सोमवार, 19 दिसंबर 2011

हामी..मुस्कुराहट...धूप...मेरा आसमान और तुम...

ख्यालों की सिगरेट
जलती जा रही थी...
झड़ती जा रही थी
तगाफ़ुलों की राख
अचानक मैंने कहा तुम से
‘सुनो मेरी ओर से हां है...’
तुम ने मुस्कुरा के कहा,
‘मेरी तरफ से तो कब से हां है..’
फिर मैंने कहा ‘फूल’
तुम ने कहा खुशबू...
मैंने कहा संगीत
तुम ने कहा जादू...
मैंने कहा हवा
तुम ने आसमान
फिर मैंने कहा बादल..
तुमने कहा सूरज
मैंने कहा धूप
तुमने कहा मुस्कुराहट
और फिर तुम बन कर धूप
छा गई
मेरे ज़ेहन की सर्दियों के आसमान पर
मुस्कुराहट की तरह...

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

समय के नाम...


देखो इतिहास का सूरज
डूब रहा है
समय की घाटी में
देवता
धर्म की किताबों में
जा छुपे हैं
महापुरुष
गमलो में
उगने की तैयारी में हैं
घरों की दीवारों पर
चढ़ते मनीप्लांट
अमरबेल में बदल गए हैं
ज़ेहन की दीवारों पर
काई जम आई है
शास्त्रों के साथ
दियासलाई रखी है
महान मस्तिष्क
बह गए वेश्यालय के बाहर
पेशाबघरों में
सच की रात
छा रही है
सच जो काले हैं
अंधेरे से
रोशनी जो झूठी थी
खत्म हो गई है
हमारे समय के सच
व्याभिचारी बूढ़े से
घिनौने
आज़ादी से अश्लील
लोकतंत्र से
तानाशाह
गाभिन पागल महिला से
विद्रूप
ही तो हैं
आओ चलें कूद जाएं
समय की नदी में
इतिहास के
डूबते सूरज के साथ

(समय के नाम...2-12-2011...समय 1.40 देर रात)

काल चक्र

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देवनागरी