शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

मकडियां

सन्नाटे के शोर से
कानो को पकड़
दांतों को भींचता
सामने के
भयानक दृश्य
देख न पाने की हालत में
आंखों को मींचता
इधर उधर
हर तरफ़ ....
जहाँ देखो
या न देखो
सब कहीं झूठ ....
धोखा
लोग होते जाते
और और और
मक्कार
सब हैं अय्यार
अंधेरे में
पूरे बदन पर
रेंगती हैं फंसाने को
शिकार बनाने को
जाल बुनती हैं
हजारों मकडियां
दरो दीवारों पर ......
दिलो की दीवारों पर !

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