सोमवार, 26 अप्रैल 2010

माओवादी (एक लम्बी कविता...)


जंगल उसका घर था
ज़मीन उसकी मां
कल कल करते
झरनों
निर्बाध बहती नदी
पत्तों में सरसराती
हवा के साथ
उसका जीवन भी
सतत
अविरत
प्रवाह मान था

फिर एक दिन...
जंगल
सरकारी हो गए
ज़मीन
कम्पनियों की हो गई
और जल में
घुल गया ज़हर
वो....
बेबस था

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सरकारी वर्दी
गांव में आती रही
पिताओं को किया गिरफ्तार
भाईओं को
गोली दी मार...
मां-बहनों का
होता रहा बलात्कार
फिर एक दिन....
बाग़ी भी आए
निशानदेही कर मुखबिरों की
कई सर
उन्होंने भी कमाए
ये सिलसिला चलता रहा
वो....
अब भी बेबस था

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अब आधा जंगल
सरकार का था
आधा बागियों का
कुछ ज़मीन कम्पनियों की थी
कुछ बागियों की
जल में
अब भी ज़हर घुला था
और
खून बह रहा था
गोलियों की गूंज
बमों के धमाकों
बारूद की महक
सनसनाते तीरों के बीच
भटकती मौत के साथ
जीवन
अब भी प्रवाहमान था
पर सतत नहीं
वो...
अब भी बेबस था

************************

फिर एक दिन
पहले खूब शोर मचा
फिर गहरा सन्नाटा छाया
बेहोशी टूटी
तो खुद को
उनके बीच पाया
तब से अब तक
उसके कांधों पर
तरकश-कमान
हाथ में संगीन है
फूल लाल
पत्ते लाल
पानी लाल
लाल ज़मीन है....
सुबह और शाम
लाल हैं...
दोनो ओर के हाथ
दामन लाल हैं...
पर ये सुर्खी खून की है...
निर्दोषों का रक्त
मिल के बह रहा है
दोषियों के खून के साथ
वो कह रहे हैं
देखो आ गया साम्यवाद....
जंगल में कहीं किसी छोर
खड़ा है वो भी
एक ओर...
पर
उतना बेबस नहीं है...

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उसका नाम
किशन
करीम
थॉमस..
जो भी था उसे नहीं याद
नहीं जानता है वो
क्या है माओवाद....
उसने मार्क्स को
नहीं पढ़ा
वो लेनिन को नहीं जानता
दरअसल
वो किसी भी
वाद को नहीं मानता

उसके हाथ में
हथियार है
पर वो पुलिसवाला नहीं
पुलिसवाला नहीं है...
पर उसके तन पर वर्दी है...
उसका अपराध है आदिम होना...
उसने अपराध किया है
पर अपराधी नहीं है...
उसके हाथ में लाल झंडा है
लेकिन
वो हिंसा का आदी नहीं है....
उसने खून तो बहाया है
पर.......
वो माओवादी नहीं है......

मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com

(कभी बस्तर या दंतेवाड़ा गए हैं....या कभी उड़ीसा के माओवाद प्रभावित इलाकों में....माओवादी नेता अगर किसी वजह से आदिवासियों को अपने साथ शामिल कर पा रहे हैं तो उसका केवल एक ही कारण है...आदिवासियों की विवशता...जो सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार...उपेक्षा और शोषण ने उन्हें आज़ादी के बाद से उपहार में दी है....तो अगली बार आदिवासियों के लिए माओवादी शब्द प्रयोग करने से पहले सोचिएगा....उनकी भूख को महसूस करिएगा...उनकी पीड़ा का अहसास करिएगा....दया मत दिखाइएगा....क्योंकि जब ज़रूरत थी हम में से किसी ने वो नहीं दिखाई....)
ये लम्बी कविता....असल में कहीं ज़्यादा लम्बी है...कई सौ सालों का दर्द है इस में....मैं वाकई माओवादी नेताओं के वीभत्स तरीकों का विरोधी हूं....पर उतना ही विरोधी आदिवासियों को उनके जल, जंगल और ज़मीन से वंचित कर पूंजीवादियों के हाथ में खेलने वाली सरकार का भी हों.....जब हम अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा बिना चिन्हित किए गए हमलों में आम लोगों के मारे जाने की निंदा करते हैं...तो वैसे ही हमले कैसे अपने देश में होने का समर्थन कर सकते हैं.....


बुधवार, 21 अप्रैल 2010

"और कुछ नया ताज़ा सुनाओ..." (कविता)


आजकल
अक्सर
एक बेहद अजीब
और बेहद मुश्किल सवाल से
बार बार
घिर जाता हूं...

जितनी बार
ये सवाल पूछा जाता है
उतनी बार
कुछ नया
कह पाने की चाहत में
हर बार
पुराना जवाब दोहराता हूं...

हर बार वो
जानना चाहते हैं
कुछ ताज़ा ऐसा
अब तक न देखा, सुना गया
न घटा हो कभी वैसा

मैं कभी अनमना
कभी चिड़चिड़ा
कभी उदास
तो कभी नाराज़ हो जाता हूं
पर फिर भी
हर बार
पुराना जवाब दोहराता हूं...

पर फिर भी
हर बार दोबारा
वही सवाल पूछते वक्त
उनको अपेक्षा है मुझसे
कुछ अलहदा सुनने की

दरअसल हम सब
जानना चाहते हैं
दूसरे की ज़िंदगी का
कुछ अलहदा पल
क्योंकि किसी की भी
ज़िंदगी में
कुछ नया नहीं है आज कल...

चाय वैसी ही
कई बार उबाली गई....
वही दफ्तर की मेज
हर शनिवार को संभाली गई
वही लोग
भागता-हांफता शहर
भोगते-झेलते हम
घड़ी में वक्त भी कमबख्त
हर रोज़ लौट आता है..
सिर्फ़ कैलेंडर ही
हर साल बदला जाता है....

सब कुछ वैसा ही है
हर रोज़
जारी है फिर भी
नए की अनंत खोज

तुम चाहें कितनी ही बार
अपने रटे रटाए
सधे हुए, गिने हुए...
उत्तर दोहराओ....
वो हर रोज़ तुमसे कहेंगे....
.........
"और कुछ नया ताज़ा सुनाओ..."

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

भोला मन जाने अमर मेरी काया

जैसे ओस
तलाशती है दूब को,
जैसे धूप
तलाशती है झील को
जैसे सच
तलाशता है तर्क को
जैसे अघोरी
साधता है नर्क को
जैसे हमशक्ल
तलाशता है फर्क को
मैं तलाशता हूँ
अपना नाम और धाम
जिस नाम से तुम
मुझे जानते हो
जिस शक्ल से
पहचानते हो
वह नहीं हूँ मैं
फिर भी
भोला मन जाने अमर मेरी काया

आलोक तोमर
(रचनाकार वरिष्ठ पत्रकार, फिल्म और टेलीविज़न के पटकथा लेखक हैं....)

रविवार, 11 अप्रैल 2010

मूर्ख बने रहो...“मुझे क्या पता....” का मंत्र जपो....



न संतान का...न सम्पत्ति का...न यश का...न श्रेय का...दुनिया में सबसे बड़ा कोई सुख अगर है तो बस मूर्ख बने रहने का सुख है।
आप माने न मानें मूर्ख दिखने और बने रहने में (मूर्ख होने में नहीं) जो अद्बुत सुख है वो दुनिया के किसी भी विलास-ऐश्वर्य मे नहीं है।
मूर्ख दिखने के फायदे तो आपको कई लोग बताएंगे पर आपको बताते हैं कि कैसे बना जाता है मूर्ख और किस तरह से दुनिया भर में तमाम अक्लमंद लोग मूर्ख बन कर मज़े से ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं.....

महंगाई चरम पर है, सरकार मू्र्ख बनी बैठी है....कहती है हमें नहीं पता महंगाई कैसे आई, यह भी नहीं पता कैसे जाएगा....हम तो मूर्ख हैं....अब समझेगी तो दुख होगा, सो बने रहो मूर्ख....

सीधे सादे आदिवासी कैसे बन गए माओवादी? ...हमें नहीं पता कैसे बन गए...जा कर उन्हीं से पूछिए...हमें समझ कर क्या करना...समझेंगे तो अपने ज़ुल्मों का...उपेक्षा का...अत्याचारों का हिसाब भी देना पड़ेगा....सो बने रहो मूर्ख....

महिला आरक्षण बिल राज्यसभा से गिरा तो लोकसभा में अटक गया...नेता जी से पूछा कि क्यों हुआ भई ऐसा...नेताजी बोले...हमें तो पता ही नहीं...लो भई मस्त रहो...बने रहो मूर्ख....

दो दिन पहले तक आयशा सिद्दीकी, शोएब मलिक की आपा थीं...अब उनको तलाक दे दिया....आंय दो दिन में आपा...बेगम बन गई...शोएब बोले हमें नहीं पता...जवाब ढूंढ लेंगे पहले सानिया से निकाह हो जाए...सो बने रहो मूर्ख....

टीवी चैनल दो दिन पहले चिल्ला रहे ते ये शादी नहीं हो सकती...अब कह रहे हैं सानिया तेरी अंखिया सुरमेदानी....पब्लिक बोली ऐसा क्यों...रिपोर्टर बोले पता नहीं...बढ़िया है बने रहो मूर्ख....

बहन जी (अपनी यूपी वाली) के गले में किसी ने नोटों की माला डाल दी...ऐसी वैसी नहीं...1000-1000 के नोटों की...सबने अपनी औकात के हिसाब से कीमत लगाई....किसी ने दस हज़ार तो किसी ने दस करोड़ की बताई...जब अदालत से लेकर ऐजेंसियों तक सब पूछेंगे कि किसने पहनाई माला... तो बहन जी के साथ उनके चमचे कहेंगे...हमें पता ही नहीं....सही है बने रहो मूर्ख....

अफगानिस्तान....ईराक....तबाह हो गए...जहां तहां देखो बम या तो गिर के फटते हैं...या फट के गिरते हैं....कभी-कभी उसमें आतंकी भी मर जाते हैं...और ज़्यादातर बच्चे और महिलाएं....और जब अंकल सैंम से पूछा जाता है कि क्यों भई आपकी फौजें ये क्या कर रही हैं...तो वो अंग्रेज़ी में बुदबुदा देते हैं....”हमें नहीं पता....” लगे रहो....बने रहो मूर्ख...शाबास....

न्यूज़रूम में आउटपुट हेड चिल्ला रहा है...इतनी ज़रूरी बाइट कैसे मिस हो गई.....कौन कटवा रहा था पैकेज....रनडाउन प्रोड्यूसर कहता है...सर पता नहीं....बच गए...बने रहो मूर्ख....

पिताजी खोपड़ी पर हाथ धरे चीख रहे थे....कलपते हुए हमसे बोले...इस बार तो तीन ट्यूशन लगवाई थी...फेल कैसे हो गए...हमने धीरे से कहा...पता नहीं कैसे....बच गए....बने रहो मूर्ख....

गाड़ी पार्क कर रहे थे...पीछे खड़ी गाड़ी को ठोंक दिया....वो उतर कर आया...बोला ये कैसे हुआ....हमने भी कह दिया...भाई साहब...हमें पता नहीं चला कि पीछे आप थे....जे बात...बने रहो मूर्ख....

दरअसल मूर्खता में ही असली आनंद है...दुनिया भर की तमाम मुश्किलों से निजात का सबसे आसान तरीका है ....मूर्ख बन जाओ....हर बात पर एक ही जवाब दो...”हमें नहीं पता...” आपको बताऊं कि दुनिया में इससे ज़्यादा मूर्खतापूर्ण कोई जवाब नहीं हो सकता है....पर ज़्यादातर मौकों पर ये सबसे समझदारी भरा जवाब साबित होता है....और आपको आने वाली मुसीबतों से साफ बचा ले जाता है....

और अब कि जब कोई अच्छा ब्लॉगर ब्लॉगिंग छोड़े....और आप पर सवाल उठें....आपकी की गई बेनामी टिप्पणियों को लेकर लोग आप पर ही शक करें....असभ्य भाषा का प्रयोग करने पर आपसे लोग शिकायत करें...कि “क्यों हे ब्लॉगर....तूने ऐसा क्यों किया....”…….

तो आप चुपचाप मूर्ख बन जाइएगा
और
सर्वबाधाहारी सुनहरा मंत्र दोहरा दीजिएगा....
”मुझे नहीं पता....

सलाह:रोज़ सुबह शाम नियम पूर्वक एक ह्रष्ट-पुष्ट गधे को ढूंढ कर उसको ससम्मान भोजन कराएं....और घर पर उसका रंगीन चित्र लगा कर...उसे धूप दीप दिखा कर "मुझे नहीं पता" के सर्वबाधाहारी मंत्र का जाप करें...सारे कष्ट दूर होंगे....सुविधा के लिए चित्र दिया गया है.....

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

ऐसा मौका फिर कहां....

फिर पंछी इकट्ठे हो रहे हैं...कहां...अरे वहीं जहां से उन्होंने उड़ना सीका था...और उड़ना शुरू किया था...कल यानी कि 4 अप्रैल 2010 को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय पूर्व छात्र मिलन का कार्यक्रम आयोजित कर रहा है....जी हां कई सारे कनिष्ठ और वरिष्ठ पंछी पत्रकार वहां पहुंच रहे हैं...आप आ रहे हैं या नहीं...ये मौका फिर नहीं मिलेगा....पुराने किस्से याद कर के ठहाके लगाने का...गुरुजनों के पैर फिर छूने का....पोहा जलेबी खाने का....और एक दिन के लिए फिर बच्चा बन जाने का....तो चल पड़िए बस....
जगह....समन्वय भवन, एपेक्स बैंक, न्यू मार्केट के पास....(न्यू मार्केट तो याद ही होगा....)
तो सबका इंतज़ार रहेगा.....कल मिलते हैं भोपाल में....हां सम्पर्क करना चाहें तो डा. अविनाश बाजपेयी को 09425392448 पर....या मुझे 09310797184 पर सम्पर्क कर सकते हैं...सुबह साढ़े सात मैं भी पहुंच जाऊंगा.....

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी