रविवार, 13 जनवरी 2008

मीडिया के अकाल में एक बूँद सावन की




काफी अरसे के बाद टी वी के परदे पर दिबांग जी दिखे, चैनल वही पुराना था एन डी टी वी इंडिया ...... हालांकि दिबांग जी का कई दिनों से ना दिखना मेरे लिए बड़ी परेशानी का सबब था और मीडिया में तमाम तरह की चर्चाओं का पर इन्हें दरकिनार कर मैं जुट गया स्टोरी देखने में। खबर थी बुंदेलखंड में सूखे के हालत की और उस वजह से वहाँ आत्महत्या कर रहे किसानों की। दिबांग जी ने खुद जा कर वह स्टोरी की और जिस तरह से वह के लोगो का दर्द सामने आया वह वाकई रुला देने को काफी था।


दरअसल बुंदेलखंड में पिछले पांच साल से सूखा पड़ रहा है और गरीब- मजबूर किसानों की खुद्कुशियो का सिलसिला जारी है पर शायद हमारी मीडिया को खबरों कि तलाश है। ऐसे माहौल में जब खबर क्या होनी चाहिऐ इस पर सार्थक बहस कि ज़रूरत है और रोज़ बा रोज़ इस पर लगातार बहस चल रही है। इस तरह की स्टोरी हमे बताने को काफी है कि खबर वाकई क्या है !


एन डी टी वी की टीम को बधाई खबरों के अकाल से जूझते मीडिया के मरुथल में यह बूंदे बारिश के लौटने का संकेत है और सबक भी कि कहानी हकीक़त से अलग नही उसी का बयान है !


बस दुष्यंत की पंक्तिया दोहराएं,




हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिऐ


इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिऐ




सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही


मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिऐ




आग मेरे सीने में ना सही आग तेरे सीने में सही


हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिऐ




सूरत बदलने को क्या हमारा मीडिया तैयार है ?


उत्तर की प्रतीक्षा में




मयंक सक्सेना


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी