रविवार, 17 फ़रवरी 2008

हिमांशु का वसंत

एक युवा पत्रकार साथी हिमांशु ने एक बेहद उम्दा कविता लिखी है वसंत पर
आनंद लें

नेह का लेकर संदेसा संगिनी मधुमास आया
हो गया देखो सुमुखि भूमि का आँचल सुनहरा
हर तरफ होता तरंगित प्रेम का आगार गहरा
प्रीति के जल में प्रिये प्रकृति का कण कण नहाया
नेह का .................

आज आते रूपसी कितने मधुर सपने नयन में
क्यों न कह देती प्रिये, छुपती हो जो स्वमन में
कितना सुन्दर अवसर है देखो रोम रोम हर्षाया
नेह का ,,,,,,,

क्यों न मानव देखता सभी में निज कंत को
देखता वह क्यों नहीं हर घडी में बसंत को
क्यों न उसके ह्रदय ने अभी तक विस्तार पाया
नेह का जब ले संदेसा हर बरस मधुमास आया
नेह का ,,,,,

हिमांशु बाजपेयी

सपने बीनने वाला


सड़क पर पडा

बादलों से झांकती

धूप का एक टुकडा

जिसे बिछा कर

बैठ गया वो

उसी सड़क के

मोड़ पर

घर पर अल सुबह

माँ के पीटे जाने के

अलार्म से जागा

बाप की शराब के

जुगाड़ को

घर से खाली पेट भागा

बहन के फटे कपड़ो से

टपकती आबरू

ढांकने को

रिसती छत पर

नयी पालीथीन

बाँधने को

बिन कपड़े बदले

बिन नहाए

पीठ पर थैला लटकाए

स्कूल जाते

तैयार

प्यारे मासूम

अपने हम उम्रो

को निहारता

बिखरे सपनो को

झोली में

समेटता

ढीली पतलून

फिर कमर से लपेटता

जेब से बीडी निकाल कर

काश ले

हवा में

उछाल कर

उडाता

अरमानों को

जलाता बचपन को

मरोड़ता

सपनो को

चल दिया

वो उठ कर

समेत कर

वह एक टुकडा

धूप का

वही बिछा है

अभी भी

देख लें जा कर कभी भी

वो सुनहरा टुकडा

अभी भी वही है

पर

उस पर बैठा बच्चा

अब नही है !!!!


शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

विज़न २०२०२

यह मेरी कविता आप सब भविष्य दृष्टाओ के सपनो को और विशेष तौर पर पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर कलाम साहब को समर्पित है !

हरी नीली
लाल पीली
बड़ी बड़ी
तेज़ रफ़्तार भागती मोटरें
और उनके बीच पिसताघिसटता
आम आदमी

हरे भरे हरियाले पेडों
के नीचे बिखरी
हरी काली सफ़ेद लाल
पन्नियाँ
और उनको बीनता
बचपन

सड़क किनारे चाय
का ठेला लगाती
वही बुढ़िया
और
चाय लाता
वही छोटू

बडे बडे
डिपार्टमेंटल स्टोरों
में पाकेट में सीलबंद
बिकता किसान
भूख से
खुदकुशी करता

पांच सितारा अस्पताल
का उद्घाटन करते प्रधानमंत्री
की तस्वीर को घूरती
सरकारी अस्पताल में
बिना इलाज मरे नवजात की लाश

इन सबके बीच
इन सबसे बेखबर
विकास के दावों की होर्डिंग्स
निहारता मैं
और मन में दृढ करता चलता यह विश्वास
कि हां २०२० में
हम विकसित हो ही जाएँगे
दिल को
बहलाने को ग़ालिब ....................

मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com

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