मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

बाढ़ और अकाल

क्षमा चाहूँगा की पिछले तीन चार दिन से ताज़ा हवा पर कुछ ताज़ा नहीं ला पाया ...... अब क्या किया जाए कमबख्त न्यूज़ चैनल की नौकरी होती ही ऐसी है की वक्त हो ता कटता नहीं और जब न हो तो खाना सोना मुहाल !

खैर अभी बिहार में बाढ़ और कुछ दूसरे राज्यों में अकाल के हालत की चर्चा हुई और फिर आज सुबह मेरे लिहाज से देश के सबसे बौद्धिक और स्तरीय चैनल लोकसभा टीवी पर बिहार की बाढ़ पर एक संजीदा कार्यक्रम देखा। कार्यक्रम के अंत में बाबा नागार्जुन की एक कविता थी जो काफ़ी पहले सुनी थी याद आ गई। सोचा आज आपके सामने वही पेश कर दूँ, नागार्जुन के स्वभाव के अनुसार कविता सच्चाई का सच्चाई से बयान है......बाढ़ और अकाल दोनों पर सटीक बैठने लायक है पर मूलतः अकाल पर लिखी गई है .......


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।



दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।


-नागार्जुन


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