शुक्रवार, 25 जून 2010

हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है...गर्रर्रर्र...पहली किस्त..Part-I


इसे नौजवान अपनी महबूबा से भी ज़्यादा मोहब्बत करते थे। इतनी मोहब्बत कि इसे आज भी देखते हैं तो हम में से कई बल्कि वो जो तब नौजवान थे और अब अधेड़ हैं अपने अपने दिलों पर हाथ रख लेते हैं। और दिल में से एक ही आवाज़ आती है कि वाह..... तेरा जवाब नहीं है...., पुराने इश्क के किस्से ताज़ा हो जाते हैं और यादों का समंदर अपनी लहरों के आगोश में ले लेता है....स्कूल, कॉलेज और बाज़ारों पर उसकी वो दिलकश आवाज़ यूं लगता है आज भी कानों में गूंज रही है। यकीनन वो हम सबकी महबूबा थी....आज सुबह अचानक ही डॉ. अनुराग आर्या से फेसबुक चैट ने फिर उसी याद दिला कर बेचैन कर दिया है....और रात को नींद भी नहीं आ रही है....पता नहीं डॉ. साहब भी चैन से सो पाए हैं या नहीं....

अब रहस्य की परतें खोल ही देते हैं और राज़ खुलते ही आप में से ज़्यादातर मुझ से सहमत होंगे। मई 1985 में सड़कों पर एक शाहकार उतरा था, शाहकार ऐसा जो 11 साल तक नौजवानों के दिलों की धड़कन बना रहा। चेरी लाल रंग के आउटफिट्स में क्या कमाल लगती थी, और आज तक लगती है....यामाहा RX100.....याद है न....देखा कानों में गूंज उठी न आवाज़....भीग गए न यादों के समंदर की लहरों में.....

पहली बार RX100 को एक दोस्त के चाचा के हाथ में देखा था....तब केवल 10 साल का था....उसके पहले इसे तमाम हिट फिल्मों में देख चुका था और पापा के विजय सुपर पर बैठ कर जो आवाज़ मुंह से पैदा की जाती थी वो दरअसल RX100 से ही प्रेरित थी और टेलीविज़न पर देखी जाने वाली फिल्मों में इस शानदार बाइक से सुनकर मुंह से निकाली जाती थी....लगता था कि कब बड़े होंगे और हाथ में लाल या काली ये सुंदरी होगी....

पहली बार RX100 पर बैठने का सौभाग्य मिला पड़ोस में रहने वाले एक भैया के साथ, वो एक दिन किसी दोस्त की बाइक लेकर आए और हम मोती नगर से चारबाग तक उनके पीचे बैठकर गए...उम्र थी कोई 12 साल की...रास्ते भर बाइक के साथ आवाज़ निकालते रहे....खैर सपना अभी भी अदूरा था खुद इसे चलाने का....आश्चर्य भी होता था कि क्यों आखिर एक दोस्त के बड़े भाई का अपने पिता से इसी बाइक को लेने को लेकर झगड़ा होता था जबकि वो उनको इससे भी महंगी राजदूत दिलाना चाहते थे....पर शायद हर रहस्य के खुलने की एक उम्र होती थी उस वक्त....आज की तरह नहीं कि उम्र से पहले ही सारे राज़ खुल जाते हो....सही भी थी किसी बात को न जानने पर एक रोमांच सा बना रहता था....सो उम्र के साथ साथ राज़ खुलने लगे....

और बड़े हुए तो सीएमएस राजेंद्र नगर में दसवीं में पढ़ते वक्त हालांकि सड़कों पर चारों ओर हीरो होंडा सीडी 100 चलती दिखाई पड़ती थी.... लेकिन स्कूल से लौटते वक्त जब लड़कियों के महाविद्यालय नवयुग कन्या विद्यालय के सामने से गुज़रना होता....तो मोहल्ले से लेकर शहर तक के तमाम शोहदे (जिनमें से कुछ मोहल्ले के भैया भी थे) वहां इकट्ठे होते.....और वहां कावासाकी...सुजुकी और हीरो होंडा नहीं बल्कि RX100 दिखाई देतीं....शान से अकड़ती हुई....कभी दोस्तों से उधार ली गई....एकसीलेरेटर बेदर्दी से उमेठ दिया जाता था....गर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्रर्रर्र....और जिसके लिए उमेठा गया होता वो कनखियों से देख मुस्कुराती हुई चली जाती.....जो रिक्शों से जाती बाइक 10 की स्पीड में रखकर उनके साथ या पीछे चला जाता....और कुछ थोड़ा आगे जाकर इंतज़ार करती थी कि जनाब आएं और मोहतरमा को बाइक पर बिठाकर घर के उतना ही पहले छोड़ दें जितना कॉलेज के आगे से उनको पिक किया था....इस दृश्य को लगभग हर रोज़ देखने की आदत पड़ गई थी....और धीरे धीरे RX100 का एक जुनून समझ में भी आने लगा था.....पर और कई बाकी थे....जैसे और बड़ा होना भी बाकी था....

खैर हाईस्कूल के बाद बारहवीं भी पास कर ली....दुनिया के कई गुप्त ज्ञान अब ज्ञात थे...हालांकि तथ्य उतने पक्के नहीं थे पर हां इतने समझदार हो गए थे....कि लड़कियों को देखकर दिल में फिल्मी गाने और सफेद कपड़ों में नाचती माधुरी ज़रूर उतर आती थी....शाहरुख की तरह अक्सर अकेले में दोनो हाथ फैलाने में अनोखा सा अहसास होता था....ये वो दौर था जब RX100 आनी बंद हो चुकी थी....पर हां जितनी भी शहर में अभी बची थी उनका जादू बरकरार था....सपना अब भी जस का तस था कि जब जेब में अपनी कमाई आएगी तब भले ही सेकेंड हैंड खरीदें लेकिन RX100 ज़रूर घर आएगी....और हां पड़ोस की...स्कूल की कई लड़कियों को अपने पीछे बैठे भी कई बार सपनों में ज़रूर देखा...बैकग्राउंड साउंड में कोई फिल्मी गाना होता था....पर साथ में एक और मधुर आवाज़.....गर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र....गर्रर्रर्रर्रर्रर्र.....गर्रर्रर्रर्र.....

खैर अभी तो इसी आवाज़ को याद करिए...यादों की लहरें लगातार आ रही हैं....पर उनसे तार्रुफ़ कल कराऊंगा....अभी बहुत रात बीत चुकी है....सोना ही पड़ेगा....RX100....महबूबा आज सपनें में आएगी....पर पिक्चर (पोस्ट) अभी बाकी है मेरे दोस्त....मोहब्बत की कहानी के कई रंग बाकी हैं....और अभी तो मिलन भी बाकी है....कल बात करेंगे पहले मिलन की.....
तब तक गर्रर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्रर्र गर्रर्रर्र......

मंगलवार, 1 जून 2010

मूर्ति ध्वंस.....(लघु कविता...क्षणिका...)

शब्द..
भाव.....
मात्रा......
छंद..........
कविता.........
जहां से नहीं थी
आशा
वहीं से देखो
फूट रहे हैं
क्रोध...
शोभ...
द्रोह......
विद्रोह....
ध्वंस हुई हैं
सदियों से पूजित
मूर्तियां
देखो युग के
प्रतिमान
टूट रहे हैं

(ये कविता बरखा दत्त और वीर सांघवी जैसे तमाम प्रतिमानों को समर्पित है....और इस युग को भी जिसे मैं प्रतिमानों के ध्वंस का युग मानता हूं...कभी इस विषय पर भी एक पोस्ट....पर फिर कभी....)

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी