गुरुवार, 24 जनवरी 2008

पंछी ..............


वक़्त हमेशा दगा देता है.... पहले लोगो से मिलाता है .......करीब लाता है और फिर वही दगा .................दूर ले जाने का ! इस तरह के मंज़र जब लोग एक ज़बरदस्त रिश्ता बन चुकने के बाद एक दूसरे से विदा ले रहे होते हैं, वाकई दर्दनाक और रुला देने वाले होते हैं । पत्रकारिता विश्वविद्यालय में आजकल ऐसे ही मंज़र रोज़ देखने में आ रहे हैं जब हमारे साथी internship और नौकरियों के लिए जा रहे हैं। दरअसल अच्छे दोस्तो से अलग होना दुनिया की सबसे बेशकीमती दौलत को खोना है ......
संस्कृत के एक श्लोक में अच्छे मित्र के कुछ लक्षण बताये गए हैं जो कहता है ,

पापान्निवार्यती योज्य्ते हिताय
गुह्यम निगूहती
गुणान प्रकटीकरोति
सन्मित्र लक्षणं इदम
प्रवदन्ति संता

खैर कुल जमा बात यह है कि माहौल ग़मगीन है और कुछ लाइने हमने भी लिख डाली
नज़र है सभी साथियो को

पंछी
पंछी उड़ चले
पंछी उड़ चले

शायद यह था रैन बसेरा
जहाँ पे डाला कुछ पल डेरा
सही समय आया उड़ने का
राह पे जो अपनी मुड़ने का

रस्ते मुड़ चले

पंछी उड़ चले .......

1 टिप्पणी:

  1. panchiyon ki to yahi kismat hai
    jana unki fitrat hai
    par,
    jate jate kuch wadon ki hasrat hai
    aei dost,
    phir milenge kal
    ye tmse hamari mohabbat hai.

    this is not an end but just a new beiggining. we may apart but always remain a part of each other.
    ameen!

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