बाज़ुओं में
बदल गए हैं
और हौसले
बयानों में
तो
उन्होंने मेरे बाज़ू काट दिए
और
ज़ुबान पर
छुरी चलवा दी...
मैं फिर भी लड़ती गई
पर अब मेरे कटे बाज़ुओं में
जुम्बिश
और गायब ज़ुबान के बयान
खो गए हैं
और वो तो
अब मुझे पहचानते भी नहीं हैं
दरअसल मैं अब
अस्तित्व में ही नहीं हूं
और अब जब
सब मुझे भूल गए
इससे पहले कि तुम मुझे
मां पापा
और मैं खुद को भूल जाऊं
मुझे जाने दो...
मेरे आखिरी पल के
इस अहसास को
नियति मान लेना
कि मैं
हमेशा की तरह हार गई...
मयंक सक्सेना

सोमवार, 5 सितंबर 2011

हम बुद्धिजीवी हैं ...(भाग-1)


(ये कविता किन के लिए लिखी गई है, इसे लिखने से इसका मर्म समाप्त हो जाएगा...मैं जानता हूं कि आप जानते हैं...ये पहला भाग है, अगले का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा)

बिनायक सेन
लड़ रहे थे आदिवासियों के लिए
गांव में
और वो उनके साथ थे
अपने
एसी कमरों में बैठे

जब इरोम
अनशन पर थी
तो वो उड़ा रहे थे
पांच सितारा होटलों में
महंगी विदेशी शराब

जब गुजरात में
एक पूरी कौम का
खात्मा हो रहा था
तो वो डर से
वहां झांकने नहीं पहुंचे

जब जंगलों में
जल, जंगल और ज़मीन की
लड़ाई चालू थी
तब वो
सरकारी फंडिग के
दौरे पर
विदेशी रिसॉर्ट में
करवा रहे थे
मसाज

दलितों-वंचितों के घर
जब जले
तो वो सोते रहे
उठे और राख पर
बड़बड़ाने लगे
वो दलितों में
सवर्ण जो थे

और अब
जब लोग सड़कों पर हैं
वो फिर भी घरों में हैं
लोगों को
भीड़ बता रहे हैं
खारिज कर रहे हैं
आंदोलन से उन्हें
नफरत है
क्योंकि लोगों के साथ
आने के लिए
छोड़ना पड़ेगा
अपना एसी कमरा
और गर्मी बहुत है

-मयंक सक्सेना

काल चक्र

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देवनागरी