सोमवार, 19 दिसंबर 2011

हामी..मुस्कुराहट...धूप...मेरा आसमान और तुम...

ख्यालों की सिगरेट
जलती जा रही थी...
झड़ती जा रही थी
तगाफ़ुलों की राख
अचानक मैंने कहा तुम से
‘सुनो मेरी ओर से हां है...’
तुम ने मुस्कुरा के कहा,
‘मेरी तरफ से तो कब से हां है..’
फिर मैंने कहा ‘फूल’
तुम ने कहा खुशबू...
मैंने कहा संगीत
तुम ने कहा जादू...
मैंने कहा हवा
तुम ने आसमान
फिर मैंने कहा बादल..
तुमने कहा सूरज
मैंने कहा धूप
तुमने कहा मुस्कुराहट
और फिर तुम बन कर धूप
छा गई
मेरे ज़ेहन की सर्दियों के आसमान पर
मुस्कुराहट की तरह...

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