बुधवार, 24 मार्च 2010

हे राम....


रामनवमी
और विजयादशमी
एक राम-जन्म का
पर्व
एक रावण-वध का
गर्व
दोनों के बीच
केवल
छः महीनों का भेद
पर
हमें है बेहद
खेद
कि ये अंतर
पंचांग में ही
कम है
असल में
आज भी रावण ज़्यादा
राम कहीं
कम हैं....
हे राम
आज तुम आए हो
पुनः
तस्वीरों में
लोकगाथाओं में
लोकगीतों में
रिवाज़ों में
रीतों में
फिर अभिजित नक्षत्र है
फिर है चैत्र की नवमी
फिर मंदिरों में शोर है
तुम्हारे आगे है भीड़ जमी
पर हे राम.....
तुम तो
मानव रूप में
जन्मे थे न....
फिर क्यों नहीं
दे पाए
मानव को वरदान
मानव रूप में
रहने का विद्यमान
राम
तुम बस मूर्तियों में रहे
भावना से हुआ
तुम्हारा अवसान
राम
तुमने देव होकर भी
मानव का अवतार
ले लिया
पर मानव
देव बनने के लिए
मानव भी नहीं रहा
हे राम....उस से
रंग जाएगी ये दुनिया
जितना खून
तुम्हारे नाम पर बहा
और बस अब
विवादित रह गया
तुम्हारा नाम
हर अनहोनी पर
कहते हैं हम.....
हे राम.....

सोमवार, 8 मार्च 2010

महिला दिवस पर विशेष....


तुम्हारी लड़ाई...

सैकड़ों साल से

जकड़ी गई

बेड़ियां

अब टूटती जा रही हैं

उच्श्रंखल

...

उत्साहित...उत्तेजित

आधी आबादी

पूरी आज़ादी के

गीत गा रही है


ओंठ

जिनके बोलने पर

बंदिश थी

वो नई बंदिशें

गुनगुना रहे हैं....

युग के लोग

तुम्हारे जीतने की

युगगाथा

सुना रहे हैं....


तुमको देखना

कई बार

थोड़ा तो

हीन महसूस कराता है

पर इस हीनता बोध का

तुमको बढ़ते देखने के

सुख से

गहरा नाता है


तुम्हारा संवरना

संवरना है

परिवार का...

तुम्हारा जीतना

जीतना है संसार का...


तुम्हारी ताकत

हम सबकी ताकत है

तुम्हारी प्रतिष्ठा

कौम की इज़्ज़त है


पर हां इतनी

हम सबकी लाचारी है

तुम्हारी लड़ाई

केवल तुम्हारी है....


(ये पोस्ट महिला दिवस पर उन सब शर्मिंदा पुरुषों की तरफ से दुनिया जीत रही आधी आबादी को शुभकामना है....जो उनके बढ़ते देख खुश तो हैं....पर उनकी लड़ाई में भागीदारी करने में अक्षम हैं....या विवश हैं....या फिर भागीदारी के जोखिमों से डरते हैं.....)

बुधवार, 3 मार्च 2010

अलिखित...

लिखने

और कुछ न लिखने

के बीच

फर्क सिर्फ

कह देने

और

न कह देने सा है

कुछ

जो सोचा गया

कभी

कहा नहीं गया

कुछ

जो मन में चला

कभी

लिखा नहीं गया

कुछ

सोच कर भी

अनकहा रहा

कुछ

जान कर भी

अलिखित है

आज तक....

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