शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

पानी में चंदा और चंदा पर आदमी .....

कई साल पहले अपनी हिन्दी की उत्तर प्रदेश बोर्ड की पाठ्य पुस्तक में एक निबंध पढा था, पानी में चंदा - चंदा पर आदमी। आज जब हम ख़ुद चाँद पर पहुँच गए हैं तो सहसा वो निबंध याद आ गया.....खुशी हुई पर २ मिनट बाद ही अपने वो भाई याद आ गए जो उस रात भी भूखे सोये और शायद आज रात भी..... सारी खुशी काफूर हो गई जब देखा कि किस तरह राज ठाकरे के किराये के बदमाश मुंबई की सडकों पर आतंक फैला रहे थे और संसद में हमारे कर्णधार कि तरह बेशर्मी से बर्ताव कर रहे थे ..... क्या वाकई हम चाँद पर पहुँचने लायक हैं ? क्या वाकई भूखे लोगों के देश में चांद्रयान उपलब्धि है ?

तब लगा कि वाकई आज भी मुल्क के आधे से ज्यादा लोगों के लिए चाँद केवल एक सपना है जिसे पानी में ही पास से परछाई देख कर महसूस किया जा सकता है.....पाया नहीं जा सकता है ! तब अचानक चल उठी कलम और निकल पड़ी एक कविता जो ऑफिस में एक बेकार पड़े पन्ने पर लिखी गई......

पानी में चंदा और चंदा पर आदमी .....

भूख जब सर चकराती है

बेबसी आंखों में उतर आती है

बड़ी इमारतों के पीछे खड़े होते हैं जब

रोजी रोटी के सवाल

तब एक गोल चाक चौबंद इमारत में

कुछ बहुरूपिये मचाते बवाल

गिरते सेंसेक्स की

ख़बरों में दबे

आम आदमी की आह

देख कर मल्टीप्लेक्स के परदे पर

मुंह से निकालते वाह

सड़क पर भूखे बच्चों की

निगाह बचाकर

कुत्तों को रोटी पहुंचाती समाजसेवी

पेज थ्री की शान

आधुनिक देवी

रोटी के लिए कलपते

कई करोड़ लोगों का शोर

धुंधला पड़ता धुँआधार डी जे की धमक में

ज्यों बढो शहर के उस छोर

तरक्की वाकई ज़बरदस्त है

नाईट लाइफ मस्त है

विकास की उड़ान में

जा पहुंचे चाँद पर

पर करोड़ो आंखों में नमी

पानी में चन्दा और

चन्दा पर आदमी

मयंक ...............

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

आज फिर .....

आज करवाचौथ है......पुरूष प्रधान व्यवस्था का एक और पर्व ! सुशोभित करते रहे इसे पति पत्नी के पर्व के रूप में पर यही सामंत वाद है किक्यो नही पति के व्रत करने की भी प्रथा चलाई गई ?
क्या लम्बी उम्र की ज़रूरत केवल पुरूष को है ?

एक कविता जो मन में बचपन से मचलती रही, कागज़ पर आज आ पायी है ! स्वीकारें

आज फिर माँ

सुबह से भूखी है

और हमारी दिनचर्या

वैसी ही है

आज फिर भाभी

रात तक

पानी भी नहीं पीने वाली हैं

भइया चिल्ला कर

पूछते हैं

क्यों मेरी चाय बना ली है ?

आज फिर दीदी

व्रत रखेंगी

जीजाजी की

लम्बी उम्र के लिए

उनको खांसते खांसते

तीन महीने हुए

सुहागन मरने की

दुआएं करती

आज फिर नानी

अस्पताल में

भूखी हैं

बीमारी के हाल में

आज फिर दादी

सुना रही हैं बहुओं को

करवाचौथ की व्रत कथा

बहुएं भूखी प्यासी हैं

सुबह से

सुनती हैं मन से यथा

आज फिर पत्नी

खाने के लिए

पति का

मुंह देखेगी पहले

आज फिर पति

का दिन

वैसे ही बीता

दफ्तर में

चाय पर चाय पीता

आज फिर बिटिया

को बाज़ार से

दिला लाया टाफी

सोचा जी लो ज़िन्दगी

तुम्हारे करवाचौथ में

वक़्त है काफ़ी

मयंक सक्सेना

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

बाढ़ और अकाल

क्षमा चाहूँगा की पिछले तीन चार दिन से ताज़ा हवा पर कुछ ताज़ा नहीं ला पाया ...... अब क्या किया जाए कमबख्त न्यूज़ चैनल की नौकरी होती ही ऐसी है की वक्त हो ता कटता नहीं और जब न हो तो खाना सोना मुहाल !

खैर अभी बिहार में बाढ़ और कुछ दूसरे राज्यों में अकाल के हालत की चर्चा हुई और फिर आज सुबह मेरे लिहाज से देश के सबसे बौद्धिक और स्तरीय चैनल लोकसभा टीवी पर बिहार की बाढ़ पर एक संजीदा कार्यक्रम देखा। कार्यक्रम के अंत में बाबा नागार्जुन की एक कविता थी जो काफ़ी पहले सुनी थी याद आ गई। सोचा आज आपके सामने वही पेश कर दूँ, नागार्जुन के स्वभाव के अनुसार कविता सच्चाई का सच्चाई से बयान है......बाढ़ और अकाल दोनों पर सटीक बैठने लायक है पर मूलतः अकाल पर लिखी गई है .......


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।



दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।


-नागार्जुन


बुधवार, 8 अक्तूबर 2008

नन्ही पुजारन

संकट का वक्त सा दीखता है यह जब मुल्क के तमाम धर्म के ठेकेदारों को आम आदमी को बरगलाते देखता हूँ......कमोबेश पूरे मुल्क का यही हाल है। इन दिनों ब्लॉग जगत में भी कट्टरपंथ की आंधी आई हुई है.....अब लोग लेखक या पत्रकार होने के बजाय हिंदू और मुसलमान हो रहे हैं और ब्लॉग के नाम भी धर्म का कच्चा रंग छोड़ रहे हैं। हालत ऐसे हैं कि ना तो बैठ कर रोने का वक्त बचा है, ना ही सोचने की हमें तमीज रह गई है। मुल्क में भुखमरी, बाढ़ और आतंकवाद के सवालों पर मज़हबी जवाब भारी पड़ रहे हैं। कट्टरपंथ पूरा फन फैलाए खडा है और डसने को तैयार है...... ऐसे में क्या किया जाए ये दुविधा है....क्या वाकई धर्म जनता की अफीम है ?

हाल ही में मशहूर शायर मजाज़ लखनवी की एक नज़्म हाथ लगी सोचा उसे आपके नज़्र कर दूँ ....... शायद पत्थर दिल कुछ पिघलें ( पर उसके लिए भाव समझना होगा, जो शायद हमारी अब आदत नहीं रही !)

नन्ही पुजारन



इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन, पतली बाहें, पतली गर्दन।

भोर भये मन्दिर आयी है, आई नहीं है माँ लायी है।

वक्त से पहले जाग उठी है, नींद भी आँखों में भरी है।

ठोडी तक लट आयी हुई है, यूँही सी लहराई हुई है।

आँखों में तारों की चमक है, मुखडे पे चाँदी की झलक है।

कैसी सुन्दर है क्या कहिए, नन्ही सी एक सीता कहिए।


धूप चढे तारा चमका है, पत्थर पर एक फूल खिला है।

चाँद का टुकडा, फूल की डाली, कमसिन सीधी भोली-भाली।


कान में चाँदी की बाली है, हाथ में पीतल की थाली है।

दिल में लेकिन ध्यान नहीं है, पूजा का कुछ ज्ञान नहीं है।


कैसी भोली और सीधी है, मन्दिर की छत देख रही है।

माँ बढकर चुटकी लेती है, चुप चुप सी वो हँस देती है।


हँसना रोना उसका मजहब, उसको पूजा से क्या मतलब।

खुद तो आई है मन्दिर में, मन में उसका है गुडया घर में।


- मजाज़ लखनवी

शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

इक शमा और जला लूँ

हिन्दी भाषा के ब्लॉग क्रान्ति के आन्दोलन में एक और क्रांतिकारी शामिल हो गया है......क्रान्ति इस सन्दर्भ में की ब्लॉग ने हिन्दी जगत में ग़दर मचा दिया है और क्रांतिकारी वह हर व्यक्ति जो ग़दर मचाना चाहता है ! फिलहाल ग़दर में न फंस कर मुद्दे पर आते हैं तो एक नया ब्लॉगर आप सबके बीच आ गया है और उनका परिचय कराता हूँ आपसे ......ये हैं अनुपम अग्रवाल जी। लखनऊ के रहने वाले अनुपम जी पेशे से इंजिनियर है और फिलहाल विद्युत् अभियंता के रूप में उत्तर प्रदेश के अनपरा प्लांट में कार्यरत हैं।

खाली समय में शानदार कवितायें और ग़ज़ल लिखने वाले अनुपम जी के ब्लॉग पर पहली ग़ज़ल एक बानगी भर है......

प्यास महफ़िल की बुझा लूँ तो कहीं और चलूँ

इक शमा और जला लूँ तो कहीं और चलूँ

सबसे बड़ी बात है की जब लोग आराम करने की सोचते हैं उस वयमें अनुपम जी कंप्यूटर से खेल रहे हैं और ब्लॉग्गिंग शुरू की है....... तो देखा जवानी तब तक है जब तक आप उसे महसूस करें.....

तो अनुपम जी का ब्लॉग देखें ....... नाम है ..............ज़िन्दगी

www.aapkesamne.blogspot.com

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

अदम गोंडवी की ये ग़ज़ल

ये दौर मुल्क के लिए मुश्किलों का दौर है.....भरोसा दोनों ओर का टूटा है और हालत रोज़ बा रोज़ बदसे बदतर होते जा रहे हैं ! ऐसे में अचानक आज शायर / कवि अदम गोंडवी की ये ग़ज़ल हाथ लगी तो सोचा ये सवा शेर आपकी नज़र कर दूँ ......तो पढ़ें और गुनें !

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी