बुधवार, 5 मई 2010

यकीन मानो रात हर रोज़ अलग सी होती है....

रात.... हर रोज़ आती है....
शायद सबको एक ही सी लगती है हर बार....
या ज़्यादातर
पर रात हर रोज़ अलग सी होती है....

कभी गीत सी गेय होती है...
तो कभी अनगढ़ सी गद्य कविता...
कभी छंदों में बंधी
तो किसी रोज़
वर्जनाओं के बंध तोड़ बहती सरिता...

कहीं नववधू सी
कुछ छिपती कुछ दृश्य सी
कभी सब कुछ कहती
पर अनकही...
झींगुरों के सुरों पर नाचती...
रात की नर्तकी का
जैसे हो सन्नाटा मौन प्रेमी

तपते बुखार में
सिरहाने बैठी माँ सरीखी
रात जगती है हर रोज़
जब हम सो जाते हैं....
शायद इसी लिए हर रोज़
रात का नयापन देख नहीं पाते हैं....
पर यकीन मानो
रात हर रोज़ अलग सी होती है....

मयंक सक्सेना

6 टिप्‍पणियां:

  1. "यकीन मानो रात हर रोज़ अलग सी होती है...."
    रात की बात रात में की ....अच्छी रचना मज़ा आगया

    http://athaah.blogspot.com/

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  2. हर रात तो अलग होती ही हैं
    हर व्यक्ति के लिए रात का मतलब भी अलग होता हैं
    एक नयी ताजगी मिली आपकी कविता बांच कर.......बहुत पसंद आई

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  3. Surkh kali aankhion si raat....mehakti kaliyon si raat....do anjanon ko milwati raat...gum ki raat wo khushbuon ki bahar....kuch ankahe sapno ki raat....hazaron khwahishon ko behkati wo raat....


    achchi kavita hai par i think raat ka description aur achche tarike se kiya ja sakta hai...hamare paas shabdon ki kami hai par tmse aur behtar kavita ki ummed ki ja sakti hai.....

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  4. शायिर साहब अब इसमें इज़ाफ़े कि ज़रुरत है !

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