मंगलवार, 30 सितंबर 2008

कुछ और चिट्ठियां

सप्ताह भर भगत सिंह की सालगिरह मना रहे ताज़ा हवा पर आज थोड़ा देर से सही पर एक पोस्ट ले ही आया हूँ ...... आज पेश हैं भगत सिंह के कुछ व्यक्तिगत पात्र जो उन्होंने अपने परिवार को लिखे थे। इन पत्रों में झलक मिलती है की जूनून क्या होता है और उनमे वो किस हद तक भरा था !

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शादी से इनकार के लिए पिताको पत्र

पूज्य पिता जी,

नमस्ते।

मेरी जिन्दगी मकसदे आला यानी आजादी-ए-हिन्द के असूल के लिए वक्फ हो चुकी है। इसलिए मेरी जिन्दगी में आराम और दुनियावी खाहशात बायसे किशश नहीं है।

आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हू।

आपका ताबेदारभगतसिंह

छोटे भाई कुलतार को अन्तिम पत्र

सेण्ट्रल जेल,

3 मार्च,1931

प्यारे कुलतार,

आज तुम्हारी आ¡खों में आसू देखकर बहुत दुख पहु¡चा। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था। तुम्हारे आ¡सू मुझसे सहन नहीं होते। बरखुरदार, हिम्मत से विद्या प्राप्त करना और स्वास्थ्य का ध्यान रखना। हौसला रखना, और क्या कहू-

उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे-जफ़ा क्या है,

हमें यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।

दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,

सारा जहा अदू सही, आओ मुक़ाबला करें।

कोई दम का मेहमा हू ऐ अहले-महिफ़ल,

चराग़े- सहर हू¡ बुझा चाहता हू।

हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,

ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे।

अच्छा रूख़सत।

खुश रहो अहले-वतन, हम तो स़फर करते हैं।

हिम्मत से रहना।

नमस्ते।

तुम्हारा भाई,

भगतसिंह

पढ़ें और एक बार फिर की अब सोचना शुरू करें .......

रविवार, 28 सितंबर 2008

भगत सिंह की माँ की अपील ....

यह पर्चा भगत सिंह की माँ का संदेश है आम अवाम के नाम ...... यह दुर्लभ पर्चा भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद उनके मुकदमे के दौरान छपे थे। इस पर्चे में उनकी माँ विद्यावती ने उनके स्वभाव और देश के प्रति उनके जूनून को नवयुवकों के सामने रखा है। पाल प्रेस, लुधिआना से छपे इन पर्चों में भगत सिंह की माता के हस्ताक्षर हैं और युवक केन्द्र, खटकर कलां गाँव, जालंधर का पता है....इसे पढ़कर यह समझ में आएगा की किसी व्यक्ति का भविष्य का जीवन उसके परिवार और संस्कारों से भी काफ़ी प्रभावित होता है। इसे पढ़ें....

अंत में एक बार फिर ...... सोचना शुरू करें !

भगत सिंह......




२८ सितम्बर ..... शहीद ऐ आज़म भगत सिंह की आज जन्मतिथि है......नहीं मालूम कितने लोगों को पता है पर कल यश चोपडा का जन्मदिन था और अखबार-टीवी और पोर्टल अटे पड़े थे। आज लता मंगेशकर का जन्मदिन है आज भी यही हाल है ......या तो हम सो रहे हैं या हम सब बेहोशी में हैं पर यह जो भी है इसे दूर करना होगा।
भगत सिंह की पैदाइश २८ सितम्बर, १९०७ को आज के पाकिस्तान के लायलपुर जिले के बंगा में चक नंबर १०५ में हुआ जबकि उनका पुश्तैनी घर आज भी भारतीय पंजाब के नवाशहर के खट्टरकलां गाँवमें है। भगत सिंह ने क्या कुछ किया वह शायद हम सब जानते हैं पर शायद उनको याद करने की ज़हमत उठाना हम गवारा नहीं कर सकते हैं। उनकी जयंती के अवसर पर ताज़ा हवा उनको याद करते हुए उनकी कुछ स्मृतियाँ आपसे बांटेगा और यही नही ताज़ा हवा (http://www.taazahavaa.blogspot.com/) इस पूरे हफ्ते भगत सिंह के दुर्लभ पात्र और किस्से आपसे बांटेगा ............


आख़िरी पैगाम

यह वो आखिरी ख़त है जो भगत सिंह ने २२ मार्च १९३१ को यानि की फांसी के एक दिन पहले अपने साथियों को लिखा था ..........

22 मार्च,1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह

फिर यही कहूँगा ........ अब सोचना शुरू कर दें !

शनिवार, 27 सितंबर 2008

आतंक का फिर हमला


देश के दिल दिल्ली अब दिल की मरीज़ हो चली है। आज दोपहर २:१५ से २:३० के बीच दिल्ली के पुराने और मशहूर इलाके महरौली में दो संदिग्ध विस्फोट हुए जिसमे अब तक प्राप्त सूचनाओं के अनुसार ४-५ लोगों की मौत हो चुकी है जबकि असली आंकडा अभी आना बाकी है। ज्ञात हो कि कुतुबमीनार के लिए मशहूर इलाके महरौली के फूल बाज़ार के इलाके में यह धमाका हुआ। यह धमाके इस मायने में खतरनाक संकेत देते हैं कि पुलिस और सरकार ने पिछली १३ सितम्बर को हुए धमाको के बाद बड़े बड़े दावे कर डाले थे। हाल ही में आतंकियों ने अनेक ई मेल भी की जिनमे तमाम तरह की धमकियां दी गई और पुलिस ने सतर्कता भी बढ़ा दी पर नतीजे सिफर ही रहे और आज फिर ये घटना हुई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार स्कूटर सवार दो युवकों ने एक झोले में यह विस्फोटक फूल बाज़ार की सड़क पर फेंका और वहाँ से चले गए, उनको लोगों ने यह कह कर आवाज़ भी दी कि शायद उनका कोई सामान गिर गया हो पर जब तक लोग कुछ समझ पाते ...... चारों तरफ़ लाशें, घायल और खून बिखरा पड़ा था। बताया जाता है कि उस बैग को एक बच्चे ने उठाया और उसके साथ ही उस बैग में धमाका हो गया और उस बच्चे के चीथड़े उड़ गए। अभी तक ४ लोगों की मौत की ख़बर है जिसमे दो बच्चे हैं।
सवाल आतंकियों से है जो अपने आपको दहशतगर्द की जगह मुजाहिद्दीन कहते हैं ..... कि धर्म की लड़ाई में बेगुनाहों की जान लेने पर क्या कोई धर्म माफ़ करता है ?
सवाल सरकार से है जो शायद सुरक्षा से ज्यादा मुआवजा देने में तत्परता दिखाती है......कि आख़िर उसकी कोई जवाबदेही है या नहीं ?
सवाल हम सबसे है कि हम अपने समाज और अपने मुल्क को लेकर कितने संवेदनशील हैं ....... क्या अब हमें सड़कों पर नहीं उतर आना चाहिए ?
दुष्यंत कुमार ने जैसा कहा....
पक चुकी हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं


अब वक़्त आ गया है कि हम सोचना शुरू करें ...... नेताओं से उम्मीद ना करें, अपने अपने स्तर पर आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखें....सडकों पर तमाशबीन बनने की जगह सडको पर जुटना शुरू करें ...... ???

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

बीच की दीवार



हाल ही के धमाकों के बाद मुल्क में जिस तरह का माहौल बना है उस पर सोचना होगा। एक बार फिर हम धार्मिक पहचान के आधार पर होने वाले मामलों में उलझ रहे हैं और हिन्दू-मुस्लिम होने के कारण संदेहों में फंसे हैं। यही नहीं एक क्षेत्र विशेष के कुछ लोगों के इन दिल्ली धमाकों में शामिल पाये जाने से उस इलाके को भी बदनाम किया जा रहा है.......मुल्क में दोबारा मज़हबी शक और वैमनस्य का माहौल बनने लगा है। ऐसे में एक कहानी हाथ लगी जो शायद कुछ मदद कर पाए.....मेरी तो की, आप भी पढ़ें !


ये एक उर्दू कहानी है, जिसे गयासुर्रह्मान ने लिखा है और इसका हिन्दी अनुवाद किया है नसीम अजीजी ने .......


बीच की दीवार


पूरे दस दिन हो गए थे। फ़साद की आग जो भड़की तो बुझने का नाम नहीं लेती थी। सारे शहर में सख्त कर्प्यू के बावजूद वारदातें हो रही थीं। पूरी दस रातें आंखों में गुजर गईं। इस क़दर शोर-शराबे में नींद किसको आती है? फिर हर वक्त ये डर कि कहीं फ़सादी हमला न कर दें। यों तो पहले ही सब कुछ लुट चुका है लेकिन जान सबको प्यारी होती है और उससे भी प्यारी औलाद।मशकूर अली और उनकी बेगम, अपनी दो बेटियों को गले लगाए बारगाहे-इलाही में दुआएं करते रहते थे कि ''खुदाया इन मासूम बच्चियों पर कोई आंच न आये, चाहे हमारी चिक्का बोटी कर दी जाये।''बड़ी लड़की राशिदा हाई स्कूल पास करके इंटर में दाख़िल हुई तो अचानक ही उस पर ऐसा निखार आया कि पूरे मुहल्ले की नज़रों में समा गई। कॉलेज के मनचले हसरत भरी निगाहों से देखने लगे। आस-पास क्या, दूरदराज़ से भी कई पैग़ाम आने लगे लेकिन मशकूर अली ये कहकर इंकार कर देते कि ''अभी बच्ची पढ़ रही है और मैं इसको आला तालीम दिलवाना चाहता हूं। खुदा ने बेटा नहीं दिया तो क्या, ये मेरी बेटियां ही बेटों से बेहतर हैं।''लेकिन राशिदा की जवानी ने मां-बाप की आंखों से नींद छीन ली थी और दिन-ब-दिन एक अजीब सा इज़्तेराब बढ़ता जा रहा था और पिछले दस रोज़ से तो वो सिर्फ राशिदा की फिक्र में इतने परेशान थे कि कोई मौत से भी इतना परेशान न होगा। वैसे कई बार मशकूर अली ने अपनी दो नाली बंदूक निकाल कर उसकी सफाई की थी और पुराने करातूस को धूप दिखाई थी। वो रोजाना कारतूस गिन-गिन कर रखते थे। कुल नौ कारतूस थे।
उन्होंने अच्छी तरह सोच रखा था कि अगर फ़सादी आते हैं, पहले तो सद्र दरवाज़ा ही आसानी से नहीं टूट सकेगा। अगर दरवाज़ा टूट भी जाता है और वो अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो मशकूर अली राशिदा को अपने साथ ही रखेंगे। जहां तक हो सका आठ कारतूसों से फसादियों का मुकाबला करेंगे और नवां कारतूस राशिदा की इज्जत बचाने के लिए काफी होगा लेकिन आज उन्हें राशिदा की कम और अपनी छोटी बेटी सुगरा की ज्यादा फिक्र थी। सुग़रा सात-आठ साल की थी और अपनी तोतली जबान में इतनी प्यारी बातें करती थी कि सभी उसके गरवीदा थे। पिछले तीन दिन से वो बुखार में मुब्तला थी। दवाई तो दरकिनार, खाने के लिए एक दाना भी बाकी न था।मशकूर अली हमेशा ज़ख़ीरा अंदोजी के ख़िलाफ़ थे और कभी उन्होंने मुस्तक्बिल की फिक्र न की थी लेकिन अब पछता रहे थे।'' काश पहले ही एक आध बोरी आटा या चावल वैगरह जमा कर लेता तो आज ये नौबत न आती।'' उस कर्फ्यू में बिजली और पानी का निजाम दरहम-बरहम हो गया था। अब तो पीने का पानी भी बमुश्किल तमाम फराहम हो पा रहा था और फिर रह-रह कर सुग़रा का दिलदोज़ अंदाज़ के साथ खाना मांगना उन्हें बेचैन कर रहा था। आज तक उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए थे। जमींदारी खत्म हुई, जायेदाद के बंटवारे हुए। मशकूर अली के हिस्से में ये पुराना मकान और चार छोटी-छोटी दुकानें आईं, जिनका बरायेनाम किराया ही उनका जरिय-ए-गुज़र औक़ात था। उन्होंने इसी पर इक्तेफ़ा किया, लेकिन अपने भाइयों में सबसे बड़े होने के नाते उन्होंने जिद करके अपने बुजुर्गों की निशानी ये दो-नाली बंदूक अपने कब्जे में कर ली थी। कितने ही उतार-चढ़ाव आये, एक-एक करके घर की सभी क़ीमती चीजें सस्ते दामों में बिक गई। फाकों तक की नौबत आई लेकिन उन्हें अपने आबाई शानो शाकत की निशानी उस दो नाली बंदूक को बेचने का ख्याल भी नहीं, मगर आज वो अपनी सुग़रा की भूख की खातिर अपनी जान भी बेचने को तैयार थे। वो फ़कीरों की तरह भीख मांग कर भी अपनी बच्ची का पेट भरना चाहते थे लेकिन बाहर निकलना मुमकिन न था। कर्फ्यू ने सख्त शक्ल अख्तियार कर ली थी, देखते ही गोली मार देने के अहकामात जारी हो गए थे। बाहर पुलिस की जीप गुजरती और लाउडस्पीकर पर यही ऐलान करती कि कोई भी घर से बाहर न निकले।


आस-पड़ोस में सभी हिंदुओं के मकान थे। यों तो उनके ताल्लुकात सभी से अच्छे थे लेकिन इस फ़साद ने तो दिलों में दरारें पैदा कर दी थीं, किस पर एतबार किया जाय? उनके घर की दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल रहते थे। उनकी बच्ची भी सुग़रा के साथ एक ही स्कूल में पढ़ती थी। दोनों में इस क़दर दोस्ती थी कि एक दूसरे के बगैर एक पल भी रहना गंवारा न था। ऊषा की गुड़िया और सुग़रा का गुड्डा, जिनकी कई बार शादी रचाई गई थी, आज अलग-अलग थे। ऊषा उधर रो-रो कर सुग़रा के घर जाने की जिद कर रही थी लेकिन पंडित रतनलाल खतरा महसूस कर रहे थे। ''मशकूर अली मुसलमान है, वैसे तो वो भला आदमी है लेकिन दंगे में तो सारे मुसल्ले एक जैसे हो जाते हैं। नारा-ए-तकबीर की आवाज़ कान में पड़ते ही आपे से बाहर हो जाते हैं। मैं अपनी बेटी को उसके घर भेजूं और वो उसका गला दबा दे तो क्या होगा?''वो अपनी बेटी को बहुत समझाते लेकिन उसकी जिद बढ़ती ही जा रही थी। उधर सुग़रा की हालत ग़ैर हो रही थी। मशकूर अली की बेगम और राशिदा रोने लगीं। मशकूर अली उन्हें दिलासा तो दे रहे थे लेकिन खुद उनकी आवाज़ भी भर आई थी और आंखें डबडबाने लगीं। वो कुछ कहना ही चाहते थे कि अचानक उनकी दीवार पर आहट हुई। रात काफी हो चुकी थी। कोई उनके घर की दीवार तोड़ रहा था। दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल का मकान था। मशकूर अली ने अपनी बंदूक कस के पक़ड़ ली। उसमें कारतूस भर दिए और खतरे से निपटने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने बेगम से कहा कि वो सुग़रा को लेकर दूसरे कमरे में चली जायं और राशिदा को अपने साथ रहने का हुक्म दिया। वो दिल ही दिल में बड़बड़ाए, '' मुझे रतनलाल से ऐसी उम्मीद न थी कि वो फसादियों को अपने घर से मेरे घर में दाखिल करेगा। वैसे तो बड़ा प्यार जताता था लेकिन आज उसने अपना कमीनापन दिखा ही दिया।''मशकूर अली ने मुस्तहकम इरादा कर दिया कि फ़सादियों के अंदर घुसते ही वो गोली चला देंगे चाहे उनमें रतनलाल ही क्यों नो हो, जब उसको दोस्ती का एहसास नहीं है तो मैं क्यों हिचकिचाऊं।दीवार के पीछे से कुदाल की ज़र्बें लग रही थीं और हर ज़र्ब के साथ मशकूर अली के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, राशिदा उनके पीछे सहमी हुई, ज़ख्मी फ़ाख़्ता की तरह कांप रही थी--''पुराने ज़माने की दीवार इतनी आसानी से नहीं गिरेगी''---एक जगह से चूना उखड़ना शुरू हुआ। मशकूर अली दीवार के बिल्कुल करीब आ गए। बहुत देर के बाद दीवार की एक ईंट घऱ में गिरी और आर-पार एक सुराख हो गया। मशकूर अली ने ललकार कर कहा--''खबरदार! अगर किसी ने अंदर घुसने की कोशिश की तो गोली चला दूंगा।'' और उन्होंने बंदूक की नाल ईंट से निकले हुए सूराख पर लगा दी लेकिन दूसरे ही लम्हे ऊषा की आवाज़ ने चौंका दिया।''मशकूर चाचा, मैं सुग़रा के लिए खाना लाई हूं।'' और उसने सूराख से एक छोटा सा टिफिन अंदर की तरफ बढ़ा दिया।



नोट: हमें सोचना पड़ेगा अब .......सबको मज़हब से ऊपर उठ कर

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

मकडियां

सन्नाटे के शोर से
कानो को पकड़
दांतों को भींचता
सामने के
भयानक दृश्य
देख न पाने की हालत में
आंखों को मींचता
इधर उधर
हर तरफ़ ....
जहाँ देखो
या न देखो
सब कहीं झूठ ....
धोखा
लोग होते जाते
और और और
मक्कार
सब हैं अय्यार
अंधेरे में
पूरे बदन पर
रेंगती हैं फंसाने को
शिकार बनाने को
जाल बुनती हैं
हजारों मकडियां
दरो दीवारों पर ......
दिलो की दीवारों पर !

रविवार, 14 सितंबर 2008

हिंदी को आजादी चाहिए

हिन्दी फिल्मो के मशहूर लेखक और गीतकार हैं प्रसून जोशी। प्रसून जी कभी पेशे से एड गुरु हुआ करते थे पर मन से हमेशा थे साहित्यकार तो आखिरकार सब्र नहीं कर पाये और कूद ही गए सक्रिय लेखन में। प्रसून शानदार कवि हैं और इसका दर्शन हमें उनके फिल्मी गीतों में भी हो जाता है। आँधियों से झगड़ रही है लौ मेरी ...अब मशालों सी बढ़ रही है लौ मेरी ! जैसी पंक्तियाँ लिखने वाले प्रसून जोशी ने हाल ही में दैनिक भास्कर के लिए हिन्दी पर एक आलेख लिखा जो आज हिन्दी दिवस के अवसर पर आपके लिए भास्कर से साभार प्रस्तुत है,

हिंदी को आजादी चाहिए


प्रसून जोशी


भाषा कोई भी हो, वह अपनी जमीन से उपजती और पनपती है, इसलिए कोई लाख चाहे भी तो उसका रिश्ता उस जमीन से तोड़ नहीं सकता। भाषा को लेकर आज तक जितने भी विवाद हुए हैं, उसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं रहा है। कुछ स्वार्थी तत्वों का हित-साधन उससे जरूर हो जाता है। भाषा का उससे न कुछ बनता है, न बिगड़ता है। जहां तक हिंदी की बात है, वह खुद इतनी सक्षम और सशक्त है कि अपना पालन-पोषण जीवंत तरीके से कर रही है। हर भाषा समय के साथ अपना रूप-रंग बदलती रहती है। इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने मूल रूप से च्युत हो रही है। दरअसल उसकी आत्मा नहीं बदलती है। हिंदी को खुद खिलने और खेलने की आजादी मिलनी चाहिए।


हिंदी तो सतत प्रवाहित धारा है। धारा जरूरी नहीं कि सीधी ही चले, आड़ी-तिरछी भी चलेगी। उसे उसी रूप में बहने नहीं दिया गया, तो उसके साथ अन्याय होगा। हिंदी का विकास कभी नहीं रुका, सिर्फ जगह-जगह रूप बदल रहा है। जब मैं उत्तर भारत में था तो मुझे लगता था कि जो हिंदी वहां बोली जा रही है, वही सही हिंदी है। जब मैं मुंबई आया तो पाया कि हिंदी तो यहां भी है, मगर उसमें कुछ टपोरीपन और मस्ती मिली हुई है। उसे ही हर कोई सुनता और बोलता है। किसी को कोई परेशानी भी नहीं होती। इसका मतलब यह नहीं कि हिंदी विकृत हो गई। हां, यह जरूर लगा कि व्याकरण यहां मजबूर हो गया है। भाषा-शुध्दि की आवश्यकता है। मगर यह शुध्दिकरण अभियान कहां-कहां चलाएंगे? इसलिए भाषा को अपनी राह पर चलते रहने की आजादी चाहिए, जो अंतत: समृध्दि ही देगी।


हमें अंग्रेजी से कुछ सीखने की जरूरत है। उसकी समृध्दि का राज सभी जानते हैं कि वह जहां गई है, वहीं की हो गई। भारत, स्पेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया में अंग्रेजी को अलग-अलग ढंग से बोला जाता है, क्योंकि वहां की स्थानीय बोलियां उसमें शामिल हो जाती हैं। आंचलिक भाषाओं ने अंग्रेजी को इतना कुछ दे दिया है कि अंग्रेजी ऋणी हो गई है। भारत में भी लगभग सारी भाषाओं के शब्द अंग्रेजी में घुल-मिल रहे हैं। इस मामले में हिंदी पिछड़ रही है। हिंदी के तथाकथित अलमबरदारों ने इसे अपनी ही सीमा में देखने और रखने का मानो संकल्प ले लिया है, लेकिन क्या किसी के रोके हिंदी का विकास रुक रहा है? अगर रुकना होता तो हिंदी के इतने सारे टीवी चैनल नहीं आए होते! और भी दर्जनों चैनल आने वाले हैं। हिंदी के अखबारों के संस्करणों में लगातार वृध्दि हो रही है। पाठकों की संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।


टीवी सीरियल्स और हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता और मांग में इजाफा ही हो रहा है। आज के जितने सफल विज्ञापन हिट हैं, वे सारे के सारे लगभग हिंदी में ही हैं। विज्ञापनों में 'कैच लाइन' का बहुत महत्व है, हिंदी में ज्यादा चर्चित हैं। वह चाहे 'ठंडा मतलब...', 'सबका ठंडा एक...', 'दोबारा मत पूछना...', 'पीयो सर उठा के...' हो या फिर 'ज्यादा सफेदी...' हो- हिंदी के सारे कैच लाइन मुहावरे की तरह प्रचलित हो रहे हैं। हिंदीभाषियों को और भी उदार होने की जरूरत है। हृदय विशाल हो जाए तो सीमा-रेखा अपने आप मिट जाएगी। सभी भाषाओं और बोलियों का सहयोग लेना चाहिए। अंग्रेजी के साथ भी जीने की आदत डालनी चाहिए, इसलिए मेरा मानना है कि भाषा के कपाट को कभी बंद नहीं रखना चाहिए। उसका खुला रहना सुखकर और समृध्दिकर है।


कोई कैसे बोलेगा और कोई कैसे- इसे समस्या नहीं समझना चाहिए। हिंदी बोलने की आदत अगर कोई डाल रहा है तो यह अच्छी बात है। गैर-हिंदीभाषी ही क्यों, हिंदीभाषी भी अशुध्द बोलते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि वे हिंदी को बिगाड़ रहे हैं। इसे इस तरह कहना चाहिए कि वे बोलकर भाषा को सीखने और शुध्द करने का प्रयास कर रहे हैं। यह उनकी मुख्यधारा(हिंदी) में शामिल होने की इच्छा है। गाना सबका स्वभाव होता है। कोई अच्छा गाता है और कोई बुरा। बुरा गाने वालों का लगाव गीतों से उतना ही है, जितना अच्छा गाने वालों का। फर्क इतना ही है कि किसी का सुर अच्छा लगता है और किसी का बुरा। गानों की तरह भाषा पर सबकी पकड़ एक जैसी हो, संभव नहीं है।


हिंदी के हितैषी पता नहीं क्यों, इसे लेकर इतना बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं! हम यह क्यों नहीं मानते कि सबका बौध्दिक स्तर एक जैसा नहीं होता? कोई भाषा और व्याकरण के मामले में कमजोर होता है और कोई परिष्कृत शब्दों का इस्तेमाल करता है। इसके बावजूद दोनों में संवाद होना चाहिए। इससे दोनों में समृध्दि आएगी। जिम्मेदारी भी महसूस होगी। हां, यह बात सही है कि आजकल फिल्मों की स्क्रिप्ट रोमन लिपि में लिखी जाती है, मगर इससे क्या फर्क पड़ता है। अंतत: पर्दे पर तो वह हिंदी ही बनकर आती है। इसे अंग्रेजीदां की जिद नहीं कह सकते। संभव है उन्हें अच्छी हिंदी बोलनी आती हो, मगर पढ़नी नहीं। सीधे हिंदी पढ़ने के बाद जो भाव आता है, संभव है वह रोमन से नहीं आता हो, मगर यह काम निर्देशक का है कि संवाद के अनुसार एक्सप्रेशन या इमोशन कैसे लाया जाए! जहां तक फिल्म, टीवी, एड मीडिया में अंग्रेजी स्कूलों से पढ़े लोगों के आने की बात है, इसमें हिंदी को खुश होना चाहिए कि उन्हें हिंदी ही आश्रय दे रही है। वे अंग्रेजी में भले योजना बनाते हों, स्क्रिप्ट भी अंग्रेजी में मांगते हों, सेट पर पूरा माहौल अंग्रेजीनुमा हो, मगर कलाकारों को जब डायलॉग बोलने की बारी आएगी तो क्या बोलेंगे?


वैश्वीकरण के बाद हिंदी का भी विस्तार हो रहा है। हिंदी फिल्में विदेशों में भी धूम मचा रही हैं। इसे सिर्फ भारतीय या भारत के गैर-हिंदीभाषी ही नहीं देखते हैं, बल्कि विदेशी भी देखते हैं और समझने की कोशिश करते हैं। अगर आज की भाषा में कहूं तो हिंदी एक बड़ा बाजार बन गया है। विदेशी भी हिंदी में काम करना चाह रहे हैं। भले उनके डायलॉग डब किए जाएं, मगर हिंदी की सत्ता को वे स्वीकार तो कर ही रहे हैं। हिंदी की अपनी भाव-भूमि है। उसके अपने शब्दों में क्षेत्र, जमीन, मौसम, संवेदना और भावना का असर होता है। 'तारे जमीं पर' में 'मां...' वाला गाना भारतीय जमीन और मानसिकता का प्रतिबिंब है। उसका अनुवाद अगर विदेशी भाषा में होगा तो वह असर नहीं पैदा होगा, क्योंकि वहां की संस्कृति में 'मां' का क्या स्थान है, ठीक-ठीक पता नहीं है। यह निश्चित है कि मां का जो दर्जा यहां है, वैसा कहीं नहीं है। इसलिए मैं मानता हूं कि हिंदी की भाषा जितनी समृध्द है, उतने ही विचार भी परिपक्व हैं। हिंदी को रोकना संभव नहीं है, मगर हमारी जिम्मेदारी है कि हम हिंदी को खिलने की आजादी दें।


(भास्कर से साभार)

रविवार, 7 सितंबर 2008

आवाज़ .....

काफ़ी दिनों से इस कविता को पूरा करने के लिए परेशान था सो आज हो ही गई ...... ये हम सबकी हकीक़त है ..... सब जो सोचा करते हैं, तो पढ़ें ....

चुप रहो
तुम्हारी आवाज़
दूसरों के कानों तक न जाए
यही बेहतर है

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
सच बोले
जो दूसरों को हो नापसंद
तो कर लो इसे बंद

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
तुम्हारे पक्ष में हो
और उनको लगे अपने ख़िलाफ़
वो करेंगे नहीं माफ़

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
इतनी बुलंद हो
की उनके कानों के परदे फट जायें
फिर तुम्हारे साथी भी
तुमसे कट जाएँ

तुम्हारी आवाज़
दूसरी आवाजों से
अलग हुई तो
उन आवाजों को अच्छा नहीं लगेगा
वो
तब ?

तुम्हारी आवाज़ में सवाल हो सकते हैं
सवालों से बडों का
अपमान होता है
तुम्हारी आवाज़ में
अगर जवाब हुए
तो उनका हत मान होता है

तुम्हारी आवाज़
भले
तुमको मधुर लगे
पर उनको ये पसंद नहीं
इसलिए
या तो चुप रहो
या फिर
ज़ोर से चिल्लाओ
दुनिया को भूल जाओ
बंधन क्यूंकि
टूटने को उत्सुक है

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

राधाकृष्णन, कबीर, तुम्हारे या फिर अपने बहाने ...?

(कुछ व्यक्तिगत कारणों से इधर व्यस्त या कहूं की अस्त - व्यस्त रहा इस कारण शिक्षक दिवस पर ज़्यादा तैयारी से ब्लॉग पर नही आ पाया उसके लिए क्षमायाचना के साथ)

A teacher affects eternity; he can never tell where his influence stops ( एक शिक्षक आने वाले युगों तक प्रभाव डालता है.....कितना और कितने समय तक यह उसे ख़ुद को भी नहीं मालूम होता !)

हेनरी ब्रुक एडम्स की यह उक्ति वाकई कितनी सटीक है। कल जब मैं पहली बार इतनी परेशानी में था की मुझे याद ही न रहा कि आज शिक्षक दिवस है, तभी मुझे एक ई मेल मिली जिसमे यह उक्ति थी ..... कुछ समय के लिए अपनी सारी परेशानी भूल कर स्कूल के दिनों में चला गया।

राम-नाम कै पटंतरै, देबे कौं कछु नाहिं ।

क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥

सुबह सुबह अपनी साइकिल उठा कर सबसे पहले फूलों की दूकान पर जाकर मास्टर जी/सर/गुरूजी के लिए फूल खरीदना......"५ रुपये का है बेटा .... "

"चचा यार घर से ३ ही रुपये मिले हैं आज मास्टर साब को फूल देना ज़रूरी है....टीचर्स डे है ना आज !"

"ऊ तो मालोमै है हमको, अमा बरखुरदार ये बताओ ..... साल भर तो उनको तिगनी का नाच नचाये रहते हो, ससुर ऊ दिन उनकी गाड़ी की हवा भी तुम्ही निकाले थे ना ? आज कौन सा गज़ब हो गया कि अमां फूल पाती चढ़ा रहे हो ??"

" अमां चचा ऐसा है कहानी ना समझाओ हमको, आज देश के दूसरे राष्ट्रपति डाक्टर राधाकृष्णन की सालगिरह है .... वो भी टीचर थे ..... बस उन्ही की याद में शिक्षक दिवस मनाते हैं "

" अच्छा जैसे १५ अगस्त - २६ जनवरी मानते हैं ?"

" हाँ ऐसे ही समझ लीजिये .... ख़ुद तो चले गए ...हम को फंसा गए ये सब मनाने को !!"

We expect teachers to handle teenage pregnancy, substance abuse, and the failings of the family। Then we expect them to educate our children - John Sculley

मैं सोचता हूँ हम में से ज़्यादातर को ये याद होगा ...... उसके बाद स्कूल में मास्टर साहब से दरवाज़े का फीता कटवाना और फिर उनको पूरी कक्षा की ओर से एक तोहफा ...... और फिर होड़ लग जाती उनको अपना अपना गुलाब देने की, कभी कभी कुछ बड़े घरों के बच्चे जब अध्यापकों के लिए महंगे तोहफे ले आते तब थोड़ा बुरा भी लगता पर खैर ...... अगले दिन से फिर वही ....

" होम वर्क किया ?"

" नहीं सर !"

" जाओ पीछे जा कर दोनों हाथ ऊपर कर के खड़े हो जाओ !"

" सर, आइन्दा से ऐसा नहीं होगा !"

" जितना कहा उतना सुनो ... पीछे !!" (और फिर तमाम तरह के बुरे चेहरे बनाते हुए पीछे जाकर खड़े हो जाते थे, दिमाग चलता रहता था कि अब इनको कैसे परेशान करना है ....)

गुरु कुम्हार सिख कुम्भ है, गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट
अन्तर हाथ सहार दे, बाहर बाहे चोट

ये सब याद आया और फिर याद आया स्कूल का आखिरी दिन और उस दिन की बाद से हर रोज़ स्कूल को, स्कूल के टीचरों को और स्कूल के दोस्तों को याद करना ..... वो सारे टीचर जिनको सताया उनकी भी याद आती है .....जिन सहपाठियों से एक एक साल बात नहीं की उनको रोज़ ऑरकुट पर ढूंढता हूँ ......
आज सोचता हूँ तो पाता हूँ कि आज जो कुछ हूँ उसमे उनका कितना बड़ा योगदान है ...... अंग्रेज़ी की क्लास में मार न खाता तो आज फर्राटे से बोल नहीं पाता, गणित की कक्षा में पीछे ना खडा होता तो आज जीवन के सवाल क्या हल कर पाता ? भूगोल की जिन कक्षाओं से गोल रहा वो आज तक गोल गोल घुमा रही हैं ......

गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागू पाय
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय

आज जो कुछ हूँ उसमें उनका योगदान अपरिमेय है......
उसका धन्यवाद नहीं कर सकता

तेरा तुझको सौंप दूँ, क्या लागत है मोर
मेरा मुझ में कुछ नाही, जो होवत सो तोर

पर आज ये बताना चाहता हूँ कि जो कुछ हूँ ...... आपकी वजह से, जहाँ तक पहुँच पाया आपकी वजह से ......जहाँ तक जाऊँगा, वह रास्ता आपका दिखाया हुआ है और चलने का हौसला भी आपने ही दिया है !
अगर कभी वो पा पाया जो सोच रखा है तो ...... वो मेरा नहीं आपका प्राप्य होगा, मेरी उपलब्धियां हमेशा आपकी मोहताज होंगी .....

गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नमः

आप सब जो बचपन से अब तक चलना ही नहीं .... बदलना भी सिखाते रहे ......... कल अगर दुनिया बदली तो सबसे पहला श्रेय आपको मिलेगा ......
हम सब ये स्वीकार करते हैं कि आप हमारे बचपन की यादों से वर्तमान के वक्त में शामिल हैं ..... आप की वजह से हम हैं इसलिए हम आप से अलग नहीं हो सकते
आपकी शिक्षा से हमारा ज्ञान है
आपकी दीक्षा से हमारा व्यवहार है
आपके प्रेक्षण से हमारा चरित्र
आपकी प्रेरणा से हमारी प्रगति
आपके ध्यान से हमारी शुचिता है
अगर
आज भी हम इतना नहीं पथ भ्रष्ट हुए जितना दुनिया ने प्रयास किया तो उसकी वजह भी आप हैं ......
आपकी मति आज हमारी गति बन गई है

और अधिक लिखना अब मूर्खता है ..... कबीर का अब यह आख़िरी दोहा बचा है,

सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुन लिखा ना जाए
( सारी धरती को कागज़ कर लूँ, सारे जंगलों के पेडो की कलम बना दूँ, सातों सागरों की स्याही कर लूँ पर गुरु के गुन लिखना सम्भव नहीं )

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

क्रन्तिकारी का अवसान ....

देश में नक्सलवादी आन्दोलन ने कई तरह के प्रभाव पैदा किए ..... कुछ अच्छे - कुछ बुरे और कुछ समझ से परे ! इन्ही प्रभावों के फलस्वरूप कुछ साहित्य भी उपजा जिसमे आम आदमी ..... गरीब आदमी की हताशा और दुःख से उपजा विद्रोह गीत था .... तंत्र के ख़िलाफ़ गुस्सा और रोष का संगीत था !

इस दौरान इस हवा ने कई क्रांतिकारी कवि पैदा किए, उन्ही में से एक और सबसे अलग कवि हुए वेणुगोपाल ....जिस दौर में नक्सल आन्दोलन उपजा और तब से अब तक वेणुगोपाल ने कम लिखा पर जो लिखा उसे पढ़ना किसी भी विद्रोही कवि या व्यक्ति के लिए ज़रूरी है

कवि वेणुगोपाल का सोमवार देर रात निधन हो गया। वह 65 वर्ष के थे और कैंसर से पीडित थे। 22 अक्टूबर 1942 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर में जन्मे वेणुगोपाल का मूल नाम नंद किशोर शर्मा था और वह देश में नक्सलवादी आंदोलन से उभरे हिंदी के प्रमुख क्रांतिकारी कवियों में से थे। उन्होंने दो शादियां की थीं और उनके एक पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। वेणुगोपाल के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए थे, जिनमें वे हाथ होते-1972, हवायें चुप नहीं रहती-1980 और चट्टानों का जलगीत-1980। इसके अलावा उन्होंने काम सौंदर्य शास्त्रों की भूमिका शीर्षक से एक शोध ग्रंथ भी लिखा था।
वेणुगोपाल ने प्रमुख रंगकर्मी बब कारंत के नाटकों का निर्देशन भी किया था और उनमें अभिनय भी किया था। वह हैदराबाद में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता करते थे।
उनके बारे में ज़्यादा कहने से बेहतर होगा की आपको उनकी रचना पढ़वा दूँ ..... पढे और सोचें ...

ख़तरे

ख़तरे पारदर्शी होते हैं।

ख़ूबसूरत।

अपने पार भविष्य दिखाते हुए।

जैसे छोटे से गुदाज बदन वाली बच्ची

किसी जंगली जानवर का मुखौटा लगाए

धम्म से आ कूदे हमारे आगे

और हम डरें नहीं।

बल्कि देख लेंउसके बचपन के पार

एक जवान खुशी

और गोद में उठा लें उसे।

ऐसे ही कुछ होते हैं ख़तरे।

अगर डरें तो ख़तरे

और अगर नहीं

तो भविष्य दिखाते रंगीन पारदर्शी शीशे के टुकड़े।

और सुबह है

हम

सूरज के भरोसे मारे गए

और

सूरज घड़ी के।

जो बंद इसलिए पड़ी है

कि

हम चाबी लगाना भूल गए थे

और

सुबह है

कि

हो ही नहीं पा रही है।

अंधेरा मेरे लिए

रहती है रोशनी

लेकिन दिखता है अंधेरा
तो
कसूर
अंधेरे का तो नहीं हुआ न!
और
न रोशनी का!

किसका कसूर?

जानने के लिए
आईना भी कैसे देखूं
कि अंधेरा जो है
मेरे लिए
रोशनी के बावजूद!


सोमवार, 1 सितंबर 2008

दुष्यंत के मायने ....

आज १ सितम्बर है । दुष्यंत कुमार का जन्मदिन । भोपाल आने से पहले दुष्यंत के नाम से तो वाकिफ था पर दुष्यंत के मायने नही जानता था । भोपाल आया तो दुष्यंत को सही से जाना । फ़िर पता चला की दुष्यंत को न जानना कितनी बड़ी लापरवाही थी ।

दुष्यंत का मतलब लोगों के लिए हिन्दी ग़ज़ल हो सकता है ... कुछ सीमा तक मेरे लिए भी है लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं।

ग़ज़ल की विधा उर्दू में जितनी लोकप्रिय थी उतनी ही शिद्दत से हिन्दी में भी अपनाई गई । जब साहित्य में अलग अलग भाषाई विधाओं का इख्तेलात होता है , तब फायदा किसी उर्दू या हिन्दी को नही होता समूचे अदब को होता है । ग़ज़ल अगर आम जन तक पहुची विशेष कर हिन्दी प्रेमियों में, तो इसके पीछे दुष्यंत का आसमान में सुराख कर देने वाला जज्बा रहा । वरना साहित्य के कथित ठेकेदार हिन्दी और उर्दू दोनों में ही, न उस वक्त कम थे और न आज कम हैं ।


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।


आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।


हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।


हिमांशु बाजपेयी

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी