बुधवार, 26 मई 2010

ब्लॉगर बैठक पर शंका निवारण...जवाब...एजेंडा....और अनुरोध...



(सबसे पहले अपने एक बेहद लाडले साथी को स्पष्ट कर दूं कि ये पोस्ट किसी सफाई के तौर पर नहीं लिख रहा हूं, इसका कल ही वादा किया था....वो निभा रहा हूं....)

हां तो कल हम पहुंचे थे स्वल्पाहार के डिब्बों तक....तो आगे चलते हैं....मेरे बगल में एक तरफ थे इरफ़ान भाई और एक ओर थे खुशदीप जी....ऐसा इसलिए था कि मैं पहले ही बस और रेल के अंदाज़ में उन दोनो के बीच की कुर्सी पर अपना पिट्ठू बैग रख कर सीट घेर चुका था.....वैसे भी खुशदीप जी और इरफान भाई तो नोएडा से साथ ही आए थे....कहीं आपस ही में न बतियाते रहें तो बीच में हड्डी ज़रूरी थी....हां तो इरफान भाई, खुशदीप जी के साथ आते आते ही शीतल पेय गटक चुके थे पर स्वल्पाहार का डिब्बा जब खुला तो उनका मुंह खुला रह गया...बोले "अरे मयंक जी इतना सारा कैसे खाया जाएगा, मैं तो घर से भी खाना खा के निकला हूं, इसमें से आप भी ले लीजिए कुछ...." इस कथन के साथ ही भाई ने अपने डिब्बे से समोसा निकाल कर हमारे डिब्बे में बिठा दिया.....हम तो घर से सुबह चले थे....और कुंवारे हैं तो बिना खाए ही चले थे....सो एक बार भी मना नहीं किया....ज़ाहिर है पापी पेट का सवाल था....इसके बाद शुरु हुआ तस्वीरें लेने का दौर और हमेशा की तरह कैमरे तब ज़्यादा चमके जब खाना खाया जा रहा था....तस्वीरें आपने देखी ही हैं....पर इसके बाद शुरु हुआ असली दौर....
अगले दौर को असली दौर क्यों कह रहा हूं ये जानना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अब तक इस पूरे सत्र का चूंकि हम में से किसी भी ब्लॉगर ने ठीक ढंग से उल्लेख नहीं किया इस वजह से फिर से इस मिलन की नीयत पर उंगलियां उठ रही हैं....ज़ाहिर है हमने वहां काम की बातें की पर ब्लॉग पर ज़लज़ला और खाने की बातें ज़्यादा....शायद वक्त की कमी की वजह से.....तो भाई लोगों सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि अगला सत्र था ब्लॉगरों...यानी कि हिंदी चिट्ठाकारों के संगठन और उसके उद्देश्यों पर चर्चा का.....
हालांकि अविनाश जी के आदेश और सलाह पर संगठन के निर्माण हेतु एजेंडा मैं बनाकर लाया था पर चौखट वाले चाचा पवन चंदन जी का सुझाव था कि पहले सब अपनी अपनी सलाह रखें...परेशानियां बताएं....बात कहें....और फिर एजेंडे को पेश किया जाए....जहां जहां ज़रूरत होगी एजेंडे में संशोधन भी हो जाएगा.....सलाह बढ़िया लगी और फिर एक एक कर के सब ने अपना मत रखा....सामाजिक सेवाओं से लेकर लड़ाई तक की बात कही गई....बेनामियों और लापताओं को भाव न देने की बात हुई.....बीच बीच में हंसी मज़ाक भी होता रहा....व्यक्तिगत टीका टिप्पणी से परहेज़ की बात कही गई....हिंदी में नए ब्लॉगरों को जोड़ने की बात हुई....और इसके अलावा ये भी सवाल उठ ही गया कि वाकई एजेंडा क्या है....
इसके बाद आई बारी हमारी....एजेंडा तो तैयार ही था....भाई लोगों....(माताओं-बहनों नें भी) उसमें संशोधन और संकलन भी करवा दिए थे....तो हमने अपनी बात रखी....ये सारे ब्लॉगर्स की बात के बाद प्रस्तावित किया गया एजेंडा है....और सम्भवतः सबकी शिकायतों का निराकरण कर देगा कि ऐसी बैठकें केवल खाने और खानापूर्ति के लिए होती हैं.....तो लीजिए बिंदुवार एजेंडा.....
  1. हिंदी ब्लॉगरों का एक संगठन बने जिसमें किसी भी धर्म, जाति, लिंग, सम्प्रदाय, नागरिकता और विचारधारा का ब्लॉगर सदस्य बन सकता हो।
  2. इस संगठन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य और आवश्यक्ता यह है कि सरकार द्वारा किसी भी सम्भावित सेंसरशिप, तानाशाही और ब्लॉगरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ़ एकजुट हुआ जा सके जो भविष्य में अवश्यम्भावी है।
  3. यह संगठन हिंदी चिट्ठाकारी में साम्प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देगा और किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने वाली चिट्ठाकारी के खिलाफ़ लड़ेगा।
  4. ब्लॉगरों का संगठन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देगा और निरंतर समाज से अंधविश्वास दूर करने का काम करेगा।
  5. हिंदी चिट्ठों द्वारा कम्प्यूटर और इंटरनेट के प्रयोग के लिए हिंदी देशज भाषा और वर्तनी विकास की दिशा में काम किया जाएगा।
  6. अलग अलग भाषाओं का साहित्य ब्लॉगर आम आदमी की भाषा में अनूदित कर के उसे लोकप्रिय करेंगे ही और साथ ही भाषा को भी।
  7. अभी तक हिंदी साहित्य में उपेक्षित विषयों जैसे बाल साहित्य, वैज्ञानिक साहित्य आदि पर काम किया जाए।
  8. अधिक से अधिक संख्या में हिंदी के नए ब्लॉगरों को जोड़ा जाए।
  9. विषयों की विविधता सुनिश्चित की जाए, अधिक से अधिक और लोकोपयोगी विषयों पर ब्लॉगिंग हो।
  10. नियमित ब्लॉगरों की क्षेत्रवार और राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय बैठकें हों और छात्रों और ब्लॉगरों के लिए उपयोगी वर्कशॉप्स का आयोजन हो।
  11. स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हिंदी चिट्ठाकारी का प्रचार प्रसार हो।
  12. हिंदी से जुड़ी लोक बोलियो और लोक भाषाओं को प्रोत्साहन दिया जाए, हर ब्लॉगर अपनी लोक बोली या भाषा में भी नियमित लेखन करे।
  13. नए ब्लॉगर्स की सहायता की जाए।
  14. ब्लॉगर्स की सामाजिक, व्यक्तिगत और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  15. हिंदी चिट्ठाकारी में लगातार बढ़ रही व्यक्तिगत टीका टिप्पणी और तथाकथित कुंठित ब्लॉगिंग पर लगाम कसी जा सके।
  16. हिंदी चिट्ठाकारी को अपनी भाषा हिंदी के लिए आंदोलन के मंच के तौर पर इस्तेमाल किया जाए।
  17. ब्लॉगिंग को एक सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन के तौर पर स्थापित किया जाए, इसे लोकतंत्र का पांचवा खंभा बनाया जाए।
  18. संगठन के सदस्यों की सहायता से अपने सामाजिक दायित्वों का भी लगातार निर्वहन हो।
  19. संगठन एक त्रैमासिक (प्रारंभ में) प्रिंट पत्रिका निकाले जिसमें गत तीन माह की चुनिंदा ब्लॉग रचनाएं संकलित हों। (रचनाओं के रचनाकार का संगठन का सदस्य होना ज़रूरी नहीं है)
  20. संगठन का एक सामूहिक ब्लॉग बनाया जाए जहां न केवल फोरम्स हो बल्कि संगठन की सूचनाओं से लेकर फंड तक का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए।
हम मानते हैं कि संगठन न केवल ब्लॉगिंग को दिशा देगा बल्कि इसकी दशा भी सुधारेगा। ये संगठन है कोई गुट नहीं है....हम एक ऐसा अनोखा संगठन चाहते हैं जहां विचारधाराओं की कोई बंदिश नहीं है....सबके पास लोकतंत्र है...क्योंकि ब्लॉग लोकतंत्र का ही प्रतीक है....एक ऐसा संगठन जहां अलग अलग विचारधाराओं के वे सभी लोग एक दूसरे का हाथ थामें खड़े हों जो अंततः देश और दुनिया का भला चाहते हैं....मतभेद जहां मनभेद न बने....जहां वाकई हम एक आदर्श दुनिया का सपना देख सकें...जी सकें....जहां लिंग...भाषा....जाति...सम्प्रदाय.....विचारधारा का भेद मिट चुका हो....और वसुधैव कुटुम्कम की परिकल्पना साकार हो.....
जैसा कि कृष्ण कहते हैं गीता में 'सर्वभूतेषु हिते रतः' और करआन शरीफ़ कहती है, 'खुदा सारी खिलकत को बरकत दे....' हम कहते हैं तथास्तु...आमीन.....

संघे शक्तिः

आप में से जो भी लोग इस बारे में और सुझाव देना चाहते हैं वो टिप्पणी के तौर पर दर्ज कर सकते हैं....विरोध भी और सहमति भी.....जो साथ आना चाहते हैं वो....और जो नहीं आना चाहते वो भी अपने कारण ज़रूर दें...अपनी राय ज़रूर दे....आप ई मेल भी कर सकते हैं....
mailmayanksaxena@gmail.com

ये कुछ लोगों को मेरा जवाब भी था....और सवाल भी.....कि आखिर क्या गलत था इसमें....और क्या वाकई ये बैठक दिशाहीन थी.....

आज मामला सीरियस हो गया कल इस बैठक की कुछ मज़ाकिया बातें.....और हां साथियों गलती हमारी है कि हमने बैठक के असल मुद्दों से ज़्यादा गौण मुद्दों पर पोस्ट लिखी.....हमारा ध्यान भले ही बैठक पर था पर अगर पोस्ट में असल मु्द्दों के ज़िक्र पर खाने का वर्णन और आपस की गुफ्तगू हावी हो गई...तो संदेश तो गलत जाना ही था न.....खैर गलती मेरी भी है...मैंने भी पोस्ट देर में डाली....और खाने का ज़िक्र मैंने भी किया.....सबसे क्षमा प्रार्थना के साथ अनुरोध कि हम से कभी भी ये संदेश न जाए कि ब्लॉगरों को बैठक के उद्देश्य से ज़्यादा पोस्टों पर टिप्पणियों की चिंता है.....यकीन मानें मेरी सर्वश्रेष्ठ रचना पर आजतक कोई टिप्पणी नहीं है....पॉपुलिस्ट पोस्टों का मोह कभी कभार छोड़ना चाहिए......

बाकी एजेंडा सबके सामने है और बैठक की दिशा और नतीजे भी.....

फिर मिलेंगे....

मंगलवार, 25 मई 2010

जब वी मेट....शायद सबसे लेटलतीफ रिपोर्ट...और लम्बी भी....

जब से अविनाश जी ने बताया था कि रविवार को सब मिल रहे हैं...सब से मतलब अपने उस परिवार से था जो पूरे देश में फैला है...ब्लॉगरों का परिवार...या कहें तो चिट्ठाजगत, तब से ही दिमाग में खलबली मत गई थी, ऐसे में अविनाश जी ने जब खुला सार्वजनिक आमंत्रण नुक्कड़ पर प्रकाशित किया तो रहा नहीं गया। लगा कि अपना बी कुछ योगदान हो तो आनन फानन में एक आमंत्रण पत्र फोटोशॉप में डिज़ाइन कर के अविनाश जी को मेल कर मारा पर जल्दबाज़ी में तारीख गलत छप गई...और फिर उस पर भी खूब मज़े ले लिए गए, और वो भी मेरे नहीं वाचस्पति जी के....तो वाचस्पति जी से क्षमायाचना...खैर 22 की रात को सबसे तेज़ टीवी चैनल की सबसे ज़मीनी पर वरिष्ठ एंकर के बेटे के जन्मदिन की दावत में इतनी देर लगा दी गई कि घर लौटना हुआ सुबह के तीन बजे, ज़ाहिर है सोते सोते बज गया चार....और फिर शुरु हुए ब्लॉगर मिलन के सपने....
फिर अचानक सपने में ही एक गहरा काला सा साया दिखाई दिया, जिसका चेहरा तो नहीं दिखा पर सारे ब्लॉगरचिल्ला रहे थे "भागो-भागो बेनामी है....बेनामी का शोर मचा ही ता कि दूसरी ओर शोर उठा और कुर्सियां हवा में उड़ने लगीं, छत कांपने लगीं और कान में अविनाश जी की आवाज़ आई कि मयंक जी ज़लज़ला आ गया है..." और इसी सपने से डर कर जैसे ही आंख खोली तो देखा कि मोबाइल पर अविनाश जी का नम्बर फ्लैश हो रहा है। फोन उठाया तो अविनाश जी का सुपरिचित अंदाज़ और प्यारा सा प्रश्न कि कितने बजे तक पहुंच रहे हैं, कहां से चलेंगे और कैसे जाएंगे....उसके बाद पता चला कि ललित जी भी साथ हैं और ललित जी से बी ऐसे दुआ सलाम हुई जैसे पता नहीं कितने सालों से जान पहचान हो हमारी....
इसके बाद समझ में आया कि भैया बड़ी देर हो चुकी है, और फौरन तैयार होना शुरु किया गया...जल्दबाज़ी में एक चारलाईना पोस्ट डाली कि ब्लॉर सम्मेलन पलक पांवड़े बिछाए सबका स्वागत कर रहा है....और घर से निकल पड़ा गया। इस वक्त दोपहर के सवा एक बज चुके थे गले में अंगोछा डाला और बाइक को किक कर के निकल पड़ानोएडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन की ओर...सिटी सेंटर पहुंचकर गाड़ी को पार्किंग में लगाकर स्टेशन पर पहुंचा और जेब में से मेट्रो के उस रूटमैप का प्रिंटआउट निकाला जो घर से लेकर चला था.....और खोला तो वो कह रहा था कि भई नोएडा से पहुंचे कीर्ती नगर और फिर वहां से बदलें नांगलोई के लिए मेट्रो...और फिर उतर जाएं जाट धर्मशाला के लिए....तो फिर ले लिया गया नांगलोई रेलवे स्टेशन तक का एक टोकन....और चढ़ गए लाला मेट्रो में।सफ़र जितना सोचा था उतना भी आसान नहीं था, पत्रिका पढ़ते हुए जब कीर्ति नगर पहुंचे तो पता चला कि अभी वहां से नांगलोई की लाइन शुरु ही नहीं हुई है....अब तक पौने तीन बज चुके थे और दो बार अविनाश वाचस्पति जी का फोन आ चुका था....मन में एक शर्मिंदगी की बताइए पहली बार में ही फ़जीहत करवा ली, बड़े बड़े वादे किए थे अविनाश जी से और वक्त पर पहुंच ही नहीं पाएंगे....खैर अविनाश जी को फोन पर ही बताया कि अब आगे का सफ़र ऑटो से ही तय करना पड़ेगा और फिर कर लिया गया एक ऑटो...
ऑटो वाले चचा बड़े सज्जन आदमी निकले, प्रतापगढ़ के रहने वाले और जब उन्होंने अपने जैसी बोली सुनी तो अवधी में ही बतियाते रहे और सफ़र कट गया....और हम उतर पड़े जाकर छोटूमल जाट धर्मशाला के सामने....ऑटो से बाहर उतरे तो चौखट पर ही पवन जी मिल गए.....और अपने चिर परिचित अंदाज़ में चुटकियां लेते हुए उन्होंने स्वागत किया....इसके साथ ही मिले विनोद जी और वर्मा जी....मिलते ही लगा कि ठेठ बनारसी लोगों से गले मिल रहा हूं...खैर सफ़र में बहुत थक चुका था और जैसे ही अविनाश जी ने कहा कि शीतल पेय ले लूं तो शीतल पेय न पीने की आदत के बावजूद दो गिलास पी गया...और माणिक को खूब आशीर्वाद दिया...अब तक हम चौखट पार कर के नुक्कड़ तक आ चुके थे और सामने ही सामना हो गया बड़ी बड़ी सीधी खड़ी मूंछों से जो हमें देख कर मुस्कुरा रही थी...जी हां वो एक ही बार में पहचान लिए गए अपने भाईललित शर्मा जी, उसके बाद बगल में ही बैठी संगीता पुरी जी को जब हमने अपना परिचय दिया तो वो बी तुरंत ही पहचान गई...और बोली अच्छा आप ही मयंक सक्सेना हैं दरअसल संगीता जी से मेरा परिचय एक बार आपसी नोंक झोंक से हुआ था...और उनकी मेल मैंने आज भी सहेज कर रखी है। तब तक अंदर आ गए थे मेरे पसंदीदा ब्लॉगर....जो फौजी कैप लगाए एक और यात्रा को तैयार दिख रहे थे...अपने मुसाफ़िर जाट नीरज भाई, उनके साथ थे अंतर सोहिल.....नीरज भाई से मिला...हस्तिनापुर जाने की योजना भी बना डाली और उसके बाद काफी देर तक रतन सिंह शेखावत जी से ब्लॉगिंग की दिशा पर लम्बी चर्चा चलती रही....
अब सवाल ये ता कि अभी तक बैठक शुरु क्यों नहीं हुई थी...तो जवाब ये था कि अभी तक खुशदीप सहगल जीऔर मशहूर कार्टूनिस्ट इरफ़ान भाई नहीं पहुंचे थे....और फिर दोनो भी आ ही गए और विधिवत एक गोलाकार समूह में बैठकर शुरु हो गई बैठक....सबसे पहले अविनाश वाचस्पति जी जो कि इस बैठक के सूत्रधार थे उन्होंने अपनी बात सबके बीच रखी जो कि आप सब चौखट पर पढ़ चुके हैं....और इसके बाद जब तक तालियों की गूंज थमती तब तक आ चुके थे गर्मागर्म स्वल्पाहार (जो कि कहीं से भी अल्प नहीं था) के डिब्बे...और तय हुआ कि इन्हें निपटाने के बाद ही आगे की बैठक जारी की जाएगी....तो फिलहाल हम भी रोक रहे हैं कलम को ब्रेक के लिए आप तब तक स्वल्पाहार को निहारिए....और साथ में उस मेट्रो मैप को भी जिसने हमारी ऐसी तैसी कर डाली.....









(शेष कल....कल की किस्त में वो एजेंडा जो मैंने बैठक में पेश किया...और भी बहुत कुछ मज़ेदार बाते....)

शनिवार, 22 मई 2010

3 बजे याद है न....


अविनाश जी के साथ मैं खड़ा हूं आपके इंतज़ार में....

तो मिलते हैं सही वक्त पर...

सही जगह...

सही इरादों को....

सही अंजाम पर पहुंचाने....

जाट धर्मशाला

नांगलोई....

बस कुछ ही घंटों बाद....

शुक्रवार, 21 मई 2010

प्रताप सोमवंशी...एक पत्रकार की कविकारिता...


किसी के खास आग्रह पर एक लम्बी कविता पर काम कर रहा हूं....विषय भी एक आध दिन में कविता के साथ पढ़वा दूंगा....तो फिलहाल पढ़ें प्रसिद्ध पत्रकार प्रताप सोमवंशी की कुछ कविताएं...मुझे हमेशा लगता है कि प्रताप मीडिया में चंद अच्छा लिखने वालों में से एक हैं...और ये कविताएं बताती हैं कि ऐसा क्यों है....क्यों हर अच्छा लेखक मूलतः एक कवि होता है....                                                                                                                                                           

उसने मिट्टी को छुआ भर था....                                                                                                                                  

उसने मिट्टी को छुआ भर था

धरती ने उसे सीने से लगा लिया

उसने पौधे लगाए

ख़ुश्बू उसकी बातों से आने लगी

पेड़ समझने लगे उसकी भाषा

फल ख़ुद-ब-ख़ुद

उसके पास आने लगे

पक्षी और पशु तो

सगे-सहोदर से बढ़कर हो गए

जो मुश्किल भाँपते ही नहीं

उन्हें दूर करने की राह भी सुझाते हैं



मैने पूछा भाई प्रेम सिंह !

क्या कुछ खास हो रहा है इन दिनों

खिलखिला पड़े वो

कहने लगे-

लोग जिस स्वर्ग की तलाश में हैं

मैं वही बनाने में जुटा हूँ


कितना प्रतिभाशाली है.

कितना प्रतिभाशाली है
काम नहीं है खाली है


केवल फल से मतलब है
कैसे कह दूं माली है


थोड़ा और दहेज जुटा
बिटिया तेरी काली है


इनके हिस्से सारे सुख
उनके हिस्से गाली है


सपनों की दुकानें हैं
भाषण है और ताली है


प्रताप सोमवंशी

(प्रताप सोमवंशी वरिष्ठ पत्रकार हैं....पर उनकी कविताएं बोलती हैं कि दिल से एक मासूम और संवेदनशील कवि हैं। प्रताप ने  दक्षिण एशियाई मीडिया फेलोशिप के तहत वषॆ १९९९ में बुंदेलखंड के सिलिका खनन क्षेत्रों की महिलाओं पर अध्ययन  औरत और धरती का साझा दुख के नाम से किया। जनसत्ता, दैनिक भास्कर, वेबदुनिया डाट काम में विभिन्न पदों पर रहे। चित्रकूट पर एक वृत्त-चित्र का निर्देशन। रेडियो के लिए कई लघु नाटिकाएं लिखीं। कविताओं का कन्नड़, बांग्ला, उर्दू में अनुवाद सम्प्रति हिंदुस्तान समाचार पत्र में वरिष्ठ सम्पादकीय पद पर कार्यरत।)
 

बुधवार, 19 मई 2010

कालजयी...प्रगतिशील...साहित्कार....

हम माओवादियों को

तब मानेंगे आदिवासी

जब

खत्म हो चुका होगा

वर्ग संघर्ष

जंगलों में फैला खून

प्रतिष्ठित कर देगा

पूंजीवाद का उत्कर्ष


जब

सारी श्रमिक महिलाएं

गाभिन हो जाएंगी

मालिकों के बलात्कार से

तब

रच डालेंगे हम

आधी आबादी का

मुक्तिरण

अपनी कलम की धार से


जब शोषण की अतिरेकता से

शोषित ही

समाप्त हो जाएंगे

तब चारों ओर

हमारे गद्य काव्य

सर्वहारा को न्याय दिलाने

व्याप्त हो जाएंगे


जब नहीं होगी

हमारी किंचित भी आवश्यक्ता

बस तभी उपस्थित होंगे

हम

हर बार....

हम

कालजयी....प्रगतिशील....

साहित्यकार...


(ये कविता 18 मई 2010 को इंडिया हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर सभागार में ओम थानवी के ब्लॉगिंग को दिशाहीन और अहम से भरी बताने के बाद....और राजेंद्र यादव के इस वक्तव्य के बीच लिखी गई कि भाषा साहित्यकार की बपौती है....और आम आदमी साहित्य नहीं रच सकता....दो दिन से पसोपेश में हूं कि जो मैं लिखता हूं वह साहित्य नहीं इन दो लोगों ने ऐसा कह दिया है....साहित्य नहीं है तो ये क्या है....और साहित्य है तो क्या मैं आम आदमी नहीं रहा....बाकी CAVS संचार पर विस्तृत विचार मंथन करूंगा इस आयोजन पर...जिसका नाम था "मीडिया में खत्म होती साहित्य की जगह".....अविनाश भाई अच्छा लगता अगर वक्ताओं के नाम पट्टिकाओ पर हिंदी में छपे होते....हालांकि कार्यक्रम मैं मानता हूं सफल रहा....)

मयंक सक्सेना

9310797184


रविवार, 16 मई 2010

तीन लघु कविताएं....

ये वो तीन छोटी कविताएं हैं जो अचानक अनायास दिमाग में कभी आई और फेसबुक पर पोस्ट कर दी गई....अब ब्लॉग पर भी डाल रहा हूं....वैसे कई लोग टोकते भी रहते हैं कि थोड़ी छोटी कविताएं लिखा करो....तो ये है छोटी कविताओं की श्रृंखला में शुरुआती तीन कविताएं......

1.न दैन्यं न पलायनं
मेरे मन में
विचार हैं
तुम्हारे पास
बाहुबल
मेरी ज़ुबां पर
शब्द हैं
है तुम्हारे हाथ
संगीनें
तुम फिर भी
लड़ाई से
डर रहे हो
लड़ो मुझसे
पलायन क्यों कर रहे हो.....

2. भरोसा
रात
गहरी हो रही है....
गहरा रहा है...
भरोसा
आएगा कुछ देर में...
सवेरा...
हर रोज़ जैसा........

3. कमीना!
सच कह देता हूं...
कभी भी
सामने हो भले...
कोई भी
निडरता से...
पर उन्हें लगता है
निर्लज्जता सा...
सरलता से...
पर उन्हें
समझ आता है
कुटिल सा...
हां
कड़वा ही होता है..
और
कड़वा ही लगता है...
सच
वो सुन नहीं सकते...
पर मैं
बोलता हूं
कर चौड़ा सीना...
वो कहते हैं...
मैं हूं कमीना!

मयंक सक्सेना

बुधवार, 5 मई 2010

यकीन मानो रात हर रोज़ अलग सी होती है....

रात.... हर रोज़ आती है....
शायद सबको एक ही सी लगती है हर बार....
या ज़्यादातर
पर रात हर रोज़ अलग सी होती है....

कभी गीत सी गेय होती है...
तो कभी अनगढ़ सी गद्य कविता...
कभी छंदों में बंधी
तो किसी रोज़
वर्जनाओं के बंध तोड़ बहती सरिता...

कहीं नववधू सी
कुछ छिपती कुछ दृश्य सी
कभी सब कुछ कहती
पर अनकही...
झींगुरों के सुरों पर नाचती...
रात की नर्तकी का
जैसे हो सन्नाटा मौन प्रेमी

तपते बुखार में
सिरहाने बैठी माँ सरीखी
रात जगती है हर रोज़
जब हम सो जाते हैं....
शायद इसी लिए हर रोज़
रात का नयापन देख नहीं पाते हैं....
पर यकीन मानो
रात हर रोज़ अलग सी होती है....

मयंक सक्सेना

शनिवार, 1 मई 2010

क्यों न मजदूर दिवस का नाम बदल डालें.....


आज सुबह
वो गली बुहार गया
वरना शायद
पांव धरना भी मुश्किल था
रास्ते पर
जिसे वो निखार गया

आज दोपहर
वो खाने का डिब्बा
वक्त पर ही लाया
उसकी ज़रूरत का अहसास
भूख ने कराया

आज कड़ी धूप में
वो कहीं खुद को ही
रिक्शे पर लादे
खींचता होगा
कहीं
सर पर तसला रखे
मिट्टी उलीचता होगा

आज फिर उसने
कहीं किसी
निर्माण स्थल पर
जान गंवाई होगी
आज फिर उसने
किसी तरह रात की रोटी
कमाई होगी

आज भी वो
रेल की पटरियां
बिछा रहा होगा
सड़कों पर, दफ्तरों में...
जंगलों..पहाड़ों में...
कल कारखानों में
न जाने कहां कहां होगा...

फिर किसी रोज़ वो
किसी मेट्रो के
पुल के नीचे दब कर
या किसी कारखाने में
हवा में ज़हर घुल जाने से...
या फिर धूप में तड़प कर
या सर्दी लग जाने से
हो सकता है
वो दंगों में
हिंदू कह कर
या मुसलमान कह कर
जला दिया जाए...
या पुलिस थाने में
बुरी तरह पीट कर
जंगल में दफना दिया जाए....

कुछ भी हो ...
हर तरह से
उसकी किस्मत
बदलने वाली नहीं है...
उसकी नहीं कोई जगह
अब हमारे पास है...
अखबार के सिंगल कॉलम
और टीवी की मदहोशी में
वो बेहद उदास है...

और आज भी वो
सुबह निकला था
पेट के नाम पर...
हमेशा की तरह
काम पर...

मजदूर दिवस....
नाम से ही स्पष्ट है
जैसा
मान लिया है हमने
नियति को
वैसे का वैसा
साल के सारे दिन हमारे हैं
हम मजबूर नहीं हैं...
इसलिए मजदूर नहीं...
उसका सिर्फ़ एक दिन है...
वह बेहद मजबूर है
इसलिए वो मजदूर है....

आज अखबारों और टीवी चैनलों किसी ने भी यह ज़हमत नहीं उठाई कि उस तबके की बात करें जिसकी वजह से सब हैं...मार्क्स की दुहाई देने वाले मार्क्सवादी भी परिदृश्य से फाख्ता हैं....ब्लॉग की दुनिया को ज़रूर बधाई कि हम शायद इतना चेतन हैं कि याद रखते हैं उनको जिनसे हम सब हैं....टीवी चैनलों की तो खैर मैं बात करना भी बेमानी समझता हूं लेकिन अखबारों को क्या होता जा रहा है....ज़ाहिर है जब मेट्रो के खम्बे गिरने से या किसी ढोंगी सन्यासी के आश्रम में मजदूर मरेंगे तो हम शोर मचाएंगे...पर मई दिवस को भूल जाएंगे...मई दिवस को मजदूर दिवस कहना भी अपने आप में एक मानसिकता का ही परिचायक है....कि हम उनको अपने साथ खड़ा करने से परहेज़ करते हैं....क्यों न इसे निर्माण दिवस कहें...परिश्रम दिवस कहें....या साथी दिवस कहें....

और फिर आखिरी में अज्ञेय की एक छोटी कविता जो काफी कुछ कह देती है....

जो पुल बनाएंगे
वे अनिवार्यत:

पीछे रह जाएंगे।
सेनाएँ हो जाएंगी पार
मारे जाएंगे रावण
जयी होंगे राम,
जो निर्माता रहे
इतिहास में
बन्दर कहलाएंगे


मयंक सक्सेना


काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी