रविवार, 17 फ़रवरी 2008

सपने बीनने वाला


सड़क पर पडा

बादलों से झांकती

धूप का एक टुकडा

जिसे बिछा कर

बैठ गया वो

उसी सड़क के

मोड़ पर

घर पर अल सुबह

माँ के पीटे जाने के

अलार्म से जागा

बाप की शराब के

जुगाड़ को

घर से खाली पेट भागा

बहन के फटे कपड़ो से

टपकती आबरू

ढांकने को

रिसती छत पर

नयी पालीथीन

बाँधने को

बिन कपड़े बदले

बिन नहाए

पीठ पर थैला लटकाए

स्कूल जाते

तैयार

प्यारे मासूम

अपने हम उम्रो

को निहारता

बिखरे सपनो को

झोली में

समेटता

ढीली पतलून

फिर कमर से लपेटता

जेब से बीडी निकाल कर

काश ले

हवा में

उछाल कर

उडाता

अरमानों को

जलाता बचपन को

मरोड़ता

सपनो को

चल दिया

वो उठ कर

समेत कर

वह एक टुकडा

धूप का

वही बिछा है

अभी भी

देख लें जा कर कभी भी

वो सुनहरा टुकडा

अभी भी वही है

पर

उस पर बैठा बच्चा

अब नही है !!!!


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