सोमवार, 5 सितंबर 2011

हम बुद्धिजीवी हैं ...(भाग-1)


(ये कविता किन के लिए लिखी गई है, इसे लिखने से इसका मर्म समाप्त हो जाएगा...मैं जानता हूं कि आप जानते हैं...ये पहला भाग है, अगले का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा)

बिनायक सेन
लड़ रहे थे आदिवासियों के लिए
गांव में
और वो उनके साथ थे
अपने
एसी कमरों में बैठे

जब इरोम
अनशन पर थी
तो वो उड़ा रहे थे
पांच सितारा होटलों में
महंगी विदेशी शराब

जब गुजरात में
एक पूरी कौम का
खात्मा हो रहा था
तो वो डर से
वहां झांकने नहीं पहुंचे

जब जंगलों में
जल, जंगल और ज़मीन की
लड़ाई चालू थी
तब वो
सरकारी फंडिग के
दौरे पर
विदेशी रिसॉर्ट में
करवा रहे थे
मसाज

दलितों-वंचितों के घर
जब जले
तो वो सोते रहे
उठे और राख पर
बड़बड़ाने लगे
वो दलितों में
सवर्ण जो थे

और अब
जब लोग सड़कों पर हैं
वो फिर भी घरों में हैं
लोगों को
भीड़ बता रहे हैं
खारिज कर रहे हैं
आंदोलन से उन्हें
नफरत है
क्योंकि लोगों के साथ
आने के लिए
छोड़ना पड़ेगा
अपना एसी कमरा
और गर्मी बहुत है

-मयंक सक्सेना

3 टिप्‍पणियां:

  1. लोगों के साथ
    आने के लिए
    छोड़ना पड़ेगा
    अपना एसी कमरा
    और गर्मी बहुत है
    !!!!!!!!!!!!!!!!!! bhyavah satya

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  2. यथार्थ अभिव्यक्ति :
    विनायक सेन हो या वैरागी चोला पहने स्वामी अग्निवेश, भ्रष्टाचार के विरुद्ध हुए आन्दोलन ने जहां हर आयु हर, हर वर्ग के व्यक्ति की आत्मा को झकझोर के रख दिया. उस दौरान इन तथाकथित समाजसेवकों द्वारा एसी कमरों की ठंडक से बाहर निकलने की ज़हमत ना उठा पाने और अन्ना हजारे जी की तुलना पागल हाथी से करने जैसी हरकतों ने, भ्रष्ट नेताओं के साथ-साथ इनका भी असली चेहरा जनता के सामने ला दिया.

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    सादर, संवाद की अपेक्षा में... जन सुनवाई

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