बुधवार, 30 जनवरी 2008

युगावतार गांधी






महात्मा गाँधी पर यह कविता कई साल पहले प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी ने लिखी थी। द्विवेदी बच्चो के लिए लिखने वाले कुछ प्रमुख कवियों में से एक थे। यह कविता मैंने अपनी स्कूल बुक में कक्षा ७ या ८ में पढी थी। प्रस्तुत है अंश ............ याद करें राष्ट्रपिता को !

चल पड़े जिधर दो डग, मग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि,
पड़ गये कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गये उसी पर कोटि माथ।

हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!
हे
कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम
एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि!
हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम!
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख, युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख;
तुम अचल मेखला बन भू की, खींचते काल पर अमिट रेख।

तुम बोल उठे, युग बोल उठा,
तुम मौन बने, युग मौन बना
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर,
युग कर्म जगा, युगधर्म तना।
युग-परिवर्त्तक, युग-संस्थापक, युग संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें, युग-युग तक युग का नमस्कार!




- सोहनलाल द्विवेदी

मैंने गांधी को मारा है !!

गांधीजी की पुण्यतिथि पर उनको शायद हम सबने याद किया, कुछ को याद था कुछ को याद दिला दिया गया। अच्छा लगा कि कम से कम हमारी ज़िम्मेदार ( तथाकथित ) मीडिया इस दिन को नही भूली। वैसे कई चैनल दूरदर्शन देख कर जगे होंगे, दूरदर्शन को बधाई किसी काम तो आया ....... कुछ निजी चैनल भी तैयारी के साथ आये जैसे एन डी टी वी और समय को बधाई ! कल एन डी टी वी देखते पर कुछ विचार फिर से उठे और शब्दों की शक्ल अख्तियार कर ली ! गांधी की प्रासंगिकता पर सवाल और जवाब की ही उलझन में पड़े हम सब हिन्दोस्तानी शायद यही सोचते हैं !

मैंने गांधी को मारा है !!
मैंने गांधी को मारा है .....
हां मैंने गांधी को मार दिया !!

मैं कौन ?
अरे नही मैं कोई नाथूराम नहीं
मैं तो वाही हूँ जो तुम सब हो
हम सब हैं

क्या हुआ अगर मैं उस वक़्त पैदा
नही हो पाया
क्या हुआ अगर गांधी को मैं सशरीर नही मार सका
मैंने वह कर दिखाया
जो नाथू राम नही कर पाया

मैंने गांधी को मारा है
मैंने उसकी आत्मा को मार दिखाया है
और मेरी उपलब्धि
कि मैंने गांधी को एक बार नही
कई बार मारा है
अक्सर मारता रहता हूँ

आज सुबह ही मारा है
शाम तक न जाने कितनी बार मार चुका हूँगा
इसमे मेरे लिए कुछ नया नहीं
रोज़ ही का काम है

हर बार जब अन्याय करता हूँ
अन्याय सहता हूँ
सच छुपाता झूठ बोलता हूँ
घुटता अन्दर ही अन्दर मरता हूँ

अपने फायदे के लिए दूसरे का नुकसान
करता हूँ
और उसे प्रोफेश्नालिस्म का नाम देकर
बच निकलता हूँ
तब तब हर बार
हाँ मैंने गांधी को मारा है ........

जब जब यह चीखता हूँ कि
साला यह मुल्क है ही घटिया
तब तब ......
जब भी भौंकता हूँ कि
साला इस देश का कुछ होने वाला नही
और जब भी
व्यंग्य करता हूँ कि
अमा यार
' मजबूरी का नाम .........'
तब तब हर बार मैंने
उसे मार दिया
बूढा परेशान न करे हर कदम पर
आदर्शो के नखरों से
सो उसे मौत के घाट उतार दिया

तो आज गीता कुरान जिस पर कहो
हाथ रख कर क़सम खाता हूँ
सच बताता हूँ
कि मैंने गांधी को मारा है

पर इस साजिश में मैं अकेला नहीं हूँ
मेरे और भी साथी हैं
जो इसमे शामिल हैं
और
वो साथी हैं
आप सब !!
बल्कि हम सब !!!!
यौर होनौर आप भी ......
अब चौंकिए मत
शर्मिन्दा हो कर चुप भी मत रहिये .......
फैसला सुनाइये

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है !!!!!!!

हाँ दो मुझे सज़ा दो क्यूंकि मैंने गांधी को ....................


- मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com

सोमवार, 28 जनवरी 2008

गणतंत्र दिवस कुछ झलकियाँ

एक और गणतंत्र की सालगिरह बीत गयी और रह गया गणतंत्र अगली सालगिरह के इंतज़ार में ! ताज़ा हवा पर हम कुछ न कुछ नया ताज़ा लाते रहेंगे ऐसा वादा था सो हम इस बार लाये हैं ५८ साल के गणतंत्र की कुछ तसवीरें। इन तस्वीरो का मकसद मुल्क की बुराई या कमी ढूंढना नही बल्कि यह याद दिलाना है कि शहादत केवल आजादी के लिए और उसके पहले नही दी गयीं शहादतें उसके बाद भी जारी हैं। और शहादतों से आज सर उठाए जिंदा है यह गणतंत्र !!! ताज़ा नज़र है उनके गणतंत्र दिवस पर जिन पर शायद हमारी नज़र नहीं ..........................





































एक गुजारिश है सभी बांचने वालो से कि इन तस्वीरो के शीर्षक खो गए हैं अगर वक़्त मिले तो ढूंढ कर हमें ज़रूर भेजे ..... कुछ मुश्किल नही वो आपके जेहन में ही कहीं गुम हैं !

चीन ओ अरब हमारा हिंदोस्ता हमारा
रहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा
...................................................
.........................................
............................

भारत ऑस्ट्रेलिया श्रंखला ड्रा


अरे अरे शीर्षक पढ़ कर हैरान होने की ज़रूरत नही है। दरअसल मैं इस वक़्त का इंतज़ार कर रहा था ................ कि सीरीज़ ख़त्म हो और मैं ऐसा कुछ लिखू। हमारे सभी पत्रकार साथी जो कुछ दिन पहले बकनर को बेईमान बता रहे थे अब कह रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया ने सीरीज़ जीत ली है। अब सवाल है कि क्या दूसरे टेस्ट में अम्पयारो की शानदार अम्पायरिंग ना होती तो ऑस्ट्रेलिया वो टेस्ट जीत पाता ?

जवाब तो वही है कि नही ....... तो न्याय के तकाजे पर मैं या तो यह नही मानता कि उस टेस्ट में भारत बेईमानी से हारा या फिर मैं यह नही मानता कि वह मैच अस्तित्व रखता है सो इस लिहाज से यह सीरीज़ दोनो ही हिसाब से ड्रा रही मतलब

१ यह मैच हटा दें तो ३ मैच रह गए ..... एक ड्रा ... एक एक दोनो टीमों ने जीता तो सीरीज़ ड्रा !

२ यह मैच ड्रा करें तो भी सीरीज़ ड्रा !


तो भाई लोगो ये रहा मेरा बदला बकनर, बेन्सन और प्रोक्टर से ........ ( आख़िर ब्लोग भडास निकालने के लिए ही तो है ) अब आप लोग भी चाहे तो कमेंट्स दे कर भडास निकाल लें

जय हिंद


आपका


मयंक सक्सेना

शुक्रवार, 25 जनवरी 2008

२६ जनवरी


२६ जनवरी यानी कि गणतंत्र दिवस फिर आ गया है ....... गणतंत्र दिवस यानी कि इस दिन हम गणतंत्र बने थे मतलब अपना संविधान लागू हुआ था और सो मानते हैं कि यह असली आजादी थी । पर आज संविधान क्या है हम भूलते जा रहे हैं ..... सो समय है सोचने का कि आगे का क्या प्लान है इस मुल्क का, इसके नेताओ का, और अवाम का..... तब तक प्रस्तुत है ताज़ा हवा की ओर से काका हाथरसी की कविता २६ जनवरी जो कई साल पहले लिखी गयी पर आज भी प्रासंगिक है ..... गणतंत्र दिवस की बधाई !

२६ जनवरी

कड़की है भड़की है मंहगाई भुखमरी
चुप रहो आज है छब्बीस जनवरी

कल वाली रेलगाडी सभी आज आई हैं
स्वागत में यात्रियों ने तालियाँ बजाई हैं
हटे नही गए नहीं डरे नही झिड़की से
दरवाज़ा बंद काका कूद गए खिड़की से

खुश हो रेलमंत्री जी सुन कर खुशखबरी
चुप रहो आज है .......

राशन के वासन लिए लाइन में खडे रहो
शान मान छोड़ कर आन पर अडे रहो
नल में नहीं जल है तो शोर क्यो मचाते हो
ड्राई क्लीन कर डालो व्यर्थ क्यो नहाते हो

मिस्टर मिनिस्टर की करते क्यो बराबरी
चुप रहो आज है ...................

छोड़ दो खिलौने सब त्याग दो सब खेल को
लाइन में लगो बच्चो मिटटी के तेल को
कागज़ खा जाएंगी कापिया सब आपकी
तो कैसे छपेंगी पर्चियां चुनाव की

पढ़ने में क्या रखा है चराओ भेड़ बकरी
चुप रहो .......................................................
आज है २६ जनवरी

- काका हाथरसी

नैनो भौजी

अभी हाल ही में रवीश जी के कस्बे में गया था तो उनका एक लेख पढ़ टाटा की नैनो पर जिसमें नैनो को भौजाई का संबोधन दिया गया ...... खैर ताज़ा हवा पर पहली बार कुछ ऐसा है जो केवल तस्वीरो में है पर मुझे देख कर मज़ा आया। एक ई मेल जो आप भी देख कर मज़ा लें .............
कार्टूनिस्ट को ताज़ा हवा टीम की ओर से बधाई









गुरुवार, 24 जनवरी 2008

पंछी ..............


वक़्त हमेशा दगा देता है.... पहले लोगो से मिलाता है .......करीब लाता है और फिर वही दगा .................दूर ले जाने का ! इस तरह के मंज़र जब लोग एक ज़बरदस्त रिश्ता बन चुकने के बाद एक दूसरे से विदा ले रहे होते हैं, वाकई दर्दनाक और रुला देने वाले होते हैं । पत्रकारिता विश्वविद्यालय में आजकल ऐसे ही मंज़र रोज़ देखने में आ रहे हैं जब हमारे साथी internship और नौकरियों के लिए जा रहे हैं। दरअसल अच्छे दोस्तो से अलग होना दुनिया की सबसे बेशकीमती दौलत को खोना है ......
संस्कृत के एक श्लोक में अच्छे मित्र के कुछ लक्षण बताये गए हैं जो कहता है ,

पापान्निवार्यती योज्य्ते हिताय
गुह्यम निगूहती
गुणान प्रकटीकरोति
सन्मित्र लक्षणं इदम
प्रवदन्ति संता

खैर कुल जमा बात यह है कि माहौल ग़मगीन है और कुछ लाइने हमने भी लिख डाली
नज़र है सभी साथियो को

पंछी
पंछी उड़ चले
पंछी उड़ चले

शायद यह था रैन बसेरा
जहाँ पे डाला कुछ पल डेरा
सही समय आया उड़ने का
राह पे जो अपनी मुड़ने का

रस्ते मुड़ चले

पंछी उड़ चले .......

मफलर - साभार : रवीश कुमार


रवीश कुमार हिन्दी मीडिया के देश के जाने माने हमारे साथी हैं ( मतलब पत्रकार ) उनसे क्षमा मांगते हुए और आभार प्रकट करते हुए उनका यह लेख प्रकाशित कर रहा हूँ । दरअसल जानता हूँ वे बुरा नही नही मानेंगे और फिर यह लेख इतना अच्छा लगा कि मन नही माना सो इसे पढे और आनंद ले.....

मफ़लर
सर्दी के तमाम कपड़ों में मफ़लर देहाती और शहरी पहचान की मध्यबिंदु की तरह गले में लटकता रहता है। एक सज्जन ने कहा आप भी मफ़लर पहनते हैं। देहाती की तरह। एक पूर्व देहाती को यह बात पसंद नहीं आई। आखिर मुझे और मेरे मफ़लर में कोई फ़र्क नहीं है। मफ़लर एक पुल की तरह वो पट्टी है जो फैशन भी है और पुरातन भी।कैसे? बस आप मफ़लर को सर के पीछे से घुमाते हुए दोनों कान के ऊपर से ले आईये और फिर ठुड्डी के नीचे बांध कर कालर में खोंस दीजिए। आप देहाती की तरह लगते हैं। मफ़लर तब फ़ैशन नहीं रह जाता। नेसेसिटी की तरह सर्दी से बचने का अनिवार्य ढाल बन जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश के ठीक ठाक लोगों से लेकर रिक्शेवाले, चायवाले तक इसी अंदाज़ में मफ़लर की इस शैली को ज़माने से अपनाते रहे हैं।
मफ़लर पर किसी ने शोध नहीं किया है। शायद ब्रितानी चीज़ होगी। लेकिन हम मफ़लर से पहले शाल को भी इसी अंदाज़ में कॉलर के ऊपर गांठ बांध कर ओढ़ते रहे हैं। हिमालय से नीचे उतर कर आने वाली सर्द हवाओं से बचने के लिए। लालू जैसे नेता तो कपार के ऊपर घूमा घूमा कर बांध देते हैं। मफ़लर का एक रूप यह भी है।लेकिन मफ़लर का एक अंदाज़ खांटी देहाती होने के बाद भी शहरी रूप में बचा रहा है। जिसे आप अपने कोट के दोनों साइड के बीच लटका देते हैं। यहां मफ़लर का कुछ हिस्सा कोट के पीछे रहता है और कुछ कोट के बाहर। यह मफ़लर का शहरी रूप है। इस रूप में आप स्मार्ट कहे जाते हैं।मफ़लर नेसेसिटी से फ़ैशन हो जाता है।
देहात और शहर के बीच का एक मध्यबिंदु मफ़लर में ही वो ताकत है जो पल में देहाती और पल में शहरी हो सकता है। वो मेरे जैसा है। पूर्व देहाती और मौजूदा शहरी। कृपया मफ़लर को गया गुज़रा न समझें। इससे मेरी आत्मा आहत होती है।

रवीश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार NDTV इंडिया

रविवार, 13 जनवरी 2008

मीडिया के अकाल में एक बूँद सावन की




काफी अरसे के बाद टी वी के परदे पर दिबांग जी दिखे, चैनल वही पुराना था एन डी टी वी इंडिया ...... हालांकि दिबांग जी का कई दिनों से ना दिखना मेरे लिए बड़ी परेशानी का सबब था और मीडिया में तमाम तरह की चर्चाओं का पर इन्हें दरकिनार कर मैं जुट गया स्टोरी देखने में। खबर थी बुंदेलखंड में सूखे के हालत की और उस वजह से वहाँ आत्महत्या कर रहे किसानों की। दिबांग जी ने खुद जा कर वह स्टोरी की और जिस तरह से वह के लोगो का दर्द सामने आया वह वाकई रुला देने को काफी था।


दरअसल बुंदेलखंड में पिछले पांच साल से सूखा पड़ रहा है और गरीब- मजबूर किसानों की खुद्कुशियो का सिलसिला जारी है पर शायद हमारी मीडिया को खबरों कि तलाश है। ऐसे माहौल में जब खबर क्या होनी चाहिऐ इस पर सार्थक बहस कि ज़रूरत है और रोज़ बा रोज़ इस पर लगातार बहस चल रही है। इस तरह की स्टोरी हमे बताने को काफी है कि खबर वाकई क्या है !


एन डी टी वी की टीम को बधाई खबरों के अकाल से जूझते मीडिया के मरुथल में यह बूंदे बारिश के लौटने का संकेत है और सबक भी कि कहानी हकीक़त से अलग नही उसी का बयान है !


बस दुष्यंत की पंक्तिया दोहराएं,




हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिऐ


इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिऐ




सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही


मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिऐ




आग मेरे सीने में ना सही आग तेरे सीने में सही


हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिऐ




सूरत बदलने को क्या हमारा मीडिया तैयार है ?


उत्तर की प्रतीक्षा में




मयंक सक्सेना


शुक्रवार, 4 जनवरी 2008

आखिरकार सचिन का भाग्य जागा !


जी हाँ ... आखिरकार छोटे उस्ताद जो हालांकि काफी बडे हो चुके हैं ... अपने दुर्भाग्य से उबर पाए। सिडनी टेस्ट में जहाँ दूसरे दिन वी वी एस लक्ष्मन की चर्चाएं हवा में तैरती रही, तीसरा दिन मास्टर ब्लास्टर के नाम रहा। सचिन तेंदुलकर ने नर्वस नैन्टी के दबाव को घुमा के लात मारी और ऐसा बल्ला घुमाया कि टीम इंडिया की बल्ले बल्ले हो गयी। दरअसल पोरस के वक़्त से ही भारतीय योद्धा विश्व विजेताओ को टक्कर देते आए हैं, और वर्तमान सिकंदर आस्ट्रेलिया भी ऐसे ही योद्धाओ के पल्ले पड़ गयी है।

तेंदुलकर अकेले चलते तो कोई बात नही थी, ऑफ़ स्पिनर हरभजन सिंह ने भी ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों कि सिलाई उधेड़ कर रख दी और ६३ शानदार रन बनाए। मैच के अंत में सचिन १५७ रन बना कर नाबाद रहे और भारत को ६९ रनों कि महत्वपूर्ण बढ़त हासिल हुई।

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी